VIDEHA

‘विदेह’ ४३ म अंक ०१ अक्टूबर २००९ (वर्ष २ मास २२ अंक ४३)

In maithili on October 22, 2009 at 11:30 pm

वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own scriptRoman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi
एहि अंकमे अछि:-
१. संपादकीय संदेश

२. गद्य

२.१. कथा- बहीन -जगदीश प्रसाद मंडल
२.२. अनमोल झा- लघुकथा
२.३.उपन्यास-उत्थान-पतन

२.४.कथा-फ्यूज बल्व कुमार मनोज कश्यप
२.५. पन्ना झा-असामान्य के
२.६.संस्कार गीत/ लोक गीत नाद-जगदीश प्रसाद मंडल
२.७. -नवेन्दु कुमार झा-सेमीफाइनलमे धाराशायी भेल राजग
२.८. हेमचन्द्र झा-मास्टर साहेब नहि रहलाह

३. पद्य

३.१. गुंजन जीक राधा

३.२. पंकज पराशर
३.३. सुबोध कुमार ठाकुर
३.४.उमेष मंडल (लोकगीत-संकलन)
३.५.कल्पना शरण-प्रतीक्षा सँ परिणाम तक-५
३.६.विजया अर्याल-आजुक जीवन
३.७.सरोज खिलाडी-मनक बात मनमे
३.८. दयाकान्त-बाढ़ि

४. मिथिला कला-संगीत-कल्पनाक चित्रकला

५. गद्य-पद्य भारती -पाखलो (धारावाहिक)-भाग-६- मूल उपन्यास-कोंकणी-लेखक-तुकारामरामा शेट, हिन्दी अनुवाद- डॉ. शंभु कुमार सिंह, श्री सेबी फर्नांडीस, मैथिली अनुवाद-डॉ. शंभु कुमार सिंह

६. बालानां कृते- देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स)२.कल्पना शरण:देवीजी.
७. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.]

8. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS (Festivals of Mithila date-list)

8.1.Original poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Lucy Gracy from New York
8.2. where lies the fault- maithili story by shyam darihare translated by Praveen k jha

9. VIDEHA MAITHILI SAMSKRIT EDUCATION(contd.)

विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link.
विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे
Videha e journal’s all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions

विदेह आर.एस.एस.फीड।
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अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू।
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मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू।

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VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव

भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र ‘मिथिला रत्न’ मे देखू।

गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू ‘मिथिलाक खोज’।

मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू “विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण”।
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१. संपादकीय
नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा स्वातंत्र्योत्तर मैथिली कविता संकलन अक्खर खम्भा (सम्पादक देवशंकर नवीन) केँ सर्वश्रेष्ठ प्रोडक्शनक पुरस्कार प्रगति मैदान दिल्लीक 2009 अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक मेलादिससँ देल गेल अछि। अक्खर (अक्षर ) खम्भा (संचयन) [तिहुअन खेत्तहि काञि तसु कित्तिवल्लि पसरेइ। अक्खर खम्भारम्भ जउ मञ्चो बन्धि न देइ॥कीर्तिलता प्रथमः पल्लवः पहिल दोहा। माने जे अक्षररूपी स्तम्भ निर्माण कए ओहिपर (काव्यरूपी) मंच नहि बान्हल जाए तँ एहि त्रिभुवनरूपी क्षेत्रमे ओकर कीर्तिरूपी लता (वल्लि) प्रसारित कोना होयत।] मे नामक अनुरूप ६१ कविक २९५ टा कविता संकलित अछि, अन्तमे कवि लोकनिक संक्षिप्त परिचय सेहो देल गेल अछि। एहिमे काशीकान्त मिश्र “मधुप” ( अनुक्रममे नाम बोल्डफेस नहि रहने सोझाँक पृष्ठ संख्या नहि आयल अछि) आ शिवेन्द्र दास (हिनकर संक्षिप्त परिचय सयोगसँ छुटि गेल छन्हि)सेहो सम्मिलित छथि। एहि संग्रहमे सम्मिलित अछि:

सीताराम झा
हमरा क्यो कहलनि
कांचीनाथ झा ‘किरण’
माटिक महादेव, जय महादेव, अर्जुन, कृष्ण
तन्त्रानाथ झा
धनछूहा, नूतन वत्सर (साॅनेट)
काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’
घसल अठन्नी
सुरेन्द्र झा ‘सुमन’
दायित्व, नारी-वर्णना नयन, देश, स्वदेश
वैद्यनाथ मिश्र यात्राी
एहि घर पर बैसल रहए गिद्ध, ओ तँ थिकाह दधीचिक हाड़, आजुक महाकारुणिक बुद्ध, ओ ना मा सी धं!, पत्राहीन नग्न गाछ, अखाढ़, बीच सड़क पर, जगतारनि!, पसेनाक गुण-धर्म, बाँसक छाहरि,ताड़क गाछ, देशदशाष्टक, परम सत्य, सिंहवाहिनी दशभुजा चण्डी
आरसी प्रसाद सिंह
बाजि रहल अछि डंका
ब्रजकिशोर वर्मा ‘मणिपर्’िं
तखन कोन सोना केर मोल, कवि-कोकिलसँ भेंट
गोविन्द झा
युग-पुरुष, अन्न देवता
रामकृष्ण झा ‘किसुन’
खिस्सा-पिहानी, प्रतिवादक स्वर, अनुत्तरित, खुटेसल
चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’
देखहक हौ गाँधी बाबा, नेतावचनामृत, युगचक्र
राजकमल चैधरी
सीता मृत्यु: अहिल्याक जन्म, इजोरिया धनुकाइन, निन्न ने टूटए, बन्धन मोक्ष, तथाकथित परम्परावादीक प्रति, महावन, कवि परिचय, गामक नाम थिक पुरबा बसात पछबा बसात, पति-पत्नी कथा, उपमा, दृष्टि उत्थापन
मायानन्द मिश्र
मूल्य, पैघत्व, हमर पीढ़ी, इतिहासक गली, चिन्ता, ताजा खबरि
सोमदेव
कर्मनाशा, की लिखल छनि वैदेहीक कपारमे, कीलन, तैयो जुलूस नहि रुकल, महाभिनिष्क्रमण,किछु भ’ सकैछ
धीरेन्द्र
मनुक्ख आ मशीनी आदमी, हमर जिनगी, चलि रहल छी, की हेतै?, सत्य, गुरु द्रोणक प्रति
हंसराज
गन्ध, ईश्वर, अन्वेषण
रामदेव झा
निर्जल मेघ, भारत-जननी
धूमकेतु
कविता, मुक्ति, मुदा
कीर्तिनारायण मिश्र
हेराएल अस्तित्व, ओ अएलाह!, एहि लेसल शरीरकें
जीवकान्त
बस्तीक स्त्राी, माटि भेल मृदुल, आबि रहल छथि सूर्य, शुभ हो, किरिन एक मुट्ठी भरि, नचैत ग्लोब जकाँ, खदकैत रही रसमे
रमानन्द रेणु
व्यक्ति, कहिया धरि,
गंगेश गुंजन
बाजार-कालमे मन, प्रेम लेल सब किछु, रातिक पेट, शब्द: एक, शब्द: दू, छोट-छोट पैघ लोक,स्वाधीनता, विजय पर्व: आॅपरेशन टेबुल पर, जुआएल लोकतन्त्रामे दादी-पोता, अचार समाचार,मेघक गाछ
वीरेन्द्र मल्लिक
सावधान, होशियार, शून्य काल, नक्सालइट, बंगाल बन्द, हे हमर अग्रज शान्त भ’ जाउ
रवीन्द्रनाथ ठाकुर
परिचय, बचू, चित्रा-दर्शन, भोर भेल भोर…
रामानुग्रह झा
एलेक्ट्रिक गर्ल, मधुमाछीक खोता आ हम, युद्ध आ शान्ति
मार्कण्डेय प्रवासी
दू-चारि दिनक ई यात्रा अछि, बौक अछि गाम हमर, आउ हम वसन्तकें बजाबी
कुलानन्द मिश्र
ओना कहबा लेल बहुत किछु छल हमरा लग, ऊष्माक जोगाड़, राति भरि बरखा भेलै’ए, बिसरल वसन्त शोर पाड़लक’ए, शपथ छनि गौतम तापसकें, उत्तरक प्रतीक्षामे
भीमनाथ झा
लंगूर, मुदा उड़लै कहाँ परबा?, समाचार दर्शन
मन्त्रोश्वर झा
पूजा, अन्हराक लकड़ी, छिपकली, एकटा शून्य अछि, नवका नवका सत्य
उदयचन्द्र झा ‘विनोद’
यात्रासँ पूर्व, नीरव बालिका, डाइन, विकास, स्त्राी
उपेन्द्र दोषी
स्वागत हे…, कोना चलत ई घर?, जाड़क रौद, आत्म-कथ्य
रामलोचन ठाकुर
लाख प्रश्न अनुत्तरित, सौंदर्य-बोध, इतिहासमे नइं छै
नचिकेता
विरोध समुद्रसँ, ऋतु-विशेष, पृथ्वी पर, एक अहीं छी, नामकरण, भीतर उगैत शब्द
बुद्धिनाथ मिश्र
गरहाँक जीवाश्म, चलला गाम बजार, लोकसभासँ शोकसभा धरि, रेड रिबन एक्सप्रेस, जनी जाति
महाप्रकाश
नंगटा नेना, पन्द्रह अगस्त, जूता हमर माथ पर सवार अछि, सूर्य महाकाल अछि, मृत्युक रंग,रंगसँ इतर की अछि?, पहाड़-समुद्र भेल जीवन, शब्द नहि होयत शिखण्डी, नव सदीक चेहरा,हुलसि क’ करब स्वागत
सुकान्त सोम
निषेधाज्ञा, आगिक बेगरता, निज संवाददाता द्वारा, एकटा युद्धक तैयारी
पूर्णेन्दु चैधरी
चारि गोट कविता, स्वार्थक शुभ-लाभ,
महेन्द्र
बहुत अछि अपना लेल…, बाट अछि निस्तब्ध…, समय, नखदर्पण में नित्तह, अन्हारक अन्हार…
ललितेश मिश्र
एकटा जारज युद्ध, नियति, एकटा भ्रान्त संकल्प, मिथ्या परिचय, कामना गीत
विभूति आनन्द
एहि तरहें अबैत अछि भोर, धनछूहा, विडम्बना, तैयार अछि पृथ्वी, इच्छा, हाक
हरेकृष्ण झा
जिमूतवाहन, अकाजक काज, छागदान, एना त नहि जे, अनेरे
अग्निपुष्प
इजोतक लेल, भोर, की चुनू, सदानीराक स्नेह, दादागिरी, स्नेहक समस्त सुर
अशोक
मोछ, दाँत, बुधियार, ई के सोर करै’ए?, फेरसँ,
शिवशंकर श्रीनिवास
लाठी, बाढ़िक पानि घटि रहलै’ए, कनेक काल लेल, रामधन राम चैठी पासवान, अहाँक नहि आएब
तारानन्द वियोगी
मीता, अहाँक हँसी; पितामहसँ, बागडोरामे भिनुसरबा, बाबा, प्रभु राग, संलग्न, अद्वैत, मिथिलाक लेल एक शोक-गीत, बुद्धक दुख
केदार कानन
हमर भावी पीढ़ी, हमरा चाही ओ हाथ एक बेर, जनताक कवि, भरि घर भोरका हवा, बिझाएल ह’रक फार, एतएसँ ओतए धरि
रमेश
कोसी सरकार, आदि कथा, ओइ पार अइ पार, मरसीया, कोसीकनहाक आम बात: कोसिकनहाक खास बात, गाम, बजार
विवेकानन्द ठाकुर
गिद्ध बैसल मन्दिर, भूख आ पियासक अर्थ
सियाराम सरस
एक आँखि कमल दोसर अढूल, सत्यसँ साक्षात्कार
देवशंकर नवीन
माइक कथा, मजूर, उखड़ल गाछ, कने रोकि लिअनु हुनकर मृत्यु, झरना, दुनियाँ-दारी, समाचार,बिज्जू स्त्राीवाद, तराजू
नारायण जी
निर्बल भोगत जीव-सुख भुवनमे, कोसी, पैंजाब हमर अँगनाक गीतनाद छी, जल धरतीक अनुरागमे बसैत अछि, पृथ्वी मोन रखैत अछि प्रेम, पृथ्वीमे हाथसँ अर्पित करैत अभिलाषा
ज्योत्स्ना चन्द्रम
पुल, वैदेहीक नाम, अक्षर-पुरुषक दुहिता, छठि, फराक-फराक नहि सोचब
सुस्मिता पाठक
कखन होएत भोर, हमर कविता, हमर निस्तब्धताकें थपकी दैत अछि चान, हथियार, कत’सँ शुरू करू, भोरक खोजमे
शिवेन्द्र दास
पाइ, सम्भावना, विरोधक कविता
विद्यानन्द झा
गामसँ पत्रा, हम आ अहाँ, एहना समयमे, मृत पितासँ वात्र्तालाप, खिचकाहनिमे चलैत, बहतरा भ’जाइत अछि लोक, टीवी
कृष्णमोहन झा
अहाँ बिसरि जाएब हमरा, नर्क-निबारन-चतुर्दसी, स्त्राीक आँखिएँ, एक दिन, ओहि स्त्राीक कानब
रमण कुमार सिंह
उलटबाँसी, फेरसँ हरियर, किछु अंतरंग मित्राक प्रति, आस्थाक गीत, सड़क बनौनिहार,
अहीं सभ लेल
अविनाश
सभ दिन रातिमे, की हम पछुआएल छी, कहबाक कला होइ छै, सन्दिग्ध विलाप
पंकज पराशर
बिहाड़िक बीच बाट तकैत, राग मालकोश, मारु(ख) विहाग, खयाल, ध्रुपद
अजित आजाद
मृतकक बयान, लिंग भेद, बारूदक विरोधमे, पिताएल छथि प्रभुगण, अघोषित युद्धक भूमिका
कामिनी
अन्हारक सत्ता, चारि पाँती, छौंड़ीक आँखिमे, मादा, दुनिया बड़ छोट छै
संगहि “विदेह” केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ १४ सितम्बर २००९) ८५ देशक ९२३ ठामसँ ३०,४२४ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी.सँ २,००,६७५ बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण।

गजेन्द्र ठाकुर
नई दिल्ली। फोन-09911382078
ggajendra@videha.co.in
ggajendra@yahoo.co.in
२. गद्य
२.१. कथा- बहीन -जगदीश प्रसाद मंडल
२.२. अनमोल झा- लघुकथा
२.३.उपन्यास-उत्थान-पतन

२.४.कथा-फ्यूज बल्व कुमार मनोज कश्यप
२.५. पन्ना झा-असामान्य के
२.६.संस्कार गीत/ लोक गीत नाद-जगदीश प्रसाद मंडल
२.७. -नवेन्दु कुमार झा-सेमीफाइनलमे धाराशायी भेल राजग
२.८. हेमचन्द्र झा-मास्टर साहेब नहि रहलाह

जगदीश प्रसाद मंडल
कथा-
बहीन

‘आब अधिक दिन माय नहि खेपतीह। ओना उमेरो नब्बे बर्खक धत-पत हेबे करतनि। तहूँमे बर्ख पनरह-बीसेक सँ कहियो बोखार के कहे जे उकासियो
नहि भेलनि अछि। एक तऽ ओहिना पाकल उमेर तहि पर सँ देहक रोगो पछुआयल, तेँ भरिसक एहिबेरि उठि कऽ ठाढ़ हेबाक कम भरोस। किऐक तऽ एक न एक उपद्रव बढ़िते जाइत छन्हि। अन्नो-पानि अरुचिये जेकाँ भेलि जाइ छनि।’’ -भखरल स्वरमे राधे-श्याम पत्नीकेँ कहलथिन।
पतिक बात सुनि, कने काल गुम्म रहि, रागिनी बाजलि- ‘‘ककरो औरुदा तऽ कियो नहिये दऽ सकैत अछि। तहन तऽ जाधरि जीवैत छथि ताधरि हम-अहाँ सेबे करबनि की ने?’’

‘हँ, से तँ सैह कऽ सकैत छियनि। मुदा जिनगीक कठिन परीक्षाक घड़ी आबि गेल अछि। एते दिन जे केलहुँ, ओकर ओते महत्व नहि जते आबक अछि। किएक
तँ कखनो पानि मंगतीह वा किछु कहतीह, तहिमे जँ कनियो विलंब हएत आ कियो सुनि लेत तँ अनेरे बाजत जे फल्लांक माय पानि दुआरे किकिहारि कटैत रहैत छथिन। मुदा बेटा-पुतोहू तेहन जे घुरि कऽ एको-बेरि तकितो नहि छन्हि। ककरो मुंहमे ताला लगेबै। देखिते छियै जे गाममे कोना लोक झुठ बाजि-बाजि झगड़ो लगबैत आ कलंको जोडै़त अछि। तेँ चैबीसो घंटा ककरो नहि ककरो लगमे रहए पड़त। जँ से नहि करब तऽ अंतिम समयमे कलंकक मोटरी कपार पर लेब।’’

‘‘कहलहुँ तँ ठीके, मुदा बच्चा सबहक हिसाबे कोन, तहन तँ दू परानी बचलहुँ। बेरा-बेरी दुनू गोटे रहब। अन्तुका काज अहूँ छोड़ि दिऔ। किएक तँ अंगनेक
काज बढ़ि गेल। बहीनो सभकेँ जनतब दइये दिअनु।’’
‘‘अपनो मनमे सैह अछि। जँ तीनू बहीनि आबि जायत तँ काजो बँटा कऽ हल्लुक भऽ जायत। ओना अंगना सँ दुआरि धरि काजो बढ़बे करत। किएक तँ जखने सर-
संबंधी, दोस्त-महिम बुझताह तँ जिज्ञासा करै अयबे करताह। जखन दरबज्जा पर औताह तँ सुआगत बात करै पड़त”।
मूड़ी डोलबैत रागिनी बजलीह- ‘‘हँ, से तँ हेबे करत।’’

‘‘एखन निचेन छी आ काजो करैऐक अछि। तेँ अखने तीनू बहीनियो आ मामोकेँ जानकारी दइये दैत छिअनि।’’
आन कुटुम्बकेँ एखन जानकारी देब जरुरी नहि छै। मोबाइलमे मामाक नम्बर लगौलक। रिंग भेलै।

‘‘हेलो, मामा। हम राधेश्याम।’’

‘‘हँ, राधेश्याम। की हाल-चाल?’’

‘‘माय, बड़ जोर दुखित पड़ि गेलीह।’’

‘‘एखन हम एकटा जरुरी काज मे बँझल छी। साँझ धरि आबि रहल छी।’’
मोबाइल बन्न कऽ राधेश्याम जेठ बहीनि गौरीक नम्बर लगौलक।

‘‘हेलो, बहीनि। माए दुखित पड़ि गेलथुन।’’

‘‘एखन हम स्कूलेमे छी आ अपनहुँ (पति) कओलेजे मे छथि। छुट्टीक दरखास्त दइये दैत छिअए। साँझ धरि पहुँच जायब।’’
मोबाइल बन्न कऽ छोटकी बहीनिक नम्वर लगौलक।

‘‘सुनीता। हम राधेश्याम।’’
‘‘भैया, माय नीके अछि की ने?’’
‘‘एखन की नीक आ कि अधलाह। तीनि दिनसँ ओछाइन धेने अछि। तेँ किछु कहब कठिन।’’
‘‘हम अखने छुट्टीक दरखास्त दऽ आबि रहल छी।’’
‘‘बड़बढ़िया’’ कहि मझिली बहीनि रीताक नम्बर लगौलक।
‘‘हेलो, रीता। हम राधेश्याम। माए, बड़ जोर दुखित छथुन।’’

‘भैया, हम तँ अपने तते फिरीसान छी जे खाइक छुट्टी नहि भेटैत अछि। काल्हिये सँ दुनू बच्चाक प्रतियोगिता परीक्षा छियै।’
बिना स्विच ऑफ केनहि राधेश्याम मोबाइल राखि अकास दिशि देखए लगल। ठोर पटपटबैत- ‘बच्चाक परीक्षा……, मृत्यु सज्जा पर माय….! केकरा प्राथमिकता देल जाय? एक दिशि, जे बच्चा एखन धरि जिनगीमे पैरो नहि रखलक, सौंसे जिनगी पड़ल छैक। दोसर दिशि कष्टमय जिनगीमे पड़ल बृद्ध माय। खैर, सभकेँ अपन-अपन जिनगी होइ छैक आ अपना-अपना ढ़ंग सँ सभ जीबै चाहैत अछि। हम चारि भाइ बहीनि छी तेँ ने दोसर पर ओंगठल छी। मुदा जे असकरे अछि, ओ कोना माए-बापक पार-घाट लगबैत अछि। किछु सोचितहि छल कि नव उत्साह मनमे जगल। नव उत्साह जगितहि नजरि पाछु मुहे ससरल। चारु भाइ-बहीनिमे माय सबसँ बेसी ओकरे(रीता) मानैत छलि आ ओकर सेबो केलक। कारणो छलैक
जे बच्चेसँ ओ रोगा गेल छलि। मुदा आश्चर्यक बात तँ ई जे जेकरा माय सभसँ बेसी सेवा केलक वैह सभसँ पहिने बिसरि रहलि अछि।

गोंसाइ डूबैत-डूबैत मामो आ दुनू बहीनि-बहिनोइ पहुँच जाइ गेलथिन।
अबितहि डॉ. सुधीर(छोट बहिनोइ) आला लगा माए(सासु) केँ देखि कहलखिन-‘‘भैया, माए बँचतीह नहि। मुदा मरबो दस दिनक बादे करतीह। तेँ एखन ओते घबड़ेबाक बात नहि अछि। अखन हम जाइ छी, मुदा बहीनि(डॉ. सुनिता) रहतीह। ओना हमहूँ दू दिन-तीन दिनपर अबैत रहब।’’

डॉ. सुधीरक बात सुनि सभकेँ क्षणिक संतोष भेलनि।
मामा कहलखिन- ‘‘भागिन, ओना हम ककरो छींटा-कस्सी नहि करैत छिअनि मुदा अपन अनुभवक हिसाबे कहैत छिअह जे भरि दिन तँ स्त्रीगण सब मुस्तैज
रहथुन मुदा राति मे नहि। ओना हमरो गाम बहुत दूर नहिये अछि। एखन तँ धड़फड़ाइले चलि एलहुँ। तेँ एखन जाइ छी। काल्हि सँ साँझू पहरकेँ अयबह आ भोर कऽ चलि जेबह। भरि राति दुनू माम-भगिन गप-सप करैत ओगरि लेब।’’
दुनू बहिनोइयो आ मामो चलि गेलखिन।

‘‘आइ सातम दिन माएकेँ अन्न छोड़ब भऽ गेलनि। दू-चारि चम्मच पानि आ दू-चारि चम्मच दूध, मात्र अधार रहि गेल छनि।’’ -आंगनसँ दरवज्जापर आबि रागिनी पतिकेँ कहलथिन। पत्नीक बात सुनि राधेश्याम मने-मन सोचै लगलाह। मन मे उठलनि चारु भाइ-बहीनिक पारिवारिक जिनगी। कतेक आशासँ दुनू गोटे(माए-पिता) हमरा चारु भाइ-बहीनि केँ पोसि-पालि, पढ़ा-लिखा, वियाह-दुरागमन करा परिवार ठाढ़ कऽ देलनि। जहिना गौरी(जेठ बहीनि) एम.ए. पास अछि। तहिना एमए.पास बहिनोइयो छथि। हाई स्कूलमे बहीन नोकरी
करैत अछि तँ कौलेजमे बहिनोइ। परिवारक प्रतिष्ठा, समाजोमे बढ़वे केलनि जे कमलनि नहि। तहिना छोटकियो बहीनि अछि। बहीनो डॉक्टर आ बहिनोइयो डॉक्टर।
तहिना तँ पिताजी मझिलियो बहीनि केँ केलनि। दुनू परानी इंजीनियर। बम्बईमे दुनू गोटे नोकरी करैत।

जहिना तीनू बहीनि पढ़ल-लिखल अछि तहिना बहिनोइयो छथि। अजीव नजरि पितोजीक छलनि। मनुष्यक पारखी। तेँ ने बहीनिक विआह समतुल्य बहिनोइक संग केलनि। एक माए-बापक तीनू बेटी, पढ़ल-लिखल, एक परिवारमे पालल-पोसल गेलि, मुदा तीनूक विचारमे एते अंतर कोना अबि गेलै। एहि प्रश्नक जबाव राधेश्यामकेँ बुझैमे अयबै नहि करनि। मन घोर-घोर होइत। एक दिशि माइक
अंतिम अवस्थापर नजरि तँ दोसर दिशि मझिली बहीनिक व्यवहार पर।

विचारक दुनियाँमे राधेश्याम औनाय लगलाह। प्रश्नक जबाब भेटिबे ने करनि। अपन परिवार पर सँ नजरि हटा बहीनि सभक परिवार दिशि नजरि दौड़ौलनि।
गौरीक ससुर उमाकान्त हाई स्कूलक शिक्षक रहथिन। अपने बी.ए. पास मुदा पत्नी साफे पढ़ल-लिखल नहि। नामो-गाम लिखल नहि अबनि। ओना पिता पंडित रहथिन। मुदा बेटी कऽ परिवार चलबैक लूरिकेँ बेसी महत्व देथिन। जाहिसँ कुशल गृहिणी तँ बनि जाइत, मुदा ने चिट्ठी-पुरजी पढ़ल होइछै आ ने लिखल। ओना जरुरतो नहि रहै। किऐक तऽ ने पति-पत्नीक बीच चिट्ठी-पुरजीक जरुरत आ
ने कुटुम्ब-परिवारक संग। मुदा दुनू परानी उमाकान्त आ सरिताक बीच असीम स्नेह। मास्टर सैहब केँ अपन बाल-बच्चा सँ लऽ कऽ विद्यालयक बच्चा सभकेँ
पढ़बै-लिखबैक मात्र चिन्ता। जहि पाछू भरि दिन लगलो रहथि। जखन कि पत्नी सरिता परिवारक सभ काज सम्हारैत। एखनुका जेकाँ लोकक जिनगियो फल्लर नहि, समटल रहै। गौरीक परिवार पर सँ नजरि हटा राधेश्याम छोटकी बहीनि डॉ. सुनिताक परिवारपर देलनि। जहिना बहीनि डॉक्टरी पढ़ने तहिना बहिनोइयो। जोड़ो बढ़ियाँ। सुनिताक ससुर बैद्य रहथिन। जड़ी-बुट्टीक नीक जानकार। जहिना जड़ी-बुट्टीक जानकार तहिना रोगो चिन्हैक। जहि सँ समाजमे प्रतिष्ठो नीक आ जिनगियो नीक जेकाँ चलनि। तेँ अपन चिकित्साक वंशकेँ जीवित रखैक दुआरे बेटाकेँ डॉक्टरी पढ़ौलनि। पत्नियो तेहने। अंगनाक काज सम्हारि, बाध-बोन सँ जड़िओ-बुट्टी अनैत आ खरलमे कुटबो करैत रहथि। दवाइ बैद्यजी अपने बनाबथि
किऐक तँ मात्राक बोध गृहिणी केँ नहि रहनि। छोटकी बहीनिक परिवार पर सँ नजरि हटा मझिली बहीनिक परिवारपर देलनि। रीताक ससुर मलेटरिक इंजीनियरिंग विभागमे हेल्परक नोकरी करैत। अपनहि विचार सँ मलेटरिऐक बेटी सँ विआहो केने- लभ-मैरिज । मलेटरिक नोकरी, तेँ पाइयो आ रुआबो। हाथमे सदिखन हथियार तेँ मनो सनकल। मुदा बेटा-बेटीकेँ नीक जेकाँ पढ़ौलनि। जहिना रीता इंजीनियरिंग पढ़ने तहिना घरोवला। दुनू बम्वईक कारखानामे नोकरी करैत। कमाइयो नीक खरचो नीक, तहिना मनक उड़ानो नीक। एकाएक राधेश्यामक
मनमे उठल जे आब तँ माइयक अंतिमे समय छी तेँ एक बेरि रीताकें फेरि फोन कऽ कऽ जानकारी दऽ दिअए। मोवाइल उठा रीताक नम्वर लगौलनि। रिंग भेल।

‘‘हेलो, हम राधेश्याम।’’
‘‘हेलो, भैया। अखन हम स्टाफ सबहक संग काजमे व्यस्त छी।’’

रीताक जबाव सुनि राधेश्याम सन्न रहि गेलाह। रातिक दस बजैत। इजोरियाक सप्तमी अन्हार-इजोतक बीच घमासान लड़ाइ छिड़ल। किछु पहिने जहि चन्द्रमाक
ज्योति अन्हारपर शासन करैत, वैह चन्द्रमा पछड़ि रहल अछि। तेज गति सँ अन्हार आगू बढ़ि रहल अछि।

तहि बीच छोटकी बहीन डॉ. सुनीता आंगनसँ आबि भाइ राधेश्यामकेँ कहलक-‘‘भैया, हम तँ भगवान नहि छी, मुदा माइयक दशा जहि तेजी सँ बिगड़ि रहल
छनि, तहि सँ अनुमान करैत छी जे काल्हि साँझ धरि परान छुटि जेतनि।’’

एक दिशि माइक अंतिम दशा आ दोसर दिशि रीताक बिचारक बीच राधेश्यामक धैर्यक सीमा डगमग
करै लगलनि। विचित्र स्थिति। जिनगीक तीनिबट्टी पर
वौआइ लगलाह। तीनिबट्टीक तीनू रस्ता तीनि दिस जाइत।
एक रास्ता देवमंदिर दिशि जाइत त’ दोसर दानवक काल
कोठरी दिशि। बीचक रास्ता पर राधेश्याम ठाढ़। एकाएक
निर्णय करैत राधेश्याम बहीनि सुनिता क’ कहलखिन-
‘‘कने गौरियो क’ बजाबह।’’

आंगन जा सुनिता गौरी क’ बजौने आयलि। दुनू
बहीनिक बीच राधेश्याम बजलाह- ‘‘बहीनि, जहिना हमर
बहीन रीता तहिना त’ तोड़़ो सबहक छिअह। तेँ, तोहूँ सब
एक बेरि फोन लगा मायक जानकारी द’ दहक। हम
निर्णय क’ लेलहुँ जे जहिना एहि दशा मे मायक रहनहुँ,
ओकरा अपन धिया-पूता सँ अधिक नहि सुझैत छैक
तहिना हमहूँ ओकरा भरोसे नहि जीबैत छी। तेँ जँ माय
के जीवित मे नहि आओत त’ मुइलाक बाद नहो-केश
कटबैक जानकारी नहि देबइ। हमरा-ओकरा बीच ओतबे

काल धरि संबंध अछि जते काल मायक प्राण बँचल छैक।
कहलो गेल छैक ‘‘भाइ-बहीनि महीसिक सींग, जखने
जनमल तखने भिन्न।’’ मन त होइत अछि जे भने ओ
एखन स्टाफ सभक बीच अछि, तेँ एखने सभ बात कहि
दियै। मुदा कहनहुँ त’ किछु भेटत नहि, तेँ छोड़ि दैत
छियै।’’
जहिना अकास मे उड़ैत चिड़ै के बंश रहितहुँ परिवार नहि
होइछै तहिना जँ मनुक्खोक होइ त अनेरे भगवान किऐक
बुद्धि-विवेक दइ छथिन। किऐक नहि मनुक्खो केँ
चिड़ैइये-चुनमुनी आ कि चरिटंगा जानवरेक जिनगी जीबए
देलखिन।’

बजैत-बजैत राधेश्यामोक आ दुनू बहीनियोक करेज
फाट’ लगलनि। आंखि स’ नोर टघरै लगलनि। भाइ-बहीनिक
टूटैत संबंध स’ सभ अचंभित हुअए लगलथि। सभहक
हृदय मे रीता नचै लगलनि। बच्चा स’ वियाह धरिक
रीताक जिनगी सभहक आंखिमे सटि गेलनि। एक दिशि
रीता बम्बईक घोड़दौड़ जिनगीक प्रतियोगितामे आगू बढ़ै
चाहैत छलि त’ दोसर दिशि देवाल मे टांगल फोटो जेँका
सबहक हृदय मे चुहुट क’ पकड़ने। जहिना बाँसक झोंझ स
बाँस काटि निकालै मे कड़चीक ओझरी लगैत तहिना ध् ि
ाया-पूताक ओझरी मे रीता।

‘तीनू ननदि-भौजाई(गौरि, सुनिता आ रागिनी)
माय लग बैसि मने-मन सोचै लगलीह। कियो-ककरो
टोकैत नहि। तीनू गुमसुम। सिर्फ आंखि नाचि-नाचि
एक-दोसर पर जाइत। मुदा मन श्वेतबान रामेश्वरम्
जेँका। एक दिशि जिनगी रुपी भूमि(स्थल) जेँका विशाल
भूभाग देखैत त दोसर दिशि मृत्यु रुपी अथाह समुद्र। यैह
थिक जिनगी आ जिनगीक खेल। जहि पाछु पड़ि लोक
आत्मा क’ बलि चढ़वैत। तहि बीच माय बाजलि-
‘रीता…..।’ रीताक नाम सुनि तीनूक हृदय मे ऐहेन
धक्का लगलनि जहि स तीनू तिलमिला गेलीह।

रातिक एगारह बजैत। गामक सब सुति रहल।
इजोरियो डुबै पर। झल-अन्हार। दलानक आगू मे, कुरसी
पर बैसि राधेश्याम आंखि मूनि अपन वंशक संबंध मे
सोचैत रहथि। मन मे अयलनि जे आइ सप्तमीक चान
डुबि रहल अछि, अन्हार पसरि रहल अछि, मुदा कि
कल्हुका चान आइ स’ कम ज्योतिक होएत? की अगिला
ज्योति पैछला अन्हारक अनुभव नहि करत? सब दिन स’
अन्हार-इजोतक बीच संघर्ष होइत आयल अछि आ होइत

3

रहत। फेरि मन मे उठलनि जे आजुक राति हमरा लेल
ओहन राति अछि जे भरिसक मायक जिनगीक अंतिम
राति होएत। जनिका संग हजारो राति बीतल ओहि पर
विराम लगि रहल अछि। विचारक दुनियाँ मे उगैत-डूबैत
राधेश्याम। तहि काल शबाना पोतीक संग पहुँचलीह।
दलान-आंगनक बीच रास्ता पर दुनू गोटे चुपचाप
ठाढ़ि। दुनू डेरायल। राधेश्याम आंखि मुनने तेँ नहि
देखैत। परोपट्टा मे हिन्दु-मुसलमानक बीच तना-तनी।
जहि डर स शबाना दिन के नहि आबि अन्हार मे
आयलि। किऐक त सरोजनीक स्नेह खींचि क ल’
अनलकें। रेहना शबाना क’ कहलक- ‘‘दादी, अइठीन
किअए ठाढ़ छीही, अंगना चल ने?’’

रेहनाक अवाज सुनितहि राधेश्याम आंखि
तकलनि त दुनू गोटे क’ ठाढ़ देखलनि। पुछलथि-
‘‘के?’’
शबाना बाजलि- ‘‘बेटा, राधे।’’

‘‘मौसी।’’

‘‘हँ’’

‘‘एत्ती राति क’ किऐक अलेहें?’’

‘‘बौआ, से तू नै बुझै छहक जे गाम-गाम मे केहेन
आगि लागि रहल छैक। पाँचम दिन सुनलौ जे बहीनि
बड़ जोड़ अस्सक छथि। जखने सुनलहुँ तखने मन भेल
जे जाइ। मुदा की करितौ? मन छटपटाइ छलै। बेटा क’
पुछलियै त कहलक जे से तू नै देखै छीही रस्ता-बाटमे
इज्जत-आवरुक लुटि भ’ रहल अछि। मार-काट भ’
रहल अछि। ऐहन स्थिति मे कोना जेमए। मुदा मन नै
मानलक। जिनगी भरि दुनू बहीनि संगे रहलौ, आइ
बेचारी मरि रहल अछि त मुहो नै देखब? जी-जाँति
पोती के संग केने एलौ।’’

कुरसी पर स उठि राधेश्याम शबानाक बाँहि
पकड़ि आंगन दिशि बढ़ैत बहीनि क’ कहलथिन-
‘‘मौसी अयलखुन। पाएर धोय ले पानि दहुन।’’

राधेश्यामक बात सुनि दुनू बहीनियो(गौरी आ
सुनिता) आ रागिनियो घर स निकलि आंगन आइलि।
गौरी बजलीह- ‘‘मौसी, शबाना मौसी!’’
शबाना बजलीह- ‘‘हँ।’’

दुनू गोटे(शबानो आ रेहनो) पाएर धोय सोझे
बहीनि(सरोजनी) लग पहुँच दुनू पाएर पकड़ि कनै

लगलीह। कनैत देखि सरोजनी पुछलथिन- ‘‘कनैइ किअए
छेँ। हम कि कोनो आइये मरब? एत्ती राति क’ किअए
एलैहें?’’

शबाना बाजलि- ‘‘बहीनि, रस्ता-पेरा बन्न अछि। दू बर्ख
स’ भौरियो-बट्टा(घुमि-घुमि बेचनाइ) बन्न भ’ गेल। जखैन
से अहाँ द’ सुनलहुँ, तखैन स’ मन मे उड़ी-बीड़ी लगि गेल
तेँ दिन-देखार नै आबि चोरा क’ अखैन ऐलौहें।’’
सरोजनी बहुत कठीन सँ बाजलि- ‘‘धिया-पूता नीके छौ की
ने?’’
शबाना कहलकनि- ‘‘शरीर से ते सब नीके अछि, मुदा
कारबार बन्न भ’ गेल अछि।’’

‘‘गामो(नैहर) दिशि गेल छलेहें?’’

‘‘नै। कन्ना जायब….। तेसर सालक बाढ़ि मे अहूँक गाम
कटि क’ कमला पेट मे चलि गेल आ हमरो गाम कोसी मे।’
हमरो गाम भरना पर बसल हेँ आ अहूँक गाम कमलाक
पछबरिया छहरक पछबरिया बाध मे। घनश्यामपुर तक त’
रस्ता छइहो(छहिहो) मुदा ओइ से आगू रस्ते सब पर मोइन
फोड़ि देने अछि। पौरुका जे जाइत रही त लगमा लग मे डूबै
लगलौ।’
सरोजनी गौरी के इशारा सँ कहलक- ‘‘दाइ, बड़ राति
भेलइ। मौसी के खाइ ले दहक।’’
शबाना बाजलि- ‘‘बहीनि, पहिने हम कना खाएब? पहिने
बौआ (राधेश्याम) के खुआ दिऔ। खा क’ सुति रहत। हम
भरि राति बहीन से गप-सप करब। बहुत दिनक गप पछुआइल
अछि।’’

शबानाक बात सुनि राधेश्याम मने-मन सोचै लगल
जे दुनियाँ मे बहीनिक कमी नहि अछि। लोक अनेरे अप्पन
आ बीरान बुझैत अछि। ई सब मनक खेल छिअए। हँसी-खुशी
स जीवन बितबै मे जे संग रहए, ओइह अप्पन। शवाना क’
कहलक- ‘‘मौसी, माए त ने सिर्फ हमरे माए छी आ ने
अहींक बहीनि। सबहक अप्पन-अप्पन छिअए, तेँ कियो
अप्पन करत की ने?’’

पूबरिये घरक ओसार पर राधेश्याम सुतल। बाकी
सभ पूबरिया घर मे बैसि गप्प-सप करए लगलीह। गौरी
पुछलनि- ‘‘मौसी, अहाँ दुनू बहीनि त दू गामक छिअए। दुनू
गोरे मे चीन्हा-परिचय कहिया भेलि?’’
शबाना बाजनि- ‘जइहे(जहिहे) से ज्ञान-परान भेलि, तेहिये से
अछि। हमरा बाप आ तोरा नाना(कका) क’ दोसतियारै

4

रहनि। कोस भरि पूब हमर गाम(झगड़ुआ) अछि आ कोस
भरि पछिम बहीनिक। अखन त’ दुनू गाम उपटि क’
दोसर ठीन बसल अछि। मुदा पहिने बड़ सुन्दर दुनू गाम
छलै।

गौरी बाजलि- ‘‘मौसी, हम त बच्चे मे, बहुत दिन पहिने
गेल रही। तइ दिन मे त’ बड़ सुन्दर गाम रहए।’’
शवाना बजलीह- ‘‘हँ, से त रहबे करए। मुदा आब
देखवहक ते बिसबासे ने हेतह जे अइह गाम छिअए। हँ,
त कहै छेलिहह, काका केँ(गौरीक नाना) बहुत खेत-पथार
रहनि। चारि जोड़ा बड़द खुट्टा पर, चारि-पाँच टा महीसियो
रहनि। मुदा हमरा बाप के खेत-पथार नै रहै। गामे मे
खादी-भंडार रहए। सौंसे गामक लोक चरखोे चलबै आ
कपड़ो बीनए। सबसँ नीक कारीगर रहए हमर बाप।
घरक सब कियो सुतो काटी आ कपड़ो बनबी। सलगा,
चद्देरि, गमछी आ धोती बीनएमे हमरा बापक हाथ
पकड़िनिहार कियो नहि। बहीनिक गामक सब हमरे बाप
स’ कपड़ा कीनए। सौंसे गाम से अपेछा रहए। पाँचे-सात
वर्खक रही तहिये से बहीनिक(ऐठाम) अइठीन जेबो
करियै आ खेबो करियै।’’

शबानाक बात सुनि गौरी क अचरज लगलै।
मने-मन सोचै लगली जे एक त’ गरीब तहू मे मुसलमान।
तहि बीच दोस्ती। मुस्की दैत रागिनी बाजलि- ‘‘कोन
पुरना खिस्सा मौसी जोति देलखिन। ई कहथु जे दुनू
बहीनिक बिआह एक्के दिन भेलनि?’’
शबाना बाजलि- ‘धूर्र कनियाँ! अहाँ की बजै छी। हमरा
स’ बहीनि दू-तीन बरख जेठ छथि। बहीनिक वियाह से
दू वर्ख पाछु क’ हमर वियाह भेल। कक्का हमरा बाप के
कहलखिन जे पूबरिया आ दछिनवरिया इलाका कोशिकन्हा
भ’ गेल तेँ आब कथा-कुटुमैती उत्तरेभर करब नीक हैत।’
कन्ने गुम रहि, शबाना बाजलि- ‘‘बेटी, कपारक दोख
भेल। आब अपनो बुझै छी जे नैहरक काजक जे महौत(महत्व)
छेलै से अइ काजक(भौरीक) नै अछि। मुदा की करितियै?
अइ ठीन(सासुर) उ काज अछिये नहि। ने खादी-भंडार छै
आ ने कारोवार अछि।’’

मुस्की दइत रागिनी बाजलि- ‘‘मौसी, अपना वियाह मे
तँ हम कनिये टा रही। सब गप मनो ने अछि। हिनका त
मन हेतनि, विआह मे झगड़ा किअए भेल रहए?’’
कने काल गुम रहि शबाना ठाहाका मारि हँसि, बजै

लगलीह- ‘‘अहाँक बावू बड़ मखौलिया रहथि। हँसी-चैल
मे ककरो नइ जीतए देथिन। घरदेखी मे अयलथि। हम
दुनू बहीनि खूब छकौलिएनि। पीढ़ी तर मे खपटा, झुटका
आ रुइयाँ तरि क’ सेहो देलिएनि। खा क’ जहाँ उठलाह
कि एक डोल करिक्का रंग कपार पर उझलि देलिएनि।
मुदा हुनका लिये धनि सन। तहिना बरिआती मे ओहो
छकौलकनि। सबहक धोती मे चारि-पाँच दिनक सड़लाहा
खैर(खइर) लगा देलकनि। पहिने त बरिआती सब अपन
मे रक्का-टोकी केलक। मुदा जखन भाँज लगलै जे घरवारी
सबकेँ सड़लाहा खइर लगा देलक। तखन बरिआतियो सब
टूटल। मुदा कहे-कही भ’ क’ रहि गेलइ। मारि-पीटि नहि
भैल।’’ कहि हँसै लागलि। सभ हँसल।

राधेश्याम ओसार पर सुतल रहथि। मुदा एक्को
बेरि आंखि बन्न नहि भेलनि। किऐक त मन मे शंका
होइत जे अनचोके मे ने माय मरि जाय। खिस्से-पिहानी मे
राति कटि गेल।

भोर होइतहि शबाना राधेश्याम क’ कहलक-
‘‘बौआ, अपन मन अछि जे आब बहीनि क’ एक
काठी(लकड़ी) चढ़ाइये क’ जायब। मुदा गामे-गाम जे
आगि लगल देखै छिअए तइ से डर होइ अए।’’
राधेश्याम बजलाह- ‘‘मौसी, एहिठाम कियो किछु नहि
बिगाड़ि सकैत छओ। जहिया तक तोरा रहैक मन होउ,
निर्भीक स’ रह।’’
शवाना बाजलि- ‘‘बौआ, मन होइ अए जे बहीनिक सब
नुआ-बिस्तर हम खीचि दिअए। फेरि ई दिन कहिया
भेटत’’
राधेश्याम- ‘‘दुनू बहीनिक बीच हम की कहबौ। जे मन
फुड़ौ से कर।’’

इम्हर आब राधेश्यामक माय सरोजनीक टनगर
बोलो मद्धिम भेल जा रहल छलनि।

अनमोल झा (१९७०- )-गाम नरुआर, जिला मधुबनी। एक दर्जनसँ बेशी कथा, लगभग सय लघुकथा, तीन दर्जनसँ बेशी कविता, किछु गीत, बाल गीत आ रिपोर्ताज आदि विभिन्न पत्रिका, स्मारिका आ विभिन्न संग्रह यथा- “कथा-दिशा”-महाविशेषांक, “श्वेतपत्र”, आ “एक्कैसम शताब्दीक घोषणापत्र” (दुनू संग्रह कथागोष्ठीमे पठित कथाक संग्रह), “प्रभात”-अंक २ (विराटनगरसँ प्रकाशित कथा विशेषांक) आदिमे संग्रहित।
लघुकथा
अधिकार

-एकटा बात ध्यानसँ सुनि ले लखना,जऽ बेगारी नै खटमे हमर आ आबाज ऊँच कके बजमे तऽ बासडीह जे छउ तकरा खाली करऽ परतउ। हमर पुरखा तोरा बाप-पुरखाकेँ रैयतमे जमीनपर बसेने छला एहि उपकार ले जे तू हमरा मुँह लागल जबाब देमे।
-तकर माने की अहाँ हमर उपजल बोनि नै देब आ अहाँक बेट-भातिज हमर इज्जत दिस आँखि उठायत। हाथ-पैर तऽ तोड़ि देबै तकर। हँ रहल बासडीह बला सवाल से एतेक सस्ता नै छैक जे खाली करबा देब अहाँ। दस-बीस साल जे बटाइयो खेती करै छै तऽ सरकार कहै छै जे खेत ओकरे छियै आ दू पाँच पुरखासऽ जाहि डीहपर बसल छी हम सब से हम्मर नै! हाकिमक देल बासगीत परचा सेहो अछि हमरा लग।

जगदीश मंडल
उपन्यास:
उत्थान-पतनः

गामे-गाम, कतौ अष्टयाम कीर्तन तँ कतौ नवाह, कतौ चण्डी यज्ञ त’ कतौ सहस्र चण्डी यज्ञ होइत।
किसेक तँ एगारह टा ग्रह एकत्रित भऽ गेल अछि। की हैत की नइ हैत कहब कठिन। एकटा बाल ग्रह बच्चा
केँ भेने त’ सुखौनी लगि जाइत आ जहिठाम एगारह टा ग्रह एकत्रित अछि तइ ठाम त’ अनुमानो कम्मे हैत।
परोपट्टा भगवान नाम स गदमिसान होइत। जओ तील, घीउक गंध सँ हवा सुगन्धित। सभक हृदय मे भगवान
क स्वरुप बिराजैत। सभ व्यस्त। सभ हलचल। खरचाक कोनो इत्ता नहि। जना निसाँ लगला पर बेेहोशी होइत,
तहिना जाधरि लोक कीर्तन मंडलीक संग, मंडप मे कीर्तन करैत ताधरि घरक सब सुधि-बुधि बिसरि मस्त भ
रहैत। मुदा घर पर अबिते केयो भूखल गाय-महीसिक डिरिऐनाई सुनि, चिन्तित होइत त क्यो बच्चा केँ
बाइस-बेरहट ले ठुनुकब सुनि। व्यथा कऽ दबैत सब आखिक नोर होइत बहाबैत। चारि सालक रौदीक चलैत
पोखरिक पाइन सूखि गेल। नमहर-नमहर दरारि खेत स ल कऽ पोखरि धरि फाँटि गेल। इनारक मटिआइल पानि
भरि-भरि सब घैल मे रखि, जखन फड़िछाइत तखन गिलास, लोटा मे ल ल पीबैत। लोक की करत? कत्ते जायत?
मृत्युक मुह छोड़ि दोसर रस्ते की? आजुक कोलकत्ता ओ कलकत्त नहि जहिठाम अकाल आ समुद्री तूफान स
ढ़ेरो लोक मरैत छल। जकरा आइ अपन दोसर घर बुझि लोक जीवन-यापन करै जाइत अछि। आजुक पंजाब
ओ पंजाब नहि जहिठाम आन-आन राजक लोक जा खेत-खरिहान स कारखाना धरि खटि क परिवारक
भरण-पोषन करैत अछि। पंजाबक ओ दशा छल, जइठाम कल-कारखानाक कोन गप जे खेतक माटि गेउर रंगक
कंकड़ मिलल, बरखा स भेटि नहि होइत छल। साइते-संयोग साल मे कहिओ बरखा भऽ जाइ छलै। ओतुक्का
लोक पड़ा-पड़ा आन-आन राज जा हड़तोड़ मेहनत कऽ जीविका चलबैत। बम्बई आजुक मुम्बई नहि। ने सिनेमा
उद्योग छल ने कलकाखाना आ ने अखुनका जेँका कारोबार।

गंगानन्द केँ तीस बीघा जमीन। तीनि भाईक भैयारी आ सत्तर गोटेक आश्रम। जइ साल सबारी समय
समय होइत ओइ साल आश्रम चला, मलगुजारी दइयो के गंगानन्द केँ अन्न उगड़ि जाइत जकरा दू-सलिया ,
तीनि सलिया पुरान बना खाइत। सबाइयो लगबैत। पहिल सालक रौदी गंगानन्द केँ बुझि नहि पड़लनि। घर मे
धान-चाउर, गाय-महीसि ले बड़का-बड़का दू टा नारक टाल। पहिलुके जेँका गंगानन्दक मन हरियर। दोसर साल
घरक धान-चाउर लगिचायल। रौद मे, जहिना गाछक तोड़ल फूल मौलाइ लगैत तहिना गंगानन्द मौलाइ लगला।
कुटुम्बो-संबंधीक आवाजाही बढ़ि गेलनि। गंगानन्दक जेठ बेटी रीता सासुर बसैत। चारि बेटी आ एक बेटाक संग
रीता सेहो आबि गेलनि। रीताक जेठकी आ मझिली बेटी विआह करै जोकर। जँ कहिओ रीता कोनो काज मे
नैहर अबैत त काजक पराते सासुर जाइ ले धूम मचा दैत। किऐक त सासुरक सब भार रीते दुनू परानी पर।
भैयारी मे जेठ रहने घर से बहार धरिक सब तरद्दुत करय पड़ैत।

रौदीक चलैत रीता धिया-पूता ल’ छबो गोटे नैहर आयल। मासो सँ उपरे भ’ गेलैक मुदा सासुर जेवाक
चर्चे ने करैत। बाप-माय बेटीके कोना मुँह फोड़ि जाइ ले कहत। भरिआयल खरचा सँ गंगानन्द तेरे-तर कुहरैत।
छाती दलकैत। साल खेपब कठिन रहै। बरखाक कतौ पता नहि। सभ खेत परती भेला स’ पड़ल। ने हर जोतय
जोकर एकोटा आ ने पानिक कोनो दोसर उपाय। मने-मन रीता सोचए जे अगर सुमनक(जेठ बेटी) विआहक
चर्चा माए करत तँ ओकरे माथ पर पटकि देव। अपना बूते तँ वियाह पार लागव कठिन अछि।

सभ दिन साझू पहर क’ गंगानन्द चूड़ाक भूजा फँकैत छलाह। बीस मनिया कोठी टा मे चाउर बचल
छल। धान पहिने एठि गेल छल। धानक दुआरे चूड़ा कुटाओल कथीक जायत?गंगानन्दक पत्नी पार्वती पतिक
अभ्यास बूझि चाउर भूजि छिपली मे नेने एलखिन। भूजल चाउर देखि गंगानन्द मने-मन बुझि गेलखिन जे धान
सठि गेल। पुरान चाउर रहने भूजा पथरा गेल, तेँइ सक्कत रहै। पहिलुक फक्का मुँहमे लइते गंगानन्दक दाँत
सिहरि गेलनि। दाँत सिहरतहि गंगानन्द लोटाक पानि मुँहमे ल’ गुल-गुला केँ घोटलनि। मुँहक चाउर घोटि छिपली
आगू सँ घुसका देलखिन। मने-मन पार्वती अंदाजलनि जे सक्कत दुआरे भूजा नहि खा’ भेलनि। मुदा उपाय की?
गंगानन्द केँ तामस नहि उठलनि। जँ घरमे धान रहैत तँ चूड़ा कुटाओल जायत। नहि रहने कतए सँ आओत।

जहिना लकड़ी जरि केँ राख भेला पर षक्तिहीन भ’ जायत तहिना गंगानन्दक दषा भ’ गेल रहनि। गिलासमे चाह
नेने नातिन सुमन आइलि। दुनू परानीक नजरि सुमन पर पड़ल। चाह राखि सुमन आंगन चल गेलि। लग्गी भरि
हटि क’ बैसलि पार्वतीकेँ हाथ्क इषारा सँ गंगानन्द लग ऐवाले कहलनि। पार्वती बैसले-बैसल घुसुकि क’ लग
आयलि। फुस-फुसा क’ गंगानन्द पत्नीकेँ कहलखिन- ‘‘रीताक दुनू बेटी, जेठकियो आ मझलीयो वियाह जोकर
भ’ गेल। जँ कहीं एहिसाल एकोटा वियाह ठनलक तँ इज्जति वाँचव मोसकिल भ’जैत। हमहू तँ नने छियैक।’’

एखन धरि वार्वती अंगना सँ दलान धरि अवैत-जायत रहली हेन। एहि सँ अधिक नहि देखलनि। ने समय
भेटलैनि आ ने घरक नी अधला नीक अधला बुझल। नातिनक यिाह बुझि उद्गार सँ पार्वती कहलकनि- ‘‘यज्ञो
ककरो बाकी रहैत छै। यैह तँ भगवानक लीला छन्हि जे गरीब स’ ल’ क’ अमीर धरि सबहक काज होइते
जायछै।’’
चोटाइल साप जेँका गंगानन्दक दषा रहनि। दिन ससरब कठिन। तई पर सँ पत्नीक चढ़ल बात सुनि, केँचुआ
छोड़ैत सापक साँस तेज भ’ जाइत तहिना नमहर साँस छोड़ैत गंगानन्द कहए लागलखिन- ‘‘ऐहन दुरकाल मे जीवि
कठिन अछि तई पर वियाह सनक यज्ञ तहन तँ जकरा सिर पर जे काज अबैत छैक, कोनो ने कोनो तरहेँ करिते
अछि। दू सालक रौदीक झमार। अखनो धरि पानिक कोनो आषा नहि, पहिले ओ पार करब अछि। वियाह तँ
एक-आध साल आगूओ बढ़ाओल जा सकैत अछि।’’

ओलती लग ठाढ़ भ’ रीता माय-बापक फुसुर-फुसुर गप्प सुनैत। जखन गप्प मोड़ पर आयल कि रीता
आगू बढ़ि मायक लग आबि ठाढ़ भ’ गेलि। अपन बात क’ छिपबैत गंगाननद कठहँसी हँसि पत्नीकेँ कहए
लगलनि- ‘‘रीतोक बेटी वियाह करए जोकर भेल जाइछै?’’
मुँह निच्चा केने रीता बाजलि- ‘‘बावू, दुनू बहीन तरे-उपरे भ’ गेलि अदि। मुदा घरक जे दषा अछि तहिमे अखन
वियाह पार लागब कठिन अछि। जखन समय-साल सुधरतै तखन बुझल जेतै।’’
मने-मन गंगाननद सोचथि जे घरक भार पड़ला सँ सभ आगू-पाछू देखि किछु करैत। मूड़ी हिलबैत गेगानन्द
कहलखिन- ‘‘हँ, से तँ ठीके। अखन विवाह करबाक अनुकूल समयो ने अछि। सिर्फ हमरे टा नइ समाज मे बहुतोँ
के बेटी विवाह करै जोकर छै। सभक पार तँ भगवाने लगौथिन।’’
पिताक बात सुनि रीता क’ मोनमे षान्ति एलै। अपन परिवारक संबंध मे रीता पिताकेँ कहए लागलनि- ‘‘बावू
घरक हालत खराव भ’ गेल अछि। एक तँ दू-अढ़ाई बरखक रौदी दोसर सवांगो सभ उहिगर नहि ने क्यो
कमाई-खटाई बला नहि अछि। भरि दिन, कतौ बैसि क’ गप्प-षप्प लड़वैत दिन बितवैत छथि। जेना कोनो
धैन-फिकिर नहि। भैयारी मे जेठ रहने दुनू परानी काजक पाछु दिन-राति अपस्याँत रहैछी।’’

मास पूरए मे दू दिन रहल। राजक सिपाही केँ पटवारी अंतिम सूचना मालगुजारीक लेल पठौलक। सिपाही
आबि गंगानन्द केँ कहलकनि- ‘‘परसू तक जँ मालगुजारी नै देवइ तँ जमीन निलाम भ’ जायत। पटवारी अपन
जाति-बेरादर बुझि चुपचाप पठौलनि।’’
सिपाहीक समाचार सुनि गंगाननदकेँ हृदय मे ऐहन धक्का लागल जना कोनो राजाकेँ दुष्मन राज छीनि, भगा दैत।
छाती धकधकाइत! कंठ सुखैत गंगानन्द सिपाहीकेँ कहलक- ‘‘अखन जे दषा अछि तहि मे मालगुजारी देव असंभव
अछि। दोसर कोनो रास्तो ने सुझैत अछि।’’

गंगाननदक मजवूरी वुझति सिपाही कहलकनि- ‘‘एकटा उपाय अछि।’’

‘‘की?’’

‘‘पटवारी केँ वियाहै जोकर बच्चिाया छन्हि। अहाँ अपन बेटाकेँ बियाह क’ लिअ। देबो-लेब नीक जेँका
हैत। हुनके हाथक काज छन्हि जमीनक रसीद द’ देताह। क्यो बुझवो ने करत काजो भ’ जायत।’’

बचनाक आवाज सुनि, फुलिया जाँत चलौनाई रोकि, एक हाथ सँ हथरा पकड़ने,तकलक। बचनाक मोन,
जना धिया-पूताक हाथ सँ कौआ रोटी लपकि उड़ला पर होइत, तहिना रोगाइल मने बचना पत्नी(फुलिया) केँ

कहलक- ‘‘हम लक्ष्मीपुर(फुलिया नैहर, अपन सासुर) जँ कोनो गर जँ कोनो गर रुपैयाक लागि जायत त’ लगौने
अवै छी।’’
नैहरक नाम सुनि फुलियाक मनमे आनन्दक अंकुर अंकुरित होअए लागल मुदा विपत्त्कि चादरि ओकरा झाँपि
देलक। सोगाइल मने फुलिया बाजलि- ‘‘जाउ, कपार तँ फुटले अछि तइओ अपना भरि परियास करु। कपार
तँ उनटवो-पुनटवो करैछै जँ नीके गड़े उनटि जाय। कनिये थमि जाउ। रोटी पका दइ छी। खा के जायव।’’
मन्हुआइल बचना ठोर पटपटबैत बाजल- ‘‘बड़वढ़ियाँ। ताबे हमहू दौड़ले दाढ़ी बनौने अवैछी।’’

बचना दाढ़ी कटबैए ले विदा भेल। फुलिया जाँत लगक चिक्कस मुजेलामे उठौलक। चुल्हि लग मुजेला
राखि कोठी परसँ चिक्साही सूप अनलक। गठूलासँ जारन आनि चुल्हि पजारलक। नौवा गाममे नहि छल। मूडनक
पता देइ ले सुखेत गेल छल। बिना दाढ़ी कटौनहि बचना घुमि आवि, नहाए लागल। फुलिया रोटी पका, भाँटा
क’ सन्ना बनौलक। बचना हाँहि-हाँहि खा धोति-अंगा पहिर छाता ल’ लक्ष्मीपुर विदा भेल। वचना रास्तो चलै
आ मने-मन महावीरजी कँ सुमरैत कहलकनि- ‘‘हे महावीरजी काज भ’ जायत तँ अहाँ केँ एक रुपैया क’ चिन्नी
चढ़ाएव।’’ महावीरजी केँ कबूला करितहि जना बचनाक मोनमे विष्वास भ’ गेल जे काज हेबे करत। लक्ष्मीपुर
पहुँचते बचना सभक मन उदास मोन खसल छै! मुँ सँ फुफरी उड़ैछै। करेज पर पाथर राखि बचना सरहोजि सँ
पूछलक- ‘‘किऐक सभ अनोन-बिसनोन जेँका छथि।’’
नोराइल आँखिये सरहोजि उत्तर देलकनि- ‘‘पाहुन की कहब, खेतक मलगुजारी दू सालक पछुआयल छै। तई
दुआरे परसू सब खेत लिलाम भ’ जेतै।’’

सरहोजिक कलहंस बात सुनि बचना अवाक् भ’ गेल। ककर दुख के हरत! पाएरो ने धोय चोट्टे बचना
गाम घूमि गेल।

विसेसर घरक आगू मे रास्ता पर लोक सभ ठाढ़ रहै। रौदाइल विसेसर। हर जोेति कँ अबिते छल। हाथ
मे हरवाही पेना। माथ मे गमछाक मुरेठा बन्हने। फरिक्के सँ विसेसर सुनलक जे कचहरीक सिपाही बलजोरी बाड़ी
जा कदीमा तोड़ि लेलक। विसेसरक पत्नी मोहिनी कतबो मनाही केलकै सिपाही नहि मानलकै। मोहिनी आ
सिपाहीक बीच श्रक्का-टोकी होइते छल, कदीमा सिपाहीक हाथे मे रहै। धाँय-धाँय विसेसर चारि-पाँच पेना
सिपाहीके लगा, कदीमा छीन लेलक। गरिअबैत विसेसर कहलक- ‘‘बापक बाड़ी बुझि कदीमा तोड़ले। सिपाही
तू मालिकक छीही की हमर?’’
चाड़ि-पाँच गोटे मकड़ि विसेसरकेँ पकड़लक। दू-दू गोटे दुनू डेन पकड़ने तइओ जोष मे बिसेसर उठि क’ ठाढ़
भ’ हुरुकि-हुरुकि सिपाहीके मारक कोषिष करए। लोकक कहला सँ कनेक तामस विसेसरक कमल। गरिऔनाइ
बन्न केलक। मुदा तामसे ठोर पटपटैते। षान्त भ’ विसेसर बाजल- ‘‘अहाँ समाज मिलि पकड़लहुँ, मुदा पच्चीस
बेर सिपाहीकेँ कान पकड़ि उठाउ-बैसाउ। चाहे थुक फेकि चटबाउ जे फेरि ऐहन गल्ती नै करै। ई चोर छी।
लालीस क’ जहल से बाहर नै हुअए देवइ। राँड़-मसोमात हमरा बुझलक।’’

बिसेसरके मात्र दू कट्ठा घरारिये टा। सेहो बेलगान। दुइये गोटाक आश्रम। बेटा-पुतोहू भिन्न। एकटा
तेरह हाथक घर अपनो आ बेटो मिलाकेँ रहै। बाकी डेढ़ कट्ठा बाड़ी बनौने। मोहिनी अपन बाड़ी मे सभ दिन
राषि-राषि क’ तरकारी उपजबैत। बिसेसर बोइन करए। दुनू परानीक मिलानक चर्चा गामो मे होइत अछि। दुनू
गोटे अपन-अपन काज बँटने। भिनसुरका उखराहाक तीन सेर धान आ बेरका डेढ़ सेर दलिहन बोइन सभ दिन
विसेसर कमाइत। दुनू साँझ भरि पेट खाय निचेन सँ रहैए। कोनो हरहर-खटखट जिनगीमे नहि। दू सेर चारि
सेर घरो मे अन्न रहैत। साठि बर्खक विसेसर जुआन जेँका तनदुरुस्त। ने एकोटा दाँत टूटल आ ने केष पाकल।
जना दोसर-तेसर बोनिहार पचास वरख पुरैत-पुरैत झुन-कुट बूढ़ भ’ जाइत तना विसेसर नहि। नियमित काज
खायब आ सुतब विसेसरक खास गुण छलैक। तरकारीक गाछ रोपै स’ ल’ क’पटौनी, कमौनी सभ मोहनिये करैत
अछि।

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मोहिनी डेढ़हो कट्ठा बाड़ी मे कोदारिक काज सँ ल’ क’ खुरपी हसुआँक सभ काज करैत अछि।
लत्ती-फत्ती ले छोट-छोट मचानो अपने बना लैत। तरकारीक गाछ रोपब, पानि देब,कमैनी सँ ल’ क’ देखभाल
तक करैत। अंगने जेँका चिक्कन वाड़ियो बनौने। सभ दिन मोहिनी धान कूटए। गाछी-बिरछी से पात खछड़ि
अनैत। दष हाथ्क एकटा लग्गी बनौने कुटए जइ से गाछक सुखल ठहुरी तोड़ै। विसेसर तमाकुल खाइत मोहिनी
हुक्का पीबैत। अमलो आसान। कातिक मे सय गाछ तमाकुल बाड़ी मे मोहिनी रोपि लैत जे माघ मे जुअएला पर
काटि लैत। उपरका मूड़ी, कनोजरि आ निचला पात डाँट के छाँटि पीनी कुटैत आ बीचला पात सुखा क’ खेवा
ले रखैत। एक्को पाई खरच नहि। बाध सँ मुइलहा डोका मोहिनी बीछि आनए। ओकरा डाॅहि क’ चून बना
लिअए। एक सेर धान क’ छुआ कीनि, डावा मे राखि, सालो भरि पीनी कूटए।

भोलिया विसेसरक बेटा। जाबत छोट छल मायक संग घर-आंगनाक काज करैत। गाछ पर चढ़ि सुखल
जारनो तोड़ैत। जखन नमहर भेल वियाह भेले। विसेसर अपने संगे काज करै ले ल’ जाय। बियाहक बाद साल
भरि भोलिया बापक संग काज करैत रहल। मुदा छैाँड़ा मारड़िक संगत मे पड़ि भोलिया भाँग पीबए लागल।
बाड़ी-झाड़ी मे भाँगक गाछ। ओकर फूल झाड़ि-झाड़ि आ जट्टा वाला डढ़ि काटि-काटि सुखा-सुखा रखैत। विसेसर
केँ कोनो पता नहि। साल भरिक बाद जखन विसेसर काज करए। विदा हुअए तखन भेलिया सुतले। मोहिनी
उठवए जाय तँ गरजि केँ भालिया कहैत- ‘‘मन खराव अछि, माथ दुखाए।’’ एक दिनक नहि भोलियाकेँ आदत
भ’ गेलै। षुरु मे दू-चारि दिन विसेसर बाजल- ‘‘छैाँड़ा, मौगियाह भ’ गेल।’’ कहि छोड़ि देलक। मुदा आदत देखि
विसेसर भोलिया केँ कहलक- ‘‘तू बेटा छियैँ, एकर माने ई नहि जे तू मालिक भ’गेलै। दू परानी तोहूँ छेँ। दुनू
गोटोक खाइ-पीवै ले कमाइये पड़तौ। भिन्न रह कि साझी, बिना कमेने ने हेतौ। जो आइ से फुटे भानस कर।’’
भालियकेँ विसेसर भिन्न क’ देलक।

साझू पहर केँ सभ दिन विसेसर डेढ़िया पर बिछान बिछा, जावत भानस होइ,भजन-कीर्तन करैत।
असकरे विसेसर खजुरी बजा भजन करैत। ने दोसर साज आ ने दोसर संगी। अपने गवैया अपने बजनिया अपने
सुननिहार। पाँचे टा भजन विसेसर केँ अवैत। जे सभ दिन गावए। जखन भजन करए वइसे। तखन पहिने ‘‘सत्
नाम, सतनाम, सँ षुरु करए। एक सुर खूब झमका केँ सतनाम गावए। चुल्हि लग मोहिनी भानसो करए आ
घुन-घुना क’ संग-संग सतनामो गावए। सतनामक बाद ‘‘साँझ भयो नहि नहि आयो मुरारी’’ अह्लाद सँ विसेसर
गावए। अड़ोस पड़ोसक सभ पाँचो भजन सीख लेने। जहाँ विसेसर षुरु करए कि सभ अपना-अपना अंगना मे
घुन-घुना- घुन-घुना गावए। साँझ गोलाक बाद विसेसर विनती गवैत। विनती गेवा काल ततेक तन्मय विसेसर भ’
जाइत जना भवान हृदय मे वैसि प्रेरित करति होथि। विनती समाप्त हाइते विसेसर खुजुरी राखि तमाकुल चुना
क’ खाइत। मोहिनी चुल्हिये लग बैसल-बैसल हुक्का भरि क’ पीवैत। तमाकुल थूकड़ि पानि सँ कुड़ुर क’ विसेसर
कृपण रुप-वर्णन षुरु करए। रुप-वर्णनक समय विसेसर कँ बुझि पड़ै जे अन्तज्र्ञान सँ ब्रह्माण्ड केँ देखि-देखि गवैत
छी। गबैत-गबैत विसेसर उठि के ठाढ़ भ’ खजुरियो बजवैत आ ठुमकी चालि मे झूमि-झूमि नचबो करैत। असकर
रहनहुँ विसेसर केँ बुझि पड़ैत जे हजारो-लाखो लोकक बीच नाचि-गावि रहल छी। कखनो हँसैत, त’ कखनो मुस्की
दैत। कखनो नोर बहबैत त’ कखनो पंडित जेँका प्रवचन करैत। रुप वर्णन समाप्त होइते तौनी सँ मुँ-हाथ पोछि
सोहर गवैत। सेाहर गवैत-गवैत विसेसर केँ भरि दिनक ठेही उतरल वुझि पड़ैत। अंत मे समदाउन गावि समाप्त
करैत।

उत्थान-पतनःः1

रोहितपुरक दोनौक चर्चा बुढ़हो-पुरान अष्चर्य स’ करैत कहैत जे ऐहन जिनगी मे नहि देखने छलौ। पर
हवा उठल। गोल-मोल भ’ सुरुंगा दौड़ैत टोल मे आबि घरक छप्पड़ सभकेँ उड़बै गोल-मोल नचैत। जना कोनो
नर्तकी घघड़ा पहिर नचैत तहिना नचैत हजारो हाथ ऊपर गर्दा खढ़-पात उड़ि जाइत। घरक नुआ वसत्र उध् ि
ाया’उधिया आंगन सँ हटि-हटि खेत सभ मे जा-जा खसैत। चेतन सभ अपन-अपन बच्चाकेँ पकड़ि-पकड़ि रखने
जे विर्ड़ो मे उड़ि ने जाय। बिरड़ो बढ़ैत-बढ़ैत आँधी मे बदलि गेल। राहितपुर मे एक्को घर अवन्च नहि रहल
जकरा कोनो नोकसान नइ भेल होय। घर गिरबो कएल आ उधिऐवो कएल। सैाँसे गामक लोक विपत्ति मे डूबि
गेल। के ककर नोर पोछत? सभकेँ अपने गिरैत।
(अगिला अंकमे)

कुमार मनोज कश्यप
जन्म मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। बाल्य काले सँ लेखन मे आभरुचि। कैक गोट रचना आकाशवानी सँ प्रसारित आ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित। सम्प्रति केंद्रीय सचिवालय मे अनुभाग आधकारी पद पर पदस्थापित।

फ्यूज बल्व

से सत्ये वर्मा साहेबक डरे खऽड़ जरैत छलैक । से रूतबा आ धाख छलनि वर्मा साहेब के जे ककर मजाल जे कल्ला अलगबितै । वर्मा साहेब समय के तेहन ने पावंद जे कहैथ जे नौ बजे सँ ऑफीस शुरू हेबाक मतलब जे नौ बजे सभ काज करय लागय , नौ बजे ऑफीस आबय नहिं । ऑफिसक सभ आधकारी आ कर्मचारी छीह कटैत वर्मा साहेबक डरे जे कहीं कॉरीडोर मे घुमैत वा कैंटीन मे गप्प लड़बैत पक़डा ने जाई । जे केयो बाहर मे देखा गेला तनिकर तऽ अभगदशा बुझू दस लोकक बीच मे झाड़ सँ लऽ कऽ लिखित वार्निंग तक किछु भऽ सकैत छल । एतबे नहिं , आधकारी -कर्मचारी अपन सीट पर सँ भागल नहिं रहय तैं हुनकर समय-समय पर सरप्राईज भिजीट सेहो भेल करय । जे केयो सीट पर नहिं भेटलाह तनिकर नाम आ भिजीट समय नोट कऽ कऽ राखि लेथि आ मैसेज छोड़ि देथि जे जखन आबथि तऽ हमरा लग पठायब ।

वर्मा साहेब के चैम्बर मे घुसबा सँ पहिने कतेक-कतेक के आधा जान अपने निकलि जाईत छलैक़़ रूपे तेहने छलैऩ़पाँच हाथक चाकर-चौरठ शरीऱ़ एहन टा कल्ला़ भयाओन दृष्टि । आवाज की भारीबिना ले ईस कें’हू आर यू एंड व्हाई कम टु मी ?’ लोक के पहिने सँ सोचल सभ बात बिसरा देबा लेल पर्याप्त छल । जीनका लग समुचित कारण नहिं भेलनि ; तनिका तऽ बुझु सस्पेंड हेबा सँ ब्रम्हो नहिं बचा सकथिन । वर्मा साहेब के लेल तऽ ककरो सस्पेंड करब नेना-भुटका के खेल । विभागीय सचिव रहथि तैं ककरो सँ कोनो आदेश लेबाक जरूरतो नहिं । पैघ-पैघ ऑफीसर तक के डाँट-डपट करबा मे वर्मा साहेब के कोनो टा असोकर्ज वा मलाल नहिं । डाँट-डपट की कैक बेर तऽ भरल लोकक बीच मे बेईज्जत तक कऽ देथिन । भरि ऑफीस मे कहबी पसरल छलैक जे जाबत तक लोक वर्मा साहेबक डाँट नहिं सुनि लैत आछ ताबत तक मोन हौंड़ैत रहैत छै। जहाँ ने डाँट पड़ल की मोन के शांति भेटैत छै ।

से वर्मा साहेब सरकारी सेवा सँ सेवानिवृत भऽ गेलाह । भरि ऑफीसक लोक जी-जी कऽ उठल। चर्चा ईहो छलैक जे वर्मा साहेब पेᆬर सँ सलाहकर बनि कऽ मंत्रालय मे ज्वाईंन करताह । गोपीबाबू तऽ सभ के चेतेन्हो रहथिन जे शैतान के जाबत तक श्राद्ध नहिं भऽ जाय ताबत ओकरा मुईल नहिं बुझल जेबाक चाही । तैं लोक साकाँक्ष नहियों होईत तते तर खुशी तऽ मनेनहे छल भरि ऑफिस मे चोराईये नुका कऽ सहा ; मिठाईयो बाँटले गेल छलैक । लोक के भीतरे-भीतर डरो छलैके जे कहीं वर्मा साहेब पेᆬर सँ आबि गेलाह तऽ सभ खुशी मनेनहार सँ हिसाब चुकता कऽ लेथिऩ़ भेदिया तऽ सभ ठाम रहिते छै ने ।

मंत्रालय के लोकक कपार एतबो खराब नहिं छलैक़़वर्मा साहेब दोबारा सँ नहिं एलाह । समय तऽ गतिमान होईत छैक ; बितैत गेलैक । वर्मा साहेब लोक के एखनो मोन छथिन खिस्साक रूप मे । वर्मा साहेव के अरदली बालकिशन सेहो समय पर सेवा निवृत भेल कतेक लोक आअयल-गेल ऑफीस चलैत रहलैक ।

ओहि दिन बालकिशन दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्मक बेंच पर बैसल ट्रेनक प््रातिक्षा मे छल कि तखने बगल मे बैसल कनियाँ केहुनिया कऽ ओकरा पुᆬसपुᆬसा कऽ कहलकै- ‘ओम्हर देखहक तोहर पहिलुका साहेब ठाढ़ छथुऩ़भीड़ धकियबैत हैऩ़बजा कऽ बलु हमरा सीट पर बैसा दहक़़हम ओम्हर चल जाईत छी़हमरा आऊर तऽ ठाढ़ो रहब तऽ कोनो बात नहिंओ तऽ हाकीम-हुक्काम छथि ।’ ईशारा सँ देखेलकई बालकिशन वर्मा साहेब के़लोकक रेला मे ट्रेनक प््रातिक्षा मे ठाढ़़़पसीना सँ तरबतर भेल़़एक हाथ सँ एटैची थम्हने आ दोसर हाथ सँ मुँह पर बेर-बेर माँथ सँ टघरि कऽ अबैत पसेना के रूमाल सँ पोछबाक अनवरत प््रायास करैत । कखनो काल रेला बढ़ै तऽ लोकक धक्का सँ अपन संतुलन सेहो बनबैत । बालकिशन किछु सोचलक आ कनियाँ के बाँहि पकड़ि कऽ बैसल रहबाक ईशारा केलकै- ‘रहऽ दही़ बैसल रह तों । आब हम आ वर्मा साहेब दुनू गोटे पत्यूज बल्व जकाँ छी़पत्यूज बल्व मे कोन फरक जे हजार वॉट के छलैक की साठि वॉट के। ‘

वर्मा साहेब भीड़क दोगें खनहुँ-खनहुँ कनखिया कऽ बालकिशन के देखि लैत छलाह । बालकिशन आओर पैर पसारि कऽ बैसि रहल छल़़ट्रेनक एखनहुँ कोनो पता नहिं छलैक।

पन्ना झा
असामान्य के

डाक्टर नन्दीक चेम्बर मे बैसल-बैसल मोन थाकि गेल। अनायास भेंटकरक समाद पठेने छलाह। मोने-मोन कारणक अटकर लगा रहल छलहुं। कतेकोकारण मोन मे आयल मुदा एकोटा कारण सटीक नहि बुझना जाइत छल। डा.नन्दीक अनुपस्थिति मे हुनकर रोगी या सम्पूर्ण नर्सिंग सम्हारयवला हुनकरदहिना हाथ डा. सिन्हा कतेको बेर अपन मुखरित मुखारविन्द देखाय गेला। पुछलापर कहने छलाह कारण त’ हमरो नहि बूझल अछि, तखन मात्र एतबे कहने छथिजे अयला पर बैसय कहबन्हि।
डा. नन्दीक कार्यव्यस्तता आ समयक अभाव मोन पड़ला पर इच्छा भेलउठि क’ चल जाइ। आखिर कतेक काल प्रतीक्षा कयल जाय? एना कयला स’गुरुक गुरुता लघु भ’ जयतन्हि। समय बितयबाक लेल नर्सिंग होमक निरीक्षणकरय लगलहुं। आधुनिक आ सुरूचिपूर्ण सजावट, जीवाक लालसा उत्पन्न करयवलाचित्र सब, जे संभवतः मानसिक रोगी सभक द्वारा चित्रित छल, एक कोन मेलतरल मनी प्लान्ट, टेबुल पर टटका फूलक गुच्छा कांचक पात्र मे पानि परराखल। भीतर जा क’ रोगी सब स’ भेंट करक इच्छा भेल मुदा नहि गेलहु जे कोनठीक एही बीच डाक्टर साहब आबि ने जाइथ।
अपना स्थान पर बैसले छलहुं कि एक सौम्य, हृष्ट-पुष्ट, प्रसन्नमुख युवकप्रवेश कयलन्हि। हुनकर अनुसरण आवश्यकता स’ अधिक गंभीर एक व्यक्ति क’रहल छलाह। अबितहिं पहिल युवक हमरा स’ प्रश्न कयलन्हि- डा. नन्दी छथि किनहि?
-नहि, बैसू कनेक काल मे औताह”। हमर उत्तर छल। पहिल युवक कें देखिक’ लागल जे हम पूर्व-परिचित छी। स्मरण नहि भ’ रहल छल। सोचल-हमरसंबंधी त’ नहिये छथि तखन कतय देखने छियैन्ह? कोना चिन्हैत छियन्हि? पूर्वमे कतहु देखने छियन्हि, एतबा निश्चित छलहुं। एही ओझराहटि मे छलहुँ कि संगआयल दोसर युवक ठठा क’ हँसि पड़ल आ फेर तुरत गंभीर भ’ फुसफुसाय लागल,जेना ककरो स’ गप्प क’ रहल हो। एहि तरहक व्यक्तिक एहि तरहक क्रिया-कलापदेखक अभ्यस्त भ’ गेल रही तें कोनो विशेष प्रभाव नहि पड़ल। संग आयल पहिलयुवक सेहो तटस्थ छलाह। मुदा तीव्र ठहाका डा. सिन्हा के ओतय अयबा लेलबाध्य कयने रहनि। आगन्तुक दिस अभिमुख होइत पुछने छलखिन्ह- कहल जाय,नब कोनो समाचार? संगे के छथि? आगन्तुकक शान्तभावें उत्तर छलन्हि – अहांलेल कोनो नब नहि। हमरा लेल अशान्तिदायक। ई छथि, रोगीक मित्र रोगी आओ बिहुंसल छल। डा. सिन्हा हमरा पुछलन्हि – हिनका चिन्हलियैन्ह? अपन केस-हिस्ट्री ई मात्र अहींके कहने छलाह। हमरा भक्क द’ सब स्मरण भ’ आयल। ओव्यक्ति लज्जापूर्वक आंखि नीचा कयनहिं हाथ जोड़ि देने छल।
ओकर स्वास्थ्य लाभ पर हार्दिक बधाई दैत हमरो हाथ जोड़ा गेल छल। डा.नन्दी के अयला पर हुनका स’ आवश्यक गप्प क’ डेरा विदा त’ भ’ गेलहुं मुदाओहि व्यक्तिक संग प्रथम साक्षात्कार आर ओकर केस हिस्ट्री पुनः स्मृति-पट परआबि गेल।
लुम्बिनी पार्क ;मानसिक-रोग-अस्पताल मे डा. मित्राक क्लास आठ बजेप्रातः प्रारम्भ भ’ जाइत छलन्हि। अस्पताल डेरा स’ काफी दूर छल। डेराक काजसलटि, बस स’ पहुंचलहुं त’ भीतर जा क’ हड़बड़ायल अपना ग्रूपक संगी सबकेताकय लेल एक बेर चारू दिस दृष्टि घुमाओल। तखनहि एक रोगीक कोठली स’अनु हड़बड़ायल निकललि आर हमरा देखितहिं कहने छलि -बाज अयलहुं हम एहिडिग्री स’। लुम्बिनीक ई हमर अंतिम भीजिट भेल।” हमर जिज्ञासा छल – कियैककी भेल? एखने हिम्मत टूटि गेल? एखन त’ पूरा एक साल बाकी अछि? अनुगंभीर भ’ कहने छलि – एहन पेसेन्ट त’ एकोटा नईं भेटल छल। किछु साधरणप्रश्न पुछलियै त’ मुंह पर थूकि देलक।”
अनु डा. मित्राक चेम्बर दिस बढ़ि गेल छल। हम ओही कोठली मे घुसलरही जतय स अनु बहरायलि छलि। ओतय हमरा ग्रूपक आर सब छात्रा-छात्राबैसल छल। सामने एक सुदर्शन पुरुष मुंह घुमाक’ खिड़की बाटे बाहर ताकि रहलछल। किछु क्षण परिस्थितिक निरीक्षण क’ हम एक सहपाठी स’ आस्ते स’ पुछनेरहियैक – की कोनो खास बात? ओ शी करैत मुंह पर आंगुर देने हमरा बाहरआनि कहलक – एकर केस हिस्ट्री लेबाक हमरा लोकनिक सब चेष्टा निष्फल भेलअछि। ककरो किछु कहिते नईं छै। अनु किछु बेशी प्रश्न केलकै त’ मुंह पर थूकिदेलकै। तों त’ गिन्नी ;विवाहिता, मलिकाइन छें। सब ठाम प्रिफरेन्स’ भेटैत छउ।भ’ सकैयै एतहु लहि जाउ।
प्रश्न विचारणीय छल, मुदा मित्रा सर कें कंक्रीट काज चाहियन्हि, खाना-पूर्त्तिनहि। साहस क’ आगू बढ़लहुं।
ओहि व्यक्तिक सम्मुख जा नमस्कार क’ परिचय पूछक साहस कयनेछलियैक। ओ निर्विकार भावे मात्र हमरा दिस तकने छल।
-जँ हम गलती नहि क’ रहल छी त’ अहीं श्री चौधरी छी?
ओ तैयो चुप।
-हमरा डा. मित्रा पठेने छथि। अहां स’ किछु जानकारी लेबय लेल। अहांकेंअसुविधा नहि हो त’ हम किछु पूछि सकैत छी?”
ओ एक बेर मूडी उठा, हमरा दिस देखलक फेर खिड़कीक बाहर देखयलागल जेना किछु ताकि रहल छल। ओकर प्रतिक्रियाहीन चुप्पी स’ हमरा बलभेटल। बुझबैत कहने रहियैक -एहि स’ अहूंकें लाभ होयत। एहि कैदखाना स’ मुक्तिभेटत। ऑफिस जा सकब।” ओ हमरा पर बरसि पड़ल छल- बन्द करू अपनलेक्चर। भगवानक लेल दया क’ अहाँ लोकनि हमरा एसगर छोड़ि दिय’। स्वयंबड़बड़ायल छल – घरक लोक एहि नर्क मे धकेल गेल आर एतय घर जयबाकगप्प।
हमर ग्रूप ओतय स’ बिदा भेल ई बुझि जे एकरा पाछू समय नष्ट कयलास’ कोनो लाभ नहि। हम जयबा काल अंतिम प्रयास कयल – अहां एकान्त चाहैतछी त’ ठीक छैक, हमरा लोकनि जा रहल छी। मुदा अहां त’ स्वयं विद्वान आबुझनुक छी, मोनक कष्ट बँटला स’ मोन हल्लुक होयत आ चिकित्सा मे सुविधासेहो।
क्षीण आशाक संग ओ पुछने छल – तखन हमरा छोड़ि देल जायत? -एतयअहाँ कोनो जन्म भरिक लेल त’ नहिये आयल छी। स्वस्थ्य भेला पर पुनःपरिवारक संग रहब।”
ओ हमरा बैसक संकेत कयने छल। बाहर मे अपना ग्रूप के सूचना द’ हमआबि क’ बैस गेल छलहुं। ओ बिना कोनो भूमिकाक सहज स्वाभाविक रूपें कहबआरंभ कयने छल – नाम हमर अहांकें बुझले अछि। अधिकांश लोक नामे स’जनैत अछि, चेहरा स’ ओतेक नहि। हम कलकत्तेक वासी छी। इन्जीनियर छलहुं।एखन त’ पागल छी। जेना सब रहैत अछि हमहूं रहैत छलहुं। डेरा, ऑफिस, क्लब,मित्र-वर्ग, संबंधी सब स’ लगाव छल। अनायास एक दिन अपने महल्ला क रीनास’ परिचय भेल। हमरे ओहिठामक आयोजित एक भोज मे। रीना सुन्दरि, स्मार्ट,हँसमुख, डिग्री कोर्स – फाइनलक छात्रा। ओकर सब किछु हमरा आकर्षितकयलक। हाव-भाव, व्यवहार, वेश-भूषा सब नीक लागल। ओकरा स’ बेशी कालभेट होमय लागल या कहि सकैत छियैक जे भेटक सुयोग बनबैत गेलहुं। ओहोबिना कोनो प्रतिवादक हमर संग दैत गेलि। लेक, सिनेमा, थियेटर, होटल कतहुसंग जयबा मे हिचकिचायल नहि। हमरो ओकरा बिना कतहु मोन नहि लगैतछल। सतत एक्केटा ध्यान मे रहैत छल – रीनाक सामीप्य। ओहो कहैत छलि -क्लास, लेक्चर, घर कतहु मोन नहि लगैत अछि। हम विभोर भ’ जाइत छलहुं।दूनू गोटे मे कतेको प्रेम, आश्वासन आर प्रतिज्ञाक गप्प होइत छल। हमरा लोकनिदिन-प्रतिदिन एक दोसराक समीप होइत रहलहुं। घरक लोकक प्रतिवादक उपरान्तोहम ओकर प्रत्येक इच्छा आर आवश्यकताक पूर्त्ति करैत रहलियैक।
ओ आनर्सक परीक्षा पास कयलक। ताहि उपलक्ष मे हम ओकरा अपनऔंठी उपहार स्वरूप द’ कहने छलियै -एकरा अपना स’ अलग करक अर्थ होयतअहाँ हमरा अलग करब। उत्तर मे ओ मात्रा बिहुँसि देने छल। एक दिन रीनानौकरी करक इच्छा व्यक्त कयने छलि, जाहि मे हमर सहयोग अपेक्षित छलैक।हम हंसि क’ कहने रहियैक – दूनू गोटे बाहरे काज करी ई आवश्यक छैक की?मात्रा हमर आय पर्याप्त नहि होयत?
ओ मौन रहि गेल छलि। आस्ते-आस्ते हम रीना मे परिवर्त्तनक अनुभवकयल। ओ हमर सामीप्य त’ दूर भेंट तक नहि करय चाहैत छलि। हमर देलउपहार सेहो आब नहि लेबय चाहैत छलि। कारण पुछला पर कतेको बहाना। हमराकोनो कारण बुझवा मे नहि आबि रहल छल। हम अपना कें कमजोर आ विचलितअनुभव करय लागल छलहुं।
बीच मे किछु दिन सर्दी-ज्वरक कारण डेरा स’ निकलल नहि भेल। रीनापुछारियो तक करय नहि आयल। कनेक स्वस्थ भेला पर हमहीं ओकर डेरा गेलहुंत’ पता लागल जे किछुए काल पहिने बाहर निकललि अछि। मोन कें संतोष देलहुं- ई बताहि निश्चित नोकरीक पाछू बउआइत होयत।
समय व्यतीत करक ध्येय स’ हम सिनेमा हॉल दिस बढ़ि गेल रही। संयोगस’ टिकट भेट गल छल। सिनेमा आरंभ भ’ गेल छलै। हमरा सामनेक सीट परएकटा जोड़ी बैसल छल। हाव-भाव स’ नव-दम्पति हेबाक आभास भेल।इन्टरवलक प्रकाश मे जे देखल ओहि स’ बड़ पैघ मानसिक झटका लागल। ओयुवती हमर रीना छल, आ युवक हमरा लेल अपरिचित छल। अनायासे मुंह स’निकलि गेल छल – रीना! अहूं आयल छी? हम अहांक डेरापर गेल छलहुं। अहाँस’ भेट नहि भेल त’ सोचल सिनेमा देखि समय बिता आबी।
रीनाक प्रति हमर सम्मोहन हटल नहि छल। ओहि युवकक उपस्थितिहमरा लेल नगण्य छल। तखनहि सुनाइ पड़ल – ई के थिकाह, रिनी? -हमरामुहल्ला मे रहैत छथि।” रीनाक एहि उत्तर स’ हमरा मोन मे ठेस लागल। हॉल मेफेर अन्हार भ’ रहल छलैक। ओ व्यक्ति रीनाक हाथ पकड़ि सीट पर बैस गेलछल। ओतय रहब हमरा असह्‌य बुझना गेल आ हम डेरा घुरि आयल रही। हमरआत्मा ई स्वीकार नहि क’ पाबि रहल छल जे रीना एहन कोनो काज करत जाहिस’ हमरा – ओकरा बीच मनमुटाव भ’ जाय। दर्द स’ हमर माथ फाटय चाहैत छल।मुदा से भेलै नहि। कखन झपकी लागि गेल, नहि बुझलियै। निन्न मे हम चिचियाउठल रही – नहि, नहि एना नहि भ’ सकैत अछि, ई असंभव ….. मिथ्या छी।माय जगा देने छलि – की स्वप्न देखैत छी यौ? निन्न मे बाजक बीमारी त’ अहांकें नहि अछि? दू दिन बाद रीनाक ओतय स्पष्टीकरण लेल जयबाक साहस कयनेछलहुँ। गप्पक क्रम मे कहने छलि – विवाह आ मित्रता मे कोनो सम्पर्क नहिहोइत छैक। मित्र कतेको भ’ सकैत छथि, विवाह कोनो एकटा स’ होयत। विवाहकरक योग्य मित्र एखन तक नहि भेटल अछि। सिनेमा हालक ओकर संगीयुवकक चर्चा कयला पर कहने छलि -………. इन्डस्ट्रीक मालिक छथि। इन्टरव्यूमे हमरा स’ बहुत प्रभावित छलाह। बड़ सरल आ मिलनसार लोक। हमहूँ हुनकास’ प्रभावित छी।”
हतप्रभ भेल मानसिक झंझावात नेने डेरा चल आयल रही। तखनहिं स’प्रत्येक महिला हमरा नाटकक पात्रा लागय लागलि। लागल जेना सब अपन-अपनकुशल अभिनय मे लागल अछि।
हमर छोट बहीन भोजन लेल पूछय आयलि त’ प्रश्न कयने रहियै – तोंहुकोनो अभिनय क’ रहल छें? अप्रत्याशित प्रश्नक उत्तर प्रश्ने स’ भेल छल -अहांपागल भेलहुं अछि की?” हमरा भय छल एहि पीड़ा स’ हमर मस्तिष्क ने विकृतभ’ जाय आर यैह कटु सत्य हमर बहीन बाजल छल। तामसे हम पेपर वेट उठाक’ ओकरा पर फेकने छलियैक जे ओकरा माथ स’ शोणित बाहर क’ देने छलैक।तकर बाद सबक पूछल प्रश्नक उत्तर हम टेढ़ आ अपशब्द मे देने रहियै। भोर मेऑफिस जयवाक या किछु करक इच्छा नहि भेल तें घर बन्द क’ पड़ल रहलहुँआर रीनाक व्यवहार पर सोचैत परेशान होइत रहलहुँ। हमर दुर्व्यवहार बढ़ि नेजाय तें ककरो स’ गप्प नहि कयल, एसगर कनैत रहुलहुं, स्वयं मे ओझरायलगप्प करैत रहलहुं। घरक सब गोटे केवाड़ खोलक नेहोरा करैत रहैत छल, हमनहि खोलैत छलियै।
दैनिक-दिनचर्या बाधित भ’ गेल छल। ऑफिस जयबाक त’ कोनो प्रश्ने नहिछल। स्वयं मायक खुओला पर एक दू क’र खा लैत छलहुँ। एहिना कतेक दिनबीतल मोन नहि अछि। आब घर स’ निकली त’ सभक कातर दृष्टि हमरा पर रहैतछलै। हमरा भेल छल आब सभ हमरा क्षमादान द’ देने अछि। एक दिन बाबूजीकआग्रह पर हुनकर एक नजदीकी मित्रक ओतय जयबा लेल तैयार भेल छलहुं। मायभरि पाँज क’ पकड़ि कानय लागल छल, जे अनर्गल लागल। बाबूजी माय के डटनेछलखिन्ह। संभवतः डर भेल रहनि जे हम जयबा स’ बिमुख नहि भ’ जाइ।बाबूजीक ओ मित्र वास्तव मे एतयक डाक्टर छलाह आ तहिया स’ हम एतहि छी।अहाँ पूछि सकैत छी जे अहाँक सहपाठिका पर हम थूकि कियैक देलियन्हि। एकत’ ओ अनावश्यक चहकि रहल छलीह, रीना जकाँ। हुनक स्वर आ आकृतिअझक्के मे हमरा रीना सन लागल। लागल जेना ओ जानि-बूझि क’ हमरा खौंझारहल छल।
चौधरीक केस-हिस्ट्री बूझि हम बहुत आश्वस्त भेल छलहुं। हुनका सांत्वनादैत बाजल रही – अहां त’ एकदम स्वस्थ छी। एतेक नीक जकां अपन मोनकगप्प हमरा स’ कयलहुं। हम मित्रा सर के अहांक प्रोग्रेसक रिपोर्ट द’ दैत छियन्हि।
चौधरीक आकृति पर पुनः आक्रोशक भाव आबि गेल छलै। ओ हमरा स’पुछने छलाह – हमर एक प्रश्न अछि – लोक हमरे कियैक पागल कहैत अछि?अहाँ लोकनिक शब्द मे असामान्य। असामान्य हम कियैक? रीना या एहि तरहकअभिनय करयवाली कियैक नहि? हम हुनक प्रश्नक उत्तर बिना देनहिं ओतय स’बिहुंसि क’ निकलि गेल रही।
संस्कार गीत/ लोक गीत नाद-
जगदीश प्रसाद मंडल
संस्कार कल्पना थिक। हमरा सभक बीच संस्कारक प्रयोग विभिन्न रूप मे विभिन्न जगह पर होइत अछि। ओना जहि रूप मे संस्कारक प्रयोग हमरा सभक बीच होइत, ओ मन्द आ कुषाग्र रूप मे सेहो होइत। मुदा विचारणीय प्रष्न अछि जे मन्द तँ किऐक? आ कुषाग्र तॅ किऐक? एखन हम एहि प्रष्नक उत्तर नहि द शास्त्रीय प्रयोग दिषि नजरि दैत छी। गर्भजनित वातावरण जन्य कतिपय अपदार्थ के दूर करैक हेतु संस्कारक कल्पना कयल गेल अछि। कहल गेल अछि जे एहि सॅ शरीर आ मन परिष्कृत होइत अछि। शालीनता आ शिष्टता मनुष्यताक परम सिद्वि थिक आ ओकर प्राप्तिक साधन थिक संस्कार कर्म। दषर्न शास्त्रक अनुसार भोग्य पदार्थक अनुभूतिक छाप थिक संस्कार कर्म। मनुष्यक अव्यक्त मन पर अुभवक जे छाप पड़ैत छैक, समय अयला पर ओ प्रकट भऽ जायत छैक। यैह छाप थिक वासना आ यैह कहबैत अछि जन्मान्तक संस्कार। धर्मशास्त्री लोकनि संस्कार केॅ शारीरिक, मानसिक आ बौद्धिक गुणश्दोषक प्रक्रियाक रुप ग्रहण कयलनि अछि।
आष्वलायन अपन गृहसूत्र मे एगारह तरहक संस्कारक वर्णन केने छथि। जखन याज्ञवल्क्य बारह तरहक। गौतम भिन्नश्भिन्न दैवयज्ञ केॅ संस्कार मे परिगणित कऽ अड़तालिस संख्या धरि लऽ गेल छथि। भारत सरकारक 1901 इसवीक जनगणना प्रतिवेदनक अनुसार ओहि समय हिन्दू मे बारह संस्कार प्रचलित छल। मिथिला मे सोलह तरहक संस्कारक विधान मान्य अछि ई थिकश् गर्भधान,पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राषन, चूड़ाकर्म,कर्णबेध, उपनयन, वेदारम्भ, समावर्तन, विवाह, वानप्रस्थ, सन्यास आ अन्त्येष्टि। एखन सिर्फ पाँच तरहकश् जन्म,मूड़न,उपनयन,विवाह आ मृत्यु संस्कारक चलनि अछि। मुदा इहो सभ जाति मे समान नहि अछि। जेना उपनयन सिर्फ समाजक अगुआइल जातिक बीच अछि। मूड़नोक रुपरेखा एकरंगक नहि अछि। तेँ जँ सभकेँ नजरि मे राखि देखैत तँ सिर्फ तीनिये टा संस्कार जन्म,विवाह आ मृत्यु अछि।
संस्कारक कल्पना आ ओकर चयन वा नामकरणक पाँछा सामाजिक कारण सोहो प्रमुख रहल। स्पष्ट अछि जे संस्कारक शासन जीवन पद्धति के खास ढ़ंग सॅ नियंत्रित आ आदर्षोन्मुखी बनयवाक लेल देल गेल। शुद्धताक अपेक्षा सुनियोजित जीवनश्व्यवस्थाक आवष्यकता अथवा स्थितिक उपस्थिति दिषि संकेत करैत अछि। कहैक तात्पर्य जे आर्यश्अनार्यक घालमेल सँ उपजल सामाजिक स्थिति मे संस्कारक माध्यम सॅ अपन अस्मिता के सुरक्षित रखवाक ब्राहम्णवादी चिन्तनक परिणाम थिक संस्कार। मध्यकाल मे संस्कारक पालन पर बेसी जोर देल गेल। ओना दोषक निवारण आ गुणक अंगिकार करब अधलाह बात नहि थिक। इतिहास साक्षी अछि जे भौतिक परिस्थितिक प्रभवक कारणे समाज मे कखनो बेटिक त कखनो बेटाक मोल बढ़ैत रहलैक अछि।
आइ जकरा मैथिल संस्कृति कहल जा रहल अछि,से की वस्तुतः मिथिलाक संस्कृति थिक? एहि लेल मिथिलाक इतिहास दिषि देखए पड़त। मिथिलाक धरती हिमालयक माटिश्बालू सँ बनल अछि। नदी प्रदेषक एहि भूभाग पर किरात आ कोल रहैत छल। आर्यीकरणक अभियान मे जे किछु बहरबैया लोक सभ एहिठाम अयलाह ओ द्विज बनि के एहि प्रदेष पर सत्ता स्थापित केलनि। क्षत्रिय राजसत्ता कब्जा केलनि आ ब्राह्मणक हाथ मे समाज सत्ता आयल। वैष्वलोकनि अर्थसत्ताक स्वामी बनलाह। मूलवासी अर्थात आदिवासी अन्त्यज बनि गेलाह। बहरबैया लोक कम संख्या मे आयल रहथि तेँ कृषि कर्यक लेल वा आनो प्रयोजन सँ प्रतिलोम विवाह जोर पकरलक। जकर चर्चा मनुस्मृति आ मिथिलाक इतिहास मे बिस्तार सँ अछि। द्विजक संख्या कम रहने, एहि ठामक आदिवासीक देवीश्देवता,पावनिश्तिहार आ नेमश्तेम अपनौलनि। जहि स ब्राह्मणीकरण भऽ गेल। समाजक सत्ता ब्राह्मणक हाथ मे छलनि तेँ हुनके जीवनश्षैली संस्कृति बनल। बहुसंख्यक मूलवासी पर एकटा नवश्संस्कृति आरोपित कयल गेल। औझुका जेँका प्रचारश्प्रसारक माध्यम त नहि छल, मुदा जे किछु छल ओ हुनके सभक बीच छलनि। लिखैकश्पढ़ैक सुविधा आ सामथ्र्य रहने हुनके (द्विजिक) संस्कृति सम्पूर्ण मिथिलाक संस्कृति रसेश्रसे बनि गेल। मुदा मूलवासीक जीवनश्शैली आ रीतिश्नीतिक पूर्ण विलयन ने त संभव छल आ ने से भेल। आइयो ओ (मूलवासी) दूबि बनि माटि पकड़ने छथि। जकर संस्कृति लोक संस्कृत कहल जाइत छैक।
मूड़न आ उपनयन, आब सेहो काम्य संस्कारक कोटि मे अबैत जा रहल अछि। अखनो मिथिला मे ढ़ेरो जाति बसल अछि। किछु जाति छोड़ि बहुसंख्यक जातिक बीच उपनयन प्रथा नहि अछि तेॅ उपनयन के मिथिलाक संस्कार कोना मानल जाय? हाँ, खंडित संस्कार कहल जा सकैत अछि। तहिना मूड़नोक अछि। एक रुप मे मूड़नोक चलनि नहि अछि। केयो देवस्थान जा मूड़न करबैत त क्यो गंगाकात जा। केयो गामे मे कबुलाश्पाती द करबैत त केयो बिना गीतेश्नाद,पूजेश्पाठ केने,करैत। केयो समाज मे खीरश्टिकड़ी बाॅटि करैत त क्यो भोजश्भात कऽ। तेॅ सब मिला के देखला पर प्रष्न उठैत जे मुड़नक कोन रुप मानल जाय? तहिना विवाहोक संबंध मे प्रष्न उठैत? कुमार बर आ कुमारि कन्याक संग विवाह प्रचलित अछि। मुदा द्वितीय बर आ कुमारि कन्याक संग विवाह होइत जखन कि बहुसंख्यक जाति मे द्वितिय बरश्कन्याक विवाह सेहो होइत। द्वितिय कन्याक संग कुमार बर के सेहो होइत अछि तहिना मृत्यु संस्कार मे सेहो एकरुपता नहि अछि। मृत्यु के शोक बुझि गीतिश्नाद नहि होइत। मुदा प्रष्न उठैत जे मृत्यु शोकेक संस्कार किऐक थिक? हाॅ, असामयिक मृत्यु के शोकक श्रेणी मे राखल जा सकैत। मुदा उचित आयु बीतला परक मृत्यु के शोक किऐक मानल जाय? जहिना प्रकृति मे देखैत छी जे अपन पूर्ण आयु पाबि स्वतः नष्ट भऽ जाइत अछि तहिना त मनुष्यो थिक। मुदा ढ़ोरो प्रष्न उठलाक उपरान्तो समाज, विवाह आ मृत्यु के व्यवहारिक संस्कार रुप मे अपनौने अछि। छिटश्फुट ढ़ग सँ जे किछु होइत हो मुदा समुद्र रुपी समाज, सब कुछ अपना पेट मे समेटि लैत अछि।
व्यक्तिगत जीवनक समस्या सँ ऊपर उठि कऽ सार्वजनिक जीवन जीवाक एहि अभ्यास कालक महत्व आइयो अछि। सन्यास यैह थिक। ब्रह्मचर्य जीवन ज्ञान अर्जनक होइत। गृहस्ताश्रम व्यवहारिक जीनगी होइत, जे उपार्जन क जीवनश्जीवाक माध्यम होइत। नव परिवारक सृजन होइत। जहि सॅ समाज आगूओ बढ़ैत आ समृद्धो होइत। तेसर अवस्था वा अंतिम संन्यास अवस्था तक पहुँचैतश्पहुँचैत ज्ञान आ कर्म सँ पूर्ण मनुष्य केँ अज्ञान आ अबोध मनुष्यक सेवा मे लगि जायब, बेजाय नहि। वास्तव मे ओ जरुरियो अछि।
संस्कार गीतक अर्थ थिक विभिन्न संस्कारक प्रसंग मे गाओल जायवला गीत। ई लोक प्रचलित गीत थिक। तेँ एहि मे लोक गीतक आत्मा बसैत अछि। लोक गीतक मनोहर फुलवाड़ी मे यदि संस्कार गीत के हटा देल जाय तँ ओ निष्प्राण भऽ जायत। यैह कारण थिक लोकगीतक, प्रायः समस्त विषेषता संस्कार गीत मे उपलब्ध अछि। मृत्यु संस्कार केँ छोड़ि अन्य सभ संस्कार आनन्दोत्सवक माहौल मे मनाओल मे जाइत अछि। उमंगमय वातावरण मे नारी कंठ सँ निकलैत स्वरलहरी देह मे थिरकन, हृइय मे झंकार आ मस्तिष्क मे चुलबुली उत्पन्न कऽ दैत अछि। गीति गायव मिथिलाक सभ नारश्नारीक सहजात गुण रहल अछि। जेना दखैत छी जे मूड़न, उपनयन, विवाह इत्यादिक समय सभ नारी समवेत स्वर मे गीति गबैत छथि। जे मिथिलाक धरोहर छी। तहिना पुरुषो पावनि आ धार्मिक कार्य मे सभ मिलि गबैत छथि।
संस्कार गीत लाकगीतक अंग थिक। कहल जाइत अछि जे लोकगीतक रचनाकार नहि होइत छथि, ओ सार्वजनिक रचना होइत अछि। एकर वास लोक कंठ मे अछि। एक कंठ सँ दोसर कंठ धरि जाइतश्जाइत गीतक स्वरुप बदलि जाइत। ततबे नहि! गीतक भास सेहो बदलैत। एक्के गीत भास बदलिश्बदलि कत्ते रुप मे गाओल जायत। तेँ संस्कार गीत मे एकरुपताक अभाव भेटैत अछि। स्वभावगत एहि स्थितिक दोसर परिणाम थिक भनिताक बेलगाम प्रयोग। गीत गौनिहारि सभ अपने फुरने कोनो गीत मे कोनो रचनाकार नाम भनिताक रुप मे जोड़ि दैत छथि। विद्यापतिक रचना उमापतिक भ जाइत त कखनो उमापतिक चंदा झाक वा मनबोधक। ततबे नहि मैथिली क्षेत्र सँ बाहरोक रचनाकार जना तुलसी, सूर दास,मीरा इत्यादि मिथिलाक माएश्बहीनिक कंठ मे आबि मिथिलेक आ मैथिलिऐक गीतिकार बनि जाइत छथि। जे उचित आ अनुचित दुनू थिक। उचित एहि लेल जे हुनकर लोकप्रियता विनयपत्रिता, रामायण, सुरसागर माध्यम सँ एतेक अधिक प्रचलित भऽ गेल अछि जे अपन बनि गेल छथि। जहाँ धरि शब्द टूटैक प्रष्न अछि ओ ज्ञानश्अज्ञानक बीचक बात थिक। भषाक जन्म आम जनक बीच होइत। किछु नव शब्दो जन्म लैत अछि आ शुद्व शब्द टूटि कऽ नवो बनि जायत अछि। तेँ कोन गीत किनकर लिखल थिकन्हि, संस्कार गीत मे वुझब कठिन भऽ जायत अछि। स्पष्ट अछि जे संस्कार गीत मैथिलश्महिलाक परिष्कृत सांस्कृतिक चेतनाक परिचायक थिक।
मिथिला मे संस्कार गीत अनौपचारिक षिक्षाक माध्यम अछि। मैथिल समाज मे नारीक लेल औपचारिक षिक्षा वर्जित छल। सिर्फ नारिये नहि माटि परक लोकक लेल सेहो छल। कहल जाइत अछि जे वेद वा गीता पढ़ला सँ ओ बताह भऽ जायत। नारी मे विदुषी होइत छलीह। संस्कार गीतक संबंध संस्कृति आ साहित्य से त अछिये, समाज स सेहो अछि। संस्कृति, साहित्य आ समाजक अन्तरावलम्वन केँ जत्ते नीक जेँका संस्कार गीत प्रकट करैत अछि तत्ते एहि प्रकारक आन कोनो घटक नहि। संस्कार गीतक संकलनश्प्रकाषन सँ मौखिक परम्परा साहित्य समेटल जाइत अछि आ ओ साहित्य अघ्ययनश्विष्लेष्णक आधार प्रस्तुत करैत अछि
मिथिला मे संस्कार गीतक श्रीगणेष होइत अछि गोसाउनिक गीत सँ। एहि स मैथिल समाजक धर्मभावनाक ज्ञान होइत अछि। किन्तु प्रष्न अछि जे संस्कारक अवसर पर ई धर्मश्भावना मुख्यतः गोसाउनिऐक गीत मे किऐक प्रकट होइत अछि? स्पष्ट अछि जे एहिठाम गोसाउनि गोसाई सँ बेसी महत्वपूर्ण छथि। भगवानोक गीत मिथिला मे गाओल जाइत अछि मुदा संस्कार कर्मक अवसर पर जे प्रधानता भगवती गीतक अछि से भगवानोक गीतक नहि! आब प्रष्न उठैत जे मिथिला मे देवीश्पूजाक प्रमुखता किऐक अछि? सभ जनैत छी जे देवीश्पूजा तंत्रसाधना सँ सम्बद्ध अछि। किछु इतिहासकारक मत छन्हि जे तंत्रसाधना असंस्कृत जनजातिक समाज सँ आयल अछि। जकरा कालान्तर मे ब्राह्मणवादी लोकनि अपना लेलनि। बहुत दिन धरि तंत्रश्साधना अवैदिक कार्य बूझल जायत छल। रसेश्रसे अपनवैतश्अपनवैत सनातन धर्म मे जोड़ा गेल। वैदिक धर्मावलम्बी सभ सेहो तंत्रश्साधना अपना देवी पूजा दिषि आकृष्ट भेलाह। एहि सँ अतिरिक्त मिथिलाक समाज मे शैवश्धर्मक प्रमुखता छल अथवा शाक्त धर्मक। जे विवाद विद्वत मंडली मे बहुत दिन धरि चलल। पनचैती सँ फरिआयल जे मिथिलाक लोक पंचदेवोपासक होइत छथि। ई मान्यता पुरानकालक समन्वयवादी धार्मिक जीवनक देन थिक। संस्कार गीतक मध्यकालीन चरित्र के देखार करैत अछि।
गीत संस्कार मे मैथिली गीतक अपन इतिहास अछि। लोचनक ‘रागतरंगिणी’ मे मैथिल गीतक जे इतिहास लिखने छथि तदनुसार एकर जन्म तेरहमश्चैदहम शताब्दी मे भेल। षिव सिंह आ विद्यापति समकालिन छलाह। हुनके पितामह सुमति मैथिली गीतक परम्पराक प्रारंभकर्ता छलाह। एहि प्रकारे मिथिलाक देषी गीत परम्पराक स्थापना भेल। ऐतिहासिक आाधार पर यैह मानल जाइत अछि मुदा गीत गेवाक प्रवृति मनुष्यक विकासक संग जुड़ल अछि। जहि आधार पर आरो पुरान कहल जा सकैत अछि।
गीत गेवाक ढ़ंग, जकरा राग कहल जाइत, मिथिला मे भास कहल जाइत छैक। मिथिला भासक अपन विषिष्टता छैक। संस्कार गीत एहि भासक भंडार छी। हँ,किछु त्रुटिपूर्ण बात सेहो अछि जे कम जनने एक्के गीत (समदाउन) खुषीक समय मे सेहो गवैत छथि आ शोकक समय सेहो जखन कि दुनूक लेल अलगश्अलग विषयवस्तु होइछ। तहिना बेटाक विवाह मे कुमार गीत आ बेटीक लेल कुमारि गीत मे सेहो अंतर होइत अछि। जनमक समय खेलौना आ सोहर मे सेहो अंतर अछि। …

-नवेन्दु कुमार झा
सेमीफाइनलमे धाराशायी भेल राजग

बिहार विधान सभाक सेमीफाइनल प्रदेशमे सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधनक लेल परेशानी बाला रहल। एहि चुनावमे मतदाता नीतीश सरकारकेँ जोरक झटका धीरेसँ देलनि। विधान सभाक अठारह सीटक लेल भेल उप चुनावक जे परिणाम सोझाँ आयल अछि एकर कल्पना शायद सत्तारूढ़ गठबंधन नहि कयने होयत।ज्यों एकर एहसास रहैत त चुनाव प्रचारक क्रम मे राजगक नेता अपना-आपके आत्म विश्वास सँ भरल प्रकट नहि करितथि। लोकसभा चुनाव आ विधान परिषदक स्थानीय निकाय कोटाक चुनाव मे भेटल सफलता सँ उत्साहित मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एहि चुनाव मे जे राजनीतिक प्रयोग कयलनि से असफल रहल। राजनीति मे परिवारबाद विरूद्ध डेंग उठायब आ दल-बदलू के तरजीह देब हुनका लेल महग पडल। एहि चुनाव मे दल बदलूक पूरा मान-मर्दन मतदाता कयलनि अछि। भाजपा छोडि राजदक टिकट पर मूँगेर सँ जीतल विश्वनाथ प्रसाद गुप्ता आ उदय माँझी के छोडि आन उम्मीदवार चुनाव नहीं जीति सकल।
अठारह सीट पर भेल मतदानक परिणाम राजद-लोजपा गठबंधनक पक्ष मे गेल अछि। एहि गठबंधन के नौ सीट पर सफलता भेटल अछि त राजग के मात्र पाँच सीट पर संतोष करय पडल अछि। काँग्रेस आ बसपा लेल ई चुनाव लाभदायक रहल। काँग्रेस जतय दूटा सीट कय झटकि लेलक ओतहि बसपा एक सीट हथिया कय उत्तरप्रदेशक सीमा सँ सँटल क्षेत्र सभ मे परिवार बादक विरूद्ध जे विगूल मुख्यमंत्री फूकलनि से निरर्थक गेल। पूरा बिहार नीतीश के, घोसी जगदीश के’क नाराक संग जदयू सांसद जगदीश शर्माक कनिया शांति शर्मा निर्दलीय उतरि जीतय मे सफल रहलीह एहि ठाम जदयूक उम्मीदवार तेसर नम्बर पर चलि गेलनि।
दल बदलू के जनता रास्ता देखा देलक। राजद छोडि जदयू मे सम्मिलित भेल रमई राम, श्याम रजक, अजय कुमार टुन्ना, जदयू छोडि भाजपाक टिकट पर चुनाव लडल अभय सिंह, जदयू छोडि राजदक दामन थामने विजय राम आ ललन पासवान सहित कतेको दल बदलू विधान सभाक चौखट धरि पहुँचय मे असफल रहलाह। प्रदेश मे नव सोशल इंजिनियरिंग मे लागल मुख्यमंत्री नीतीश कुमारक प्रयास एहि चुनाव मे असफल रहल। महादलित आ अति पिछडाक रूप मे नव वोट बैंक तैयार करबाक प्रयास के सेहो झटका लागल अछि। एहि उपचुनाव मे सात टा सुरक्षित क्षेत्र सेहो छल जाहि मे सँ मात्र दूटा सीट जदयू के भेटल जखनकि राजद आ लोजपा अपन-अपन कब्जा बाला सुरक्षित सीट बचब मे सफल होयबाक संगहि लोजपा बोधगया (सु0) आ काँग्रेस चेनारी (सु0) सीट राजग सँ छीनि लेलक। ई उपचुनाव न्यायक विकास’क नारा देबय बाला नीतीश सरकारक लेल जनताक चेतौनी अछि त राजद आ लोजपाक लेल आत्म विश्वास बढब बाला कहल जा सकैत अछि। काँग्रेसक लेल ई चुनाव प्रयोग पहिल सफलता अछि असगर लडबाक काँग्रेसक निर्णय सँ एहि सँ आलाकमान पर दबाब बनब मे सफलता भेटत। उत्तरप्रदेश सीमा सँ सटल नौतन सीट पर बसपा अपन कब्जा जमा सभ राजनीतिक दलक लेल खतराक घंटी बजा देलक अछि।
उपचुनावक परिणामक सभ दल अपना-अपना दलक मोताबिक विश्लेषण क रहल अछि। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हारिक कारण स्थानीय मुद्दा के जनैलनि अछि आ एहि हारिक चिंतन करबाक बात कहलनि अछि। भाजपाक निशाना पर काँग्रेस अछि। भाजपाक अध्यक्ष राधामोहन सिंहक मानब अछि जे राजद-लोजपा आ काँग्रेस भीतरे-भीतरे एकजूट छल आ राजग के नोकसान पहुँचैबा लेल काँग्रेस असगर मैदान मे उतरल जहि सँ राजग के नोकसान भेल अछि। लोजपा अध्यक्ष रामविलास पासवान आ राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद एहि जीत पर खुशी व्यक्त करैत कहलनि जे चुनाव परिणाम नीतीश सरकारक पोल खोलि देलक अछि। विकासक नाम पर जनताक ठगबाक काज आ महादलित आ अति पिछडलक नाम पर समाज के बँटबाक प्रयासक जबाब जनता द देलक अछि। काँग्रेस अध्यक्ष अनिल कुमार शर्मा दू सीट पर भेटल सफलता आ पार्टी प्रदर्शन के सोनिया गाँधी आ राजीव गाँधीक बढैत लोकप्रियताक परिणाम जनौलनि अछि। भाजपाक आरोप के खारिज करैत श्री शर्मा कहलनि अछि जे काँग्रेस ककरो वोट बैंक मे सेंधमारी नहि कयलक बल्कि काँग्रेसक जे वोट बैंक छिटकि गेल छल ओकरा वापस अपना दिस अनलक अछि।
हाँलाकि एहि परिणाम सँ सरकारक स्वास्थ्य आ स्थिरता पर कोनो असरि नहीं पडत मुदा भाजपा आ जदयूक भीतर आक्रोशक विस्फोट भ सकैत अछि आ एकर किछु बानगी सेहो सोझा आयल अछि। ओना एहि चुनाव के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आत्म विश्वासक संग सेमीफाइनल कहैत छलाह आ खेलक नियमक मोताबिक सेमीफाइनल हारलाक बाद फाइनल मे स्थान नहीं भेटैत अछि मुदा राजनीतिक नियम अपना अनुसार बनैत अछि। हारि के जीत आ जीत के हारिक विश्लेषण राजनीतिक दल आ राजनेता अपना अनुसार सँ करैत छथि आ नियमानुसार फाइनल मे फेर राजग, लोजपा-राजद आ काँग्रेस एक दोसरा के सोझा होयत त परिणाम कि होयत ई त भविष्यक गर्त्त मे अछि मुदा सत्तारूढ भाजपा-जदयूक राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधनक बढल आत्म विश्वासक खतराक घंटी जनता बजा देलक अछि।
वि0 सभा विजयी उम्मीदवार निकटतम प्रतिद्वन्दी भोटक
क्षेत्र आ दल आ दल अंतर
बगहा(सु0) कैलाश बैठा नरेश राम 6950
(जदयू) (काँग्रेस)
नौतन नारायण प्रसाद मनोरमा प्रसाद 13326
(बसपा) (जदयू) वारिसनगर विश्वनाथ पासवान डा0 संजय पासवान 6235
(सु0) (लोजपा) (भाजपा)
कल्याणपुर अशोक वर्मा रंधीर कुमार 19029
(राजद) (जदयू)
बोचहाँ मुसाफिर पासवान रमई राम 4000
(सु0) (राजद) (जदयू)
औराई सुरेन्द्र राय राम सूरत राय 8801
(राजद) (जदयू)
अररिया विजय कुमार मंडल अजय कुमार झा 13468
(लोजपा) (भाजपा)
बेगूसराय कृष्ण सिंह सुदर्शन सिंह 9259
(भाजपा) (लोजपा)
त्रिवेणीगंज दिलेश्वर कामत दीनबन्धु यादव 11419
(जदयू) (लोजपा).
धोरैया मनीष कुमार नरेश दास 2695
(सु0) (जदयू) (राजद)
मूँगेर विश्वनाथ प्र0 गुप्ता मो0 सलाम 4152
(राजद) (जदयू)
सिमरी चौधरी महबूब अली डा0 अरूण कुमार 5870
बख्तियारपुर कौसर (काँग्रेस) (जदयू)
रामगढ अम्बिका प्र0 यादव नरेन्द्र कु0 सिंह 2957
(राजद) (बसपा)
चैनपुर बृजकिशोर बिन्द विरेन्द्र कु0 सिंह 3369
(भाजपा) (राजद)
चेनारी मुरारी प्रसाद गौतम ललन पासवान 1150
(सु0) (काँग्रेस) (राजद)
घोसी शांति शर्मा दिनेश प्र0 यादव 5200
(निर्दलीय) (राजद)
बोध गया कुमार सर्वजीत विजय कुमार मांझी 7662
(सु0) (लोजपा) (भाजपा)
फुलवारी उदय मांझी श्याम रजक 1274
शरीफ(सु0) (राजद) (जदयू)

सीटक हेरा-फेरी
विस0 सीट 2005 उपचुनाव
रामगढ राजद राजद
चैनपुर राजद भाजपा
चेनारी जदयू काँग्रेस
बेगूसराय भाजपा भाजपा
घोसी जदयू निर्दलीय
नौतन जदयू बसपा
बगहा जदयू जदयू
औराई जदयू राजद
बोचहाँ राजद राजद
फुलवारी राजद राजद
कल्याणपुर जदयू राजद
वारिसनगर लोजपा लोजपा
त्रिवेणीगंज जदयू जदयू
बेगूसराय भाजपा भाजपा
मूँगेर जदयू राजद
अररिया भाजपा लोजपा
धोरैया जदयू जदयू
सिमरी बख्तियारपुर जदयू काँग्रेस

परिणाम तालिका

दल सीट(सं0) मे विधान सभा सीट राष्ट्रीय जनता दल 06 फुलवारी शरीफ(सु0), रामगढ,
मूँगेर,बोचहाँ(सु0), औराई आ
कल्याणपुर।
लोकजनशक्ति पार्टी 03 वारिसनगर(सु0), अररिया आ
बोढगया(सु0)।
जनता दल यूनाइटेड 03 बगहा(सु0), धोरैया(सु0) आ
त्रिवेणीगंज।
भारतीय जनता पार्टी 02 चैनपुर आ बेगूसराय।
काँग्रेस 02 चेनारी(सु0) आ सिमरी
बख्तियारपुर।
बहुजन समाजवादी पार्टी 01 नौतन।

निर्दलीय 01 घोसी।

कुल 18

……

हेमचन्द्र झा
मास्टर साहेब नहि रहलाह

आई मास्टर साहेब शांत भऽ गेलाह । भोरे-भोर सौंसे गाम मे खबरि पसरि गेल जे आब मास्टर साहेब दुनिया मे नहि छथि । छब्बे मास पहिने तँ रिटायर भऽ कऽ आयल रहथि ओ । एखन पेंशनक कागतो कहाँ सोझरायल रहनि । कएकटा काज एखन बाँकिये रहनि । सेहेन्ते अपन एकमात्र बेटा भोलूक वियाह १६ वरषक अवस्था मे करेने रहथि । अगहन मे दुरागमन करेबाक विचार रहनि,से कहाँ भेलनि । जेठे मे विदा भऽ गेलाह ओ । जिनगी भरि एक-एक पाई बचेनहार, चारि-चारिटा कनेदान अपना हाथें केनहार, बाप-पुरषाक ७-८ बीघा जमीन के १२ बीघा पर लऽ गेनहार, साबिकक घरारी सँ अलग घरारी लऽ कऽ घर बनेन्हार मास्टर साहेब आखिर अपन बेटाक लेल दू कोठली पक्का घर नहिये बना सकलाह । भला कालक आगाँ ककरो बस चललैक अछि? मास्टर साहेब हारि गेलाह काल आ समय सँ । आई मास्टर साहेब नहि हुनक लहाश पड़ल अछि आँगन मे । करुण क्रंदन सँ पूरा आँगन शोकाकुल छैक ।
किछु दिन पहिने सँ ओ दुखित छलाह । दरभंगा जा कऽ दवाई-दारू करेने रहथि । दवाई सभ चलिये रहल छलनि, ता एकाएक काल्हि सांझ मे ओ बेसी दुखित भऽ गेलाह । गाम मे जे डाक्टर रहैक से बजाओल गेलाह । ओ नाड़ी देखलनि, बी.पी चेक केलनि, आला लगेलनि आ कहलनि जे ता हम किछु दवाई लीखि दैत छी आ ईहो कहैत छी जे हिनका आगू लऽ जैऔन । परिवारक सभ सदस्य हुनका आगू लऽ जेबाक उपक्रम मे लागल । परंतु मास्टर साहेब मना कऽ देलनि । शायद हुनका अपन मृत्युक आभास भऽ गेल रहनि । ओ स्पष्ट कहने रहथि जे जँ भिनसर धरि बाँचि गेलियह तँ डाक्टर लग लऽ जैहह । हम राति-बिराति डाक्टर लग नहि जायब ।
से मास्तर साहेबक मरितहि हुनक एकमात्र बालक भोलू पर विपत्तिक पहाड़ टूटि पड़ल । १६ वरषक बालक जेकर जन्म चारि बहीनक बाद भेल छलैक,विपत्तिक तँ एखन धरि नामो ने सुनने छल । पछिले साल तँ मैट्रिक कयलक ओ आ एखन पटना मे आई.ए. मे पढ़ैत अछि । वियाहो भऽ गेल छैक । आब ओकरा पर अपन पढ़ाइ पूरा करबाक जिम्मा छैक, माइक लेल परिवार पेंशनक कागत बनबेबाक छैक, अपन परिवारक चिन्ता छैक आ ७-८ बीघा खेतक जिम्मा छैक । भला १६ वरषक बालक सँ एते हो कोना आ ताहि पर सँ सामने छैक पिताजीक श्राद्धक चिन्ता ।
मास्टर साहेब शुरुहे सँ मास्टर साहेब नहि छलाह । अपना जमाना मे शास्त्री केलाक बाद जखन शीघ्रे नोकरी नहि भेलनि तँ कलकत्ता चलि गेलाह । ओतय पूजा-पाठ वला ड्‌यूटी पकड़लनि । १६-१६ घंटा पूजा-पाठ वला ड्‌यूटी करथि । फेर बाद मे कोनो जोगाड़ सँ मास्टरी भेलनि आ बनि गेलाह हाइस्कूलक संस्कृत शिक्षक । एक-एकटा पाई बचाबथि आ गाम पठाबथि । गाम मे परिवारो नमहर रहनि । तीन भाईक भैयारी मे जेठ रहथि । ७-८ बीघा खेत तीन भाइ मे कम लगनि, क्रमश: ओकरा बढ़ाय १२ बीघा पर लऽ गेलाह । बीच-बीच मे कनेदानो सभ केलनि । पिताजीक मृत्युक बाद भिन-भिनौज भऽ गेलनि । घरारी तक बँटा गेलनि । अपनहि अमलदारी मे बेटाक माथ पड़हक ४ बीघा खेत के ७-८ बीघा पर पहुँचा देलनि आ सभटा कनेदानो सँ मुक्त भेलाह ।
दाह-क्रिया सम्पन्न भेल आ तीनिये दिनक बाद आबि गेल छौड़झप्पी । सभ चीज सँ समांग सभ मुक्त भेलाह । आब आयल असली तैयारीक बेर । ओमहर मास्टर साहेब मुईलाह आ एम्हर गौंआ मे कनफुसकी शुरू । मास्टर साहेब जिनगी मे कत्ते कमेलाह एकर गणना होमय लागल । ओहि मास्टर साहेबक श्राद्ध तँ नीक सँ हेबाक चाही, गौंआ के दू दिनक भोज तँ हेबाके चाही ऊपर सँ किछु बँटलो जाय यथा लोटा या धोती या ….। कियो एकोबेर ई नहि सोचलाह जे मास्टर साहेब जिनगी भरि काजे करैत रहलाह । आ किनको लग ईहो सोचबाक समय नहि रहनि जे एहि १६ वरषक बालकक एतेटा जिनगी कोना कटतैक । जाहि बालकक पिताजीक स्वर्गवास भऽ गेलै, घरक कर्ता-धर्ता चलि गेलै, जेकरा लग स्वयं सिर छुपेबाक लेल एकटा घर नहि छैक, ओकर जिनगी कोना बिततैक । बस ऊपर सँ किछु हेबाक चाही ।
औपचारिकतावश गामक बैसारी भेल । ५-१० टा बूढ़-पूरान उपस्थित भेलाह । वस्तुत: पहिने एहि बैसारीक पाछू एकटा पैघ उद्देश्य रहैक । कर्ताक गड़ा मे उतरी रहैत छनि, ओ कोनो काज नहि कऽ सकैत छथि । ओ समाजक समक्ष अपन मोनक इच्छा रखैत छलाह जे हम अपन पिता/माता श्राद्धक निमित ई सभ करय चाहैत छी । आब समाजक दायित्व बनैत छलैक जे कर्ताक इच्छाक पूर्ति कोना हो आ समाज तदनुसार अपन काज करैत छल । जहन कर्ताक गड़ाक उतरी टूटैत छलनि तँ ओ समाज के एक-एक पाई सधा दैत छलखिन । परन्तु आब बैसारक उद्देश्य दोसर भऽ गेलैक अछि । समाज कर्ताक समक्ष अपन माँग राखय रखलाह अछि जे तोहर पिता तोरा लेल ई केल्थुन, तों ई करह, ई बाँटह…। सएह भेल, बूढ़-पुरान सभक विरोधक बावजूदो बैसार मे ई मुद्दा उठिये गेल जे की बाँटल जायत । कर्ता अपन असर्मथता जतेलैन, तथापि अगिला दिन भोर होइत-होइत सौंसे गाम मे खबरि पसरि गेल जे मास्टर साहेबक श्राद्धक समाप्तिक बाद प्रति परिवार पूरा गाम मे “फुलही लोटा” बाँटल जायत । पाई कतौ सँ अबौ, समाज के कोन मतलब?
भोज भातक तैयारी सहित श्राद्धक आन तैयारी सभ समयानुसार शुरू भऽ गेल । एकादशाह आ द्वादशाह मे खूब जमगर भोज भेलैक । गौंआ सभ खएलक आ बैसि गेल लोटाक इंतजार मे । एतबे नहि सरो-कुटुम कहाँ बाकी रखलनि । मास्टर साहेबक जेठकी बेटीक नि:संतान मृत्यु भऽ गेल रहनि आ तें आब तीनटा जीवित रहथिन । दोसर बेटी दिसक दुनू नाति नानाक श्राद्धक उसरगाक लेल तत्पर रहैक । तेसर बेटीक तीनू बेटा सेहो कम नहि रहय । ओहो सभ तैयारे छल । चारिम बेटीक धिया-पुता छोट रहैक आ तें एहि झमेला सँ काते रहैक ।
एकादशाह दिन आँगन मे उसरगा समान सभ पर नाति सभक नजरि रहैक । उसरग-पुसरगक विध खतम होईतहि सामानक लेल नाति सभ तत्पर भेल । सभ कियो सभ सामान लेलक । लेकिन दोसर बेटी दिसक दुनू नाति छोट सामानक मोह मे नहि पड़ि गाय के हाँकि के अपना गाम पर बान्हि आयल । तेसर बेटी दिसक नाति सभक हाथ मे अयलैक ओछाओन, छाता, जूता. खटिया आदि । ओकरा सभ के ई बात बड्‌ड अखरलैक जे हमर मसिऔत सभ गाय लऽ कऽ चलि गेल । मामला द्वादशाह दिन तँ शांत रहलैक, परन्तु तकर प्राते गरमा गेलैक । तेसर जमाय सभटा सामान वापस कऽ देलनि आ विरोध स्वरूप रूसि रहलाह ।
काल्हिए तँ भोलूक उतरी टुटलैक अछि आ आईये नव समस्या आबि गेलैक । ओ किकर्तव्यविमूढ़ भऽ गेल । सभ सभठाम फुट्‌टे रूसल । जेकर पिताजी मरि गेलैक तेकरा के देखतैक, अपने मे समाने लय सिर-फुटौव्वल । आखिर ओ अबोध बालक अपन चुप्पी तोड़ि सभ बहीन के एकठाम बजेलक आ प्रश्न केलक – “हम तोरा सभ बहीन सँ छोट छियौ । तों सभ हमरा बोल-भरोस कतय देमे, उल्टे सामान सभ लेल झगड़ा करैत जाई छें । की बाबूक मृत्युक बाद हमरा प्रतिये तोरा सभक कोनो फर्ज नहि बनैत छौक? भोलूक प्रश्नक जबाव केकरो लग नहि छल । सभ निरुत्तर छल ।

३. पद्य

३.१. गुंजन जीक राधा

३.२. पंकज पराशर
३.३. सुबोध कुमार ठाकुर
३.४.उमेष मंडल (लोकगीत-संकलन)

३.५.कल्पना शरण-प्रतीक्षा सँ परिणाम तक-५
३.६.विजया अर्याल-आजुक जीवन
३.७.सरोज खिलाडी-मनक बात मनमे
३.८. दयाकान्त-बाढ़ि

गंगेश गुंजन

गुंजन जीक राधा- बारहम खेप
फेर तं वैह संसारक गाथा!
फेर सृष्टिक वैह सबदिना चर्च-वर्च।
बीतल रातिक लेभरल बिसरल अनुभव
सोझांक दिनक सब उद्योग उपाय मे अपस्यांत जीवन
घाम चुअइत देह-माथक रेखा में फंसल पसेनाक
अति सूक्ष्म जलप्राण-कण करैत चक चक
अनमन जेना प्रोषित पतिकाक निर्धन सेहन्ताक चमचम ठोप!
आँखि-भौंह मध्य भाल पर ठीक उूपर। यद्यपि जरल कपार
अभागलिक तथापि । सौभाग्य-जगमग ठोपक विलास हो जाग्रत,
थिक संभव ई बात स्त्रीक करुणा, लज्जा कें बचा रहल हो दया,
महाभाव बन’ नहि दैत हो हीन-अभागिन।
रक्षा मे हो सजल शस्त्र सन सोहागक ठोप ओकर।
ओना ई एतेक दया आ एहन कृपा कथीक स्त्री लेल?
कि तं दुर्गन्जने-दुतकार आकि किछु एहने मामूलियो दुःख पर
सहानुभूति-सम्वेदनाक वर्षा, जे बनि जाय मनहि पर पहाड़!
किएक से ? देह दशा नहि ओकर तइ जोग
करय स्त्रीयो कृषि काज ?
दूहि क दूध, पोसय बछड़ू चरबय गाय। ओ कि मात्र
मक्खने टा मथि सकैए, रान्हि सकैए भात। एहि सं फाजुल नहि ?
किएक नहि हर-बड़दक दिनचर्या सकैत अछि सम्हारि ?
किएक नहि जोति सकय हर
खेत करय आबाद हाॅंकि क ल’ जाय बैलगाड़ी
बिदागरीक ? नहि रहि जाय पुरुषे बहलमान सब काल अनिवार्य।
किएक नहि क’ सकय ओहो ई सब काज ?
स्त्री-हम सक्षम नहि सब ? लिखी पोथी बोॅची सब शास्त्र ?
किएक नहि संभव ई सब जेना पुरुष बुते ?
बान्हि मूड़ी मे मुरेठा, ठेहुन धरि नूआंॅ समेटि ?
नीपय जे आंगन-असोरा, नहि कोनो संकोच तं
बाध जाय हर जोतबा मे की बाधा, की लज्जा आ व्यर्थक विचार ?
‘‘ओहनहुं तं असकर पुरुष सदाय सं करैत श्रम
कठोर जीवन यापनक उपाय जोतैत हर
चीड़ि क’ जाड़नि, उूघैत बोड़ा-मोटा क’ क’ बहलमानी
बड़य थाकल बुझाइत अछि। बड़ ठेहियायल, असोथकित।
कठमस्त देह पर्यन्त भ’ गेलैये सिंगार-विलास विमुख।’’-
कहने छलि रमकनियांॅ भौजी। बड़ छलि उदास,
बनल छलि स्वयं भरि देह पियास!
तथापि लाज सं सिहरलि।-कंठ आ देह प्राण अतृप्त,
आगि लागल हो जेना सौंसं शरीर।
ई अनुभव केहन विकट कतेक अनचिन्हार
स्त्री-पुरुखक ओहनो भेटल से सुन्दर स्नेह-काल
होयबाक छल जे शृंगार श्लथ रस धार स्नानक उद्दाम अवसर !
सेहो बनि जाय जं मरुथल-मरुथल
चारू कात उड़ैत बालुक असकर एकान्त
तरबा सं माथ धरि धहधह ताप
करय की तेहन लोक अपना आप ?
बुधिबताहि रमकनियाॅ भौजी !
27 अगस्त,2009.

(अगिला अंकमे…)
पंकज पराशर
सरगोधा
निःशब्दा राति मे खुजल पहिले-पहिल चंचु
आ हूक उठल पंचम मे?

मोन स्थिर करैत
तकैत छी एहि स्वर-धार केर उत्स
मुदा भोरुकबा उगबा लेल जेना उताहुल छल

निःश्वास छोड़लहुं- ह’-ह’ भोर होयत आब भोर
आ मोन केँ भेटत त्राण
मुदा ई कोन चिड़ै थिक
जे ‘ध’ केँ उच्चरित करैत अछि ‘द’
आ कहैत अछि- सरगोदा सरगोदा
गोदा…हाय सरगोदा

निन्न जेना गामे मे रहि गेलीह
संग नहि अयलीह एहि ठाम
भोर होइत अछि करौट फेरैत-फेरैत

होइत अछि अंततः भोर
मुदा भोर भेल शहर मे
औनाइत रहैत अछि राति

अखबारो चिचियाइत अछि
निःशब्दा रातिक स्वर जकां
रक्तगंधी स्वर मे ओहिना सरगोदा

बहराइत छी एहि शहर सँ चरैवेति…चरैवेति
आ समवेत स्वर मे सुनैत रहैत छी
चंचु सबहक पंचम स्वर
2009
सुबोध कुमार ठाकुर
अधूरा प्रेम आर चान
छिटकल क्षण आकाशमे छल
मनमे दबल जतेक बात छल

कहए लगलहुँ चानसँ
बुझबए लगलहुँ प्राणसँ

हमरो प्रेमक ज्योति जागल रहए
हमरो प्रीतक आगि लागल रहए

प्रेम करए लागल रहौँ हुनका हम प्राणसँ
ई कहए लगलहुँ चानसँ

आएल छलीह हमर मरुभूमि रूपी मनमे ओ
मृगमरीचिका जेकाँ बनि कऽ ओ
खेलाय लागल छलीह ओ हमर अरमानसँ
कहए लगलहुँ हम चानसँ

अखन तँ प्रेमक आँकुरो नहि फुटल छल
मनक स्नेह सेहो ढंगसँ नहि चढ़ल छल
नीक जेकाँ हुनका सुननहुँ नहि छलहुँ कानसँ
कहए लगलहुँ ई चानसँ

कर्मक डोरी संग बान्हल छलहुँ
जीवन सार्थक करएमे लागल छलहुँ
अर्थकेँ जुटबैमे प्यासल छलहुँ

प्रेम मधुर संगीत फीका लागए हमर कानसँ,
परंच हमर मनक गाममे ई शोर छल
कहि नहि सकलहुँहुनका ई अपन जुबानसँ
कहए लगलहुँ ई चानसँ

अन्तर्द्वन्द चलिये रहल छल
प्रेमक रंग चढ़िये रहल छल
परंच ठीक भय गेलै हुनकर विवाह ककरो आनसँ,
कहए लगलहुँ ई चानसँ

जिनक पाणिग्रहण हम नहि कए सकलहुँ,
जिनका लेल हम तड़पैत रहि गेलहुँ
हाय केहन बान्हल छलहुँ विधाताक विधानसँ

ओ छलीह हमर अधूरा प्रेम,
कल्पना ओ यथार्थक बेजोड़ संगम
आर पवित्र गीता कुरानसँ
कहए लगलहुँ ई चानसँ

उमेष मंडल

एहि बेरक बात थिक। विविधश्भारती रेडियो स्टेषन सँ गीत सुनैत छलौ। एखन धरि मैथिली साहित्य सॅ कम्मेश्सम्म सिनेह छल। ओना परिवार सॅ समाज धरि मैथिलिऐक बीच आठो पहर समय बीतैत अछि। कातिक पूर्णिमाक दिन रहने, समाजक माएश्बहिन लोकनि सामा भसा आंगन दिषि सोहर गबैत घुमलीह। एकाएक हमरो कान मे, गीतक ध्वनि हवा मे छिछलैत अबै लगल। रेडियो बन्न कऽ सोहर सुनै लगलहुँ। गीतक स्वर हृदय केॅ झकझोड़ए लगल। जेहने माएश्बहीनि लोकनिक स्वरक मधुर टाँस तेहने एकरुपता। जहिना बहीनि,माएश्बाप समाजक सखीश्सहेली छोड़ि, सासुर जेबा काल, अपन क्रन्दन स वातावरण केॅ शोकाकुल बनबैत आ सखीश्सहेली सोहरक स्वर सॅ विदा करैत,तहिना भऽ गेल। हृदय विदीर्ण हुअए लगल।
अनायास मन मे सवाल उठै लगलश्
(क) श् की हमर कलाश्साहित्य, भूमण्डलीकरण स, आगू बढ़त?
(ख) श् आ कि जतय अछि ततय, अजेगर साॅप जेॅका थुसकुरिया मारि, बैसल रहत?
(ग) श् आ कि हमर कलाश्साहित्य मटियामेट भऽ जायत?
एहि प्रष्नक बीच उलझल मोन मे, डिबियाक टिमटिमाइत इजोत जेकाॅ, आयल जे अपनो मातृभाषा आ मातृभूमिक सेवा लेल किछु कयल जाय! एहि जिज्ञासाक संग अपने लोकनिक बीच, एकटा छोटश्छीन पोथी ‘संस्कार गीत’राखि रहल छी। आषा अछि जे अधला पर ध्यान नहि दऽ, आगूक सेवा लेल पे्ररित आ प्रोत्साहित जरूर करब।
गीतक संकलन किछु पोथिओक अछि आ अधिकतर माएश्बहीनिक कंठक सेहो अछि। जहि गीतिकार लोकनिक गीत संकलित अछि, हुनक आभारी छी। आ जे गीत माएश्बहीनि लोकनिक कंठक अछि, ओ जहिना कहलनि तहिना लिखलो गेल अछि तेॅ शब्दक फेड़िश्फाड़ आ टूटल सेहो अछि।
गीतक संकलन करै मे अग्रज सुरेष मंडल आ अनुज मिथिलेष मंडलक भरपूर सहयोग रहल।
(1)
सिंह पर एक कमल राजित ताहि उपर भगवती।
उदित दिनकर लाल छवि निज रुप सुन्दर छाजती।
दाँत खटश्खट जीह लहश्लह श्रवन कुन्डल शोभती।
शंख गहिश्गहि, चक्र गहिश्गहि खर्ग गहि जगतारिणी।
मुक्तिनाथ अनाथ के माँ भक्तजन के पालती।
सिंह पर एक कमल राजित ताहि ऊपर भगवती।
माँ ताहि ऊपर भगवती।
(2)
सभ के सुधि अहाँ छी अम्बा हमरा किए बिसरै छी हे।
हमरा दिस सँ मुह फैड़े छी, ई नहि उचित करै छी हे।
छी जगदम्बा जग अबलम्बा तारिणी तरणि बनै छी हे।
छनश्छन पलश्पल ध्यान धरै छी दरसन बिनु तरसै छी हे।
छी हम पुत्र अहीं केर जननी से तँ अहँा जनै छी हे।
रातिश्दिन हम विनय करै छी पापी जानि ठेलै छी हे।
सभ के सुधि अहाँ लै छी अम्बा हमरा किए बिसरै छी हे।
(3)
कोन दिन आहे काली तोहर जनम भेल, कोन दिन भेल छठियार।
शुक्र दिन आहे सेवक हमरो जनम भेल, बुध दिन भेल छठियार।
पहिर ओढ़िय काली गहबर ठाढ़ि भेली, करब मे काली के सिंगार।
कोन फूल ओढ़न माँ के कोन फूल पहिरन, कोन फूल सोलहो सिंगार।
चम्पा फूल ओढ़न, जूही फूल पहिरन, ओढ़हुल फूल सिंगार।
भनहि विद्यापति सुनु माता काली, सेवक रहु रक्षपाल।
कोन दिन आहे काली तोहर जनम भेल, कोन दिन भेल छठियार।
(4)
अब ने बचत पति मोर हे जननी,
अब ने बचत पति मोर।
चारु दिसि पथ हेरि बैसल छी,
क्यो ने सुनै दुख मोर। हे जननी…..
एहि अवसर रक्षा करु जननी,
पुत्र कहाएव तोर। श् हे जननी…..
अलटिश्बिलटि कऽ जँ मरि जायब,
हँसी होयत जग तोर। श् हे जननी…..
अबला जानि शरण दीअ जननी,
नाम जपत हम तोर। श् हे जननी….

(5)
हम अबला अज्ञान हे श्यामा,
हम अबला अज्ञान।
धन सम्पत्ति किछु नहि अछि हमरा,
नहि अछि किछुओ ज्ञान। श् हम अबला….
नहि अछि बल, नहि अछि बुद्धि,
नहि अछि किछुओ ध्यान। श् हम अबला……
कोन विधि भव सागर उतरब,
अहिंक जपल हम नाम। श् हम अबला…
(6)
जगदम्ब हे अबलम्ब मेरी, जननी जय जय कालिका।
दष भुजा दष खड़ग राजित, पाष खप्पर विराजित।
मुण्ड लयश्लय मगन नाचय, गाबय योगिन मालिका।
भाइ भैरब मुण्ड छीनथि जय जय कालिका।
(7)
अहाँ कियै भेलहुँ कठोर हे जननी अहाँ कियै भेलहुँ कठोर।
हम दुखिया माँ शरण अहाँ के अहाँ कियै भेलहु कठोरश् हे जननी…
अतुल कष्ट सहि जनम देल अछि आब पोछत के नोरश्हे जननी …
ककरा पर हम जनम गमायब के करती आब शोरश् हे जननी….
ककरा पर हम रुसि परायब के आब रक्षक मोरश् हे जननी अहाँ कियै….
(8)
क्यो ने हमर रखबार हे जननी,
क्यो ने हमर रखबार।
चिन्ता विकल विवस मन मेरो,
मन दुख होइए अपार। हे जननी क्यो….
बिनु अबलम्ब धार मे डुबलहुँ,
सुझत नहि किनार। श् हे जननी…..
अहाँ किए देर लगेलहुँ जननी,
हम डुबलहुँ मझधार। श् हे जननी….
सृष्टिक मालिक अहीं छी जननी,
करहु सभक प्रतिपाल। श् हे जननी….
माता के सब पुत्र बराबरि,
पंडित मूर्ख गमार। श् हे जननी….
कतेक विनय कय थाकि गेलहुँ हम,
अब करिअ भव भार। श् जननी…

(9)
कहाँ नहैली काली कहाँ लट झाड़लन्हि,
कहाँ कयल सिंगार हे।
गंगा नहैली काली बाट लट झाड़लन्हि,
गहबर कयल सिंगार हे।
पहिरि ओढ़िया काली गहबर ठाढ़ भेलि,
करय लगली सेवक गोहारि हे।
यष लिय यष लिय काली हे माता,
अहाँ यष फिरु संसार हे। श् कहाँ…..
(10)
अयलहुँ शरण तोहार हे जगतारनि माता।
लाले मन्दिरबा के लाले केवरिया,
लाले ध्वजा फहराय हे जगतारनि माता।
लाले चुनरिया के लाले किनरिया,
लाले सिन्दुर कपार हे जगतारनि माता।
राखि लिय मुख लाली हमरो,
हम लेब अँचरा पसारि हे जगतारनि मता।
अयलहुँ शरण तोहार हे जगतारनि माता।
(11)
हे जगदम्बा जय माँ काली प्रथम प्रणाम करै छी हे।
नहि जानि हम सेवा पूजा अटपट गीत गबै छी हे।
सुनलहुँ कतेक अधम के मैया मनवांछित फल दै छी हे।
पुत्र सम जानि चरण सेवक के जन्मक कष्ट हरै छी हे।
विपतिक हाल कहल की हे मैया आषा लागि जपै छी हे।
सोना चानी महल अटारी ई सब किछु ने मँगै छी हे।
मनक मनोरथ मनहि मे राखि मंदिर तक पहुँचे छी हे।
अहाँक चरण के दास कहाबी एतवे हम मनबै छी हे।
प्रेमी जन सँ पाबि निराषा नयन नीर बहबै छी हे।
नोर बहा कऽ अहाँ लय मैया मोती माल गुथै छी हे।

(अगिला अंकमे)
कल्पना शरण
प्रतीक्षा सऽ परिणाम तक – 5

पृथ्वी पर जन्मक मूल उद्देश्य दिस
कृष्ण बढ़ला द्रुपद के दरबार मे
अपन महल सऽ निष्काषित पाण्डव
अत उपस्थित छलैथ ब्राह्मणक रूपमे
अपन धर्नुबल सऽ सव्यसाची भेला
घोषित विजयी द्रौपदीक स्वयंवरमे

वस्त्रहरण होय वा वनवास होय
वा जरासंघ आ भीमक मल्लयुद्धमे
वा अर्जुन संग सुभद्राक विवाह होय
बलराम असमर्थ परिजनक विभाजनमे
मुदा धर्मप्रेमी प्रभु एला पाण्डव दिस
इन्द्रपुत्रक आग्रह पर सारथिक रूपमे

आशंकित अर्जुन के गीताक मूलमंत्र संग
कुर्उक्षेत्रमे विष्णुक विराटरूपक दर्शन भेल
अग्निक गाण्डीव आ शिवक पशुपतास्त्र
मनोबल नहिं देलकैन भीष्मके मारऽ लेल
सारथि कृष्ण करेलखिन शक्तिक पूजा
देवी दुर्गाक समर्थन भेलैन जिष्णुके लेल

विजया अर्याल
आजुक जीवन

प्रत्येरक दिन मृत्युजसँ सापट मांगिकऽ
बाँकी–बक्यौिता देबऽ लेल
ऋणक रूपमे बाँचिरहल अछि जीवन ।
प्रत्येमक क्षण मृत्यु सँ पैँचा मांगिकऽ
क्षतिपूर्ति करबाक हिसाबसँ
व्यािजक रूपमे भरिरहल अछि जीवन ।
जीवन आर्जन करबाक हिसाबमे नहि
जीवन प्रत्येरक क्षणक ऋण देबाक हिसाबसँ
चुकएबाक दरमे असुल–उपर भऽ रहल अछि ।
युद्ध आ शान्तिसक जोड़–घटाउमे
भूखक बारूद लऽकऽ
माटि खाएपर मजबूर भऽ रहल अछि जीवन ।
अखन डेराओन मुँहसभ
अमूर्त्त अर्थमे नुकाएल जीवनके, आँटाक संग बदलिकऽ
विवशतासँ बाँचिरहल अछि ।
इच्छाा आ महात्वाीकांक्षीक कोठीके
प्रदूषित वातावरणके तोड़ल समयमे
संघर्षे–संघर्षक बीचसँ भागि
मनुक्खेक अस्ति्त्विपर दाग लगाबऽ लेल
सर्कसक जोकर बनि बाँचिरहल अछि जीवन ।
खोजमेसँ लाएल संरचनामे, अपनेसँ लगाएल आगि
जरिरहल पृथ्वीसक भागमे शान्तिस शान्ति करत
छितिर–बितिर भेल शताब्दी क हड्डीमे मलहम लगाबऽ
क्षेप््रतयास्तदसँ काटल गेडी लऽकऽ
कछुआक गतिमे चलिरहल अछि जीवन ।
(आबय बला पोथी अएना मैथिली कविता संग्रह-सम्पादक संतोष कुमार मिश्रसँ)

सरोज खिलाडी
मनक बात मनमे

सामनेमे तँ हम चुपचाप छलहुँ
परोछमे हम बरबराइत रहै छी
हुनका सामने हम हँसऽ नहि सकलहुँ
अएनाके सामने हम किए मुस्किनआइ छी ?

मनक बात हम हुनकासँ कहऽ नइ सकलहुँ
अखन हम किए पछताइ छी
हुनका आगू किछु बाजऽ नहि सकलहुँ
अखन हम किए नोर बहबै छी ?

मनेमन कहै छलहु अहाँ विन जीयब कोना
सामनेमे नहि कहऽ सकलहुँ
संकोच आ डरसँ चुपचाप छलहुँ
मोनसँ कहियो हँसऽ नहि सकलहुँ ।

यादमे हुनक कते दिन नोर बहाउ
हुनक इच्छा के हम बुझऽ नहि सकलहुँ
ओ तँ हमरा पौने छली
हुनका हम पाबऽ नहि सकलहुँ ।

अखनो यादमे हुनक डूबल रहै छी
कनियो चैन नहि पाबऽ सकलहुँ
एहन केहन रोग भऽ गेल हमरा
इलाज हम करबऽ नहि सकलहु ।

गलती तँ हुनकेसँ भेल
ओहो तँ हमरा कहऽ नहि सकली
ताली तँ हम बजाबऽ चाहलहुँ
मुदा दुनू हाथके मिलन कराबऽ नहि सकलहुँ
मनक बात मनेमे २।
(आबय बला पोथी अएना मैथिली कविता संग्रह-सम्पादक संतोष कुमार मिश्रसँ)

दयाकान्त
बाढ़ि
हाथ जोरी के विनय करै छी
सुनु माँ कमला, कोशी
बकसि दियै आब मिथिला के
पुत्र टुगर भेल चैदिस |
चिनवार पर सँ बहै छल धार
जान बचायब भेल पहाड़
नहि खेवाक कोनो ओरियान
बितल अन्न बिन कतेको साँझ
नेना-भुटका मुँह तकै छल
मायाक आँखी सँ नोड खसै छल
बाप बेचारा बेबस बैसल
अपना माथ पर हाथ धेने छल
दुधपीबा बच्चा करै छल सोर
मायक दुध, सुखायल ठोर
नहि जानि कोन जन्मक ई पाप
पुत्र बियोगक परल संताप
कियाक बिधाता भेला बाम
नहि छोरल खरदुतियाक ओरियान
देल कमलाक कतेको साँझ
तइयो मुइन फुटल अंगनाक मांझ
बेटा, पुतोह, नैत आ नाती
बहि गेल सबकियो टूटी गेल छाती
कनि-कनि बढिया भेल बताह
सागर गाम में मचल तवाह
सुखी गेल पानि सुखल नोर
पसरि गेल महामारीक प्रकोप
बाध-बोन सब भेल बिरान
सुखी गेल गाछ उजरल मचान
भुतही पोखरी में उरैया बाल
उच्चका डीह पर लगावय जाल
स्वर्ग से सुन्दर छल ई धरती
भय गेल आई अनाथ
व्याकुल पुत्र छटपटा रहल जेना
बिना पानि के माछ

कल्पना शरण

विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती
पाखलो
मूल उपन्यास : कोंकणी, लेखक : तुकाराम रामा शेट,
हिन्दी अनुवाद : डॉ. शंभु कुमार सिंह, श्री सेबी फर्नांडीस.मैथिली अनुवाद : डॉ. शंभु कुमार सिंह

पाखलो- भाग-६

चारि (4)
गोविन्द जाहि दिन नोकरी पर लागल, पाखलो ओहि दिन लौह – अयस्क केर खदान पर ट्रक ड्राइवर बनि गेल। ओकर काज देखि कए एक बरखक भीतरहि कम्पनी ओकर नोकरी पक्की क’ देलकैक। ओकरा 450 रूपैया दरमाहा भेटैत रहैक आ एकर अलावे ओवरटाइम सेहो। ओकर खेनाय-पीनाय कोनो एक्कहि होटलमे होइत छलैक आ ओ कतहुँ सुति जाइत छल।
पाखलो आ आलेक्स दुनू अपन पयरक तरेँ दूभिकेँ मसोड़ति लदानक गैरेज लग जा रहल छल। काल्हि आनल गेल लौह – अयस्क केर चूर्ण केर ढेर देखिकए ओ बहुत अचरजमे पड़ि गेल। ओ दुनू गैरेजमे चलि गेल। ट्रक स्टार्ट क’ कए दूभिक मेघकेँ पाछू छोड़ैत ओ लोकनि ट्रक तेजीसँ बढ़ौलक।
साँझुक काल पाखलो आ आलेक्स अपन-अपन ट्रक आनि गैरेजक लग लगा देलक। ओ काल्हुक अपेक्षा आइ एक खेप बेसी लगौने छल। आइ दुनू बहुत बेसी प्रसन्न देख’ मे आबि रहल छल। पाखलो अपना देह पर एक नजरि देलक। ओ धूरा सँ सानल बुझाइत छल। ओकर कपड़ा पूर्ण रूपसँ धूरामे सानल रहैक। माथक केश, मोछ आ सौंसे देह धूरा सँ सानल रहैक। ओ हाथ-पयर धोबाक लेल आलेक्सक संग नल दिस चलि देलक।
नल पर जमा भेल सभटा मजुरनी पाखलोक मजाक उड़ाब’ लागलैक। एकटा मजुरनी अपन एकटा छोट सन एना निकालि पाखलो केँ ओकर अपनहिं रूप देखबा लेल देलकैक। ओ एना लेलक, ओहिमे अपन अजीब रूप देखि ओकरा हँसी लागि गेलैक। ओकरा बुझेलैक जो ओ ललका मुँह बला बनरबा छैक।
पाखल्या, पेड़ाक बगल वला झीलमे जेना धूरा जमैत छैक तहिना तोरहुँ देह पर जमल छह। एकटा मजुरनी पाखलो केँ पयर सँ माथ धरि देखैत कहलकैक। अरे,ओ तँ धूरेक मिल पर नोकरी करैत अछि। एकटा दोसर मजुरनी ओकर मजाक केलकैक। ई सुनि सभटा मजुरनी हँसय लागलीह।
ओ धूरासँ भरल अछि एहिलेल अहाँसभ ओकरा पर हँसि रहल छी? आलेक्स मजुरनीसँ पूछलकैक। आब नहएलाक बाद ओकरा देखि लेबैक, ओ सेब सन लाल आ एकदम फिरंगी सन भ’ जाएत जकरा देखि कए कोनो बाप अपन बेटी ओकरा देबा लेल तैयार भ’ जेतैक।
आलेक्स, पाखलोक लेल अहाँ अपनहि जातिमे कोनो कन्या ताकि दियौक, पहिलमजुरनी कहलकैक।
…….से किएक? ओकरा तँ कोनो पाखलिने चाही। पाखल्या, अहाँ अपना लेल लिस्बन सँ एकटा पाखलिन ल’ कए आबि जाएब। एहि बात पर सभ केओ हँसय लागल मुदा पाखलो केर भौंह तनि गेलनि।
ओ…….हो…… ओकर मामाक बेटी छैक ने? बीचहिमे स्मरण आबि गेलासँ दोसर मजुरनी बाजल।
ओकर मामा सोनू परसूए शेलपें सँ गाम रहबा लेल आएल रहैक। ओकरा बेटीक एखनहि बियाह भ’ गेल छैक।
शी….. ई तँ पाखलो छैक ने?
पाखलो सँ एकर बियाह…..? शी…..पहिल मजुरनीक कहल सुनि कए सभ क्यो चुप भ’ गेल। पाखलो केँ बहुत खराप लागलैक आ ओकर भौंह तनि गेलैक।
देह धो-पोछि ओ लोकनि नीचाँ उतर’ लागल। उतरैत काल आलेक्स सीटी बजा रहल छल आ पाखलो चुपचाप चलि रहल छल। ओहि मौनक स्थितिमे ओकरा अपन मामा, सोनूक पछिला बात सभ स्मरण आबि गेलैक।
सोनूक बियाहक लेल पाखलोक माय, पाखलो केँ गोदीमे ल’ कए गेल छलैक। बियाहसँ ठीक दू दिन पहिने, सोनू अपन बियाहक खबरि अपन बहिनकेँ देने छलैक। ओ बियाहमे कोनो बिध-व्यवहार करबाक लेल तैयार नहि रहथि, मुदा सोनूक जिद्द केर कारणेँ ओकरा मानय पड़लैक।
सोनूक दुनियाँ केवल दू वरख धरि चलि सकलैक। ओकरा एकटा बेटी भेलैक मुदा तेसरहि बरख ओकर घरनी ओकरा सदाक लेल छोड़िकए चलि गेलीह।
पाखलो एकटा नमहर साँस छोड़लक। ढ़लानसँ नीचाँ उतरैत ओकर पयर लड़खड़ा गेलैक।
आलेक्स आ पाखलो नदीक कछेर वला होटल पहुँचि गेल। नित दिन जकाँ ओ सभ होटलक भीतर जयबाक लेल ओ सभ अपन-अपन माथ नीचाँ झुकौलक। पाखलो चाह पीबि लेलक मुदा ओकरा दिमागसँ एखन धरि ओहि बातक निसाँ नहि उतरल छलैक। जमा भेल मित्र सभसँ आलेक्स गप्प करए लागल।
पाखलो होटलसँ बाहर निकलल आ खेत दिस खुलल पेड़ा बाटे चलय लागल। ओ बहुत दुखी अछि, एहन ओकरा चेहरासँ बुझाइत छलैक। मजुरनी सभ द्वारा कएल गेल गप्पक नह ओकर करेज फारने जा रहल छलैक।
शी….. ई तँ पाखलो छैक ने? मामाक बेटीक बियाह पाखलोक संग?…..
मंगुष्ठी (एक प्रकारक जंगली फल जे लोक खाइत अछि) झरनाक पानिक आवाज आबि रहल छलैक। कपड़ा-लत्ता धोबा आ पानि भरबाक लेल आबए बाली कन्या आ स्त्रीगण सभक आवाज नहि छलैक। आइ पाखलो कने देरीसँ आएल रहय। ओ किछु अन्यमनस्क सन लागैत छल। ओ झरनासँ गाम दिस जाएबला लोकपेड़िया दिस देखलक। ओहि लोकपेड़ियाक बाटेँ अन्हरिया गाममे पयर रखने छल।
ओ अपन देह परसँ कपड़ा उतारलक आ मंगुष्ठक गाछक जड़िमे राखि देलक। ओ झरनाक कछेरमे बैसि गेल। बहैत पानिमे ओ अपन पयर खुलल छोड़ि देलक। ओकरा जाड़ लागलैक। ओ जाड़ ओकरा नसमे समा गेलैक। ओ अपन आँखिक पिपनी बन्न क’ लेलक। दूपहरमे धूरा पर चलैत जे पयर छक-छक पाकैत रहैक ओहि पयरकेँ एखन जाड़ लागि रहल छलैक। ई सोचि पाखलो एकटा नमहर साँस छोड़लक आ आँखि बन्न क’ लेलक। ओ प्रायः आबिकए पहिने अपन पयर ठंढा पानिमे डुबबैत रहय। जखन सभटा कन्या आ स्त्रीगण लोकनि पानि भरि कए चलि जाइक तखनहि ओ नहबैत छल आ अपन कपड़ा-लत्ता धोबैत छल।
ओ पानिमे डुबकी लगौलक। छपाक केर आवाज भेलैक एहिलेल ओ अपन मूड़ी उठौलक तँ देखलक जे शामा हँसि रहल छलीह। ओहो हँसल। शामा झरनाक उपरका धार पर अपन घैल भरए लगलीह। आइ पानि भरबामे देरी किएक भेल?पूछि लेबैनि, पाखलो सोचलक। मुदा ओ चुप रहल। शामा घैल अपना डाँर पर राखलक आ छोटकी घैल अपना हाथमे राखि चलि देलीह। नजरिसँ दूर होइत धरि ओ ओकरा देखतहि रहि गेल।
ओ होशमे आएल। कि शामा पानिमे पाथर फेकने छलीह? ओ सोच’ लागल, हँ – ओकर मोन कहैत छलैक। ओ आएल छथि आ हमरा बुझएबाक लेल ओ पाथर फेकने छलीह – ओकर दोसर मोन कहैक – नहि, ओ पाथर मार’ एहन काज नहि क’ सकैत अछि। भ’ सकैछ उपरका मंगुष्ठ नीचाँ गिरल होइक। ओ ई सोचतहिं छल ताधरि एकटा मंगुष्ठ पानिमे गिरलैक। खाइत काल ओकरा स्मरण भेलैक। एहि घटनाक बहुतो बरख भ’ गेल रहैक। जंगलमे काजू आ काण्ण खाइत-खाइत गोविन्द आ ओ एहि झरना पर आएल छल। मंगुष्ठी झरनाक मंगुष्ठ बहुत पाकि गेल छलैक। पाखलो आ गोविन्द ओहि मंगुष्ठ पर पाथर मारए लागल। ओहि समय शामा झरना पर आबि रहल छलीह, ई गोविन्द देखलक आ देखतहिं अपना हाथसँ पाथर फेकि देलक आ पाखलो सँ कहलकैक – पाखल्या, हाथसँ पाथर फेकि दियौक, विन्या मामाक शामा आबि रहल छथि।
किएक? पाखलो पुछलकैक।
अरे, मंगुष्ठी झरनाक जगह ओकरे छैक ने, हमसभ जे मंगुष्ठ झटाहि रहल छी ई बात जँ ओकरा बाबूकेँ पता लागि गेलनि तँ से नीक गप्प नहि थिक। ओ गारिओ देताह आ मारबो करताह। गोविन्दक कहलाक पश्चातो पाखलो अपना हाथसँ पाथर नहि फेकलक। ओ लगातार झटाहतहिं रहल। गोविन्दक रोकलाक पश्चातहिं ओ रूकल। शामा ओतए आबि गेलीह। ओ लाल रंगक पाकल मंगुष्ठकेँ देखलक। ओकरा मंगुष्ठ खएबाक मोन भेलैक। ओहो पाथर मारि-मारि मंगुष्ठ झखारए लागलीह। ओकर दू-तीन पाथरसँ एकटा पातो नहि गिरलैक। पाखलो आ गोविन्द दुनू हँसए लागल। ओ लजा गेलीह। ओकरहिं आनल पाथरसँ पाखलो मंगुष्ठ झटाह’ लागल। जल्दीए ओ पाथर ओतहि फेकि मंगुष्ठक गाछ पर चढि गेल। मंगुष्ठक गाछक डारिकेँ हिलाब’ लागल। मंगुष्ठ सभ ढब-ढब कए गिरए लागलैक। छिट्टा आनबाक लेल शामा घर चलि गेलीह। मुदा आपस अबैत काल ओकरा संगहि ओकर बाबूजी सेहो आबि गेलाह। धरती पर पसरल मंगुष्ठ देखि कए ओ पाखलो केँ ओकरा माए लगा कए गारि देलकैक। तकरा बादसँ जखन कहियो शामा ओकरा बाटमे भेटैक ओ अपन माथ झुकाकए चलि जाइत छलीह।
जाहि दिनसँ पाखलो ड्राइवर भेल छल ताहि दिनसँ ओ मंगुष्ठी झरना पर नहएबाक लेल अबैत छल। पाखलो केँ देखि शामा कहिओ-कहिओ हँसैत छलीह। एकदिन तँ ओ कनखी मारि कए गोविन्दक हाल-समाचार पूछने छलीह। ताहि दिन तँ ओ प्रायः पाखलो केँ देखि कए हँसैत छलीह आ पाखलोक मोनमे ओकरा प्रति नब अंकुर अबैत छलैक।
पाखलो सँ ई खबरि सुनि, गोविन्द पाखलोक खूब मजाक उड़ौलक।
पाखल्या, हुनकर स्वभाव बहुत नीक छनि। ओ कने कारी अवश्य छथि मुदा देख’मे नीक छथि। अहाँक जोड़ी खूब जँचत। ई बात पाखलोक मोनमे घूमैत रहैक आ ओ नहबैत काल अपना-आपहिंमे उफानक महसूस करैत छल।
दोसर दिन रबि रहैक। पाखलो घूमबाक लाथे बाहर निकलल। बाट चलैत-चलैत ओ मंगुष्ठ झरना लग पहुँचि गेल। झरनाक शीतल पानिसँ ओ एक आँजुर पानि पीबि लेलक आ लगीचक आमक गाछ दिस चलि देलक। ओहि आमक गाछक एकटा नमहर जड़ि धरतीक उपर आबि गेल रहैक। नेना सभ जकाँ ओ अपन केहुँनी उपर उठौने धरती पर परल रहय। पाखलो एकटा जड़ि पर बैसि गेल आ प्रकृतिक सौंदर्य देख’ लागल।
आइ चैत मासक पूर्णिमा छलैक। गामस लोक सभ सांतेरी मंदिर लग बसंत पूजा करए बला रहैक मुदा ताहिसँ पहिने प्रकृति फूल आ फल सभक लटकनि लगा कए बसंत ऋतुक स्वागत क’ चुकल छलैक। आमक गाछक अजोह आम सभ गोटपंगरा पाकए लागल छलैक। काजूक गाछ पर लाल आ पीयर काजू लागल रहैक। हरियर अजोह काजू सभ पाकबाक बाट जोहि रहल छल आ एखन धरि डारि पर कोंढ़ी सभ डोलि रहल छलैक।
शनैः – शनैः बसात सिहकए लागलैक। पाखलो केँ लागलैक – आब ई प्राणदायी बसात प्रकृतिकेँ नब जान द’ देतैक। गाछ – बिरीछकेँ पागल बना देतैक। बसातक सिहकबक संगहि पाखलोक मोनमे विचारक लहरि हिलकोर मार’ लागलैक। ई बसात पच्छिम दिसक पहाडकेँ पार करैत, खेतक बीचोबीच धरतीकें चीरैत नदीकेँ पार करैत पूबरिया पहाड़ दिस उझलैत बिना रूकनहि आगू बढि जाएत। ओ कतए सँ आएल हेतैक? कोन ठामसँ आएल हेतैक ई बतएबाक कोनो उमेद नहि अछि। ओ सभ ठाम भ्रमण करएबला प्रवासी अछि।
बसातकेँ अबितहिं धरती ओहि बसातमे रंग उछालि ओकर स्वागत केलक। बसात धरतीक माथक चुंबन लेलकैक। गाछकेँ गर लगेलकैक। लत्तीसभकेँ बाँहिसँ पकड़ि कान्ह पर राखलकैक आ फेर नीचाँ राखि देलकैक। फूल, फल आ पात सभक चुंबन लेलकैक। आ पूरा बगैचामे सभकेँ हाथसँ इशारा करैत ओ आपस चलि गेल।
पाखलहुँ के बुझाब’ लागलैक जे – बसाते जकाँ ओहो एहि इलाकामे घूमि-फिरि रहल अछि। ओ जन्महि कालसँ एहि इलाकामे रहैत छल। मुदा हम बसात जकाँ आबि कए चलि नहि जाइत छी अपितु एतुका निवासी भ’ गेल छी। एहि आम गाछक सदृश हमरहुँ जड़ि बहुत भीतर धरि चलि गेल अछि। एहि माटिक बल पर हम पैघ भेलहुँ फरलहुँ-फुललहुँ। एहि माटिक संस्कारमे पललहुँ-बढ़लहुँ अछि हम।
साँझ खतम भ’ कए गदहकाल भ’ रहल छलैक। मंगुष्ठी झरना पर पानि भरि कए कन्या आ स्त्रीगण लोकनि घर जा रहल छलीह। पाखलोक ध्यान ओमहर नहि छलैक, अपितु आइ शामा पानि भरबाक लेल नहि आएल रहैक एहि लेल ओकर प्राण फँसल जा रहल छैक, ओकरा एहने लागलैक। हड्डी आ मांसुसँ पैघ भेल पाखलो केँ एकटा कुमारि कन्यासँ सिनेह भ’ गेल छलनि आ ओ ओकरासँ बियाह करबाक लेल सोचि रहल छल। जकरा एक नजरि देखियहिकेँ ओकरा नस-नसमे उमंग आबि जाइत छलैक वैह शामा आइ झरना पर नहि आयल छलीह तैँ ओ अपनाकेँ मंद महसूस करैत छल।
गदहकाल खतम हेबा पर रहैक आ अन्हार अपन पयर पसारि रहल छल। सांतेरी मंदिर लग पाखलोकेँ पेट्रोमैक्सक जगमग करैत इजोत देखा पड़लैक। ओकरा आइ होमएबला बसंत पूजाक स्मरण आबि गेलैक। बसंत पूजा दिन सांतेरी माएक पालकी बड़ धूमधामसँ बाहर निकलैत अछि। ओ प्रकृतिमे आएल बसंत ऋतुसँ भेंट करैत अछि। ओहि राति ओ मंदिर आपिस नहि जाइत छथि अपितु बाहरहिं प्रकृतिक संग रहैत छथि। बसंत ऋतुक दिन गाम भरिक लोक भरि राति उत्सब मनबैत अछि। पूजाक लेल तँ शामा अवश्ये अओतीह, तखनहिं हम हुनकासँ भेंट क’ लेब। पाखलो सोचलक।
शामासँ भेंट करबाक बहन्ने ओकरा पूरा देहमे जोश आबि गेलैक आर गामक दिस जयबाक लेल ओ तीव्र गतिएँ चलए लागल।
मंगुष्ठी झरना पर सभ दिन जकाँ पाखलो आइयो अपन कपड़ा धोबैत छल। रबि लगाकए आइ तीन दिन भ’ गेल रहैक। गोविन्द रबिकेँ किएक नहि अएलाह? ओ यैह सोचि रहल छल। ततबहिमे दूरसँ – ”पाखल्या, यौ पाखल्या” गोविन्दकेँ एहन आवाज सुनबामे अएलनि। ओ पाछू घूमिकए देखलक। गोविन्दकेँ देखतहि पाखलो तुरन्त उठल आ ओकरा दिस दौड़िकए चलि गेल। दुनू एक दोसराक हाथ पकड़ि लेलक। गोविन्दक कनहा अपना हाथसँ हिलबैत पाखलो पुछलकैक –
अहाँ रबि दिन किएक नहि एलहुँ?
की कही, हमरा ऑफिसक मित्र लोकनि हमरा पिकनिक पर ल’ कए चलि गेल छलाह। हम जाएवला नहि रही, मुदा की करितहुँ ओ सभ हमरा जबरदस्ती ल’गेलाह। हमर मोन करैत रहय जे अहाँसँ आबि भेंट करी। गोविन्द अपन मोन खोलि देलथि।
जाय दिअ, एखनहिं मिललहुँ यैह की कम अछि?
दुनू हँसय लगलाह।
“चलू पहिने अहाँ नहा लिअ”
गोविन्दक कहला पर पाखलो झरनामे नहाबए लगलाह। गोविन्दकेँ उत्सुकता रहनि। ओ अपना हाथहिं सँ पानि निकालि पाखलोक देह पर छिट्टा मारए लगलाह, पाखलो सेहो हुनका पर पानि फेकलकनि। ओहि काल गोविन्दक कपड़ा नीक जकाँ भीजि गेलनि। पाखलो केँ कने खराप लागलनि। ओ गोविन्दसँ माफी माँगलनि। गोविन्द एकरा सभकेँ मजाकमे उड़ा देलथि।
पाखलो नहाकए अपन देह पोछलक। अपन कपड़ा सुखबाक लेल लारि देलकैक। बादमे दुनू गोटे आमक जड़ि पर आबि बैसि गेल। पाखलो गोविन्दक आँखिमे देखलक। गोविन्द किछु कहए चाहैत छलाह, ई हुनका आँखिसँ पाखलोकेँ पता लागि गेलैक।
कोनो नब समाचार? पाखलो पुछलकैक।
कोन समाचार?
हमरा लेल एकटा संबंध आएल अछि।
अहाँक लेल संबंध? कतएसँ? केकर? पाखलो एकसँ एक प्रश्न कएलनि।
ई सभ हम अहाँकेँ बादमे कहब। मुदा पहिने बताउ – शामा आइ आयल छलीह पानि भरबा लेल?
हँ – नहिं……,एखन धरि तँ नहि। पाखलो सोचिकए जवाब देलक।
नहि ने? तखन तँ हमर अनुमान ठीके भेल। हम अहाँकेँ आर नहि उलझाएब। हमरा लेल विन्या आपा (दादा) क दिससँ शामाक लेल संबंध आएल अछि। हम ओकरा साफ मना क’ देलियैक।
पाखलोकेँ बतएबाक लेल आनल गेल रहस्य गोविन्द खोलि देलक।
मुदा संबंधक लेल नहि किएक कहलहुँ? पाखलो फेर प्रश्न केलक।
एकर जवाब तँ बड्ड सरल छैक यौ। गोविन्द बाजल।
शामाक जोड़ीक लेल अहाँक प्रयोजन अछि हमर नहि। अहाँकेँ स्मरण अछि, हम एकबेर अहाँकेँ कहने रही – “शामा आ अहाँक जोड़ी केहन रहत?” किछु कालक लेल दुनू गोटे चुप भ’ गेलाह।
बादमे गोविन्द बाजए लगलाह।
हम दुपहरकेँ घर गेल रही। खएबाक बाद माए हमरा एहि संबंधक बारेमे बतौलनि। हम साफ मना क’ देलियनि, मुदा किएक? से नहि बतौलियनि।
नहि गोविन्द, एहि संबंधकेँ नकारि अहाँ नीक नहि केलहुँ। अहाँ हमरा लेल त्याग क’ रहल छी। ई हमरा नीक नहि लागि रहल अछि। पाखलो कहलक।
एहन नहि छैक पाखलो, अहाँ बुझैत नहि छी। अहाँकेँ क्यो नहि अछि। शामा अहाँकेँ पसिन्न अछि। ओ अहाँकेँ भेटि जेतीह तँ हमरा खुशी होएत।
मुदा हमरा संग…..
पाखलो किछु कह’ वला रहथि।
ओ सभ बादमे देखल जेतैक। ई कहि गोविन्द चुप भ’ गेल। पाखलोक मोन विचलित भ’ गेलैक। मुदाक शामाक सभ स्मरण एखनहुँ महकैत रहैक। शामाक द्वारा गोविन्दक लेल कएल गेल पूछताछ…..ओकर नमगर केशराशि…..फूल-सन ओकर हँसी…..सभटा।
ओकरा दुनूकेँ देखि शामा झरनासँ बिना पानि भरनहिं आपस चलि जाइत छलीह। तकर बाद ओ शामासँ भेंट केलक आ “हमरासँ बियाह करब?” पूछलकैक।
शामा ओकरा “हँ” कहतैक ओकरासँ यैह अपेक्षा छलैक पाखलोकेँ, मुदा ओ – नहि अहाँ पाखलो थिकहुँ, ई जवाब देलथि। पाखलो शामाकेँ किछु कहबाक लेल मुँह खोलनहि छलीह कि ओ चलि गेलीह। पाखलोक मोन तँ बुझु जे नागफनी सँ भरल रेगिस्तानक सदृश भ’ गेलैक।

क्रमशः

श्री तुकाराम रामा शेट (जन्म 1952) कोंकणी भाषामे ‘एक जुवो जिएता’—नाटक, ‘पर्यावरण गीतम’, ‘धर्तोरेचो स्पर्श’—लघु कथा, ‘मनमळब’—काव्य संग्रह केर रचनाक संगहि कैकटा पुस्तकक अनुवाद, संपादन आ प्रकाशनक काज कए प्रतिष्ठित साहित्यकारक रूपमे ख्याति अर्जित कएने छथि। प्रस्तुत कोंकणी उपन्यास—‘पाखलो’ पर हिनका वर्ष 1978 मे ‘गोवा कला अकादमी साहित्यिक पुरस्कार’ भेटि चुकल छनि।

डॉ शंभु कुमार सिंह
जन्म: 18 अप्रील 1965 सहरसा जिलाक महिषी प्रखंडक लहुआर गाममे। आरंभिक शिक्षा,गामहिसँ, आइ.ए., बी.ए. (मैथिली सम्मान) एम.ए. मैथिली (स्वर्णपदक प्राप्त) तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। BET [बिहार पात्रता परीक्षा (NET क समतुल्य) व्याख्याता हेतु उत्तीर्ण, 1995] “मैथिली नाटकक सामाजिक विवर्त्तन” विषय पर पी-एच.डी. वर्ष2008, तिलका माँ. भा.विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। मैथिलीक कतोक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे कविता, कथा, निबंध आदि समय-समय पर प्रकाशित। वर्तमानमे शैक्षिक सलाहकार (मैथिली) राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर-6 मे कार्यरत।
सेबी फर्नांडीस

बालानां कृते-
१.देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स)
२.कल्पना शरण: देवीजी

देवांशु वत्स, जन्म- तुलापट्टी, सुपौल। मास कम्युनिकेशनमे एम.ए., हिन्दी, अंग्रेजी आ मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्रिकामे कथा, लघुकथा, विज्ञान-कथा, चित्र-कथा, कार्टून, चित्र-प्रहेलिका इत्यादिक प्रकाशन।
विशेष: गुजरात राज्य शाला पाठ्य-पुस्तक मंडल द्वारा आठम कक्षाक लेल विज्ञान कथा “जंग”प्रकाशित (2004 ई.)

नताशा:
(नीचाँक कार्टूनकेँ क्लिक करू आ पढ़ू)
नताशा पचीस

नताशा छब्बीस

कल्पना शरण:देवीजी:
देवीजी : कोलम्बस दिवस
देवीजी बच्चा सबके इतिहास पढ़ा रहल छलैथ।प््रासंग छलै कोलम्बस के अटलांटिक महासागरमे पहिल समुद्री यात्रा के ।देवीजी कहलखिन जे पहिने अमीर व्यापारी सब समुद्री यात्रा पर निकलै छलैथ आ अनेको जोखिन उठा जहाज सऽ रोमांचकारी यात्रा बाद अविकसित सभ्यता बला भूमि स खूब धनार्जन कऽ लौटै छलैथ। क्र्रीस्टोफर कोलम्बस सेहो एहेने मे सऽ एक छलैथ लेकिन हुनकर यात्रा एतिहासिक छलैन कारण हुन्का सऽ नब स्थल के जानकारी भेटल छलैन।
क्रिस्टोफर कोलम्बस के पहिल समुद्रीयात्रा यूरोपके उत्तरी अमेरिका सऽ जोड़ैमे बहुत महत्त्वपूर्ण छै।यद्यपि अहि सऽ पहिनेहो किछु यात्री ओहि दिस जा चुकल छलैथ।किन्तु हुन्कर यात्रा बेसी सफल छलैन। कोलम्बस अपन तीन टा जहाज नीना. पिण्टा. आ सैण्टा मारिआ लऽ कऽ दक्षिणी स्पेन स ऽ विदा भेला।स्पेन के पश्चिमतम टापू ‘कैनेरी आइलैण्ड’ मे अपन जहाज के मरम्मत लेल रूकला। फेर ओतय सऽ विदा भऽ करीब सवा महिनाक यात्रोपरान्त 12 अक्टूबर 1492 ईसवी कऽ बहामस टापू पर विराम लेला।बहामस द्विप फ्लोरिडा ह्यसंयुक्त राष्ट्र अमेरिका के एक राज्यहृ. क्युबा ह्यउत्तरी अमेरिका के देशहृ. तथा पोत्रो रिको ह्यकैरेबियन सागर मे स्थित संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के एक भागहृ के बीच स्थित छै। 12 अक्टूबर के दिन के अहि कारणसऽ अमेरिकामे कोलम्बस दिवस के रूपमे मनाओल जायत छै।
कोलम्बस जखन क्यूबा दिस बढ़ला तऽ हुनकर एक जहाज पिण्टाक कप्तान मार्टिन एलोन्सो पिन्सोज बिना अनुमति के एक द्विप ‘बाबिक्यु’ दिस बढ़ि गेल कारण ओकरा खबरि छलै जे ओत बेसी धनोपार्जन भऽ सकैत छै।इम्हर कोल्म्बस अपन दुनु जहाज संगे हिस्पानिओला दिस गेलैथ। ओतय जहाजक असमर्थता सऽ मजबूर भऽ अपन 40टा कर्मचारी के छोड़ि कऽफेर स्पेन दिस विदा भेला। लौटऽ काल पिन्सोज भेटलैन। कोलम्बस के तामस अपन जहाजके सुरक्षित देखि समाप्त भऽ गेलैन। दुनु गोटय उत्तरी अटलांटिक सागर के एक तूफान मे फेर अलग भऽ गेला आ पुनः पेलोस बन्दरगाह मे पहिने कोलम्बस आ किछुए घण्टाक बाद पिन्जोज पहुँचला।कोलम्बस के हिरो के खिताब भेटलैन।
कोलम्बस चारि टा समुद्रीयात्रा केने छलैथ एशिया महादेश दिस लेकिन सफल नहिं भऽ सकला। ओ दक्षिण अमेरिका सेहो अपन तेसर यात्रा मे पहुँचला। विडम्बना ई छै जे हुन्को अपन गलती के एहसास बहुत देर सऽ भेलैन।अपन पहिल यात्राक खोज के एशिया बुझिलेने रहैथ।मुदा यूरोप के अमेरिका सऽ जोड़ैमे हुन्कर बहुत पैघ योगदान छलैन जे कि बाद मे यूरोप आ अमेरिकाके बीच व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित करैमे बहुत सहायक साबित भेल ।

बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
१.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
१०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)
आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् – विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे – देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽ–बिना डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।
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विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.
१.मैथिलीक नूतन वैज्ञानिक कोश आ २.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

१.मैथिलीक नूतन वैज्ञानिक कोश (वाक्य-प्रयोग सहित)-गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा।
चरम; cərəmə; चरम; अंतिम; əⁿt̪imə; अंतिम; Last, final; adj राजाक अत्याचार चरम पर पहुँचि गेल अछि।; adj rɑːɟɑːkə ət̪jɑːcɑːrə cərəmə pərə pəɦuⁿci geːlə əcʰi।; adj राजाक अत्याचार चरम पर पहुँचि गेल अछि।
चरण; cərəɳə; चरण; पएर, डेग, प्रक्रम, पद्यक पाँति; pəeːrə, ɖeːgə, prəkrəmə, pəd̪jəkə pɑːⁿt̪i; पएर,डेग, प्रक्रम, पद्यक पाँति; foot, leg, stage, line of verse; n चरण रज धोबि पीबू हिनक पएर; n cərəɳə rəɟə d̪ʰoːbi piːbuː ɦinəkə pəeːrə; n चरण रज धोबि पीबू हिनक पएर
शरण; ɕərəɳə; शरण; आश्रय; ɑːɕrəjə; आश्रय; shelter, refuge; adj अति दयालु सूनि अहाँक शरण अयलहुँ जानि॥; adj ət̪i d̪əjɑːlu suːni əɦɑːⁿkə ɕərəɳə əjələɦuⁿ ɟɑːni॥; adjअति दयालु सूनि अहाँक शरण अयलहुँ जानि॥
शरण्यn; ɕərəɳjə; शरण्य; आश्रय देबा योग्यə; ɑːɕrəjə d̪eːbɑː joːgjə; आश्रय देबा योग्य; Fit for support; adj; adj; adj
शरण्युम; ɕərəɳju; शरण्यु; रक्षक,मेघ, बिहारि; rəkʂəkə,meːgʰə, biɦɑːri; रक्षक,मेघ, बिहारि; protector, cloud, wind; n; n; n
चरपट; cərəpəʈə; चरपट; दुष्टु; d̪uʂʈə; दुष्ट; mischievous; adj; adj; adj
चरफर; cərəpʰərə; चरफर; ऊर्जायुक्त, चलबा-फिरबामे पटु, चतुर; uːrɟɑːjukt̪ə, cələbɑː-pʰirəbɑːmeː pəʈu, cət̪urə; ऊर्जायुक्त, चलबा-फिरबामे पटु, चतुर; energetic, prompt, clever; adj; adj; adj
चरसा; cərəsɑː; चरसा; चाम, खाल; cɑːmə, kʰɑːlə; चाम, खाल; leather, hide; n नेताजीक हाथ थरथरा गेलनि मुदा मुँह चालू “मुँह सम्हारि क’ बाज मौगी नइँ त’ चरसा घीचि लेबौ ।; n neːt̪ɑːɟiːkə ɦɑːt̪ʰə t̪ʰərət̪ʰərɑː geːləni mud̪ɑː muⁿɦə cɑːluː “muⁿɦə səmɦɑːri kə’ bɑːɟə maːugiː nəiⁿ t̪ə’ cərəsɑː gʰiːci leːbaːu ।; n नेताजीक हाथ थरथरा गेलनि मुदा मुँह चालू “मुँह सम्हारि क’बाज मौगी नइँ त’ चरसा घीचि लेबौ ।
चरस; cərəsə; चरस; गाजाक रस जकर धूमपान कएल जाइत अछि; gɑːɟɑːkə rəsə ɟəkərə d̪ʰuːməpɑːnə kəeːlə ɟɑːit̪ə əcʰi; गाजाक रस जकर धूमपान कएल जाइत अछि; a type of smoking, hashish; n; n; n
चराँत; cərəॉⁿt̪ə; चराँत; चरबाक हेतु सुरक्षित परती; cərəbɑːkə ɦeːt̪u surəkʂit̪ə pərət̪iː; चरबाक हेतु सुरक्षित परती; land for grazing; n; n; n
चरी; cəriː; चरी; चरबा जोग घास; cərəbɑː ɟoːgə gʰɑːsə; चरबा जोग घास; vegetation required for grazing; n; n; n
शरीर; ɕəriːrə; शरीर; देह; d̪eːɦə; देह; body; adj कतय छन्हि हुनकर मृत शरीर।; adj kət̪əjə cʰənɦi ɦunəkərə mɹ̩t̪ə ɕəriːrə।; adj कतय छन्हि हुनकर मृत शरीर।
चरिबघिआ; cəribəgʰiɑː; चरिबघिआ; चारि रस्सीसँ घोरल खाट; cɑːri rəssiːsⁿ gʰoːrələ kʰɑːʈə; चारि रस्सीसँ घोरल खाट; cot netted with four fold string; adj; adj; adj
चरिष्णुr; cəriʂɳu; चरिष्णु; गतिशील, कर्मठ; gət̪iɕiːlə, kərməʈʰə; गतिशील, कर्मठ; Moveable, active; adj;adj; adj
चरित; cərit̪ə; चरित; जीवनी, आचरण; ɟiːvəniː, ɑːcərəɳə; जीवनी, आचरण; biography, behaviour; adjनहि, कतहु फेर सँ त्रिया चरित देखाओत त ने ई…।; adj nəɦi, kət̪əɦu pʰeːrə sⁿ t̪rijɑː cərit̪ə d̪eːkʰɑːoːt̪ə t̪ə neː iː…।; adj नहि, कतहु फेर सँ त्रिया चरित देखाओत त ने ई…।
चरित्र; cərit̪rə; चरित्र; चालि, चर्या, वैशिष्ट्यi; cɑːli, cərjɑː, vaːiɕiʂʈjə; चालि, चर्या, वैशिष्ट्य; character, conduct, disposition; n ट्रेजेडीमे कथानक केर संग चरित्र-चित्रण, पद-रचना, विचार तत्व, दृश्य विधान आ गीत रहैत अछि।; n ʈreːɟeːɖiːmeː kət̪ʰɑːnəkə keːrə sⁿgə cərit̪rə-cit̪rəɳə, pəd̪ə-rəcənɑː, vicɑːrə t̪ət̪və, d̪ɹ̩ɕjə vid̪ʰɑːnə ɑː giːt̪ə rəɦaːit̪ə əcʰi।; n ट्रेजेडीमे कथानक केर संग चरित्र-चित्रण, पद-रचना, विचार तत्व, दृश्य विधान आ गीत रहैत अछि।
चर्या; cərjɑː; चर्या; करनी, चालि, आचरण, अनुसरणीय पद्धति; kərəniː, cɑːli, ɑːcərəɳə, ənusərəɳiːjə pəd̪d̪ʰət̪i; करनी, चालि, आचरण, अनुसरणीय पद्धति; deed, conduct, routine; n पञ्जीकारजीक दैनिक चर्या कलम ओ खुरपीक संग सम्पन्न होइत छलन्हि।; n pəɲɟiːkɑːrəɟiːkə d̪aːinikə cərjɑː kələmə oː kʰurəpiːkə sⁿgə səmpənnə ɦoːit̪ə cʰələnɦi।; n पञ्जीकारजीक दैनिक चर्या कलम ओ खुरपीक संग सम्पन्न होइत छलन्हि।
शर्करा; ɕərkərɑː; शर्करा; शक्कəर, चिन्नी, साँकड़, खाँड़; ɕəkkərə, cinniː, sɑːⁿkəɽə, kʰɑːⁿɽə; शक्कर,चिन्नी, साँकड़, खाँड़; Sugar; n पञ्चामृत- दही, दूध, घृत, मधु, शर्करा; n pəɲcɑːmɹ̩t̪ə- d̪əɦiː, d̪uːd̪ʰə, gʰɹ̩t̪ə, məd̪ʰu, ɕərkərɑː; n पञ्चामृत- दही, दूध, घृत, मधु, शर्करा
शर्मा; ɕərmɑː; शर्मा; शर्मन, ब्राहाणक एक उपनाम; ɕərmənə, brɑːɦɑːɳəkə eːkə upənɑːmə; शर्मन,ब्राहाणक एक उपनाम; a surname of Brahmins; n; n; n
चर्म; cərmə–mənə; चर्म; चमड़ी, खाल; cəməɖə़ी, kʰɑːlə; चमड़ी, खाल; Skin, hide, leather; n एहि गपक चर्चा अछि, जे आर्य चर्म वस्त्र पहिरैत छलाह; n eːɦi gəpəkə cərcɑː əcʰi, ɟeː ɑːrjə cərmə vəst̪rə pəɦiraːit̪ə cʰəlɑːɦə; n एहि गपक चर्चा अछि, जे आर्य चर्म वस्त्र पहिरैत छलाह
चर्मकार; cərmərə , cərmɑːrə , cərməkɑːrə; चर्मकार; चमराक समान बनबएबला; cəmərɑːkə səmɑːnə bənəbəeːbəlɑː; चमराक समान बनबएबला; shoemaker, cobbler; n एक चर्मकार आओल आ’, राजाकेँ फरिछाय बुझाओल।; n eːkə cərməkɑːrə ɑːoːlə ɑː’, rɑːɟɑːkeːⁿ pʰəricʰɑːjə buɟʰɑːoːlə।; n एक चर्मकार आओल आ’, राजाकेँ फरिछाय बुझाओल।
चर्पटी; cərpəʈiː; चर्पटी; सोहारी; soːɦɑːriː; सोहारी; Thin loaf; n; n; n
चर्र; cərrə; चर्र; वस्त्र फटबाक ध्व नि; vəst̪rə pʰəʈəbɑːkə d̪ʰvəni; वस्त्र फटबाक ध्वनि; sound of tearing cloth; nछोटगर-सन गेट, जाहिपर स्पष्ट रूपसँ ब्रेगेन्जा विला लिखल छलैक, अपन कब्जा पर झुलल चर्र-चर्र केर आवाज भेलैक; ncʰoːʈəgərə-sənə geːʈə, ɟɑːɦipərə spəʂʈə ruːpəsⁿ breːgeːnɟɑː vilɑː likʰələ cʰəlaːikə, əpənə kəbɟɑː pərə ɟʰulələ cərrə-cərrə keːrə ɑːvɑːɟə bʰeːlaːikə; nछोटगर-सन गेट, जाहिपर स्पष्ट रूपसँ ब्रेगेन्जा विला लिखल छलैक, अपन कब्जा पर झुलल चर्र-चर्र केर आवाज भेलैक
चरुआ; cəruːɑː; चरुआ; पीनी रखबाक बासन; piːniː rəkʰəbɑːkə bɑːsənə; पीनी रखबाक बासन; a pot for keeping processed tobacco; n; n; n
चरुभर; cəruːbʰərə; चरुभर; दानासँ भरल धानक सीस; d̪ɑːnɑːsⁿ bʰərələ d̪ʰɑːnəkə siːsə; दानासँभरल धानक सीस; paddy sheath full of corn; adj; adj; adj
चरुङ्गा; cəruːɖə़्gɑː; चरुङ्गा; चतुरङ्ग, शतरंज; cət̪urəŋgə, ɕət̪ərⁿɟə; चतुरङ्ग, शतरंज; chess; n; n;n
चर्वण; cərvəɳə; चर्वण; चिबाएब; cibɑːeːbə; चिबाएब; chewing; adj; adj; adj
चसचरा; cəsəcərɑː; चसचरा; चोरा कए आनक फसिल चरओनिहार; coːrɑː kəeː ɑːnəkə pʰəsilə cərəoːniɦɑːrə; चोरा कए आनक फसिल चरओनिहार; one who let one’s cattle to graze other’s crop; adj; adj; adj
शस्य; ɕəsəjə; शस्य; प्रशंसनीय; prəɕⁿsəniːjə; प्रशंसनीय; admirable; adj; adj; adj
शस्य; ɕəsəjəmə; शस्य; अनाज; ənɑːɟə; अनाज; Corn, grain; n; n; n
चसकाएब; cəsəkɑːeːbə; चसकाएब; परिकाएब; pərikɑːeːbə; परिकाएब; embolden, tempt; v.i.; v.i.; v.i.
चषक; cəʂəkə , cəʂəkəmə; चषक; कप, मदिरा पात्र; kəpə, məd̪irɑː pɑːt̪rə; कप, मदिरा पात्र; A cup, the pot for drinking wine; n; n; n
चसकब; cəsəkəbə; चसकब; परिकब; pərikəbə; परिकब; addicted, tempted; v.i.; v.i.; v.i.
चसमा; cəsəmɑː; चसमा; दृष्टिवर्धक सीसा; d̪ɹ̩ʂʈivərd̪ʰəkə siːsɑː; दृष्टिवर्धक सीसा; spectacle; nदेबलरैना फुलपेन्ट पेन्हि कऽ, चसमा पेन्हि कऽ बाबू-भैया नाहित जे रिक्शापर बैठिकऽ रिक्सा चलबइ हइ तऽ सिनेमाके गोबिना माउत कऽर हइ।; nd̪eːbələraːinɑː pʰuləpeːnʈə peːnɦi kəऽ, cəsəmɑː peːnɦi kəऽ bɑːbuː-bʰaːijɑː nɑːɦit̪ə ɟeː rikɕɑːpərə baːiʈʰikəऽ riksɑː cələbəi ɦəi t̪əऽ sineːmɑːkeː goːbinɑː mɑːut̪ə kəऽrə ɦəi।; nदेबलरैना फुलपेन्ट पेन्हि कऽ, चसमा पेन्हि कऽ बाबू-भैया नाहित जे रिक्शापर बैठिकऽ रिक्सा चलबइ हइ तऽ सिनेमाके गोबिना माउत कऽर हइ।
चसमदिल; cəsəməd̪ilə; चसमदिल; प्रत्येक्ष द्रष्टा-; prət̪jəkʂə d̪rəʂʈɑː; प्रत्यक्ष द्रष्टा; eye-witness; n;n; n
चसना; cəsənɑː; चसना; इनार कोड़बामे माटि उघबाक बासन; inɑːrə koːɖə़bɑːmeː mɑːʈi ugʰəbɑːkə bɑːsənə; इनार कोड़बामे माटि उघबाक बासन; pan used for carrying soil coming out while digging well; n; n; n
शस्त; ɕəsət̪ə; शस्त; प्रशंसनीय; prəɕⁿsəniːjə; प्रशंसनीय; admirable, praiseworthy; adj; adj; adj
शस्त्र; ɕəsət̪rə; शस्त्र; हथिआर, आयुध; ɦət̪ʰiɑːrə, ɑːjud̪ʰə; हथिआर, आयुध; weapon, arms; nतावत शस्त्र सेहो ताहि द्वारे राखल अछि, प्रसन्न भए इन्द्र अपन असल रूप धरल।; nt̪ɑːvət̪ə ɕəst̪rə seːɦoː t̪ɑːɦi d̪vɑːreː rɑːkʰələ əcʰi, prəsənnə bʰəeː ind̪rə əpənə əsələ ruːpə d̪ʰərələ।; nतावत शस्त्र सेहो ताहि द्वारे राखल अछि, प्रसन्न भए इन्द्र अपन असल रूप धरल।
शताब्दीअ; ɕət̪ɑːbd̪iː; शताब्दी; सए वर्षक खण्डt; səeː vərʂəkə kʰəɳɖə; सए वर्षक खण्ड; century, centenary; nएहि मूर्तिक रचनाकाल तेरहम चौदहम शताब्दी आंकल गेल अछि।; neːɦi muːrt̪ikə rəcənɑːkɑːlə t̪eːrəɦəmə caːud̪əɦəmə ɕət̪ɑːbd̪iː ɑːⁿkələ geːlə əcʰi।; nएहि मूर्तिक रचनाकाल तेरहम चौदहम शताब्दी आंकल गेल अछि।
चटाएब; cəʈɑːeːvə; चटाएब; चटबाएब; cəʈəbɑːeːbə; चटबाएब; get someone lick; vदही-चीनी चटाएब;vd̪əɦiː-ciːniː cəʈɑːeːbə; vदही-चीनी चटाएब
चटाइ; cəʈɑːi; चटाइ; खड़क पटिआ; kʰəɖə़kə pəʈiɑː; खड़क पटिआ; straw-mat; nदलान पर चटाइ ओछा देल गेल रहै ।; nd̪əlɑːnə pərə cəʈɑːi oːcʰɑː d̪eːlə geːlə rəɦaːi ।; nदलान पर चटाइ ओछा देल गेल रहै ।
चटकाएब; cəʈɑːkɑːeːbə; चटकाएब; डराएब, धमकी देब; ɖərɑːeːbə, d̪ʰəməkiː d̪eːbə; डराएब, धमकी देब; threaten; vt; vt; vt
चटाक; cəʈɑːkə; चटाक; टकरएबाक ध्वानि; ʈəkərəeːbɑːkə d̪ʰvəni; टकरएबाक ध्वनि; smacking sound; advचटाक!…मनसा उठिकए एक चाट देलकै।; advcəʈɑːkə!…mənəsɑː uʈʰikəeː eːkə cɑːʈə d̪eːləkaːi।; advचटाक!…मनसा उठिकए एक चाट देलकै।
चटान; cəʈɑːnə; चटान; शिला; ɕilɑː; शिला; rock; n; n; n
शतावधानी; ɕət̪ɑːvəd̪ʰɑːniː; शतावधानी; अद्भुत स्मरण शक्तिबला; əd̪bʰut̪ə smərəɳə ɕəkt̪ibəlɑː; अद्भुत स्मरण शक्तिबला; having miraculous power of memory; adj; adj; adj
शतावरी; ɕət̪ɑːvəriː; शतावरी; एक वनौषधि; eːkə vənaːuʂəd̪ʰi; एक वनौषधि; a herb, Asparagus recemosus; n; n; n
चट; cəʈə; चट; कड़ा वस्तु टुटबाक सन ध्वएनि, तुरत; kəɖə़ा vəst̪u ʈuʈəbɑːkə sənə d̪ʰvəni, t̪urət̪ə;कड़ा वस्तु टुटबाक सन ध्वनि, तुरत; crackling sound, promptly; adv चट दय ठाढ़ भ’ कए। डिबियाक बाती कखनो चट–चट कऽ कऽ चरचराइक तथा बातीक मुँहपर कारी गिरह बनि जाइक ।; adv cəʈə d̪əjə ʈʰɑːɖʰə़ bʰə’ kəeː। ɖibijɑːkə bɑːt̪iː kəkʰənoː cəʈə–cəʈə kəऽ kəऽ cərəcərɑːikə t̪ət̪ʰɑː bɑːt̪iːkə muⁿɦəpərə kɑːriː girəɦə bəni ɟɑːikə ।; adv चट दय ठाढ़ भ’ कए। डिबियाक बाती कखनो चट–चट कऽ कऽ चरचराइक तथा बातीक मुँहपर कारी गिरह बनि जाइक ।
शत; ɕət̪ə; शत; सए; səeː; सए; hundred; nओना ई सब ठाम शत-प्रतिशत सत्ये नही भ’ सकैय।; noːnɑː iː səbə ʈʰɑːmə ɕət̪ə-prət̪iɕət̪ə sət̪jeː nəɦiː bʰə’ səkaːijə।; nओना ई सब ठाम शत-प्रतिशत सत्ये नही भ’ सकैय।
चटेनी; cəʈeːniː; चटेनी; पटिआ; pəʈiɑː; पटिआ; sitting mat; n; n; n
शतभिषा; ɕət̪əbʰiʂɑː; शतभिषा; चौबीसम नक्षत्र; caːubiːsəmə nəkʂət̪rə; चौबीसम नक्षत्र; 24th constellation consisting of 100 stars; n; n; n
शतचण्डीi; ɕət̪əcəɳɖiː; शतचण्डी; दुर्गासप्तिशती; d̪urgɑːsəpt̪əɕət̪iː; दुर्गासप्तशती; a narrative poem on the life of Goddess; n; n; n
चटचटाएब; cəʈəcəʈɑːeːbə; चटचटाएब; बेर-बेर चाट मारब; beːrə-beːrə cɑːʈə mɑːrəbə; बेर-बेर चाट मारब; slap repeatedly; v.t.; v.t.; v.t.
चटचट; cəʈəcəʈə; चटचट; तड़ातड़,तेलाह; t̪əɖə़ाt̪əɖə़,t̪eːlɑːɦə; तड़ातड़,तेलाह; hurriedly and repeatedly, greasy; advनॊर संऽ चटचट गाल। चटचट मारब।; advnəॊrə sⁿऽ cəʈəcəʈə gɑːlə।cəʈəcəʈə mɑːrəbə।; advनॊर संऽ चटचट गाल। चटचट मारब।
शतधा; ɕət̪əd̪ʰɑː; शतधा; सए प्रकारसँ; səeː prəkɑːrəsⁿ; सए प्रकारसँ; in hundred ways; adv; adv;adv
शतघ्नीा; ɕət̪əgʰniː; शतघ्नी; बंदूक, तोप; bⁿd̪uːkə, t̪oːpə; बंदूक, तोप; a kind of firearm; n; n; n
चटका; cəʈəkɑː; चटका; बड़ी जेकाँ एक तीमन, चटकन, थापड़; bəɖə़ी ɟeːkɑːⁿ eːkə t̪iːmənə, cəʈəkənə, t̪ʰɑːpəɖə़; बड़ी जेकाँ एक तीमन, चटकन, थापड़; curry of pulse, slap; n; n; n
चटका; cəʈəkɑː, cəʈikɑː; चटका; चिड़ै; ciɽaːi; चिड़ै; A hen-sparrow; ; ;
चटकैती; cəʈəkaːit̪iː; चटकैती; चलाकी, चतुरता; cəlɑːkiː, cət̪urət̪ɑː; चलाकी, चतुरता; cleverness; n;n; n
चटकार; cəʈəkɑːrə; चटकार; स्वादिष्ट वस्तु खएलापर जिह्वाक चटुलता; svɑːd̪iʂʈə vəst̪u kʰəeːlɑːpərə ɟiɦvɑːkə cəʈulət̪ɑː; स्वादिष्ट वस्तु खएलापर जिह्वाक चटुलता; smack, clacking of tongue while relishing some spicy dish; nचटकार सँ खाओल; ncəʈəkɑːrə sⁿ kʰɑːoːlə; nचटकार सँ खाओल
चतकार; cət̪əkɑːrə; चतकार; जनैत रहलोपर विस्मय देखाएब; ɟənaːit̪ə rəɦəloːpərə visməjə d̪eːkʰɑːeːbə; जनैत रहलोपर विस्मय देखाएब; feigned surprise; adj; adj; adj
चटकारी; cəʈəkɑːriː; चटकारी; शीघ्रता; ɕiːgʰrət̪ɑː; शीघ्रता; swiftness; n; n; n
चटक; cəʈəkə; चटक; पक्षीक विष्ठाह, शीघ्रता, शोभा, चटकलासँ भेल खाधि; pəkʂiːkə viʂʈʰɑː, ɕiːgʰrət̪ɑː, ɕoːbʰɑː, cəʈəkəlɑːsⁿ bʰeːlə kʰɑːd̪ʰi; पक्षीक विष्ठा, शीघ्रता, शोभा, चटकलासँ भेल खाधि; bird’s excrement, quickness, splendour, scratch caused by splitting; adjनिर्मला जीक चटक-मटक कतए जइतनि? एक दिन एकटा योगीक माथपर कौआ चटक कए देलकैक; adjnirməlɑː ɟiːkə cəʈəkə-məʈəkə kət̪əeː ɟəit̪əni? eːkə d̪inə eːkəʈɑː joːgiːkə mɑːt̪ʰəpərə kaːuɑː cəʈəkə kəeː d̪eːləkaːikə; adjनिर्मला जीक चटक-मटक कतए जइतनि? एक दिन एकटा योगीक माथपर कौआ चटक कए देलकैक

२.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली
(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित)
मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन

१.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना-
अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।)
पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।)
खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।)
सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।)
खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।)
उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि।
नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ।

२.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना-
ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि।
ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि।
उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि।

३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश,बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश,वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि।

४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी,जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत,योगी, यदु, यम लिखबाक चाही।

५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि।
प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि।
नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि।
सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि।
ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि।

६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु,तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले,चोट्टे, आनो आदि।

७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि।

८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि:
(क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक।
अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक।
पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक।
(ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह।
अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह।
(ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि।
अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल।
(घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि।
अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि।
(ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक।
अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ।
(च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि।
अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै।

९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन),पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि।

१०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए।
-(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित)

2. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन
ठाम
जकर,तकर
तनिकर
अछि

अग्राह्य
अखन,अखनि,एखेन,अखनी
ठिमा,ठिना,ठमा
जेकर, तेकर
तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य)
ऐछ, अहि, ए।

2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।

6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।

19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा’ ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा “सुमन” ११/०८/७६

VIDEHA FOR NON-RESIDENT MAITHILS(Festivals of Mithila date-list)

8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS
8.1.Original poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Lucy Gracy from New York
8.2. where lies the fault- maithili story by shyam darihare translated by Praveen k jha

DATE-LIST (year- 2009-10)

(१४१७ साल)

Marriage Days:

Nov.2009- 19, 22, 23, 27

May 2010- 28, 30

June 2010- 2, 3, 6, 7, 9, 13, 17, 18, 20, 21,23, 24, 25, 27, 28, 30

July 2010- 1, 8, 9, 14

Upanayana Days: June 2010- 21,22

Dviragaman Din:

November 2009- 18, 19, 23, 27, 29

December 2009- 2, 4, 6

Feb 2010- 15, 18, 19, 21, 22, 24, 25

March 2010- 1, 4, 5

Mundan Din:

November 2009- 18, 19, 23

December 2009- 3

Jan 2010- 18, 22

Feb 2010- 3, 15, 25, 26

March 2010- 3, 5

June 2010- 2, 21

July 2010- 1

FESTIVALS OF MITHILA

Mauna Panchami-12 July

Madhushravani-24 July

Nag Panchami-26 Jul

Raksha Bandhan-5 Aug

Krishnastami-13-14 Aug

Kushi Amavasya- 20 August

Hartalika Teej- 23 Aug

ChauthChandra-23 Aug

Karma Dharma Ekadashi-31 August

Indra Pooja Aarambh- 1 September

Anant Caturdashi- 3 Sep

Pitri Paksha begins- 5 Sep

Jimootavahan Vrata/ Jitia-11 Sep

Matri Navami- 13 Sep

Vishwakarma Pooja-17Sep

Kalashsthapan-19 Sep

Belnauti- 24 September

Mahastami- 26 Sep

Maha Navami – 27 September

Vijaya Dashami- 28 September

Kojagara- 3 Oct

Dhanteras- 15 Oct

Chaturdashi-27 Oct

Diyabati/Deepavali/Shyama Pooja-17 Oct

Annakoota/ Govardhana Pooja-18 Oct

Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-20 Oct

Chhathi- -24 Oct

Akshyay Navami- 27 Oct

Devotthan Ekadashi- 29 Oct

Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 2 Nov

Somvari Amavasya Vrata-16 Nov

Vivaha Panchami- 21 Nov

Ravi vrat arambh-22 Nov

Navanna Parvana-25 Nov

Naraknivaran chaturdashi-13 Jan

Makara/ Teela Sankranti-14 Jan

Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 20 Jan

Mahashivaratri-12 Feb

Fagua-28 Feb

Holi-1 Mar

Ram Navami-24 March

Mesha Sankranti-Satuani-14 April

Jurishital-15 April

Ravi Brat Ant-25 April

Akshaya Tritiya-16 May

Janaki Navami- 22 May

Vat Savitri-barasait-12 June

Ganga Dashhara-21 June

Hari Sayan Ekadashi- 21 Jul
Guru Poornima-25 Jul
Original poem in Maithili by Gajendra Thakur
Translated into English by Lucy Gracy from New York

Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed at http://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title “KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in

The Concrete Pillar Of The Pond
The heated bank of the pond in the hot day
The trees, plants bushes all the way
look so faded like sprinkled with warm water
Every pond has a wooden pillar in its centre
The Concrete Pillar Of The Pond, this is the first one
The green deposits depicting its old age

The other part of the village
Has only that ditch, ponds are none
Without any pillar as no rituals done
He died who was the owner and non-consecrated single
Before the sacred ceremony of establishing pillar, people mumble
He desired to get a pond when became rich
How can fame come through merely a ditch?
Look at this Concrete Pillar Of The Pond
It is learnt that concrete becomes harder while in water
It is not like wooden pillar
Whose life is shorter

(where lies the fault- maithili story by shyam darihare translated by Praveen k jha)

High school started from grade eight but there was no high school in my village. Most would study until grade seven but one would have to walk four miles to another village for any further education. You had to cross the same creek twice and the same canal thrice or take a detour of another four miles. So no gals from my remote hamlet would ever go beyond grade seven. Nor many lads. After seven it was mostly farming. But that year I found myself among the few lucky ones who got admitted. If I visualize today how I used to look then in my class, it would be a picture of a ragbag. A corded pant and a namesake shirt. Didn’t even think of any footwear. Books bound with farm strands and notepapers sewed with threads.

The first day I was amazed to see so many students in the class. We had only thirteen in my last class in my village but look here, a hundred and three! There was a girl as well sitting in the front. Students grouped themselves as per their villages. Kerwar’s student in one, Itahar-Ajnauli in another and Barha’s the third one. Tisi Balia was fourth and Simri-Rupauli-Nahas were fifth and sixth. But the group from Persauni and Muralia Chak had the maximum clout. Being local they had the largest numbers.

The first topic of introductory talks was who has topped in which villages and who will top this joint class. My village fellows were trying to intimidate me saying that the girl on the front bench was the topper of Persauni middle school and will undoubtedly break my run at the top. But I was lost somewhere else. The photo of Mrs. Chatterji in the seventh grade english book ‘Free India Reader’ had exactly the same look as this girl. Same beauty and the long hair. I named her Mrs. Chatterji in my mind. Howsoever those guys tried to provoke me, I didn’t feel any jealousy or competition with her. Oh, only if she could befriend me…..! Then I thought of my own dereliction and how I would just look like dirt in front of her. Whatever.

When the B.Sc. Mastersaab Fekan Thakur was teaching in a chemistry class about the three states of matter – solid, liquid and gas, my mind got fixed on the liquid. And when he said, ‘ In liquid state, the matter takes the shape of its container. It doesn’t have its own shape. Put it in a glass, and it becomes like glass, in a bottle, like a bottle and in a bucket, like a bucket.’.
Immediately the thought came in mind, ‘ yeah, like my mother, aunties et al – My mother like my father, the elder auntie like my uncle, the auntie from Uchhal like Lutti uncle, and my maami (maternal auntie) like my maama. No shape of their own. Shaped as whoever they are married to.’
If there is any shape of their own, its hidden. Lest ‘He’ would see. Lest ‘He’ would come to know that she did anything on her own. Or her chastising will be there for all to see. So I concluded that they are all liquids and my uncles their containers.

This thought followed me to the college. When I read about liquid’s ‘Bhiscosity’ in college, again I was reminded of my aunties. If the husband was a muscleman, the wife’s stature was of a hustler. A timid’s wife was bullied by everyone. A rich one’s wife was a celebrity and a poor one’s place was in the corner. Means more viscid the husband, more acclaimed the wife. Viscosity. Whatever.

In the annual of eighth, that girl Champa gave me the drubbing. She was first and I came second. Just by two marks. But then first was first. Her roll no. in the ninth became one and mine, two. Now I was jealous. At the same time a little happy. I was closer to her. Oh, Mrs. Chatterjee. At least my name will be written just under yours!

A year gone had taken out all shyness and formalities. All groups disbanded and it was now one class. Village identities were gone.
I started sitting in front. Champa ’s right behind. Even if I was late, folks would give me the seat. There was now great competition between the two of us. I didn’t know about her, I was dying of jealousy and competition and the fact that a girl beat me.

In the semi-annual of Ninth, I turned the table and snatched the top position. And that remained my position since. Until the very board exam of eleventh.

Her face was so shining that I was like a faint shadow compared to her. My clothes were not even shreds compared to her dresses. Overall she pretty much fit in the frame of Mrs. Chatterjee in my mind.

Anyway, she had become friends with me after I topped the class in ninth. I wasn’t that bitter either, I was already the topper.
We remained friends for two more years. Being local, she used be before time and I was always late. Champa would keep a seat for me right behind hers. However, our friendship remained only friendship till the very end. Being close to someone like her was good enough for me. I told her about Mrs. Chatterjee. She burst out in laughter. I wouldn’t ever forget that laughter. Every once in a while I used to call her Mrs. Chatterjee. I thought she felt good.
Unlike today, the schoolkids those days weren’t so savvy. We were no exceptions. After the matriculation she had been married. To who and where I don’t know. Nor did I need to.
By the time I landed in the officialdom of Bihar Government, it was sixteen years since my matriculation. About five years in service, I got an opportunity to visit Calcutta in on the occasion of Durgapooja. The kids were excited about visiting Calcutta and my wife about Durgapooja. On reaching Calcultta to my brother’s house, I found his in-laws also there. I advised my sister-in-law,’My orderly can help in cooking.’
‘Why? Don’t I have my own hands.’ Said she.
‘No, no, I just proposed. So many people are there. If all you do is cooking, when will you enjoy the festival?’ I insisted.
‘Get out of your chieftanship mind here. I don’t have your orderly any other day around, do I?. If I have invited you over I have made arrangements as well. I am not siting here waiting for your help.’ Said she again.
‘Alright! Do as you wish. God!’ I looked at my brother.
My brother explained,’There is Munni’s mom, someone from our place only. She will assist. Which is why so much aplomb. Or else alone what can she…”
‘Yeah, right. Its you who does everything around here.’ she murmured again.
Anyway, everything was going as planned. Ritual sacrifice was performed on the eighth day of the pooja. Mahaprasad (preparation of the sacrificial goat) was being cooked in the backyard. That Munni’s mom was swamped with work. My wife was instructing her.

I went in and asked my wife,’how longer for dinner?’
‘Just a little. I will bring you guys some fried liver in the meantime.’ she replied.
‘What’s this covered in this corner?’ I asked turning the caisson over.
‘Oh, leave it alone, would you? Why do you have to look at everything anyway. Men don’t need to poke their noses in everyhting now, do they? Go and wash your hand. Its impure now.’ wife boasted.
‘What is in it anyway?’ Dithering I asked again promptly putting the cover back on.
‘There is no treasure trove. There is the skin and some Mahaprasad. For Munni’s mom. She asked for the skin. So its put aside for her. She will take it after we are done here.’
While my wife was explaining, Munni’s mom brought water for me to wash my hand. Seeing her veiled, I whispered to my wife,’she is veiling herself from me as if she is a newcomer bride in the house.’
Wife whispered back,’just go away. Don’t…’

When dining, commented my brother,’Munni’s mom’s hands are some kind of machine, eh! What a great Mahaprasad!’
I nodded in agreement.
Munni’s mom had left with the skin for her home. I asked my sister-in-law,’What would she do with the skin?’
‘What else? She would carve a drum out of it and send it to you to play!’ she got irritated.
‘Why can’t you answer anything straight?’
‘You talk rubbish, that’s why. The skin will be boiled. Hair peeled out and they will cook and eat it for a couple of a days. I can’t believe what kind of officer you are if you don’t understand such trivia.’
Tipped my brother,’why, is he a leather department officer.’
Everybody burst out laughing.
Changing the topic I asked my sis-in-law,’So have you engraved this bedsheet yourself or bought it somewhere. Its nice.’
‘You can take it if you want it. I will get another one done. Very skillful is Munni’s mom. She has done it all.’
‘Wow! Look’s like you got yourself a genie in her.’
‘That’s actually right. She is always ready to do whatever is told. No greed she has. So nice. Its just her devil husband…’
‘Why, what does he do?’
‘What can he do? I have fixed him as an bookkeeper with a contractor. He is alright now. Earlier he had wrecked it all in drugs. Luckily my driver got to know and told me everything and so I could act in time.’ explained my brother.
‘What had happened?’
‘He started a shop in Shyam bazaar in partnership with his in-law. Invested a lot. Business was good too. But then came the bad company and drugs and he ruined it all. They fought among themselves, him and in-law. Brawls, litigation, everything. Lastly, the in-law took hold of the shop and threw him out. He came virtually on the street with his family. Didn’t even have a day’s meal. From there, he has finally improved a lot. Quit the drugs. Somehow he is managing. I give clothes for all in his family like my own in the time of festivals. This lady is very admirable. Like the beauty in the hands of beast. She maintained her dignity even in the face of great adversity. No greed for anything at all. Works her back out to earn.’ Listening to my brother’s story, I was feeling sympathy and admiration at the same time.
I wasn’t feeling well on the day of Dashhara (the tenth and final day of the pooja). When everyone else left for the festival, I bolted the door and fell asleep. I woke up on the sound of the ring-bell. Looked at the watch- it was half past five. Lying on my bed, I said, ‘who’s there?’ No response. The bell rang again. I got up murmuring and opened the door. Munni’s mom was standing. For the first time I had seen her from the front. Very exhausted looking face. Hair looked thin. The lips looked blackened. She was wearing a bengali shred saari. Hastily she covered her face. But behind this battered face, I could see what a stunning beauty she could have been once.

Moving aside , I said,’No one is there. Everyone is out to the festival’
‘Yes, I know, Sir. Sister had told me to make tea for you on time. Can I?’ Munni’s mom said.
Her voice gave me an electric shock. I felt like I would fall down. I didn’t say anything just down on the chair right on the patio. I couldn’t notice when she went inside, made tea and brought it over. I was absorbed in investigating that voice.

‘Tea is getting cold.’ She said from inside the house.
Now I came round. Instead of taking tea, I asked her,’Could you come here in front of me?’
She came and stood on the patio.
‘Where are you from’? Asked I.
‘Jagati’.
‘And native place?’
She didn’t respond.
My suspicion increased.
‘Where is your native place?’ I asked again.
‘Why would you want to know, Sir?’

‘Don’t call me ‘Sir’, Champa! I recognized you!’ I screamed.

She sat down right there. I thought she was crying. I remained quiet for a few moments. I was stunned. Her ruinous story I already knew. I just had one question,’Champa, didn’t you recognize me?’
‘I could recognize you the very first day.’
‘So why didn’t you come out to me’?
‘I don’t have the capability anymore to equal with you.’
My courage was failing. I had no energy left to say or ask anything. She rose and left for her home.
I remembered the two lessons of school – ‘Free India reader’s Mrs. Chatterjee and the shapeless state of liquid. Put it in whichever vessel and it will take its shape. Marry Mrs. Chatterjee off to whoever and her ‘viscousity’ becomes like him.

The very next day, I left Calcutta.
(1994)

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कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर

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Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding:
Language:Maithili
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विदेह: सदेह : १ : तिरहुता : देवनागरी
“विदेह” क २५म अंक १ जनवरी २००९, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिकाक पहिल २५ अंकक चुनल रचना सम्मिलित।

विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/
विदेह: वर्ष:2, मास:13, अंक:25 (विदेह:सदेह:१)
सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर; सहायक-सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा
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पेपरबैक संस्करण

उपन्यास

मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.100.00

कहानी-संग्रह

रेल की बात : हरिमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2007मूल्य रु. 70.00
छछिया भर छाछ : महेश कटारे प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 100.00
कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 100.00
शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00
पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00
नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00
आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 90.00
कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00
भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 90.00
मैथिली पोथी

विकास ओ अर्थतंत्र (विचार) : नरेन्द्र झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 250.00
संग समय के (कविता-संग्रह) : महाप्रकाश प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00
एक टा हेरायल दुनिया (कविता-संग्रह) : कृष्णमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 60.00
दकचल देबाल (कथा-संग्रह) : बलराम प्रकाशन वर्ष2000 मूल्य रु. 40.00
सम्बन्ध (कथा-संग्रह) : मानेश्वर मनुज प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु. 165.00 शीघ्र प्रकाश्य

आलोचना

इतिहास : संयोग और सार्थकता : सुरेन्द्र चौधरी
संपादक : उदयशंकर

हिंदी कहानी : रचना और परिस्थिति : सुरेन्द्र चौधरी
संपादक : उदयशंकर

साधारण की प्रतिज्ञा : अंधेरे से साक्षात्कार : सुरेन्द्र चौधरी
संपादक : उदयशंकर

बादल सरकार : जीवन और रंगमंच : अशोक भौमिक

बालकृष्ण भट्ïट और आधुनिक हिंदी आलोचना का आरंभ : अभिषेक रौशन

सामाजिक चिंतन

किसान और किसानी : अनिल चमडिय़ा

शिक्षक की डायरी : योगेन्द्र

उपन्यास

माइक्रोस्कोप : राजेन्द्र कुमार कनौजिया
पृथ्वीपुत्र : ललित अनुवाद : महाप्रकाश
मोड़ पर : धूमकेतु अनुवाद : स्वर्णा
मोलारूज़ : पियैर ला मूर अनुवाद : सुनीता जैन

कहानी-संग्रह

धूँधली यादें और सिसकते ज़ख्म : निसार अहमद
जगधर की प्रेम कथा : हरिओम

अंतिका, मैथिली त्रैमासिक, सम्पादक- अनलकांत
अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4,शालीमारगार्डन,एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023,
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बया, हिन्दी तिमाही पत्रिका, सम्पादक- गौरीनाथ
संपर्क- अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4,शालीमारगार्डन,एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023,
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१.बनैत-बिगड़ैत (कथा-गल्प संग्रह)-सुभाषचन्द्र यादवमूल्य: भा.रु.१००/-

२.कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन)- गजेन्द्र ठाकुर मूल्य भा.रु.१००/-(सामान्य) आ $४० विदेश आ पुस्तकालय हेतु।

३.विलम्बित कइक युगमे निबद्ध (पद्य-संग्रह)- पंकज पराशरमूल्य भा.रु.१००/-

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Devanagari 244 pages (A4 big magazine size)विदेह: सदेह: 1: : देवनागरी : मूल्य भा. रु. 100/-

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८/९/१०.a.मैथिली-अंग्रेजी शब्द कोश; b.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश आ c.जीनोम मैपिंग ४५० ए.डी. सँ २००९ ए.डी.- मिथिलाक पञ्जी प्रबन्ध-सम्पादन-लेखन-गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा

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गजेन्द्र ठाकुरक शीघ्र प्रकाश्य रचना सभ:-

१.कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सात खण्डक बाद गजेन्द्र ठाकुरक

कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक-२

खण्ड-८ क संग

२.सहस्रबाढ़नि क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर उपन्यास

स॒हस्र॑ शीर्षा॒

३.सहस्राब्दीक चौपड़पर क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर पद्य-संग्रह

स॑हस्रजित्

४.गल्प गुच्छ क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर कथा-गल्प संग्रह

शब्दशास्त्रम्

५.संकर्षण क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर नाटक

उल्कामुख

१.जगदीश प्रसाद म‍ंडल-
कथा-संग्रह- गामक जिनगी
नाटक- मिथिलाक बेटी
उपन्यास- मौलाइल गाछक फूल, जीवन संघर्ष, जीवन मरण, उत्थान-पतन, जिनगीक जीत
२.मिथिलाक संस्कार/ विधि-व्यवहार गीत आ गीतनाद -संकलन उमेश मंडल- आइ धरि प्रकाशित मिथिलाक संस्कार/ विधि-व्यवहार आ गीत नाद मिथिलाक नहि वरन मैथिल ब्राह्मणक आ कर्ण कायस्थक संस्कार/ विधि-व्यवहार आ गीत नाद छल। पहिल बेर जनमानसक मिथिला लोक गीत प्रस्तुत भय रहल अछि।
३.पंचदेवोपासना-भूमि मिथिला- मौन

४.मैथिली भाषा-साहित्य (२०म शताब्दी)- प्रेमशंकर सिंह

५.गुंजन जीक राधा (गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित)- गंगेश गुंजन

६.विभारानीक दू टा नाटक: “भाग रौ” आ “बलचन्दा”

७.हम पुछैत छी (पद्य-संग्रह)- विनीत उत्पल

८.मिथिलाक जन साहित्य- अनुवादिका श्रीमती रेवती मिश्र (Maithili Translation of Late Jayakanta Mishra’s Introduction to Folk Literature of Mithila Vol.I & II)
९.मिथिलाक इतिहास – स्वर्गीय प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी

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दू बर्ख(२०१०-११ ई.):: INDIA रु.३५०/- NEPAL-(INR 1050), Abroad-(US$50)
तीन बर्ख(२०१०-१२ ई.)::INDIA रु.५००/- NEPAL-(INR 1500), Abroad-(US$75)
पाँच बर्ख(२०१०-१३ ई.)::७५०/- NEPAL-(INR 2250), Abroad-(US$125)
आजीवन(२००९ आ ओहिसँ आगाँक अंक)::रु.५०००/- NEPAL-(INR 15000), Abroad-(US$750)
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(ग्राहकक हस्ताक्षर)

२. संदेश-

[ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ]

१.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत।

२.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी।

३.श्री विद्यानाथ झा “विदित”- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय “विदेह”केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध “मीटर”सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत।

४. प्रो. उदय नारायण सिंह “नचिकेता”- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल “विदेह” ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।…विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन।

५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह…अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी।

६. श्री रामाश्रय झा “रामरंग”(आब स्वर्गीय)- “अपना” मिथिलासँ संबंधित…विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।…शेष सभ कुशल अछि।

७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका “विदेह” केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू।

८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह “मौन”- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका “विदेह” क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना।

९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि “विदेह”क सफलताक शुभकामना।

१०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब।

११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- “विदेह” पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ।

१२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका “विदेह” क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि।

१३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका “विदेह” केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत।

१४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- “विदेह” इन्टरनेट पर अछि तेँ “विदेह” नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी।

१५. श्री रामभरोस कापड़ि “भ्रमर”- जनकपुरधाम- “विदेह” ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी।

१६. श्री राजनन्दन लालदास- “विदेह” ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रिं‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाई। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। ..सुभाष चन्द्र यादवक कथापर अहाँक आमुखक पहिल दस प‍ंक्तिमे आ आगाँ हिन्दी, उर्दू तथा अंग्रेजी शब्द अछि (बेबाक, आद्योपान्त, फोकलोर..)..लोक नहि कहत जे चालनि दुशलनि बाढ़निकेँ जिनका अपना बहत्तरि टा भूर!..( स्पष्टीकरण- दास जी द्वारा उद्घृत अंश यादवजीक कथा संग्रह बनैत-बिगड़ैतक आमुख १ जे कैलास कुमार मिश्रजी द्वारा लिखल गेल अछि-हमरा द्वारा नहि- केँ संबोधित करैत अछि। मैथिलीमे उपरझपकी पढ़ि लिखबाक जे परम्परा रहल अछि तकर ई एकटा उदाहरण अछि। कैलासजीक सम्पूर्ण आमुख हम पढ़ने छी आ ओ अपन विषयक विशेषज्ञ छथि आ हुनका प्रति कएल अपशब्दक प्रयोगक हम भर्त्सना करैत छी-गजेन्द्र ठाकुर)…अहाँक मंतव्य क्यो चित्रगुप्त सभा खोलि मणिपद्मकेँ बेचि रहल छथि तँ क्यो मैथिल (ब्राह्मण) सभा खोलि सुमनजीक व्यापारमे लागल छथि-मणिपद्म आ सुमनजीक आरिमे अपन धंधा चमका रहल छथि आ मणिपद्म आ सुमनजीकेँ अपमानित कए रहल छथि।..तखन लोक तँ कहबे करत जे अपन घेघ नहि सुझैत छन्हि, लोकक टेटर आ से बिना देखनहि, अधलाह लागैत छनि..(स्पष्टीकरण-क्यो नाटक लिखथि आ ओहि नाटकक खलनायकसँ क्यो अपनाकेँ चिन्हित कए नाटककारकेँ गारि पढ़थि तँ तकरा की कहब। जे क्यो मराठीमे चितपावन ब्राह्मण समितिक पत्रिकामे-जकर भाषा अवश्ये मराठी रहत- ई लिखए जे ओ एहि पत्रिकाक माध्यमसँ मराठी भाषाक सेवा कए रहल छथि तँ ओ अपनाकेँ मराठीभाषी पाठक मध्य अपनाकेँ हास्यास्पदे बना लेत- कारण सभकेँ बुझल छैक जे ओ मुखपत्र एकटा वर्गक सेवाक लेल अछि। ओना मैथिलीमे एहि तरहक मैथिली सेवक लोकनिक अभाव नहि ओ लोकनि २१म शताब्दीमे रहितो एहि तरहक विचारधारासँ ग्रस्त छथि आ उनटे दोसराक मादेँ अपशब्दक प्रयोग करैत छथि-सम्पादक)…ओना अहाँ तँ अपनहुँ बड़ पैघ धंधा कऽ रहल छी। मात्र सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक।( स्पष्टीकरण- श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ- विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे http://www.videha.co.in/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि आ किएक रखने छथि वा आगाँसँ दाम नहि राखथु- ई सभटा परामर्श अहाँ प्रकाशककेँ पत्र/ ई-पत्र द्वारा पठा सकै छियन्हि।- गजेन्द्र ठाकुर)… अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग।

१७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका “विदेह” प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल।

१८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि…अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक…। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई।

१९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत।

२०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। “विदेह”क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ।

२१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ।

२२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य।

२३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई।

२४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि।

२५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक हमर उपन्यास स्त्रीधनक विरोधक हम विरोध करैत छी।… कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए। ओना अहाँक मंत्रपुत्र हिन्दीसँ मैथिलीमे अनूदित भेल, जे जीवकांत जी अपन आलेखमे कहै छथि। एहि अनूदित मंत्रपुत्रकेँ साहित्य अकादमी पुरस्कार देल गेल, सेहो अनुवाद पुरस्कार नहि मूल पुरस्कार, जे साहित्य अकादमीक निअमक विरुद्ध रहए। ओना मैथिली लेल ई एकमात्र उदाहरण नहि अछि। एकर अहाँ कोन रूपमे विरोध करब?)

२६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक।

२७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत।

२८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल – कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी।

२९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना।

३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी।

३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि।

३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई।

३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई।

३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई।

३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक।

३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ।

३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम।

३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना।

३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ।

४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल।

४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई।

४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य।

४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना।

४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि।

४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक।

४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत।

४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि।

४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रश‍ंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत।

४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना।

५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना।

५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना।

५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल।

५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना।

५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल।

५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना।

५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल।

५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई।

५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि।

५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी।

६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि।

६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब।

६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी।

६३.श्री लक्ष्मण झा “सागर”- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही।

६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय।

६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना।

६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय।

६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह।

६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना ।

६९.श्री परमेश्वर कापड़ि – श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ।

७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक)

७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि।

विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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‘विदेह’ ४२ म अंक १५ सितम्बर २००९ (वर्ष २ मास २१ अंक ४२)

In maithili on October 22, 2009 at 11:28 pm

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एहि अंकमे अछि:-
१. संपादकीय संदेश

२. गद्य
२.१. कथा- दूटा पाइ -जगदीश प्रसाद मंडल
२.२.सुरेन्द्रश लाभ(नाटक)-माई गे ! भूख लागल हए

२.३. अनमोल झा- लघुकथा
२.४. कुसुम ठाकुर- प्रत्यावर्तन -१७

२.५. कथा-नोर अंगोर- कुमार मनोज कश्यप
२.६. डॉ रमानन्द झा रमण-67म सगर राति दीप जरय
२.७. रिपोर्ताज- मनोज झा मुक्ति
२.८. अमरेन्द्र यादव-रिपोर्ट

३. पद्य

३.१. गुंजन जीक राधा

३.२. सतीश चन्द्र झा
३.३. हिमांशु चौधरी-दू टा पद्य

३.४. पंकज पराशर
३.५. नेनाक प्रश्न-सुबोध कुमार ठाकुर
३.६.निशाप्रभा झा (संकलन)-आगां

३.७. मिथिलेश कुमार झा-दू टा पद्य
३.८.कल्पना शरण-प्रतीक्षा सँ परिणाम तक-४

४. गद्य-पद्य भारती -पाखलो -५ (धारावाहिक)- मूल उपन्यास-कोंकणी-लेखक-तुकाराम रामा शेट, हिन्दी अनुवाद- डॉ. शंभु कुमार सिंह, श्री सेबी फर्नांडीस, मैथिली अनुवाद-डॉ. शंभु कुमार सिंह

५. बालानां कृते- देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स)२.कल्पना शरण:देवीजी.
६. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.]

8. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS (Festivals of Mithila date-list)

8.1.Original poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Lucy Gracy from New York
8.2. Devil Blessed Us-Shyam darihare (Devil Blessed Us- Maithili story by Shyam darihare, translated by Praveen k Jha )

विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link.
विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे
Videha e journal’s all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions

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मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू।

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भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र ‘मिथिला रत्न’ मे देखू।

गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू ‘मिथिलाक खोज’।

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१. संपादकीय
पञ्जीमे उपलब्ध किछु तथ्य:-
महाराजाक हेतु निहुछल कन्यासँ अपन पाँजिक रक्षार्थ कन्या चोराकेँ बियाह केलापर राजा द्वारा पञ्जीकार लोकनिकेँ बजाए हुनकर नाममे तस्कर उपाधि जोड़ब, नैय्यायिक गंगेश उपाध्यायक जन्म पिताक मृत्युक ५ सालक बाद होएब, महेशठाकुरक बहिनक विवाह कूच-बिहारक राजकुमारसँ होएब, कविशेखर ज्योतिरीश्वरक उपाधिक संग उल्लेख (हुनकर पाण्डुलिपि नेपालक पुस्तकालयसँ प्राप्त होएबासँ पूर्व), ओकर अतिरिक्त ढेर रास ढाकाकवि आ कवि शेखर लोकनिक विवरण, मुस्लिम आ चर्मकारसँ विवाहक विवरण आ समाजमे ओहिसँ भेल सन्ततिक प्रति कोनो दुराग्रहक अभाव, ई सभ पञ्जीमे वर्णित अछि।आर्यभट्टक विवरण- (२७) (३४/०८) महिपतिय: मंगरौनी माण्डैर सै पीताम्ब र सुत दामू दौ माण्ड्र सै वीजी त्रिनयनभट्ट: ए सुतो आर्यभट्ट: ए सुतो उदयभट्ट: ए सुतो विजयभट्ट ए सुतो सुलोचनभट (सुनयनभट्ट) ए सुतो भट्ट ए सुतो धर्मजटीमिश्र ए सुतो धाराजटी मिश्र ए सुतोब्रह्मजरी मिश्र ए सुतो त्रिपुरजटी मिश्र ए सुत विघुजटी मिश्र ए सुतो अजयसिंह: ए सुतो विजयसिंह: ए सुतो ए सुतो आदिवराह: ए सुतो महोवराह: ए सुतो दुर्योधन सिंह: ए सुतो सोढ़र जयसिंहर्काचार्यास्त्रस महास्त्र विद्या पारङगत महामहोपाध्या य: नरसिंह:।।
५८४(A)। चैतन्य महाप्रभु: रमापति उपाध्याय करमहे तरौनी मूलक छलाह। ओ बंगाल चलि गेलाह,हुकर शिष्य रहथि चैतन्य महाप्रभु।गंगेश उपाध्याय-छादन छादन, उदयनाचार्य-ननौतीवार ननौती (करियन, समस्तीपुर), महेश ठाकुरक मातृक काश्यप गोत्री सकराढ़ी मूलमे रुद झा। रमापति उपाध्याय प्रसिद्ध विष्णुपुरी, परमानन्दपुरी वत्सगोत्री करमहा मूलक तरौनी गामक चैतन्यक गुरु।बल्लाल सेनक समयमे हलायुध आ लक्ष्मणसेन-उद्योतकर। सिंहाश्रम मूलक म.म.हलायुधसँ १२ पुस्त पूर्व माण्डर मूलक बीजी म.म.त्रिनैन भट्ट (४०० ए.डी.लगभग) एहि पोथीक प्रस्थान बिन्दु अछि(पृष्ठ १८)। हलायुध आ नरसिंह समकालीन छलाह। नरसिंह (माण्डर मूल)सँ १२ पुस्त पूर्व त्रिनैन भट्ट मे।

संगहि “विदेह” केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ १४ सितम्बर २००९) ८४ देशक ९१० ठामसँ २९,४२१ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी.सँ १,९७,८०९ बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण।

गजेन्द्र ठाकुर
नई दिल्ली। फोन-09911382078
ggajendra@videha.co.in
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२. गद्य
२.१. कथा- दूटा पाइ -जगदीश प्रसाद मंडल
२.२.सुरेन्द्र9 लाभ(नाटक)-माई गे ! भूख लागल हए

२.३. अनमोल झा- लघुकथा
२.४. कुसुम ठाकुर- प्रत्यावर्तन -१७

२.५. कथा-नोर अंगोर- कुमार मनोज कश्यप
२.६. डॉ रमानन्द झा रमण-67म सगर राति दीप जरय
२.७. रिपोर्ताज- मनोज झा मुक्ति
२.८. अमरेन्द्र यादव-रिपोर्ट

जगदीश प्रसाद मंडल
कथा- दूटा पाइ

हलहोरिमे फेकुओ दिल्लीक रैलीमे जाइक विचार केलक। परसू सौझुका गाड़ी सभ पकड़त। दिल्लीक लड्डूक बात फेकुओकेँ बुझल रहै। तेँ खाइक मन रहै। अबसर भेटल छले से किऐक तऽ, ने गाड़ीमे टिकट लागत आने संगबेक कमी, मात्र चारि दिनक खेनाइ टा अपन खर्च। गाड़ीमे लोक बेसी खाइतो नहि अछि किऐक तँ पेशाव-पैखानाक समस्या रहै छै।
फेकुआ मायकेँ कहलक- ‘‘माय, परसू दिल्ली जेबउ। बटखरचाक ओरियान कऽ दिहें?’’
माय बाजलि- ‘‘की सभ लेबही?’’
फेकुआ कहलक- ‘‘दू सेर चूड़ा लऽ कऽ डॉक्टर सहाएव नागेद्र जी चलै ले कहलथिन हेँ। हमरो दू सेर चूड़ा कुट्टि दिहेँ।’’

फेकुआक बातक बिश्वास मायकेँ नहि भेलै। मने-मन सोचलक जे दू सेर चूड़ा तँ एक दिनमे लोक खाइत
अछि। चारि दिन कोना पुड़तै? फेरि मनमे अयलै जे दू सेर चूड़ो आ चारि-दुना आठ टा रोटियो पका कऽ दऽ देबै। कहुना भेलइ तँ रोटी सिद्ध अन्न भेलइ।

गाड़ी अबैसँ पहिनहि जुलूसक संग फेकुआ स्टेशन पहुँचल। जिनगीक पहिल दिन फेकुआ गाड़ीमे
चढ़त। प्लेटफार्म पर भीड़ि देखि फेकुआक मन घबड़ेबो करै आ उत्साहो जगै जे एत्ते लोक चढ़त से हेतै आ हमरा वुत्ते कि नहि चढ़ि हैत। निरमली-सकरीक बीच छोटी लाइन। गाड़ियो छोटकिये। मुदा सकरी सँ दिल्लीकक लेल गाड़ियो बड़की आ लाइनो बड़की। गाड़ीमे चढ़ि फेकुआ सकरी पहुँचल। दिल्लीक गाड़ी लगले रहै। हाँइ-हाँइ कऽ सभ निरमलीक गाड़ी सँ उतड़ि दिल्ली गाड़ीमे चढ़ल। गाड़ी खुजलै।

ओना सकरी सँ दिल्ली जाइक लेल चैबीस घंटा लगैत छै। मुदा आइ से नहि भेल। चालीस घंटामे
पहुँचल। मुदा चालीस घंटा कोना बीतल से फेकुआ बुझबे ने केलक। हलहोरियेमे पहुँच गेल। ने एक्को बेरि खेलक आ ने पानि पीलक। मुदा तइओ भूख बुझिये ने पड़ै। गाड़ी सँ उतड़ै काल फेकुआ खिड़की देने प्लेटफार्म दिशि तकलक तँ जेरक-जेर सिपाही घुमैत देखलक। मुदा फेकुआक नजरि, कतौ नहि अँटकि, मोटका सिपाही पर अँटकल। ओकर मनही पेटपर नजरि गेलै। तइ पर से छओ आंगुर चाकर ललका बेल्ट। जे बेरि-बेरि निच्चा ससरैत। चाइन पर सँ घामक टघार। दस किलोक बन्दुक सेहो कान्हमे लटकल। मुदा तखने नागेन्द्र जी सेहो अपन छबो संगीक संग हाथ सँ सभकेँ उतड़ैक इशारा देलथिन। धड़फड़ा कऽ फेकुओ उतड़ल।

प्लेटफार्म टपि जहाँ फेकुआ मुसाफिर खाना प्रवेश करै लागल कि ममिओत भाइपर नजरि गेलै। ममिऔत भाइ रतना चरिपहिया गाड़ीक ड्राइवर। अपना मालिककेँ गाड़ी पकड़वै ले आयल रहय। भाइपर नजरि पड़ितहि लगमे जा फेकुआ गोड़ लगलक। गोड़ लागि लालकिला मैदान दिसक रास्ता धेलक। पाछूसँ झटकि कऽ आगू बढ़ि रतना फेकुआसँ घरक कुशल क्षेम पूछलक।
कुशलक जबाव नहि दऽ फेकुआ कहलक- ‘‘काल्हि साँझ धरि लाल किला मैदानमे रहब तेँ ओतइ अबिहह। अखैन नै रुकबह।’’

‘‘कनी चाहो पीबि ने ले?’’

‘‘नै अखैन कुछो नै पीवह।’’

फेकुआ बढ़ि गेल। मुदा रतनाकेँ पाछू घुमैक डेगे ने उठै। फेकुऐ दिशि तकैत रहय। मने-मन विचारै लगल जे हो न हो काल्हि भेटि नहि हुअए। ओत्ते लोकमे के कत्तऽ रहत, तेकर कोन ठीक। तहूमे सौझुका बात कहलक। दिल्ली छियै। कोन ठीक जे बिजलीक इजोत रहतै की नहि। एत्ते लोकमे तँ दिनोमे अन्हार रहत। एक्को दिन मेजमानियो ने करौलियै। गाममे दीदी सुनत ते की कहत? उ की कोनो दिल्लीकेँ दिल्ली बुझैत हैत। ओ तँ गामे जेकाँ बुझैत हैत। जहिना गाममे सभकेँ सभ चिन्है छै, तहिना। मुदा ई त दिल्ली छी। भाड़ाक एक कोठरीमे सोहर गाओल जाइत छैक आ दोसरमे कन्नारोहट होइ छै। विचित्र स्थितिमे रतना पड़ि गेल। आइ घरि रतनाक बुद्धिपर एहेन भार कहियो नहि पड़ल रहै। एकाएक मनमे अयलै जे कौल्हुका छुट्टी लऽ कऽ भोरे फेकुआक भेटि करब। भेटि होइतहि लालकिला, जामा मस्जिद देखा देबइ।

दोसर दिन भोरे रतना फेकुआक भेटि करै विदा भेलि। लाल किला मैदान पहुँचते भेटि भऽ गेलइ। भेटि होइतहि दुनू भाइ गामेक बसिया रोटी खा पानि पीलक। भरि दिन संगे रहि, रैली समाप्त कऽ रतना अपना डेरापर आयल। पैघ सेठक ड्राइवर रतना, तेँ डेरो नीक। सब सुविधा। मुदा रतनाक डेरासँ फेकुआक मनमे खूब खुशी नहि भेलइ। मन पड़ि गेलइ मायक ओ बात जे सदिखन बजै- ‘‘अनकर पहीरि कऽ साज-बाज, छीनि लेलक तँ बड़ लाज।’’
अपना जैह रहए ओहि सँ सबुर करी। मुदा मायक बात फेकुआक मनमे बेसी काल नहि अँटकल। किऐक तँ तीनि दिन सँ नहाएल नहि छल। जहि सऽ देहमे लज्जतिये ने बुझि पड़ै।
रतनाके कहलक- ‘‘भैया, पहिने हम नहेबह। बिना नहेने मन खनहन नै हैत। ओना ओंघियो लागल अछि। तेँ नहा कऽ खेबह आ भरि मन सुतबह।’’

फेकुआके रतना बाथ रुम देखा देलक। बिजली जरैत। पानि चलैत। बाथ रुम देखा रतना गैस चुल्हि पजारि भानस करै लगल। भरि मन फेकुआ नहाएल। मन शान्त भेलइ। मनमे उठलै, जखन दिल्ली आबि गेलहुँ तँ किछु लइये कऽ जायब। रतना लग आवि फेकुआ बैसल।
भानसमे विलंब देखि रतना कहलकै- ‘‘बौआ देखही, ई दिल्ली छियै। एहिठाम लोक सोलह-सोलह घंटा खटैत अछि। दरमाहाक संग ओभर टाइमोक पाइ भेटइ छै। मुदा जिनगी-जीबैक लुरि नहि रहने सब चलि जाइ छै। ने गामक कर्जसँ मुक्ति होइ छै आ ने अहीठाम चैनसँ रहैत अछि। भुतलग्गु जेकाँ सदिखन बुझि पडै़त छै। तोरा एहि दुआरे कहि दइ छिऔ जे तू अपन छोट भाइ छियें।’’

रतना बात सुनि कने-काल गुम रहि फेकुआकेँ कहलक- ‘‘भैया, तू सभ तरहे पैघ छह। जखन तोरा लग छी तँ तोंही ने हमर नीक-बेजाय बुझबहक।’’

फेकुआ बातसँ रतनाकेँ अपन जिम्माक भार बुझि पड़लै।
बाजल- ‘‘देखही बौआ, एखन जे कहलिऔ से स्टील फैक्ट्रीक स्टाफक बात कहलिऔ। मुदा सब एहने अछि सेहो बात नहि छै। एहनो लोक अछि जे अपन
मेहनत आ लुरिसँ गरीब रहितो अमीर बनि गेल। अपने इलाकाक ढ़ोरबा छी। जेकरा हम तँ ढ़ोरबे कहै छिअए मुदा ओ ढ़ोढ़ाई बाबू बनि गेल। जखन गामसँ आयल, तँ बौआ-ढ़हना कऽ चारि दिनक बाद एहिठाम आयल। ओकरा शैलूनमे नोकरी लगा देलियै। किछु दिन तँ काज करैमे लाज होइ। किऐक तँ ओ धानुक छी। मुदा किछुए दिनक पछाति तेहेन हाथ बैसि गेलइ जे नउओकेँ उन्नैस करै लगल। अपनो खूब मन लगै लगलै। दरमहो बढ़ि गेलइ। तीनि सालक बाद जेना ओकरा एहिठामसँ मन उचटि गेलइ। सोचलक जे जखन लुड़ि भऽ गेल अछि तखन कतौ कमा कऽ खा सकै छी। से नहि तँ गामेक चौकपर दोकान खोलब। अपना जे दू पाइ कम्मो हैत तइ सँ की ,समाजक उपकार तँ हेतइ। सैह केलक।
ले बलैया, गामक लोक कियो ठाकुर तँ कियो नौआ तँ कियो हजमा कहै लगलै। घरक जनिजातिकेँ नौआइन कहै लगलै। सभसँ दुखद घटना तखन भेलै जखन कथा-कुटुमैती आ जातिक काजसँ अलग कयल गेलइ। मुदा ओहो कर्म-योगी। गामकेँ प्रणाम कऽ,अपन परिवारक संग दिल्ली शहर चलि आयल। वाह रे वनक फूल, एहिठाम आबि कऽ अपन कारोवार शैलून ठाढ़ कऽ लेलक। छह टा स्ठाफ रखने अछि। बहिनीक विआह इंजीनियरसँ केलक। हमहूँ विआहमे रहियै।’’

फेकुआ बाजल- ‘‘हमरो कोनो लाज-सरम नै हैत। जे काज मे लगा देबह, हम पाछु नै हटबह।’’
रतना कहलक- ‘‘परसू रवि छिअए। हमरो छुट्टी रहत। तावे दू दिन अरामे कर।’’
फेकुआ बाजल- ‘‘हमरा ओते सुतल नीक नै लगतह। चलि जेबह बुलै ले।’’
रतना कहलक- ‘‘रौ बुड़िबक! गाममे लोक खिस्सा कहै छै जे फल्लां तेहेन काबिल छै जे एक्के पाइ मे बेचि लेतउ। मुदा अहिठाम सभ काबिले छै। तैं देखबिही जे अहिठाम सभ से पैघ कारबार मनुक्खेक खरीद-बिक्रीक छैक। देहाती बुझि केओ ठकि कऽ बेचि लेतउ। कहतौ जे हवा-जहाजक नोकरी धड़ा देबउ आ चलि जेमए आन देश।’’

रतनाक बात सुनि फेकुआ क्षुब्ध भऽ गेल। मुदा मनमे अयलै जे जना हम बेदरा रही तहिना भैया कहैए। मुदा किछु बाजल नहि। दम साधि कऽ रहि गेल।

तीनि दिनक उपरान्त फेकुआ कपड़ा सिलाइक दोकानमे काज शुरु केलक। दू हजार रुपैया दरमाहा। भिनसर छओ बजेसँ राति नओ बजे धरिक डयूटी। बीचमे एक बेर अधा घंटा जलखै करै ले आ एक घंटा खाइ बेरि छुट्टी। फेकुआक मनमे उठल जे ड्यूटी तँ बीसो घंटा कऽ सकै छी मुदा सुतैक जे आठ घंटा छै से केना
पुड़त। मुदा फेरि मनमे एलै जे जखन दू पाइ कमाइ चाहै छी तखन तँ सब सुख-भोग कमबै पड़त। दोकानमे आठ टा कारीगर। आठो नोकरे। फेकुआ अनाड़ी, तेँ दोकानक झाडू़-बहारु सँ काज शुरु केलक। कपड़ा काटब आ सिलाइ मशीन चलौनाइ सेहो कने-कने सीखए लगल।

दुइये माय-बेटा फेकुआ। दस साल पहिनहि बाप मरि गेल। अपने दिल्ली धेलक आ माय गाममे। मुदा मायो थेहगरि। पुरुखे जेकाँ बोनि-बुत्ता करैत। नोकरी होइतहि फेकुआकेँ माय मन पड़लै। माये टा नहि गामो मन पड़लै। मन पड़लै गामक स्मृति। माइक ममता जगि मनकेँ खोरै लगलै। मनमे उठै लगलै- रदेशियाक परिवारमे गेटक-गेट कपड़ा…..राशि-राशिक चीज-बस्तु….रेडियो, घड़ी, टी. वी., मोबाइल इत्यादि। ककरा नहि नीक वस्तुक सेहन्ता होइत छै। मुदा ओहन सिहन्ते की जेकरा पुरबैक ओकातिये ने रहै। दू हजार महीना रुपैआक गरमी फेकुआक मनमे तरे-तर चढ़ि गेलै। कोना नहि चढ़ितै? मुदा आमदनिऐक गरमी चढ़ल खर्चक पानि पड़बे ने कयल। सोचलक जे सबसँ पहिने माएकेँ चिट्ठी लिखि जना दिअए।
आठ दिनक बाद फेकुआ रतनाकेँ कहलक- ‘‘भैया, हमरा तँ लिखल-पढ़ल नै होइए। मुदा जखन नोकरी लागि गेलौं तँ मायकेँ जनतब देब जरुरी अछि। किऐक तँ ओकरा होइत हेतै जे कत्तऽ बौआइ-ढ़हनाइए। रतनोक मनमे जँचलै। वी. आइ. पी. बैगसँ पोस्ट-कार्ड निकालि रतना चिट्ठी लिखय ले तैयार भेल।
पुछलक- ‘‘बाज की सब दीदी कऽ लिखबीही?’’
फेकुआ लिखवै लगल-
स्थान- दिल्ली
ता.- 5.6.2007

माय, गोड़ लगै छिऔ
भगवानक दया आ तोरा-सबहक, समाजक असीरवाद से तेहेन नोकरी भेटल जे कहियो मनमे नै आयल छल। दू हजार रुपैआ महीनाक तलब। अपना कते खर्च हैत। जे उगड़त से मासे-मास पठा देबउ। बेंगबा कक्काकेँ कहिअनि जे चिमनी पर जा कऽ ईंटाक दाम बुझि अबै ले। पहिने घर बना लेब। अपना कलो (चापाकल) नै छौ, सेहो गड़ा लेब। घरक आगू जे मलिकाबाक चौमास छै, ओहो कीनि लेब।’’

तोहर बेटा फेकुआ

सात बजे भिनसर। मेघौन। कखनो कऽ सुरुज देखि पड़ै आ फेर झपा जाइ। झिहिर-झिहिर पुरबा हबा चलैत रहै। पान-छओ गोटेक संग फेकुआक माय रामसुनरि धन-रोपनी करै विदा भेलि। किछुए आगू बढ़लापर डाक-प्यूनकेँ देखलक। मुदा आन स्त्रीगण जेकाँ रामसुनरि नहि जे दिनमे दू बेरि मोबाइलसँ, तीनि पन्नाक चिट्ठी आ तइ पर सँ जे समदिया भेटलै ओकरा दिअए समाद
पठौत। मन मे कोनो हल-चल नहि।
रामसुनरिक आगू मे आबि हँसैत डाकप्यून कहलक- ‘‘काकी, फेकुआक चिट्ठी
ऐलौ हेन।’’
कहि झोरासँ निकालि पोस्ट कार्ड देलक। छबो स्त्रीगण डाकप्यून कऽ चारु भागसँ घेरि कऽ ठाढ़ भेलि। हाथमे पोस्ट-कार्ड अबितहि रामसुनरिक मन, बिहाड़िमे
उड़ैत ओहि सुखल पात जेकाँ जे सरंगोलिया उठि अकास मे उड़ैत, तहिना उड़ि गेल। जिनगीक पहिल पत्र। मनमे अयलै जे पहिने ककरोसँ पत्र पढ़ा ली। ओना डाकप्यून लगमे, से चलि गेल। मुदा तेकर अफसोस नहि भेलै। किएक तँ जाधरि प्यून लगमे छल ताधरि पत्र पढ़ेबाक विचार मनमे आयलो नहि छलैक। फेरि मनमे अयलै जे काज कामै नै करब। अखन खूँटमे बान्हि कऽ रखि लइ
छी आ जखन निचेन हैब तखन पढ़ा लेब। सैह केलक।

गोसाइ डूबैत रामसुनरि निचेन भेलि। निचेन होइतहि चिट्ठी पढ़ाबए श्याम ओहिठाम विदा भेलि। श्यामोक घर लगे। पोस्ट-कार्ड हाथ मे लऽ श्याम सत्यनारायण कथा जेकाँ पढ़ै लगल। मुदा दोसरे पाँती, ‘दू हजार रुपैआ
महिना तलब, मे रामसुनरि ओझरा गेलि। मने-मन सोचए लागलि जे फेकुआ छैाँड़ाकेँ घरक सोह एलै। बुद्धियो फुटैक उमेर भेलि जाइ छै। आब कहिया चेतन हैत। अगिला साल तक बियाहो कइये देबइ। असकरे राकश जेकाँ अंगनामे रहै छी। लगले विचार बदलि गेलइ। बुदबुदा लागलि, कना लोक कहै छै जे मसोमातक बेटा दुइर भऽ जाइ छै। विचार मे डूबल रामसुनरि।
तहि बीच श्याम बाजल- ‘‘सब बात बुझलियै ने काकी?’’
श्यामक पुछब सँ रामसुनरिक भक्क खुजल।
बाजलि- ‘‘बौआ, चिट्ठी पढ़ल भऽ गेलह। की सब छौड़ा लिखने अछि?’’

काकीक मनक बात नहि बुझि श्याम खौंझा गेल। मुदा किछु बाजल नहि। पत्रकेँ निच्चामे रखि श्याम ओहिना मुह जबानिये कहै लगलनि। मुदा कार्डकेँ निच्चामे राखल देखि बेचारी रामसुनरिकेँ भेलि जे अपने दिशिसँ कहै अए। जहि सँ विश्वासे ने भेलइ। मुदा झगड़ो करब उचित नहि बुझलक। किएक तँ बेटाक पहिल पत्र छी तेँ अशुभ व्यवहार नीक नहि।

दोसर दिन एकटा पोस्टकार्ड कीनि रामसुनरि पत्र पढ़बैइयो आ लिखबैयो ले सोहन ऐठाम गेलि।
दुनू पोस्टकाड, लिखलहो आ सौदो, रामसुनरि सोहनकेँ दैत कहलक- ‘‘बौआ, पहिने पढ़ि कऽ सुना दैह। तखन लिखियो दिहऽ।’’
पत्र पढ़ि कऽ सोहन सुना देलक। समाचार सुनि रामसुनरिक मन खुशीसँ उत्साहित भऽ गेलै।
बाजलि- ‘‘बौआ आब चिट्ठी लिखि दिऔ।“

सोहन चिट्ठी लिखऽ लागल-

परमानपुर

ता. 3.7.2007

फेकू। असीरवाद।

अखन हम अपने थेहगर छी, तेँ हम्मर चिन्ता जुनि कर। रहै ले घरो अछिये। एक घैल पानि इसकूलबला कल पर सँ लऽ अबैत छी, ओइह भरि दिन चलैत अछि। तेँ पानियोक दिक्कत नहिये अछि। नहाइ ले धारो आ पोखरियो अछि। कहियो-काल बरखोमे नहा लै छी। तइ सब ले तू चिन्ता किअए करै छैं? एखन खाइ-खेलाइक उमेर छौ। तेँ कमा कऽ जे मन फुड़ौ से करिहें। अगिला साल धरि अबिहें, वियाहो कऽ देबउ। असकरे अंगना मे नीक नै लगैए।’’

माए रामसुनरि

साल भरि बीति गेल। जहिना गाममे रामसुनरि अपना काजमे हरा गेलि तहिना दिल्लीमे फेकुओ। साले भरिमे फेकुआ कपड़ा सिलाइक कारीगर बनि गेल।
अपना देहक कपड़ा-लत्ता कीनतै-कीनैत फेकुआक सालो भरिक दरमाहा सठि गेलै। माइक जिनगी तँ जहिना के तहिना रहलि मुदा फेकुआक जिनगीमे बदलाब आयल।
दुब्बर-दानर फेकुआ फुटि कऽ जुआन भऽ गेल। कपड़ा सिआइक लुरि भेने आत्मबलो मजबूत भेलै। मुदा गामक जिनगी आ दिल्लीक जिनगीक बीचक संघर्ष फेकुआक मनमे चलितहि रहलै।

रवि दिन। रतनो आ फेकुओके छुट्टी रहै। सुति उठि दुनू ममियौत-पिसियौत विचारलक जे साल भरि सँ बगेरी नहि खेलहुँ। से नहि तँ आइ बगेरिये आनब। ताहि बीच रोड पर देखलक जे पुलिसक गाड़ी इम्हर सँ ओम्हर कऽ रहल छै। दुनू भाइकेँ कोनो भाँजे नहि लगै। कोठरीसँ निकलि रतना चाहवला सँ पुछलक। चाहवलासँ भाँज लगलै जे महल्लासँ एकटा जुआन लड़की आ एकटा सेठक बेटाक अपहरण रातिमे भऽ गेलइ। समाचार सुनि दुनू भाइ डरा गेल। बगेरीक विचार छोरि गामक गप-सप करै लगल।
रतना बाजल- ‘‘बौआ, तोरा साल लागि गेलह। एक बेरि गाम जा सबकेँ भेंटि केने आबह।’’
गामक नाम सुनितहि फेकुआक मन उड़ि कऽ दोसर दुनियाँ पहुँच गेलै। मन पड़लै-चिमनीक ईंटा….चापाकल….घरक आगूक चौमास। मन गामक सीमा पर अटकि गेलइ। सीमापर सँ अंगना पहुँचैक साहसे ने होइ। किऐक तँ बाटेपर मायकेँ ठाढ़ भेलि देखए। की कहैत हैत माय? साल भरि भऽ गेलइ, ने एक्कोटा पाइ पठौलक आ न एक्को खण्ड साड़ी। कहियो काल जे अस्सक पड़ैत हैत तँ दवाइयो आनि कऽ के दैत हेतइ? पौरुकाँ जे चिट्ठी आयल, तइ दिनसँ दोसर चिट्ठियो ने अयल हेँ। हमहूँ तँ नहिये पठौलियै। छुछे चिट्ठिये लिखिने की हेतइ। मने-मन माए बुढ़िया सरापैत हैत। कहैत हैत जे छौंड़ा ढ़हलेलक ढ़हलेले रहिय गेल। मुदा हमहीं की करब? छुछे हाथे गामे जा कऽ की करब? टिकटो जोकर पाइ नइ अइ। चिन्ता आ सोग सँ फेकुआक मन दबा गेलै। कोनो बाटे ने सुझै। मनक भीतर बिरड़ो उठि गेलइ। बिरड़ोक हवामे फेकुआक मन सोगक तरसँ निकलि गेलै। मनमे अयलै, गाम तँ गाम छी। गामक लोक माघक शीतलहरी आगि तापि कऽ काटि लैत अछि। बिना कम्मल-सीरकक जाड़ बीता लैत अछि, गाछ तर जेठक रौद काटि लैत अछि। मुदा दिल्ली मे से हैत? साल भरिक कमाइ साल भरिक मौसमक अनुकूल कपड़ेमे चलि गेल। नहि लइतहुँ तँ सेहो नहि बनैत। लेलहुँ तँ गाम छुटि गेल। जहिना घनघोर बादलक फाँटसँ सूर्जक रोशनी छिटकैत तहिना फेकुओक मनमे भेल।
रतनाकेँ कहलक- ‘‘भैया, एकटा चिट्ठी लिखि दैह।’’

लगेमे रतना कऽ सभ किछु छलै। पोस्ट-कार्ड निकालि लिखै ले तैयार भेल।

फेकुआ लिखबै लगल-

दिल्ली
ता. 11.8.2008

माय, गोड़ लगै छिऔ

मनमे बहुत छलै जे तोरो बेटा दिल्लीमे नोकरी करैत छओ। मुदा सब हरा गेल। सिर्फ एक्के टा चीज बँचल जे एहिठाम दिल्लीसँ ओहिठाम गाम धरि जीवैक
रास्ता धड़ा देत। तेँ खुशी अछि। हाथ खाली अछि। गाम कोना आयब?

तोहर फेकुआ

चारिये दिनमे चिट्ठी मायक हाथ पहुँचल। चिट्ठी के हाथमे अबितहि राम सुनरि निग्हारि-निग्हारि देखै लागलि। छैाँड़ा कतौ रहए, भगवान ओकरा नीके रखथुन। बेटा धन छी। कतौ रहय। आब तँ फुटि कऽ जुआन भऽ गेल हैत। जहिना चाह-पान खा-पी बड़का लोककेँ धोधि फुटि जाइ छै तहिना तँ फेकुओके भेलि हेतै। किऐक तँ ओहो ने चाह-पान खाइत-पीबैत हैत। गोराइयो गेल हैत। मोछो-दाढ़ी भऽ गेल हेतै। जहिना भगवान घरसँ पुरुख उठा लेलनि तहिना तँ फेरि दइयो देलनि। जुआन बेटापर नजरि पहुँचतहि रामसुनरिक मन खुशीसँ नाचि उठलै। मने-मन बुद-बुदा लगलीह-दस बर्खसँ घरमे पुरुख नइ छल, तेँ कि कोनो पुरुखक घरसँ हमर घर अधला चलल। संतोषे गाछमे मेबा फड़ैत छै। परसुका बात मन पड़लै। चाहक
दोकान पर परसू पंडी जी कहैत रहथिन जे एहिबेरि शुरुहे अगहनसँ गन-गनौआ घन-घनौआ लगन अछि। हमहूँ फेकुआक वियाह कइये लेब। बियाह मनमे अबिते सोचै लागलि-बहुत दिनसँ पाँच गोटे के अंगनामे हाथो नै धुऐलौ। सेहो कइये लेब। समाजक भोज मे तँ नै सकब मुदा जहाँ धरि सकड़ता हैत, तइमे पाछुओ नै हटब। लोक ई नै बुझै जे मसोमातक बेटाक बियाह होइ छै। डफरा-वौसली, हवागाड़ी सेहो लइये जायब। अनका जेँका एक ढ़किया कऽ मुह नै पसारव। अपना बेटी-जमायकेँ जे देत से देत। हम किअए मंगिऔ। जे आदमी पोसि-पालि कऽ एकटा मनुक्ख
देबे करत तेकरासँ फेरि की मंगिऔ? किछु ने मंगबै। लुरि रहत तँ कामधेनु बना कऽ राखब नहि तँ माटिक मुरुत रहत। एकाएक रामसुनरिक नजरि चिट्ठीपर पहुँचल। पोस्ट-कार्ड निकालि, हियसि-हियासि देखै लगलीह। फुटा-फुटा करिया अक्षर तँ नहि बुझैत, मुदा कृष्ण जेकाँ कारी मुरुत जरुर बुझि पड़ै। चिट्ठी पढ़ाबै रामसुनरि विदा भेलि।

अंगनासँ निकलितहि मनमे उठलनि आब कि कोनो पहिलुका जेँका लोककेँ बारह बर्ख कटिया सोन्हबै पड़ै छै। आब तँ साले भरिमे लोककेँ धिया-पूता भऽ जायत
छैक। कहुना भेलि तँ हमरो फेकुआ शहरे-बजारक भेल की ने। एते बात मनमे अबिते मुँहसँ हँसी निकलल। असकरे। तेँ कान कऽ सुनै दुआरे तेना रामसुनरि
जोरसँ बाजलि जेना दोसर कऽ कहैत होअय। फुसिओहोक बेटी युग जीतिलक। भाग तँ मुह-कान नीकि नइ छै। नइ ते युगमे भूर करैत। वियाहक आठमे मासमे बेटी भऽ गेलइ। ई तँ धन्यवाद अइ समाजकेँ दी जे एक सूरे सब बाजल जे सतमसुआ बच्चा छिअए। जँ एना वियाहक विदागरीमे हैत तँ केहेन हैत ?

मुदा ओ बच्चा सतमसुआ नहि। समाज झूठो बाजि ओकरा सतमसुआ बच्चाक पालन-पोसनसँ बँचैलक।

रविक दरबज्जा लग अबितहि रामसुनरिक नजरि चिट्ठीपर पहुँचल। रवि दरबज्जे पर बैसि किछु लिखैत छल।
रामसुनरिक लग अवितहि रबि उठि कऽ चौकीपर बैसबैत, पुछलक- ‘‘काकी फेकू भाइक वियाह कहिया करबीही? हमहूँ बरिआती जेवउ?’’

रविक बात सुनितहि रामसुनरिक मन बृन्दाबनक रास लीलापर पहुँच गेलनि। कनिये काल कृष्णक रास-लीला देखि, धुरि कऽ आबि चिट्ठी पढ़वो आ लिखबो ले रबिकेँ कहलक। पत्र पढ़ि कऽ रबि सुना देलकनि।
पत्र लिखै ले तैयार होइत, बाजल- ‘‘की सब लिखब?’’

रामसुनरि लिखवै लागलि-

परमानपुर

ता. 15.8.2008

बौआ फेकू।

हम तोरा कमाइक कोनो आशा केने छी, जे पाइ नै छौ तेँ गाम कोना आयब? ककरो सँ पैंच-खोंइच लऽ कऽ चलि आ। तीनि भुरकुरी धान-गहूम रखने छी, वैह बेचि कऽ दऽ देवइ। आब तोहूँ चेतन भेल-ए। लोक कलंक जोड़त। हमरो आब अइ दुनियामे नीक नै लगै अए। तेँ सोचै छी जे अपन काज जल्दी पूरा ली। अगते अगहनमे चलि अबिहें। ताबे कनियाँ ठेमा कऽ रखबौ। एखैन हमहूँ थेहगर छी, मुदा अइ जिनगीक कोन ठेकान छै। आब ई परिवारो आ दुनियों तोरे सबहक ने हेतउ। टेम पर चलि अविहेँ, जइ से काज बिथुत ने होउ।

माए, रामसुनरि।

मायक पत्र सुनि फेकुआ मने-मन खुब खुशी भेल। मनमे भेलइ जे हमरो काज एहि दुनियाँ, एहि समाजमे छैक। मुदा मनमे खुशी बेसी काल टिकल नहि। लगले माघक कुहेस जेकाँ बुद्धि अन्हरा गेलइ। कोन मुह लऽ कऽ गाम जायब। साल भरिक कमाइ मायक हाथमे की देबइ। ई बात सत्य जे हमरा भरोसे
ओ नहि जीवैत अछि। मुदा हमरा ओकर कोनो दायित्व नहि अछि, सेहो तँ नहि। हे भगवान कोनो गर सुझावह।

पनरहे दिनक पछाति एकटा घटना घटल, जहिमे फेकुओक नोकरी छुटि गेल। ओना नओ गोटेक संग फेकुआ काज करैत। मुदा आठो गोटे पुरना कारीगर
समयानुसार अपना कऽ बदलैत जायत, नव-नव डिजाइनिक कपड़ा सिबैक लूरि सिखैत जायत। फेकुआ अनाड़ी, तेँ शुरुह सँ सिलाइक काज सिखै पड़लै। साल भरिमे कहुना कऽ पुरना दिल्लीक कारीगर बनल। मुदा फैशनमे बिहाड़ि ऐने फेकुआ उड़ि कऽ कातमे खसल। ओना मालिकोक मनमे बेइमानी घोसिआइल
रहै। बेइमानीक कारण छल पाइवलाक चसकल मन। एकटा अट्ठारह बर्खक लड़की कारीगर दू हजारमे भेटि गेलै।

सवा बर्खसँ शहरमे रहैत-रहैत फेकुओक सुतल बुद्धि जगि कऽ करबट बदलै लगलै। जहिसँ आत्मबलोक जन्म भऽ चुकल छलैक। मुदा खिच्चा। सक्कत बनिये रहल
छलैक। जहिना मालिक नोकरी सँ हटैक बात कहलकै तहिना फेकुआ हिसाब मंगलक। हिसाब लऽ फेकुआ डेरा विदा भेल। पाइ रहवे करए। रस्तेमे कॉफी पीबि डेरा आयल। डेरा आबि पंखा खोलि पलंगपर ओंघरा गेल। ओंघराइते मनमे अबै लगलै ई शहर छी,गाम नहि। शहर मे जहि तेजीसँ मशीन, फैशन आ जीवन-शैली
बदलि रहल अछि, ओहिमे हमरा सन-सन मुरुखक कोन बात जे पढ़लो-लिखल लोक ओंघरनिया देत। नवका मशीन पुरना इंजीनियरकेँ धक्का देत। पुरना बुद्धिकेँ
नवका बुद्धि धक्का देत। मुदा नीक-अधलाह के बुझत? सब भोग-विलासक जिनगीक पाछु आन्हर बनि गेल अछि। बाप रे, ई तँ भुमकमक लक्षण बनि रहल अछि। फेरि मनमे एलै, भरिसक हमर माथ, नोकरी छुटने, ते ने चढ़ि गेल
हेँ। ओह, अनका विषयमे अनेरे ओझराइ छी। जेकरा भोगए पड़तै ओकरा सुआस बुझि पड़ै छै, तँ हमरे की। ठनका ठनकै छै ते कियो अपना माथ पर हाथ लऽ
साहोर-साहोर करैत अछि। फेरि मनमे अयलै जे हमहूँ तँ जूड़िशीतलक नढ़ि़ये जेकाँ भेलि छी। एक दिशि चारु भागसँ कुकूर दाँतसँ पकड़ि-पकड़ि तीड़ैत अछि तँ दोसर दिशि शिकारी सब लाठी बरिसवैत अछि। गामक लूरि सीखिलहुँ नहि, सीखि लेलहुँ शहर लूरि। तँ आब लिअ। क्वीन्टलिया बोरा मे भरि-भरि रखने जाउ। फेकुआक मन औना गेल। दुबट्टियेमे हरा गेल। तीनिबट्टिया-चरिबट्टिया तँ बाकिये अछि। माएपर तामस उठलै।
बुदबुदा लागल- ‘‘ई बुढ़िया माए गछा लेलक जे शुरुहे अगहनमे चलि अबिहेँ। कनियाँ ठेमा कऽ रखबौ। बियाह कइये देबउ।’’
एक दिशि केँचुआइल कनियाँक बदलैत रुप तँ दोसर दिशि मायक सिनेह। समुद्रक पानि जेँका फेकुआक मनकेँ अस्थिर कऽ देलक। सोचै लगल जे माय नीक छोड़ि कहियो
अधलाह नहि केलक आ ने कहियो सोचलक, ओकरा पर
आँखि उठाएब अनुचित छी। काल्हिये गाम चलि जायब।
बियाहो कइये लेब। दू टा पति-पत्नी ओहन लोक एकठाम
होएब, जे किछु कऽ सकैत छी। ‘दू पाइ’ कऽ आशा हृदयमे समेटि सौझुका गाड़ी पकड़ि,तेसर दिन गाम पहुँच गेल।

सुरेन्द्रय लाभ(नाटक)
माई गे ! भूख लागल हए
डा.
दुश्य –१
(मंचपर अन्हा र पसरल अछि । नायक युवक केँ बृद्ध माता–पिता निन्ने मे भेर अछि । विघ विचरो मंच पपर हरियर मद्धिम प्रकाश फैल जाइत अछि । दर्शककेँ मात्र नायक युवक आ’ माताक विचमे चलैत सम्वाेद सुनबामे अवैत छैक ।)
युवक– माई गे माई । हमरा बचाले । हमरा बचाले माई ।
माता– वौआ कोन्नी छा ?
युवक– एननी छियौ माई, एन्नीा ।
माता– रे केम्हौर छे बेटा ? की भेलउ ?
युवक– करेज मे गोली मारि देलक ।
माता– हमर करेजके टुकडाके कोन जोइनढाहा गोली मारलक ?
बेटा रे बेटा –कान लगैछ)
युवक– एन्नीे आ’ ना माई । देखही नै कते खून बहै है ।
माता– बेटा हमर आँखि मे त ’ अन्हहरजाली लागल हउ ।
युवक– माई कनी अपना हाथे पानी पिया दे । बड पियास लागल हए ।
माता– अनै छियो बोआ । कतौ जइहा नै ।
युवक– माई! हम त जाइछियो । आइ दुनिया से जाइ छियौ ।
माता– बौआ र ेबौआ ! नै जो रे बौआ ! नै जो, नै जो रे बौआ ।
(मंचपर अन्हाइर नीक जकाँ पसरि जाइत छैक)

दृश्य –२
(अन्हा र मंचपर प्रकाशक एकटा टुकडी सूतल माता – पितापर जाइत छै । माता निन्नरमे बडबडा रहल छै– ‘ नै जो र ेबौआ ! नै जो ।’ पिता हडबडाक, उठैत अछि । मंचपर प्रकाश पसरि जाइत छैक ।)
पिता– (माताके उठवैट) एना कथी बडबडाई है ? की भेलै ?
माता– (नीन्मे ) बौआ बौआ!बौआ! ।
पिता– हे उठौ नै । भोर भेलै आब । सपना देखै है कि ?
माता– (हडबडाक’ उठैत) बौआ कोनो कोरा मे के बच्चाल है जे एना चिन्ता करै है ।
माता–(हडबडक उठैत) बौआ! कत है हमर करेज ?
पिता– केना करै है । बौआ कोनो कारा मे के बच्चाक है जे एना चिन्ताच करै है ।
माता– हमर बेटाके कुच्छो भ’ गेल । हम बड खराप सपना देखलिय ।
पिता– सपना त’ सपने होइ है ।
माता– आई कत्ते दिन देखला भ’ गेल बौआ के । –पतिक पएर पर खसैत) केहन पाथर करेज है । जाउक नै कत्तौ से हमर बेटा के खोजिक’ ले ल अवौक ।
(फककि फफकि क’ कान लगैछ )
पिता– (कान लगैछ ) गे हम कत से आनि दियो। हमरा कोनो बुझल हए जे उ कत्त है ।
माता– (कौत) बौआ रे बौआ ।
पिता– कोन खेबने उ बौआइत होतै से त’ भगबाने जनथिन्हक ।
माता– हे दिनकर दिनानाथ रछा करिहा हमर बेटा के ।
पिता– करेज मजगूत कर गे रमलगरावाली । जो हाथ मूँह धो ग ।
माता– जावत हमर बेटा नै आओतै । हम मूँहमे पानियो नै देबै । कहि दै दियो ।
पिता– जे हमरा करेज मे दरद नै होइहए ?
माता– तोरा की हएतो ?
पिता– जकर जवान बेटा भूखल– पियासल एना गामे गाम भागल फिरतै त’ ओकर बूढ बापके की हाल होइत होतै ?
माता– ई की जान गेलै मतारी के ममता ।
पिता– जवान बेटाके देखक’ बापके हौसला केहन बुलन्दल होइ है से तोँ की जान’गेलही ? लेकिन आइृ ? (कान लगैछ)
माता– तोँ कुच्छोे कह’ । हमरा मोन नै थीर, होइ हए । हमर बेटा के कुच्छोक भ’गेल ।
पिता– चप्पक अलच्छीह । उ ममरद के बेटा है मरद के । कुच्छो नै होतौ ।
(मंच पर अन्हा‍र पसैर जाइछ)
दृश्य –३
(मंचपर अन्हा र पसरल छै । चारिटा आदमी नायक युवककेँ आँखि पर पट्टी एवं हाथमेँ रस्सीो बन्हकने ढाद अछि । सभक हाथमे बन्दुाक छै )
पहिल आदमी– (युुवक सँ) जोभाग, जतेक जोरसँ तोँ भागि सकैत छेँ भाग ।
(मंचपर धीरे धीरे इजोत पसरैत अछि )
दोसर आदमी – धमह । पहिने ई सब हटा दै छियै । बेचाराके भाग मे सुविधा हएतै ।–कहैत आगू बढि दुनू हाथक रस्सीआ एवं आँखिक पट्टी खोलि दैत छैक)
तेसर आदमी – भागने आब ढाढ कीया छेँ ?
युवक– (तेसर आदमीकेँ पएर पकडैत) नै हमरा एना भगाउ नै । हम गोर लगै छी ।
(सब आदमी ढहाका लगबैछ )
चारिम आदमी – रे तोरा हमसब मुक्त क’ रहल छियौ । तखन तोँ भगैत कीयाक ने छेँ ?
युवक– हमरा बुझल अछि अहाँसब हमरा केहन मुक्ति देब । हम नै भागब । हमरा माफ क’ दिय ।
पहिल आदमी– (ढहाका लगवैछ ) अरे एकरा त’ सब पलान बुझल छै सब –पुन ः ढहाका लगवैछ आ’ एक लात ओहि युवककेँ मारैत अछि )
( ततपइचात सब आदमी अट्टहास करैत अपन लात सँ । युवकपर प्रहार करैत अछि आ’ पुन ः मंचपर अन्हाकर पसैर जाइछ )

दृश्य –४
अन्हा रसँ इजोत होइत छैक मंच पर । एकटा फरकीपर आशकेँ चारिगोटे अपन कनहा पर लदने जा’ रहल अछि । पाछू– पाछू तीन चारि गोटे रहल छैक । एकगौटे आगू–आगू कोहा आदि ल ‘क’ चलि रहल अछि । सब चिचीया रहल अछि– ‘राम नाम सत्त है , सबका यही गत है’ । पुन ः तेसर । शव यात्रा मे पाछू– पाछू चलनिहार लोढ नारा लगा रहल अछि– ‘राम नाम सत्त है , सबका यही गत है’ ।
मंच पर अन्हारर पसैर जाइछ ।

दृश्य –५
(मंचपर अन्हा र सँ इजोत होइत छैक । लाल मुखौटाधारी तीन व्य क्ति नायक युवक केँ घेरने ढाढ अछि । युवक डरे थर थर रहल अछि । एकटा मुखौटा धारीक हाथमे कता छै , दोसरके हाथमे लाठी आ’ तेसरके हाथमे पेस्तौथल छैक)
पहिल मुखौटा धारी – (युवककेँ हाथ उपर उठा ओहिपर कता रखैछ ) एहि हाथकेँ छपटि लियौ गद्धार ।
दोसर मुखौटा धारी ः नै छोड , एकर टाडे तोडि दै छी –कहैत लाठी युवकके टाडपर बजारैत अछि )
युवक– इस्सै । –हाथ जोडैत अछि) छोड दीय, छोडि दीय हमरा ।
तेसर मुखौटा धारी– (पेस्तौवल देखवेत) अखन गीडगौडाइत अछि । गोरगीट नहितन ।
युवक – हमरा माफक दीय भाईसब
तेसर मुखौटाधारी – हमसब माफ नै करै छियै , सक्सगन करै छियै , एक्स)न । तोरो माफ नै करबौ ।
युवक– तखन की करब ?
तेसर मुखौटा धारी – पहिने दुनू हाथ पएरपर गोली मारि क’ लोथ बनएवै आ’तखन धीरे धीरे परान लेबौ ।
युवक– (डराइत) नै भाइजी नै
तेसर मुखौटाधारी– (ठहाका लगवैछ) हा……….हा…………..हा………………
युवक– ई सन हमरा नै चिन्हैकत छैथ । मुदा अहाँ त’ नीक जकाँ चिन्हैछत छी ।
पहिल सुखौटाधारी– (अट्टहास करैत) हमरा सभक दुनियाँमे ककरो केयो ने होइत छैक ।
युवक– हमर पराने लेबाक अछि त सीधा हमर करेज पर गोली मारु भाइजी– सीधा! हे लीय –अपन सर्टक बटन खोली करेज देखवैछ )
दोसर मुखौटाधारी– (कडकिक’) नै से नै हएतौ । हमसब विसरी कटा कटा क’ जान ले बौ ।
युवक– (कनैत) प्ली’ज भाइजी! प्ली ज । सीधा करेज पर गालि मारु । प्लीलज –कहेते पेस्तौ लवला मुखौटाधारीक पएर पर खसैत अछि । मंच पर अन्हासर पसैर जाइछ )

दृश्या –६

(मंचपर इजोत होइत छैक । किछु युवक युवती (१०–१२ गोट) अपन अपना माटरी चोटरी परदेश जा’ रहल अछि । किछु वुढवा– वुढिया लाठीक सहारापर ढाढ युवा युवतीकेँ हाथ हिला हिलाक’ विदा क’ रहल अछि । युवा युवती सब सेहो हाथ हिलवैत आगू बढि हिलवैत आगू बढि रहल अछि । बिच–बिचमे कोनो युवा – युवती बुढवा बुदियाकेँ चरण स्पैर्श करैत अशिर्वाद लैत आगू बढि रहल अछि । )
एकटा युवा– (बृद्ध पिताकेँ चरण स्पकर्श करैत) जाइ छियो बाउ ।
(अपन ओखिक नोर पोछैत अछि ।)
बुढवा– हँ जल्दी( से जा ’ बौआ । परदेशमे कमसे कम जान के रछा त होतो । जा’हमरा सूनके चिन्ताप नै करिहा –कान लगैछ०
(युवक आगू बढि जाइछ । बाँकी युवा युवतीसँ मंच खाली भऽ जाइत अछि । मात्र रहि जाइछ किछु जोडी बुढवा बुढिया । ओ लोकनि देखैत रहि जायछ बाट केँ जहिबाटे ओकर बेटा वेटी परदेश गतैक ।
मंचपर अन्हायर पर्सैर जाइछ)
दृश्य – ७
(अन्हा र मंचपर प्रकाश होइछ । पिता आंगनमे वैसि डोरी बना रहल छैक । माता जाँतामे गहूम सिसि रहल अछि एंव संगहि छठि भगवानक गीत गावि रहल अछि–
उगू हे सूरुज नाथ……….
नेपथ्यगसँ युवक कें आवाज अवैछ – माई !माईगे ।)
(गीत चलिए रहल छै )
पिता– कनिका चुप्प भ’जा’ त’ ।
माता– (चुप्प् होइत) कथिला ?
पिता– बौआके आवाज जेका बुझाई है ।
पुनः युवककेँ आवाज अवैछ– माई ! गे माई ।
माता– हँ ई त, हमरे बेटा हए । बौआ ? आबह नै, आबह ।
(युवक प्रवेश करैछ – अस्तौ व्य स्तन अवस्थाआ छै । माता–पिता पकडिकऽ कान’लगैछ– वौआ रे वौआ )
पिता– (आँखि पोछैत) एहन हालतमे कथिला घरे अएला बौआ ?
माता–।

अनमोल झा (१९७०- )-गाम नरुआर, जिला मधुबनी। एक दर्जनसँ बेशी कथा, साठिसँ बेशी लघुकथा, तीन दर्जनसँ बेशी कविता, किछु गीत, बाल गीत आ रिपोर्ताज आदि विभिन्न पत्रिका, स्मारिका आ विभिन्न संग्रह यथा- “कथा-दिशा”-महाविशेषांक, “श्वेतपत्र”, आ “एक्कैसम शताब्दीक घोषणापत्र” (दुनू संग्रह कथागोष्ठीमे पठित कथाक संग्रह), “प्रभात”-अंक २ (विराटनगरसँ प्रकाशित कथा विशेषांक) आदिमे संग्रहित।
चारि टा लघुकथा
चेतना

-पपा, अहाँ आ मम्मीक भोटर काड अछि।
-नै बेटा, नै अछि।
-तखन भोट कोना खसेबै? आब बिना ओकरे भोट नै खसब देतै।
-तऽ भोट नै खसेबै।
-टी.भी.मे अहाँ नै देखै छीयै पपा, जे कहैत छैक- यदि अहाँ भोटक दिन भोट नै खसबै छी तऽ अहाँ सूतल छी, पपा…!!

भारतीय डाक

ओकर एल.आइ.सी. कऽ पॉलिसी मैच्योर्ड भऽ गेल छलै! सामान्य आ साधारण लोक कऽ पचास हजार टाका एक संग भेटब आ ओहि सऽ पहिनेहे ओकर खल-खल कके खर्च करैक ब्यबस्था भऽ गेल रहै छैक, तकरा दऽ जल्दी सऽ जल्दी सधबैक चिन्ता छलै ओकरा।

आइ एकटा स्पीड पोस्ट सऽ पत्र एलै हे। जाहिमे सत्तरह तारीक कऽ पठाबैक स्टाम्प लागल छैक, पूरे आठ दिन पर चेक भेटलै हे। कलकत्ता सऽ लोकल डिलेवरी, स्पीड पोस्ट। भारतीय डाक पर ओकरा एखनो गर्व छैक जे देरिये सही, चेक तऽ भेटि गेल….!

युद्ध

सासु पुतौहुकऽ देखितहि कहलकै- जे हमरा बेटाकऽ नून खुआ हरि लेलक, तकरा नीक नै करथिन बाबा बैद्यनाथ !

पुतौहु कनडेरिये तकैत कहलकै- जे हमरा सँए कऽ अँखियबैयऽ तकरा बज्र खसा देथिन बिदेसर बाबा, बज्र खसा देथिन…!

टेकनोलजी

-पाइ कथी सऽ पठेलियैन बाबू कऽ।
-कथि सऽ पठेबैन। आब पहिलुका जमाना नै रहलै जे बीमा करू, ड्राफ बनाउ, रजिस्ट्री करू वा ककरो हथौतीये पठाउ। आब तऽ नवका-नवका टेकनोलजी एलैहे। कोर बैंकिंग मे एतय बाबूकऽ एकाउन्टमे जमा कऽ देलियै, ओतय संगे-संग हुनका खातामे पाइ जमा भऽ गेलैन।
-यैह! यैह ने मूर्खपना भेल। पाइ आब जहिया पठेबै गाम अहाँ, से मनीआडरे द्वारा!
-किए, से किए, ओहिमे तऽ बड़ समय लगै छै पहुँचैमे, आ कमीसनो पाँच रुपये सैकड़।
-से जे लागै। जखन डाक बाबू पाइ देमय जेतनि बाबूक, आ एक-दू गोटाक गबाही राखि पाइ देतनि तऽ गामक लोक तऽ बुझतै जे बेटा-पुतौह्पाइ पठेलकैहे। बुढ़बा के छोड़ि नै देने छै ओहिना…हँ…!!

कुसुम ठाकुर
प्रत्यावर्तन
17

डॉक्टर प्रसाद जाँच कयलाक बाद कहलाह एहि बेर तs WBC केर काज नहीं छैक मुदा दोसर बेर परि सकैत छैक। एक बरखक दवाई आ डॉक्टर बी. एन. झा केर नाम सsसबटा रिपोर्ट बना कs देलाह आ फेर एक साल बाद आबय लेल कहलाह । वेल्लोर आबय समय एकर एको रत्ती भान नहि छल जे एतेक गंभीर बीमारी भs सकैत छैन्ह। जाहि दिन डॉक्टर कुरियन बीमारी के विषय मेबतेलाह ताहि केर बाद सs हमर जेना माथ सुन्न भs गेल छल । ई बुझय मेनहि आबय जे हम की करी। नहि हम बिमारी के विषय मेहिनका सs गप्प कs सकैत छलहुँ आ नहि हमरा मेअतेक हिम्मत छल जे हम किनको आओर सs बिमारी के विषय मेगप्प करितहुं। बच्चा सब तs बहुत छोट छलथि ।

जमशेदपुर पहुँचलहुँ तs लोकक एनाई गेनाइ शुरू भs गेलैक मुदा हमरा एको रत्ती नीक नहि लागय, की कहिये लोक सब सs से नहि बुझय मेआबय आ नय हम ओहि समय हुनका लग रहि जे किछु कहब या कि सुनब । लल्लन जी अपनहि जे कहबाक के रहैन्ह कहथि । ओहो कि कहितथि, कहि दैत छलाह जे सब ठीक भs जेतैक दबाई देने छथि डॉक्टर । भीतर मेहमरा की होइत छल ई तs हम वर्णन नहि कs सकैत छी मुदा ऊपर सs अवश्य देखेबाक कोशिस करियैक जे सब ठीक छैक । बाबुजी के सेहो पूरा गप्प नहि बुझल छलैन्ह ।

माँ बाबुजी चलि गेलाह आ फेर हम ई आ दुनु बच्चा रहि गेलहुँ । एक एक कsपरिवारक सब कियो हिनका देखय लेल अयलाह, ओहि मेमात्र बिनोदजी (हमर बहिनक पति ) जे की स्वयं डॉक्टर छथि, केर छोरि आओर किनको बीमारी के विषय मेनहि बुझल भेलैंह। वेल्लोर सs आबि ई तुरन्त ऑफिस जाय लगलाह संगहि दवाई सेहो चलय छलैन्ह ।

बीमारी केर ओहि समय केर वर्णन केनाइ हमरा लेल बड कठिन अछि । हमरो बुझल आ हिनको बुझल छलैन्ह जे बीमारी खतरनाक छैक आ डॉक्टर केर हिसाबे १५ साल सँ बेसी आदमी एहि बिमारी मेनहि जीवय छैक तथापि हम दुनु गोटे एहि सन्दर्भ मेबात केनाई तs दूर कहियो ई नहि बूझय देव चाहिए जे हम एहि सs चिंतित छी । सच पूछू तs हमर तs मोन कहियो नहि मानय जे हिनका एहेन बिमारी छैन्ह । सब दिन मोन मेहोय जे एतेक नीक लोग आ शंकर जी केर भक्त के ऐना कहियो नहि भs सकैत छैक,ठीक भs जेतैन्ह । हम अपना भरि तs सदिखन हुनकर ध्यान राखियैन्ह आ कोशिस राखी जे कोनो बात सs ई नहि बुझय मेआबैन्ह कि हम हिनकर बिमारी सs चिंतित छी। नहि जानि कियैक मुदा हमरा सब दिन हिनकर काज करय मेनीक लागैत छल आ हम हिनकर सब काज अपनहि करैत छलियैक । बीमार भेला पर तs स्वाभाविक छलैक काज बेसी होइत छलैक मुदा ओ हम अपनहि करैत छलियैक।

एहि बीच मेबिनोद जी के पता चललैन्ह जे बनारस कोनो होमियोपेथिक डॉक्टर छैक जे एहि तरहक रोगक इलाज करैत छैक तs ओ ओहि ठाम जा ओकरा ओतहि सs दवाई लs आनलथिन्ह, जे हर तीन घंटा पर देबय के छलैक । घर पर देलाक बाद हम ऑफिस जयबाक समय संग दs दियैन्ह। राति मेसे छोरबाक नहि छलैक , हम घडी मेअलार्म लगा ली आ हर तीन घंटा पर उठि उठि कs दबाई दियैन्ह। मोन मेहोइत छल भगवान कहुना हिनका निक कs देथुन। हमारा भगवान पर पूर्ण विश्वास छल जे ओ नीक कs देथिन्ह। हमरा घर मेखास कs हमर माँ भोला बाबा के भक्त छथि ओ सदिखन कहैत भोला बाबा के मोन स ध्यान कयला सs ओ अवश्य सुनय छथि। हमरा होय जँ हम मोन सs भोला बाबा के ध्यान करबैन्ह तs अवश्य ओ हमर सुनताह कियैक नहि सुनताह। दबाई तs सब दिन हम जागि जागि क देलियैन्ह आ पूरा से भेलैक मुदा किछुए दिन बाद पता चललैक जे ओ डॉक्टर धोखेबाज छलैक आ लोक के दबाई मेस्टेरोइड मिला कs दैत छलैक । खैर ई सिलसिला त चलैत रहलैक। जहाँ कियो कहथि व पता चलैक जे ओ डॉक्टर या वैद नीक छथि या ओ किनको ठीक कयलथि या हुनका ओहि ठाम गेला सs फायदा भेलैन्ह हम ओहि ठाम जयबाक लेल हिनका मना लियैन्ह आ देखा दियैन्ह मुदा डॉक्टर प्रसाद केर दबाई कहियो बन्द नहि केलियैन्ह।

वेल्लोर सs अयालक किछु मास बाद बिनोद जी आ सोनी( हमर दोसर बहिनक पति आ बहिन) केर भयानक दुर्घटना भ गेलैन्ह ई सुनतहि हम दुनु गोटे धनबाद पहुचलहुँ । भगवानक इच्छा छलैन्ह जे ओ सब बाचि गेलथि । धनबाद आ पटना मेइलाज करेलाक बाद हुनका सेहो इलाजक लेल वेल्लोर जेबाक छलैन्ह। हम आ लल्लन जी दोसर बेर वेल्लोर असगर गेलहुँ । बिनोद जी किछु दिन केर बाद पहुँचलाह आ हुनका सँग हुनक भाय आ एकटा संगी छलथिन्ह । एहि बेर फेर किछु दिनक लेल लल्लन जी के अस्पताल मेभर्ती होमय परलैन्ह आ सबटा जाँचक बाद डॉक्टर प्रसाद हिनका दबाई देलथिन्ह आ chemotherapy शुरू करबाक लेल कहि अस्पताल सs छोरि देलथिन्ह मुदा ओ एहि बेरक रिपोर्ट सs खुश नहि छलाह , जतबा सुधार के हुनका आश छ्लैन्ह ततबा नहि भेल छलैन्ह ।

वेल्लोर मेडॉक्टर के जे कहबाक रहैत छैक से ओ सबटा मरीज आ घरक लोक वा जे कियो सँग मेरहैत छैक हुनके सोझा मेकहि दैत छथि । लल्लन जी के बिमारी केर विषय मेसेहो हमरा आ लल्लन जी केर सोझा मेओ सब किछु कहैत छलाह । लल्लन जी तs किछु किछु डॉक्टर सs पुछि लैत छलाह मुदा हमरा हिम्मत नहि होय जे हम किछु पुछितियैन्ह । हमरा सब दिन मोन मेआशंका बनल रहैत छल जे हमरा पूरा तरह हुनक बिमारी के विषय मेनहि बुझल अछि। एक दिन हम विचारलहुँ जे असगर डॉक्टर प्रसाद लग जाय कs हुनका सs हम पुछबैन्ह हमरा लल्लन जी के सोझा मेपुछय केर हिम्मत नहि छल । अस्पताल सs जहिया छुट्टी भेटल छलैक ओहि दिन हम लल्लन जी के कहलियैन्ह अहाँ किछु समय बिनोद जी लग हुनके केबिन मेबैसु हुनको नीक लागतैंह आ हम किछु बजार सs लेने आबैत छी ताहि केर बाद होटल चलब । हम ई कहि हुनका सँग बिनोद जी केर केबिन गेलहुँ आ किछु समय बाद लल्लन जी के छोरि ओहि ठाम सs निकलि सीधा डॉक्टर प्रसाद लग चलि गेलहुँ। हुनका स जे जानकारी भेटल ओ सुनि हमर तs माथ घुमि गेल मुदा हम अपन हिम्मत नहि छोरलहुँ आ ओहि ठाम सs सीधे निकलि बिनोदजी केर केबिन दिस जेबाक लेल जहिना निकललहुँ सामने लल्लन जी के आबैत देखि हम चुप चाप दोसर दिस मुडि गेलहुँ । हम हुनका डॉक्टर प्रसाद केर कक्ष मेजाइत साफ़ देखलियैन्ह मुदा ओ हमरा नहि देखि पयलाह । एहि तरह केर हम सिनेमा मेदेखने छलियैक मुदा असल जीवन मेहमरा सँग होयत, ई कहियो सोचनहु नहि छलियैक । हम सीधा बिनोदजी केर केबिन के लेल चलि देलहुँ मुदा रास्ता भरि डॉक्टर प्रसादक बात दिमाग मेघुमैत छल जे आब अहाँ दोसर बेर WBC आ bone marrow transplantation केर सोचि कs आयब, दोसर ई जे बाद मेहड्डी ततेक कमजोर भs जयतैन्ह जे बहुत ध्यान देबय पड़त नहि तs हड्डी टूटय के डर रहतैंह तेसर ई जे हुनक चालिस प्रतिशत cells malignant छलैन्ह जे डॉक्टर केर कहनानुसार ठीक नहि छलैक।

हम इ त बुझिए गेल छलहुँ जे लल्लन जी सेहो हमरा परोछ मेकिछु डॉक्टर प्रसाद सँ पुछय चाहैत छलाह आ ओहि लेल हुनका लग गेल छलाह । इ सोचि हमरा आओर भीतर सँ तकलीफ होइत छल जे हुनका सब बात बुझल रहतैंह तs हुनका मोनमेसदिखन तरह तरह केर भावना आबैत रहतैंह। हमरा वेल्लोर अस्पताल केर आ डॉक्टर केर इ एको रत्ती नीक नहि लागल। कम स कम रोगी के नहि बतेबाक चाहि। हम सदिखन अपन किस्मत पर गौरवान्वित होइत छलहुँ आ आजु होइत छल हे भगवान हमर इ भ्रम के नहि तोरु ।

बिनोद जी केर केबिन मेपहुँचि हम बैसि गेलहुँ, एक बेर नहि पुछालियेंह हिनका विषय मे। बिनोद जी अपनहि कहलाह , “ठाकुर जी नहि भेटलाह ओ तs अहिं के ताके लेल गेलाह अछि । हम बस एतबहि कहलियैन्ह आबि जयताह । हम अपन मोन मेआबय वाला एक एक टा उद्वेग के कोना कहितियैन्ह।

कुमार मनोज कश्यप
जन्म मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। बाल्य काले सँ लेखन मे आभरुचि। कैक गोट रचना आकाशवानी सँ प्रसारित आ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित। सम्प्रति केंद्रीय सचिवालय मे अनुभाग आधकारी पद पर पदस्थापित।

नोर अंगोर

‘जननी जन्म-भूमिश्र्च स्वर्गादपि गरियसि’ — मायक ई आदर्श वचन छनि आ एकरा ओ अक्षरशः पालन करैत छथि । सभ बुझा कऽ थाकि गेल, मुदा ओ गाम छोड़ि अन्यत्र रहब स्वीकार नहिये केलनि । अंगदक पैर जकाँ जमल रहि गेलि ओ गाम मे । एक्के ठाम कहलनि, ” जाहि घर मे डोली पर एलहुँ, ओहि घर सँ अर्थीये पर जायब ।” की करितहुँ हम? अंत मे भारती कें भरोसे ओकरा गाम मे छोड़ि शहर आपस आबि गेलहुँ । भारती बड़ सेवा-सुश्रूषा करैत छैक मायक—अपन जकाँ। माय सेहो बड़ खुश छलि भारती सँ। हमहुँ निश्र्िचंत भऽ गेल छलहुँ।

आई जखन सँ माय फोन सँ बतेलनि जे— ‘भारती के वियाह ठीक भऽ गेलैक आछ—आगले फागुन मे वियाह छैक—-किछु मदति तऽ करहि पड़त—-आहं पर ओकर माय आश धेने आछ’ — तखन सँ हमर बेचैनी बढि गेल आछ । बात मदति के नहि छैक—ओ तऽ हम कऽ देबैक। मुदा वियाह के बाद भारती अपन सासुर चलि जायत तखन गाम मे माय के सेवा-सुश्रूषा के करतनि? गामो मे लोक कहाँ भेटैत छैक? बृद्धावस्था के कारण माय एसकरे गाम मे कोना रहतीह? कनियाँ के गाम मे छोड़ि दी तऽ बच्चा सभक भविष्य की हेतैक?—–प््राश्र्नक मक़डजाल मे हम ओझरायले चलि जा रहल छी । खीझ उठि रहल आछ मायक पुरान-पंथी पर—-कहु तऽ आजुक रौकेट-युग मे एहन विचार पालने रहब कतेक युत्तिᆬसंगत आछ ? मुदा के बुझाबय हुनका ।

राति भरि कछ-मछ करैत रहि गेलहुँ। कनियाँ निश्र्िचंत सुतल छथि आ दुनु बच्चो। पहरेदारक सीटीक आबाज आ हमर मोनक बेचैनी— आपस मे तादातम्य स्थापित करबाक अनवरत प््रायास कऽ रहल आछ। धिरे सँ उठि कऽ घट-घटा कऽ पानिक गिलास खाली कऽ कऽ घर सँ बाहर निकलि टहलऽ लगैत छि हम । एकाएक विचार दिमाग मे चमकल— राईटींग –पैड पर कलम दौड़ऽ लागल। चिट्ठी लिफाफ मे बंद कऽ कऽ बेडरुम मे एलहुँ। कनियाँ काँचे निन्न मे करोट पेᆬरैत पुछलनि, ”निन्न नहि भेल की ?” बिनु उत्तरक प््रातिक्षा केनहिं ओ पेᆬर गहींर निन्न मे सुति गेलीह।

लेटर-बॉक्स मे चिट्ठी खसा कऽ हम ओहने आनंदक अनुभव केलहुँ जेहन कदाचित सफल ऑपरेशन के बाद रोगी करैत आछ।

किछु दिनक बाद गाम गेल रहि। भारती के माय हमर पैर पर खसि छाती पीट-पीट कऽ कानऽ लागल, ”आब हमर दुनू माय-बेटी के की हेतै मालीक ? कतेक मोश्किल सँ छौंरिक वियाह ठीक केने छलियैक; सेहो मुदैया सब मोड़ि देलकैक रे बाप! समाज सँ लड़ि कऽ छौंरि के आहाँ ओहिठाम काज करऽ देलियै, तकर बदला दुश्मनमा सभ निकालि लेलकै रौ बाप ।” भोकारि पाड़ि कनैत रहलै ओ; मोन भरि गरियबैत रहलै। बड़ मुश्किल सँ ओ चुप भऽ सकल छल ।

खेबा काल माय ओकर स्वर मे स्वर मिलबैत कहऽ लगलीह, ”कहु तऽ मसोम्माती भऽ कऽ कोना कोना कऽ बेटीक वियाह ठीक केने छलै बेचारी —सेहो लोक के आँखि मे गड़ऽ लगलै। अपन कोंढ धुनि कऽ बेचारी गुजर करैत छैक—-एहि मे कोन लाज? बेटी समाजक होईत छैक—–धुर्‌ जो एहि गामक लोक के। हे भगवता ! कथा मोड़निहार के कहियो नीक नहि करबै। भारती मायक नोर अंगोर भऽ कऽ पड़तै एहन दुश्मन पऱ़़ ।”

हमर हाथक कौर हाथे मे आ मुँह खुजले रहि गेल छल ।

डॉ. रमानन्द झा रमण- 67म सगर राति दीप जरय

67म सगर राति दीप जरयक आयोजन मानाराय टोल, नरहन, समस्तीपुरमे 05 सितम्बर,2009 केँ डा.रमानन्द झा ‘रमण’क अध्यक्षतामे भेल। डा.विपिन विहारी ठाकुर दीप बारि उदघाटन कएल। संयोजक छलाह रमाकानत राय ‘रमा’। 19 टा कथाक पाठ आ’ ओहिपर चर्चा भेल। ओहि अवसर पर डा.विभूति आनन्दक भाषा टीकाक लोकार्पण डा.रमानन्द झा ‘रमण’, गुवाहाटीसँ आएल ललित कुमार झाक कविताक छाँहमे कलोकार्पण डा.रमानन्द झा ‘रमण’ एवं कल्पनाक सागर मे क लोकार्पण रमाकान्त राय‘रमा’ द्वारा भेल। 68म सगर राति अरविन्द ठाकुरक संयोजकत्वमे दिसम्बर,2009 क पहिल सप्ताहमे सुपौलमे होएत।

मनोज मुक्ति – रिपोर्ताज
सभ्‍ ग।ेटे कहै छयि जिवन अमूल्य छियै, बहुत तपस्याक बाद मनुष्यक जिवन भेटैत छैक। आ इहो कहवी छइ जे जीवन एकटा संधर्ष छियै, संधर्षक बाद मनुष्यके सफलता अवश्य भेटैत छइ हमरा लेल मा़त्र कहवीए मे सिमीत रहिगेल इ सब।
हमर नाम रोशन पंजियार अछि,हमर घर सुनसरी जिल्ला मे पडैत अछि। हमर परिवार एकटा किसान परिवार अछि। हमरा घर मे दाइ, बाबा,माय बाबु आ हमरा लग हमर एकटा बहीन आ दूटा भाय अछि। हम अपना परिवारक सबस जेठ संतान छी। एकटा मघ्यम वर्गीय परिवार होइतो जेठ संतानक नाता स होइ वा जेइ कारणे होइ सबहक सिनेह भरपुर हमरा भेटल। दाइ, बाबा, के विशेष इच्छा भेलाक बादो हम मैट्रिक स आगा नइ पढ सकलौ। कारण इ जे पढ मे ठिक ठाक होइतो एकही बेर मे हम एस. एल. सी. पास नइ कर सकलहुॅं, जबकी हमरा स कमजोर बहुतो वि़द्यार्थी पास भ गेल। कहुनाक दोसर बेर हम परीक्षा देलौ आ पास भेली। मैट्रिक पास क क हम काठमाण्डू गेलौ, कोनो काज करबाक लेल। काठमाण्डू जाक सबस पहिने अपना क्षे़त्रक नेता लग गेलहुॅ, जकरा हमर बाबु सब चुनाव मे बड सहयोग कैने रहथिन्ह। हूनका जाक कहलियैन जे हमरा कतहुॅ काज लगा दिय। ओ कहलैथ देखैत छियै। हम प्रत्येक दिन ओइ नेताजी ओत जाइत छलौ। ओना हमरा लगायत आरो बहुतो बेरोजगार सब नेताजी ओत पहुॅचैत छल। हमरा सबके क्षेत्र मे चारि भाग मे 3 तीन भाग, लगभग 80 प्रतिशत मधेशीक जनसं़ख्या छइ आ 20 प्रतिशत गैर मधेशीक। ताहिस नेता जी ओत मधेशी आ गैर मधेशी दुनु तरहक बेरोजगार रोज हाजरी लगवैत छल। लागातार डेढ, दू मास हम ओत गेलहुॅ, मुदा हमरा नोकरीक कोनो जोगाड नइ भ सकल। जबकी हमरा सामने मे 25/30 टा नेताजीक अपन जाति़़़़़़़़़़ भाइ या कही गैर मधेशी सबहक नोकरी भेट गेल छल। तखन हमरा सोच
आयल जे हम सब बेकारे दोसर के जितवै छी अपना क्ष़ेत्र सॅ। आब हारल थाकल हम एकटा गार्मेन्ट मे काज कर लगनहुॅ। ओत हमरा हेल्फर के काज भेटल कहियो अपना घर मे एकटा मोटा नइ उठौने छलौ हम मुदा एत दिन राति हमरा समाने लाद पडैत छल। कहुनाक 4/5 मास गुजारा कंएलहुॅ। आब हम अपने काज करबाक बात सोचलहुॅ आ एकटा पुरान साइकल किनिक ओइ मे पाछा बडका केलियर लगबाक छिटटी बन्हलहु आ तरकारी बेच लगलहुॅ। आब हम भोरे पाॅच बजे उठित छलहुॅ आ साइकल ल तरकारीक बडका बजार कालिमाटी चलि जाइत छलहुॅ आ ओत तरकारी किन क अपन डेरा चल अवैत छलहुॅ। कनी जलखइ क क तरकारी निकजका साइकल पर ध क काठमाण्डूक गलिए गली मे निकलि जाइत छलौ बेचबाक लेल। 10 बजे धरि घुमित छलहुॅ आ आबिक खाना बनाक खाक आराम करैत छलौ आ फेर 2 बजे साइकल ल क निकलि जााइत छलौ। ओना कहियो हमरा बेसी राति धरि नइ घुम पडैत छल, किया त हम दोसर स कनि कमे नाफा ल क बेच देयै रही तरहे हमर दिन बितैत छल। हम जहिया गार्मेन्ट मे काज करैत छलहुॅ त दिन राति मेहनत क क चारि साढे चारि हजार पाइ कमाइत छलौ बा उपर स ठिकदार के गारि बात मुदा तरकारी बेचे मे 6/8 हजार हम कमा लैत छलहु। अही बीच मे काठमाण्डू मे रहिरहल हमरा गाम के एकटा लडका हमरा घर मे जाक कहलकै जे रोशन साइकल पर तरकारी बेचै या। तुरन्ते हमरा गाम स चिठठी आयल घर अएबाक लेल। हम घर गेलहुॅ त हमरा दाइ, बाबा, माय बाबुजी सब गोटे कहलथि जे इ कोन काज शुरु क देले त मान, इज्जति के कोनो ठेकान नइ छौ, तोरा अही लेल तोरा मैट्रिक धरि पढलियउ। भ गेलै काठमाण्डु जाय के कोनो काज नइ छै, आब गामे मे रह। हम हूनका सबहक बोली सुनिक अबाके रहि गेलहुॅ। फेर हूनका सब के कहलियैन, देखियौ काज कोनो छोट आ नम्हर नइ होइत छैक, हम जना एस. एल. सी. पास कैने छियै त हमरा केओ हाकिम थोरही बना देतै आ दोसर मे मधेशी संगे केहन भेदभाव छइ से बुझले अछि। दोसर के नोकरी स त बहुत नीक छइ अपन काज। आहाॅ सब निश्चिन्त रहुॅ अइमे इज्जति ककरो नइ जायत रहिगेल समाज के बात त समाज आइ धरि ककरो नीक नइ कहलकैया। आहाॅ बड नीक जका रहैत छी त इश्र्या करत आ स्थिति कनि खराब भ गेल त समाज हॅसत। ताही स समाज के चिन्ते नइ करु। अहिना कहुना कहुना, समझा बुझाक घरक लोक के हम फेर काठमाण्डु
गेलहुॅ। आ पुनः तरकारिए बेचबाक काज मे लागि गेलहुॅ। हमरा मोन भेल जे मेने रोडजखने मालूम भेलइ ओकरा सबके जे हम विदेश जाय चाहैत छी बस पासपोर्ट बनाब स लक विदेश जाय धरि काज के जिम्मा ल लेलक, किया त सब काज फटफट भ जाइत छै जै 8/10 दिन मे पासपोर्ट बनिक आब मेडिकल जॉचला काठमाण्डू गेलहु मेडिकल भेलाक बाद मलेशिया क लेल पासपोर्ट मैनपावर मे बना देल गेल हमर हम फेर गाम चलि अयलहु 2 मास के बाद मे 1 लाख टका ल क अगिला 5 दिन मे काठमाण्डूद चलिआउ आहा क फलाइट उठम दिन मे कहल गेल हमरा लग 30 हजार छला आ 60 हजार कर्ज लक काठमाण्डू अएलहु हमरा उडबला हमरा संगे हमर बाबुओ औलथि पाइ पुरा बुझा देलियैक आ हमर वीजा द देलक वास्तलव मे उठम दिन मे हमर फलाइट भ गेल हम 2 वर्षक लेल एकटा कम्प नी मे सुपर भाइजरक लेल जाइत छलौ मलेशिया पहुचलहु त कम्पमनीक एकटा आदमी हमरा सबके लेब एयर पोर्ट पर आयल छल हम सब गोटे संगे कम्प नी मे गेलहु काल्हिस काज पर आब पडत कहिक कनि दूर पर रहल एकटा गोदाम सनक घर मे ल गेल हमरा सबके ओकहल गेल जे एतही रह पडत काल्हि भिने कम्पपनी मे गेलहु हमर बारी आओल त बजाक ल गेल एकटा गोदाम मे आ सामान एत स उठाक ओत धर परत से काज हमरा देखाओल गेल हमरा बड खिस उठल एजेन्ट पर, कहने छल सुपर भाइजरक काज आ एत लेबर के काज कर परैया हम नेपाल फोन केलहु…

अमरेन्द्र यादव
रिपोर्ट
जनकपुरस्थि.त एमाले पार्टी कार्यालय लग बम भेटल अछि । बम राखबाक जिम्मेवारी अखिल तराई मुक्ति मोर्चा लेने अछि । धनुपा पुलिसक अनुसार बमकेँ निष्कृ्य करय सेनाक डिस्पो्जल टोली घटनास्थँलमे पहुँचल अछि । …………………….
मन्त्रीँ परिषदक बैसार-प्रधानमन्त्री क कार्यालय सिंहदरवारमे बैसयबला बैसारमे उपराष्ट्रोपती परमानन्द‍ झाक सपत प्रकरण आ सेवा सुविधा कटौती प्रति सत्तारुढ मधेशवादी दलसभक असन्तुषष्टियक विषयमे परामर्श हएत । तहिना, बैसारमे बजार हस्तपक्षेप कऽ दैनिक उपभोग्यत चीजसभ सुपत मुल्युमे उपलब्ध करेबाक अर्थ मन्त्रामलयक प्रस्ताव सहित अन्य विषयमे सेहो विमर्श हएत। कृषि तथा सहकारी मन्त्रीत मृगेन्द्रर सिंह यादव जानकारी देलन्हिय । ……………….
पुर्व–पश्चिेम राजमार्ग अन्तर्गत सर्लाहीक लालबन्दी्मे एम्वु्लेन्स दुर्घटना भेलासँ एक गोटेक मृत्य आ ५ गोटे घाइल भेल अछि । पुर्वसँ पश्चिममदिस आबि रहल १ च २५२५ नम्बरेक एम्वुरलेन्स दुर्घटना भेलासँ महोत्तरी लक्ष्मी्निया ५ निवासी बिमारी ५२ वर्षिय कृपा महतोक मृत्यु भेल अछि । दुर्घटनामे घाइल ५गोटेक इलाज प्राथमिक स्वादथ्य केन्द्र लालबन्दीममे भऽ रहल- सर्लाही पुलिस जनौलक अछि । एहिबीच,अरनिको राजमार्ग अन्तमर्गत सुकुटे लग सुनकोसी नदीमे बस खसिकऽ भेल दुर्घटनामे हेरा रहल सभक खोजीकार्य आई सेहो तिव्र अछि । पुलिसक अनुसार काल्हिक राति आओर २ गोटेक लास भेटल अछि । ई सहित दुर्घटनामे मरनिहारक संख्यार २२ पहुँचल अछि । नेपाली सेना, सशस्त्रु पुलिस, नेपाल पुलिस तथा स्थानियवासीसभ भोरेसँ हेरारहल सभक रबर बोटक माध्यामसँ खोजी कऽ रहल डिएसपी प्रमोद कुमार खरेल जानकारी देलन्हि । दुर्घटनामे १३ सँ बेसी यात्री हेरारहल पुलिसक अनुमान अछि ।
……
धनुषाक खजुरीवासीक आन्दो्लनक कारण अवरुद्ध रहल नेपालक एक मात्र रेल सेवा जनकपुर रेल्वे आईसँ सुचारु भेल अछि । रेल दुर्घटनामे दोषी रहल कर्मचारीपर कारवाही आ लिक मर्मत करबाक सहमती भेलाक बाद खजुरीवासीसभ आन्दोेलन फिर्ता लेलक अछि । पटरी बिगरलाक कारण बेर बेर रेल दुर्घटना भऽ रहल कहैत स्थाकनीयवासी, वुधदिनसँ अनिश्चि्तकालीन रेल सेबा बन्द करौने छल । ……………..
तराईक महिलासभद्धारा मनाओल ३ दिना जितिया पाबनिक दोसर दिन आई पबनैतिनसभ निराहार उपवास कऽ रहल अछि । आई भोर सुर्य उगबासँ पहिने दहीचुडाक ओठघन खेलाक बाद ब्रती महिलासभ, उपवास शुरु केलक अछि । काल्हि नुहाधोकऽ नीकनुकुत खेलाक बाद ओसभ, व्रतक सुरुवात केने छल । काल्हिर दुपहर पवित्र जलासयमे नहाकऽ जितमहान भगवानक पुजा केलाक बाद पाबनि समाप्त हएत । तराईक थारु, राजवंशी सहित मैथिली आ भोजपुरीभाषी महिलासभ, सन्ताऽनक दीर्घ जीवन एवं सफलताक कामना करैत जितियापाबनि मनबैत अछि । …………………………..
नागरिक सर्वोच्चजताक मांग करैत आन्दो लनरत एकिकृत माओवादी, आई राजधानीक खुलामञ्जन जनसभा कऽ रहल अछि । संयुक्त राष्ट्रि य जनआन्दोालन, नेवाः राज्य समितिक आयोजनामे होबयबला जनसभाकेँ अध्यक्ष पष्पकमल दहाल प्रचण्ड सहित शिर्ष नेतासभद्धारा सम्वोधन करबाक कार्यक्रम अछि । सभा शुरु होयबासँ पहिने राजधानीक विभिन्न स्थानसँ र्याणली सेहो निकालल जाएत माओवादी जनौलक अछि । नागरिक सर्वोच्चताक मांग करैत देशव्यािपी जनसभा करैत आएल माओवादी, आइए जुम्लाीमे सेहो सभा आयोजना कऽ रहल अछि । ……………………………
५ दिनसँ रत्नसपार्क शान्ति बाटिकामे आमरन अनसनमे बैसल ३गोटे आंशिक प्राध्यायपकसभक स्वास्थ्य अत्यन्त नाजुक भेल अछि । दु सुत्रिय मांग रखैत सोमदिनसँ अनसनमे बैसल आंशिक प्राध्यापक प्रेम कुमार विश्वाकर्मा, लिलाराज बराल आ अमृतेन्द्र कर्णक स्वास्थ्य नाजुक बनैत गेल स्वास्थ्य परिक्षणमे संलग्न वीर अस्पतालक चिकित्स्कसभ बतौलक अछि । देशभरिक आंशिक प्राध्या‍पकसभकेँ करार सेवामे नियुक्त करबाक आ आगामी दिनमे आंशिक प्राध्यापक नियुक्ति करैतकाल सेवा सुविधा आ शर्त स्पष्ट होयबला ऐन निर्माण बनेबाक मांग करैत प्राध्या्पकसभ, आमरण अनसन शुरु जारी रखने अछि । एहिबीच, आन्दोतलनरत आंशिक प्राध्या‍पकसभ, अपन मांग प्रति ध्याकनाकर्षण करेबाक लेल आई प्रधानमन्त्री निवासमे धर्ना देत । प्रधानमन्त्री निवास वालुवाटारमे भोर ११ वजेसँ १ घण्टा आ १ बजेसँ २ वजे धरि शिक्षा मन्त्रालयमे धर्ना देबाक कार्यक्रम अछि । …………………..
नेपाली सेनाक पृतनापतिसभक सम्मेोलन – छत्रमान सिंह गुरुङ्ग प्रधान सेनापतीमे नियुक्त भेलाक बाद होबय लागल पहिल सम्मेीलनमे ६ गोटे पृतनापति तथा उच्च सैनिक अधिकारीसभक सहभागिता रहत सेनाक प्रवक्ता रमिन्द्र क्षेत्री जानकारी देलन्हि । सम्मेलनमे नवनियुक्त सेनापती गुरुङ्ग सम्वो्धन करताह आ पृतनापतीसभद्वारा काम कारवाहीक विषयमे जानकारी करेबाक कार्यक्रम अछि । श्रोतक अनुसार प्रधानसेनापती गुरुङ्ग, पृतनापतीसभसँ परामर्शक बाद अपन अवधारणा बनेबाक तयारी कऽ रहल छथि । ………………… .
त्रिभुवन विश्व् विद्यालयक साधारण सभा-त्रिवि कार्यालय बल्खु्मे बैसयबला ५१ सद ीय सभामे प्रधानमन्त्री एवं त्रिवि कुलपती माधवकुमार नेपाल सेहो सहभागी हेेताह । सभामे ३ अर्बसँ बेसीक वार्षिक बजेट तथा प्रगति विवरण पेश कएल जाएत त्रिविक उपकुलपती माधवप्रसाद शर्मा जानकारी देलन्हि
३. पद्य

३.१. गुंजन जीक राधा

३.२. सतीश चन्द्र झा
३.३. हिमांशु चौधरी-दू टा पद्य

३.४. पंकज पराशर
३.५. नेनाक प्रश्न-सुबोध कुमार ठाकुर
३.६.निशाप्रभा झा (संकलन)-आगां

३.७. मिथिलेश कुमार झा-दू टा पद्य
३.८.कल्पना शरण-प्रतीक्षा सँ परिणाम तक-४

गंगेश गुंजन

गुंजन जीक राधा- एगारहम खेप
जड़ि से बुद्धि छैक। मनुखे सब मर्यादा थिक -समाज तकर प्रयोगधाम, सभक होइत छैक अपन-अपन खास बन्दाबन धाम हमरे-तोरे जकाँ!

आँखि खुजले पर छैक देखब संभव
बंद आँखि मे सृष्टि नहि, तकर भ्रम टा जीवित भेटैत छैक-
सृष्टिक रस-स्वाद नहि, आँखि खोल…
तखन बेचैनी मे राधा आँखि खोललनि। प्राण धक् रहि गेलनि. अरे श्रीकृष्ण !
हृदय आर्तनाद कऽ उठलनि-
‘अहाँ कतेक दुब्बर भ’ गेलौंहें कृष्ण! किएक?
-’तों जे एतेक दुबरि भ’ गेलेंहें…’
राधाक कान मे कृष्णक मर्मबेधी हंसीक गूंज-अनुगूंज आ प्रतिगुंजनक
अनन्त आवर्तनक खेल चलि रहल छल।बिरड़ो मे पड़ल कदमक एकटा
टटका-टटका हरियर पात जकाँ चकभाउर द’ रहल छलीह। से राधा छलीह।
अपन सर्वस्व कें कान्तिमय अनुभव करैत ताहि काल ओ स्वयं संॅ परिचय पात करैत
लोक छलीह। रोम रोम सर्वांग भेलि छलीह एहन !!
लाल रंग मे प्रेम लिखल हो ए
घृणा लिखल जाय कारी मे
सभ मनोरथ हरियर.पीयर
मेघ रंग हो अंग वस्त्र पहिरल मोनक
पाकल प्रस्फुटित विलास ए
विकलताक चरम बिता क’ लेब’ आयल आश्रय त
भेटलैक यैह मनुखक प्राण !
प्राण धारण कैने एउज्जर दप.दप परिधान।
सब टा रंग तिरोहित मोनक रंगशाला मे
मात्र बाँचि गेल एक रंग जे
सत्य तं रंगे नहि थिकए सब रंग कें पोतिपाति क’
करय दिअय प्रस्थान कि सबकें तेहन करय ओ आत्मलीन जे
बांचय नहिं अस्तित्व तत्वतः कोनो आनक।
रंग सात टा, स्वर सातक बनि जाय स्वतः वाणीए ध्वनि एनाटक
निःसृत होइत कतहु भरि पृथ्वी.बृंदाबन मे
हुनकर मन मेए अहांक मन मेए हम्मर मन मे.सबहक मन मे
असली यैह आ मात्र एतबे रंग.
जे होइछ भरि संसार मनक रंग!
बस।
कतय भेटत आब से सबटा सोखल धरती जे…
किंतु तथापि रंग नहिं भ जाइत अछि सब समाप्त
कोनो एक बासन मे घोडल हेरा गेला पर
माटि बहुत.बहुते बांचल रहैत अछि भरी सृष्टिक
अनगिनित कार्य व्यापार मे कोनो ने कोनो तत्वक लेने रस.
एक रती किछु कनिक रास धरतीक ऊपर सेहो बांचल रहि जाइत अछि
रंगक आभास ।
चीन्ह लेल जे हेराएल से रंग लाल छल कि पीयर.हरियर !
रंग समाप्त नहिं होइत अछि संसारक
हमर श्याम रंग
अहांक गोर नहिं हएत ख़तम कियेक तं
लोक आओत आ अबितहिं रहत निरंतर
ई संसार अनवरत अछि अनन्त!
यावत लोक रहत ताबत ई रंग रहत .
हमर श्याम रंग
राधा अहांक गोर रंग !
ई खिस्सा सब लोक कहत ।
भरि सृष्टि रहत आ
सुनत !!

(अगिला अंकमे…)

सतीश चन्द्र झा

कविता आ कनियाँ

जीवन अछि भ’ गेल छिन्न-भिन्न
सब मान प्रतिष्ठा धर्म गेल।
‘कविता’ आ ‘कनियाँ’ मघ्य आबि
छी ठाढ़ आइ दृगभ्रमित भेल।
छिटल किछु शब्दक गढ़ल अर्थ
कविता अछि अंतर के प्रकाश।
कनियाँ छथि स्नेहक पवन प्राण
जीवन के नव सुन्दर सुवास।
‘क’ सँ कविता, ‘क’ सँ कनियाँ
ह्रस्व ई लागल अछि दुनू के।
दुनू के मात्रा एक रंग अछि
बास हृदय मे दुनू के।
अंतर अछि तकराबाद बनल
अछि चाँद विन्दु कनियाँ उपर।
तैं चान जेंका छथि चढ़ल माथ
कविता अछि फेकल ताख उपर।
कविता पोथी फाटल साटल
कनियाँ नहि रहती बिना सजल।
कविता सँ कनियाँ के सब दिन
रहि गेलन्हि केहन विद्वेश बनल।
कविता कनियाँ मे भेल केना
सौतिनपन, झगरा एतेक डाह।
तै लागि जाइत छन्हि कनियाँ के
कविता सँ रौदक तेज धाह।

धरती अंबर सन बना लेब
ई मोन हृदय कतबो विशाल।
नहि समा सकत संगे-दुनू
क’ देत व्यथित क्षण हृदय भाल।

अछि अर्थ विराट एकर जग मे
शंकर के ई अछि ब्रह्म रूप।
ज्ञानी पंडित अछि चकित देखि
कविता कनियाँ के मूर्त रूप।

की करू ठाढ़ छी सोचि रहल
अछि हमरो जीवन मे दुविधा।
क’ देब त्याग कविता जखने
भेटत कनियाँ सँ सुख सुविध।

रखने छी कविता के पन्ना
कनियाँ सँ सबटा नुका- नुका।
माथक सिरहन्ना मे ठूसल
कविता किछु पुरना किछु नवका।

भेटल किछु तखने समाधन
छल जे भारी संकट विपदा।
कनियाँ पर सुन्दर नव कविता
किछु लीखि सुनाबी यदा-कदा।

लिखय लेल बैसि गेलहुँ तखने
बाहर कोनटा मे लगा घ्यान।
गृहणी सँ कविता छलै रूष्ट
नहि फुरा सकल किछु गीत गान।

बैसल रहि गएलहुँ समाधिस्थ
नहि दोसर पाँती उतरि सकल।
हे मृगनयनी, नभ चन्द्र मुखी
की करू हमर अछि कलम रुकल।

हिमांशु चौधरी-दू टा पद्य

नियति
बिछानरुपी मशान मे अर्थहीन भ
अपन लाशक कठियारी स्वयमसन भ गेल छी
इच्छा सभ मे पूर्णविराम लागि गेल अछि तेँ
एकटा नियति भ गेल छी
हँसलासँ मात्र नहि
कनएटा पडैत अछि
कनैत-कनैत थाकि जाइत छी
तखनो शांति नहि
किछु मनोविनोद करएटा पडैत अछि
बनाबटी मुस्की छोडएटा पडैत अछि
धन्य कथा!— धन्य यथार्थ!!
तेँ जीवन मृत्यु मे लीन होइत जा रहल अछि,
जीवन आ मृत्यु मञ्जिल होइत जा रहल अछि।

टप-टप नोर आ ज्वाला

शब्द वीणा मे
अक्षरक तार लटका क
आलाप क रहल छी
ई केहन कोन अछि
जे रौद नहि दैखैत छी
ई केहन गाछ अछि
जे कोयली नहि बजैत अछि
भगवान! अल्लाह! गड!
पराधीन क्षितीज मे
छाओ बढैत जा रहल अछि
रङ्ग आ तालक
परिभाषाक शब्दजाल मे स्नेह
उपेक्षित होइत जा रहल अछि
दासताक छाँह बढैत जा रहल अछि
सपना मे आगि लगैत जा रहल अछि
शताब्दीक ई निर्मम मजाक
नोरसँ भीजल पपनी केँ
हड्डी आ चमडीक शरीरकेँ
इलेकट्रोड सुगा बनबैत जा रहल अछि
अशांत आ बेचैन बीच
भीड पचीसी खेल भेल जा रहल अछि
सभकेँ सिरक मे रखैत
सहवास करबाक नीतिसँ
आस्था दुर्वासा बनैत जा रहल अछि
मेघक गर्जन, वर्षा आ ठनकाकेँ श्रृङ्खलासँ
शीघ्र उपलब्धि दीर्घ पीडासन होइत जा रहल अछि
घृणाक ज्वालामुखीकेँ
कोनहुँ भविष्य नहि होइ तो
टप- टप नोर आ क्रोधक ज्वाला
अशोक होइत जा रहल अछि
धाहे- धाहे बीच
नव-नव पिआस बढैत जा रहल अछि
तेँ स्वर्ग! जन्नत! हेवन!
इतिहास/भूगोल मे नहि खोजि क
वर्तमान मे खोजबाक आवश्यकता बढैत जा रहल अछि।

पंकज पराशर
कराची
पछिला साठि बरख सँ
उठैत अछि हूक
आ समुद्री गर्जना मे विलीन
नोनछाह होइत रहैत अछि

एतय विद्यमान अछि बनारस
सहारनपुर मेरठ गया आ बुलंदशहर
अपने निर्णय सँ बेबस आ उदास
हम अपन बत्तीसम बरख मे करैत छी
साठि बरखक साक्षात्काेर

समय पुछैत अछि समय सँ
केहेन अछि आब मेरठ ?
केहेन अछि गया आ भागलपुर ?
प्रश्नाछकुल जनसमूह मे ठाढ़
समय बाँटैत अछि समय केँ
मात्र किछु बुन्न नोर

आब ओहि समय मे घुरब असंभव
ओहि स्मृमति मे घुरब असंभव
आ संभव सँ असंतुष्टत कराची
असंभव मे घुरबाक लेल जिद कयनेँ छल !
2009
सुबोध कुमार ठाकुर
नेनाक प्रश्न

फेर कारी मेघ छयल
देखि मन सभक हर्षायल
सुन्दर बर्खा बुन्द खसत
जीव चराचरकेँ जीवन भेटत

आँखिमे काजर सजेने
देखि मन मुदित म्र्गनयनी
बात अधरमे सजा कए
पुलकित भय छलि सेज सजेने

परञ्च नेना ठाढ़ एकसर, सोचि रहल छल बात दोसर
फेर बरखा खूब होयतय , फेर परुकेँ जकाँ सगरे ढहेतय
भूखसँ तरसब हम सभ अन्नकक़ दाना नहि भेटत,
जा कय बड़का दलानपर कानि-कानि कय राति काटब,

किएक होइत अछि जलमग्न सगरो
सुधि किएक नहि छै ककरो,
किएक अछि कोशी ओ कमला , धार ई बागमती बलानक,

छै किएक नहि उपाय एकर,
सोचि रहल छल कोमल हृदय ओकर,
जकर छल नहि ककरो लग उत्तर,

डर कल्पनाक जखन यथार्थमे बदलल रहए,
दृश्य बाढ़िक ताण्डव बनि बाध-बोन पसरल रहए,

आँखिसँ काजर दहाएल,
मृगनयनीक मुख मुरझाएल,
कष्ट-पीड़ा आर डरसँ सबहक छल देह घमायल,
के करत मालक निमेरा सोचि-सोचि बुधना दुखित भेल
भागि-भागि सभसँ कहय छल आब बाँचब दुभर भेल,

घर आँगन चार-चाँचर, भय गेल जल मग्न सगरो
नहि कमल दल नहि मखानक आ नहि छल शेष धानक
बाढ़िसँ कलहंत जीवन
छलि मिथिला शिथिल भेल
के करत प्रतिकार एकर
बनायत मिथिलाकेँ निम्मन

सभ साल आबि-आबिकेँ
बाढ़िक ताण्डव करैत अछि विकास अवरुद्ध
तोड़ि सभक आशाकेँ करए आस अवरुद्ध

मुँह फाड़ि चिकड़ि-चिकड़ि कय
नेना पूछि रहल अछि प्रश्न सभसँ

की सब दिन अहिना जीब बाढ़िक ताण्डव देखि-देखि कय

प्रश्न अबोधक नहि छै केवल
प्रश्न अछि सुबोधक
प्रश्न छै माइग्रेनक एवं प्रश्न अछि बुधना किसानक
प्रश्न छै मिथिलाक आशाक एवं प्रश्न छै मिथिला विकासक

निशाप्रभा झा (संकलन)

खोलू ने केबार खोलू ने केबार हे जननी, खोलू ने केबार। माँ के द्वार पर् फूल नेंने ठाढ छी, पूजन करब तोहार हे जननी, पूजन करब तोहार।
माँ के द्वार पर धूप नेने ठाढ छी, आरती उतारब तोहार हे जननी, खोलू ने केबार।
माँ के द्वार पर माखन नेने ठाढ छी, भोग लगाएब तोहार हे जननी, खोलू ने केबार, खोलू ने केबार हे जननी, खोलू ने केबार।
——————
परिछन गारि ने हम दै छी दुलहा द रहलौ आशीष यौ, सासुर मे जुनि छाती तनियौ रहु लिबौने शीशयो ॥ गारि—– गरदनि मे तौनी लगबै छी, गरदामी ने अनलौ,
नाक धरै छी नायब तैले,
हाटक बाछा बनलौ। अहाँक जनम ओलन्हि तैले बाबू लेलन्हि फीस यौ ॥ गारि—– नव बडद छी सुन्दर लागब, ते परिरु ई माला,
सासुर के धोती परिरु आ’, फेरु बाबा माला, जे जे कहलौ मानू नै त लागत ठुनका तीस यौ ॥ गारि—-। मौसा हडकल मौसी गुडकल, पीसा अहाँक भरुआ,
दुल्हा मुदा अहाँ गुनि रुसियौ, सासुके दुलरुआ।
बहिन लेल हमारा घघरी मंगादेब बाबू ले’ कटपीसयौ ॥ गारि—- खेत बेचिक साइकिल देब,
आ’महिस बेचिक रेडियों, काका के दोसर बेटी की जेतनि,
विवाहलि कहियौ। बड हम पहिरब गुदडी दुल्हा जीबू लाख बरिस यौ ॥ गारि—-

ब्राह्मणकगीत
ब्राह्मण बाबू के नाम हम सुनिते छलउ
नहि चिन्हि ने जानि कोना ब्राह्मण भेलउ,
अहाँ पीपरक गाछ तर रहिते छलउ,
अहाँ कोढिया केकाया जे देते छलउ। ब्राह्मण बाबू के नाम हम सुनिते छलउ, नहि चिन्हि नहि जानि कोना ब्राह्मण भेलउ,
अहाँ पीपरक गाछ तर रहिते छलउ, अहाँ अंधा के नयना जे देते छलउ। ब्राह्मण बाबू के नाम हमारा सुनिते छलउ, नहि चिन्हि नहि जानि कोना ब्राह्मण भेलउ, अहाँ पीपरक गाछ तर रहिते छलउ, अहाँ बहिरा के कान जे देते छलउ। ब्राह्मण बाबू के नाम हमारा सुनिते छलउ, नहि चिन्हि नहि जानि कोना ब्राह्मण भेलउ, अहाँ पीपरक गाछ तर रहिते छलउ, ब्राह्मण बाबू के नाम हम सुनिते छलउ। —————

हनुमानक गीत

कानि-कानि कहथिन सीता सुनु हनुमान यौ,
किया जो बिसरि गेलनि मोर भगवान यौ।
जल-थल, शशि-निशि ,अग्नि समान यौ, रावणक बात सुनि लागए विष समान यौ। किया जो बिसरि गेलनि मोर भगवान यौ।
हार मांस गलि पथि भेल भुगतान यौ, तइयौ ने छुटए मोर पतित प्राण यौ। किया जो बिसरि गेलनि मोर भगवान यौ। हम त कहई छी सीता अहाँ छी संज्ञान हे, लक्षुमनक संग अओता श्री भगवान हे।
कानि-कानि कहथिन सीता सुनु हनुमान यौ,
किया जो बिसरि गेलनि मोर भगवान यौ।।
_________ मिथिलेश कुमार झापरिचय-पात

नाम ________ मिथिलेश कुमार झा
पिता ________ श्री विश्वनाथ झा जन्म ________ 12-01-1970 केँ मनपौर(मातृक) मे पैतृक ________ ग्राम-जगति, पो*-बेनीपट्टी,जिला-मधुबनी, मिथिला, पिन*- 847223 डाक-संपर्क _____ द्वारा- श्री विश्वनाथ झा, 15, हाजरा रोड, कोलकाता– 700026 शिक्षा :
प्राथमिक धरि- गामहिक विद्यालय मे। मध्य विद्यालय धरि- मध्य विद्यालय, बेनीपट्टी सँ। माध्यमिक धरि- श्री लीलाधर उच्च विद्यालय,बेनीपट्टीसँ इतिहास-प्रतिष्ठाक संग स्नातक-कालिदास विद्यापति साइंस काँलेज उच्चैठ सँ, पत्रकारिता मे डिप्लोमा-पत्रकारिता महाविद्यालय(पत्राचार माध्यम) दिल्ली सँ, कम्प्युटर मे डी.टी.पी ओ बेसिक ज्ञान। रचना: हिन्दी ओ मैथिली मे कविता, गजल, बाल कविता, बाल कथा,साहित्यिक ओ गैर-साहित्यिक निबंध, ललित निबंध, साक्षात्कार, रिपोर्ताज, फीचर आदि। प्रकाशित पहिल रचना:
हिन्दी मे– मुखपृष्ठ अखबार का- जनसत्ता(कलकत्ता संस्करण) मे 19-10-94 केँ(कविता) मैथिली मे- विधवा(कविता)-प्रवासक भेंट(मैथिली मासिक कोलकाता)-रिकार्ड तिथि उपलब्ध नहि, आरक्षण सिर्फ सत्ताक हेतु- आलेख(प्रवासक भेंट-कोलकाता)- नवम्बर 1994 कें। प्रकाशित रचना: मैथिली:- प्रायः 15 गोट कविता, 17 गोट बाल कविता, 18 गोट लघुकथा, 3 गोट कथा, 1 टा बालकथा, 44 गोट आलेख आ 6 गोट अन्य विविध विषयक रचना प्रकाशित। प्रकाशित रचना:- हिन्दी:- प्रायः 10 गोट कविता/गजल, 18 गोट आलेख, 1 गोट कथा ओ 3 गोट विविध विषय प्रकाशित।

मिथिलेश कुमार झा
दू टा पद्य
खब्बरदार

हे यौ !
एहि महान जनतंत्रक नेता,
एहि देशक जनता
बुझि गेल अहाँक चालि- प्रकृति- फूटनीति,
गमि लेलक अहाँक
गामसँ गद्दीक धरिक
सस्त बेबहार____
बैसलाक धार;
तैं सरकार, खब्बरदार!
जनतंत्रक जनता केँ
बुझिऔ जुनि
निमूधन_____
शक्ति सँ हीन;
जनताक संगठित शक्ति
बनत प्रचण्ड बिहाडि
अहाँकेँ पछाडि
गढत इतिहास
रहत साक्षी धरा-आकाश !!

गजल
उन्नति केलक गाम आब शहर लगैए,
लोक-लोक मे भेद आ जहर बढैए ।
निधोख बुलै अछि चोर रखबार दम सधने,
औंघायल कोतबाल धरि पहर पडैए ।
निट्ठाह पडल अछि रौदी जजाति जरै अछि,
पानि ने फानय धार से छहर पडैए ।
अमावस्याक राति की इजोतक आशा,
सगरो पसरल धोन्हि दुपहर बितैए ।
अपनो गाँव मे लोक बनल अनचिन्हार सन,
अनटोला केर लोक देखि क’ कुकुर-मुकैर ।

कल्पना शरण
प्रतीक्षा सऽ परिणाम तक- 4

किशोर मोहनक वृन्दावनमे रास
जलमे वरूणदेवक अस्तित्व क ज्ञान
व्रजवासीसऽ गोवर्धन पूजन करा
परास्त इन्द्रदेव पुनर्वासित स्वर्गधाम
दीन सुदामा संग गुरूकुल मे मित्रता
राधा संग अमर प्रेमकथाक निर्माण

अपन अल्हड़ताके बिसरक पाड़ी
आब बनल छल कर्मक संयोग
मथुरा स आमंत्रण आयल सुनि
व्रजवासीमे पसरल भाड़ी वियोग
विफल छल गोपी सबहक दुराग्रह
कृष्णके रोकक अनेकानेक प्रयोग

बलराम सहित युवराज के देखिकऽ
खुशी सऽ नगरमे मचल हंगामा
छल आ बल सब अकाजक बनल
द्वन्दयुद्धमे पराजित भेल कंस मामा
अपन राज पाबि प्रभु बसला द्वारिका
महल निर्मित केलैथ स्वयं विश्वकर्मा

गद्य-पद्य भारती

पाखलो
मूल उपन्यास : कोंकणी, लेखक : तुकाराम रामा शेट,
हिन्दी अनुवाद : डॉ. शंभु कुमार सिंह, श्री सेबी फर्नांडीस.मैथिली अनुवाद : डॉ. शंभु कुमार सिंह

पाखलो- भाग-५

एतबा सुनतहि ओ सभ चलि गेलाह। ओ राति ओ हमरहिं ओहिठाम बितौलक आ भोर होइतहिं चलि गेल। ओ अपन नाम रामनाथ कहने छल। ओ गोवाक स्वतंत्रता संग्राममे भाग लेने छल। ओ आ ओकर दूटा साथी गामक पुलिस-स्टेशन उड़एबाक लेल आएल छल। ओकरा साथी केँ तँ फिरंगी पकड़ि लेने छलैक आ एकरा पकड़बाक लेल एकर पाछू पड़ल छल। जिलेटिन (विस्फोटक पदार्थ) लगा कए ओ सभ गामक पुलिस-स्टेशन उड़ा देने छल, ई खबरि भोर होइतहिं सौंसे गाम आ लगपासक इलाकामे पसरि गेल छल।
गोवाकेँ मुक्ति भेटि गेल छलैक। ओहि दिन गोविन्दक दादी हमरा घर आएल छलाह।“भारत सरकार बहुत रास फिरंगीकेँ पकड़ि कए नाहमे ठूसि ओकरा सभकेँ पुर्तगाल भेज देने छैक।” हमरा मायकेँ वैह ई सूचना देलक। किछु क्षणक लेल ओ भावशून्य भ’ गेल छलीह। हमर बाबूजी जे पणजीमे रहैत छलाह ओ सदा-सर्वदाक लेल ओहि नाहसँ पुर्तगाल चलि गेलाह ई सोचि ओ बहुत दुखी भ’ गेलीह? ई हमरो पता नहि चलल। मुदा पछाति केँ हुनका आँखिमे नोर आबि गेलनि।
हम जखन बारह-तेरह बरखक रही, तखने हमर माय परलोक चलि गेलीह। हम एसगर भ’ गेलहुँ।
बरखाक दिन छलैक। कतेको दिनसँ लगातार बरखा होइत छलैक। नदीक बाढ़िक पानि गाम धरि पहुँचि गेल छलैक। गामक केळबाय (एक स्थानीय देवी) क मंदिरक चारू दिस बाढ़िक पानि आबि गेल छलैक। ओहि बाढ़िमे गामक पाँच टा घर गिर गेल छलैक। माल-जाल आ ओकर गोहाल सभटा ओहि बाढ़िमे भासि गेल छलैक।
हमर घर सीमानसँ बाहर पहाड़ीक कोनमे थोड़े ऊँच पर छल। बाढ़िसँ घरकेँ कोनो हानि नहि भेल छलैक। मुदा बरोबरि होम’ वला बरखा आ बसातक कारणेँ हमर घर ओहिदिन गिर गेल छल। घरक एक – दूटा कोरो – बत्ती कर्र – कर्र केर आवाजक संग टूटिकए गिर गेल। हम सूतल छलहुँ तखनहि ओ हमरा पर गिरल। हम आ हमर माय दुनू गोटे मरि जेतहुँ। हमर माय हमरा बचाबए अएलीह जकरा कारणेँ हुनका बहुत चोट लागि गेलनि। हुनका माथ पर बाँसक कोरो टूटि कए गिर गेल रहैक। ओ बेहोश भ’ गेलीह। हम हुनका मुँह पर पानिक छिंटा देलियनि तखने हुनका होश अएलनि। हम बाँचि गेलहुँ आ हमरा बेसी चोट नहि लागल ई जानि ओ बहुत हर्षित भेलीह। बादमे ओ हमरा गोद ल’ कए बहुत कानलीह। जखन ओ हमरा गर लगौने छलीह तखने हमरा हुनकर निकलल खून लागल। देखलहुँ तँ हुनका माथसँ खून बहराइत छलनि। हुनक माथ शीशा जकाँ टूटि गेल रहनि। ई देखि हम जोर सँ चिकरलहुँ। माय हमरा चुप रहबाक लेल कहलथि। हमर चिकरब सुनि कए एहि बरखामे किओ आबए बला नहि रहथि। मायक कहलाक अनुसार हम लजौनीक पातकेँ खूब नीक जकाँ पीसि कए हुनका माथ पर लगा देलियनि। बादमे हुनक खून बहब बन्न भ’ गेलनि। हुनका हिललो –डोललो नहि जा रहल छलनि आ ओ एक्कहि करोट पड़ल रहलीह।
घरक बचलका भागमे हम सोंगर लगौलहुँ। बसातो बहि रहल छलैक आ बरखा सेहो भ’रहल छलैक। बसातक संगहि रूकि – रूकि कए होमए बला बरखाक कारणेँ घरक बचलका हिस्सा सेहो उजड़ल जा रहल छलैक। उजड़ल कोरो बत्तीसँ पानि भीतर आबि रहल छलैक। घरमे कनेको सूखल जगह नहि छलैक।
मायकेँ बहुत चोट लागल छलनि एहिलेल ओ दरदसँ कुहरैत छलीह आ बीच – बीचमे अपन पयर हिलबैत छलीह। दीप लेसि हम हुनका सिरहौन लग बैसि रहलहुँ। बसातक झोंकक कारणेँ दीप बेर – बेर बुता जाइत छल जकरा हम पुनः लेसैत रही। तुफान ओ बरखा आओरो तीव्र भ’ गेलैक। हम पानि गरम क’ कए मायकेँ पियौलहुँ। देहक चोट आ घावक कारणेँ ओ भरि राति कुहरैत रहलीह। राति भीजलाक बाद हुनका बोखार आबि गेलनि जे बढ़िते गेलनि। भोर होइतहिं दादीकेँ संग ल’ कए हमरा डागदरकेँ बजएबाक अछि, से हम सोचलहुँ। मुदा राति तँ कटते नहि छलैक।
दोसर दिन भोरहिं-भोर गोविन्दक दादी डागदरकेँ ल’ कए आबि गेलाह। डागदर सुइया द’कए किछु दबाई सेहो देलकैक मुदा ताहिसँ कोनो लाभ नहि भेलैक।
ओ बीच-बीचमे आँखि खोलैत छलीह। हुनक देह उज्जर भ’ गेल छलनि आ आँखि अंदर दिस घंसल जा रहल छलनि। हुनक हाथ – पयर काँपैत छलनि। ओ हमरा अपना लग बैसबाक इशारा कएलनि। ओ हमरा किछु कहए चाहैत छलीह से हमरा बुझाएल मुदा ओ किछु बाजि नहि सकलीह।
ओहि दिन हुनक बोखार बहुत बढ़ि गेलनि। हुनक आँखि बन्न होम’ लागलनि। बोखारसँ ओ काँपए लागलीह। बादमे हुनका गरासँ घर्र – घर्र केर आवाज शुरू भेलनि आ ओ जतए सूतल छलीह ओतए किछुए क्षणमे सभ किछु शांत भ’ गेलैक। ओ हमरा छोड़िकए चलि गेलीह। हमरा अनाथ क’ कए चलि गेलीह ओ।
दादी एसगरे आबि कए हुनक अंतिम संस्कारक तैयारी कएलक। शेलपें मे रहयवला हमर मामा धरि खबरि भेजबाक लेल हमरा किओ नहि भेटल। बरखा जोरसँ होइत रहैक। गाममे आएल बाढ़िक पानि एखन धरि नहि कम भेल छलैक। श्मशान घाट पर दादी एसगरे हुनकर चिता पर लकड़ी राखैत जाइत छल आ हम हुनक संग दैत रहियनि। हमरा मायक अंतिम संस्कारक लेल दादीक अलावे आर किओ नहि आयल रहय। साँझ भ’ गलैक तखन जा कए चिता तैयार भेलैक। हम मायक लहास चिता पर राखि देलहुँ आ मुखाग्नि द’ दलहुँ। मुदा चिताकेँ आगि नहि सुनगा रहल छलैक। एक तँ भीजल लकड़ी आ उपरसँ बरखा। दादी बड्ड प्रयास कएलक मुदा बसातक झोंक आ बरखाक कारणेँ आगिक धधरो नहि उठि सकलैक। आधा राति बीति गेल रहैक हम दूइए गोटे श्मशान भूमिमे रही। चिताकेँ आगि लगएबाक प्रयास करैत – करैत दादी थाकि गेल।
जखन कोनहुँ उपाय नहि चललैक तखन चुपचाप काज करए वला दादी किछु समयक लेल ठाढ भेल आ बाजल – बाउ अहाँक हाथेँ तँ मायक चिताकेँ आगि नहि लागि रहल अछि। आब की करबैक? आब किछुओ क’ कए एहि लहासकेँ माटिए मे गाड़ि देबाक अछि।
एतबा कहि ओ कोदारिसँ धरती खोदब शुरू क’ देलक। हुनकर बात सुनिकए हमरा लागल – हँ, हम भाग्यहीन पाखलो छी। पाखलोक वंशक छी एहिलेल हमरा हाथेँ मायक चिताकेँ आगि नहि लागि रहल छैक। हमरा पाखलो नहि हेबाक चाही। ई पाखलोपन हमरा मोनकेँ कटोटि रहल छल। पाखलोपन केर अनुभूति हमरासँ असह्य भ’ रहल छल।
एक लोकक लंबाईक जोगर एकटा खदहा खोदल गेल।
माटि देबासँ पूर्व अपन मायकेँ अंतिम बेर प्रणाम क’ लिअ ! दादीक टोकलाक बाद हमरा होश आएल आ हम अपन दुनू हाथ उठा मायकेँ अंतिम प्रणाम केलियनि।
किछुए दिनक पश्चात् हम पाखलोसँ खलासी बनि गेलहुँ। जाहि कार्रेत (पुर्तगाली बस) पर दादी ड्राइवर छल ओहि बस पर ओ हमरा खलासी राखि लेलक। यात्री सभक समान बस पर चढाएब – उतारब यैह सभ काज हमरा करए पड़ैत छल। बजारक दिनतँ बसमे बहुत बेसी भीड़ भ’ जाइत छलैक। बसक अंदर ठूसल यात्री तँ उपर केराक घौर, कटहर,अनानास आदि लादल रहैत छल। उतार आ चढ़ाव पर तँ बस हकमैत – हकमैत चढ़ैत– उतरैत छल। जाधरि हम ओहि बस केर खलासी रहलहुँ ताधरि ओहि बसकेँ किछुओ हानि नहि भेलैक। हम एक्कहुँ टा ट्रिप चूकए नहि देलिऐक। बस मालिक केर भाय यात्री सभसँ पाइ लैत छलैक। ओ बहुत ओकादि मे घूमैत छल मुदा राति होइतहिं ओकर ओकादि खतम भ’ जाइत छलैक। घर पहुँचलाक बादे ओ पावलूक ओतए जा कए बहुत दारू पीबि लैत छल। ओ हमरा एक दिन दारू आनबाक लेल कहलक। हम ओकरा दारू आनिकए द’ देलिऐक, तखनहि दादी हमरा देखि लेलक आ बहुत डाँटलक। आब फेर कहियो ओकरा लेल दारू लएबाक लेल नहि जाएब एहन कहि ओ हमरा गामक देवी केळबाय केर किरिया द’ देलक। हमर एकटा आर स्मृति अछि – हम आ गैरेजक लाडू मिस्त्री बस धोबाक लेल ओहि नाला पर गेल छलहुँ। बस धोएब शुरू क’देलहुँ। गाड़ीक पितरिया चदराकेँ इमली घसि – घसिकए साफ केलहुँ। दुनू गोटे पानिसँ भीज गेल रही। सौंसे देह जाड़सँ कँपैत छल, एहिलेल लाडू बीड़ी सुनगा कए मुँहमे लगौलक आ गाड़ी धोबए लागल। अपन एकटा बीड़ी ओ हमरो देलक। हमहूँ ओकरा सुनगा कए पीबए लागलहुँ। एतबहिमे दादी ओतए पहुँच गेल हमरा बीड़ी पीबैत देखि लेलक। ओ हमरा पर बहुत गोस्सा कएलक आ हमरा एक झापड़ मारि देलक। हम ओकर पयर पकड़लहुँ, माफी माँगलहुँ मुदा ओकर गोस्सा कम नहि भेलैक। जँ अहाँ फेर कहियो बीड़ी पीलहुँ तँ अहाँकेँ अपन मायक किरिया, ओ हमरा मायक किरिया द’ देलक।
हम जहियासँ खलासी बनलहुँ तहियेसँ दादीक ओहिठाम रहय लागलहुँ। हम आ गोविन्द दुनू भाइ बनि गेलहुँ। गोविन्द हमरासँ बेसी तेज आ बुधियार छल। ओ ओतबहि तत्वज्ञानी ओ भावुक सेहो छल। जहियासँ हमर माय हमरा छोड़ि कए चलि गेलीह तहियासँ हम कानितहिं रहलहुँ अछि। तखन हमरासँ छोट रहितहुँ ओ हमरा समझबैत रहैत छल। ओ कहैत छल – अहाँकेँ पता अछि कि नहि, हमर गाय तामूओ केँ जखन प्रसव भेल रहैक तकर ठीक चारिए मासक बाद ओ मरि गेल छलीह मुदा तकर बाछाकेँ तहिया के देखने छलैक? देखियौक ! आइ वैह बाछा बरद भ’ गेल छैक। पाखल्या…यौ पाखल्या अहाँ कानू नहि, नहि तँ हमरहुँ कना जाएत। हमर बुढ़िया दादी पछिले साल भगमानक घर चलि गेलीह। ओ कहैत छलीह – जनम लेबए बला प्राणीकेँ तेँ मरबाक छैहे एकरा लेल लोककेँ दुखी नहि हेबाक चाही। ई सुनि हम बादमे अपन कानब बन्न करैत छलहुँ। हम ओकर भाषण सुनैत छलहुँ। ओ कोनहुँ तत्वज्ञानीक सदृश बजितहिं जा रहल छल।
मनुक्ख अपन जनमक संगहि अपन मृत्यु सेहो संग अनने अछि। जनम होइतहिं ओ नेना रहैत अछि। नेनासँ ओ जुआन होइत अछि। जुआनीसँ बुढ़ापा आ फेर जनमसँ आखिरी वा अंतिम अवस्थामे मनुक्खकेँ मृत्यु भेतैत अछि। जीवन – मरणक एहि अवस्थासँ सभ प्राणीकेँ गुजरहिं पड़ैत छैक। जतय – जतय प्राणी छैक ओतए – ओतए मृत्यु पसरल छैक। धरती हो, पानि हो वा अकाश, कोनहुँ जगह कोनहुँ समय पर मृत्यु होइतहिं छैक।
हम ओकरासँ पूछलहुँ – अहाँ ई सब कत’ सिखलहुँ? ई सब अहाँ पोथीमे पढ़ने छी की?ओ बाजल – हमरा ई सब विणे आजी (दादी) बतबैत छलीह। हुनकर स्मरण अबितहिं ओकरा आँखिमे नोर आबि गेलैक आर हमरा समक्ष हमरा छोड़िकए चलि गेल हमर मायक मूर्ति ठाढ़ भ’ गेल। रामायण, महाभारत आर आन कथा सभ सुनबएवाली, हमरा कांजी (मरगिल्ला) खोआ कए पैघ करएवाली, हम बाँचि गेलहुँ एहिलेल हमरा छातीसँ लगाबए वाली हमर माए, हमर आँखि देखने अछि हुनक मृत्यु……आ हुनक लहास,हमरा एहिसभ बातक स्मरण भ’ गेल। आँखिमे आएल नोर पोछि हम मोनहिं – मोन हुनका प्रणाम केलहुँ।

क्रमशः

श्री तुकाराम रामा शेट (जन्म 1952) कोंकणी भाषामे ‘एक जुवो जिएता’—नाटक, ‘पर्यावरण गीतम’, ‘धर्तोरेचो स्पर्श’—लघु कथा, ‘मनमळब’—काव्य संग्रह केर रचनाक संगहि कैकटा पुस्तकक अनुवाद,संपादन आ प्रकाशनक काज कए प्रतिष्ठित साहित्यकारक रूपमे ख्याति अर्जित कएने छथि। प्रस्तुत कोंकणी उपन्यास—‘पाखलो’ पर हिनका वर्ष 1978 मे ‘गोवा कला अकादमी साहित्यिक पुरस्कार’ भेटि चुकल छनि।

डॉ शंभु कुमार सिंह
जन्म: 18 अप्रील 1965 सहरसा जिलाक महिषी प्रखंडक लहुआर गाममे। आरंभिक शिक्षा, गामहिसँ,आइ.ए., बी.ए. (मैथिली सम्मान) एम.ए. मैथिली (स्वर्णपदक प्राप्त) तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। BET [बिहार पात्रता परीक्षा (NET क समतुल्य) व्याख्याता हेतु उत्तीर्ण, 1995] “मैथिली नाटकक सामाजिक विवर्त्तन” विषय पर पी-एच.डी. वर्ष 2008, तिलका माँ. भा.विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। मैथिलीक कतोक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे कविता,कथा, निबंध आदि समय-समय पर प्रकाशित। वर्तमानमे शैक्षिक सलाहकार (मैथिली) राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर-6 मे कार्यरत।
सेबी फर्नांडीस

क्रमशः
बालानां कृते-
1.देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स) आ 2.कल्पना शरण: देवीजी

देवांशु वत्स, जन्म- तुलापट्टी, सुपौल। मास कम्युनिकेशनमे एम.ए., हिन्दी, अंग्रेजी आ मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्रिकामे कथा, लघुकथा, विज्ञान-कथा, चित्र-कथा, कार्टून, चित्र-प्रहेलिका इत्यादिक प्रकाशन।
विशेष: गुजरात राज्य शाला पाठ्य-पुस्तक मंडल द्वारा आठम कक्षाक लेल विज्ञान कथा “जंग” प्रकाशित (2004 ई.)

नताशा:
(नीचाँक कार्टूनकेँ क्लिक करू आ पढ़ू)

नताशा तइस

नताशा:चौबीस

कल्पना शरण:देवीजी:
पाबनिक महत्वच
गणेश पूजा सऽ हिन्दु सबहक पाबनिक मौसस प्रारंभ भऽ चुकल छल। एक पर एक पूजा आबै वला छल आ ताहि हिसाबे विद्यालय सेहो बन्द होयत रहत।ताहि सऽ गुरू आ चेला दुनु के परेशानी छल।देवीजी अपन विद्यार्थी सऽ अहि पर बात करैत रहैथ। ओ बच्चा सबके पढ़ाइ के लय नहिं तोड़ै लेल कहलखिन। ताहि पर बच्चा सबलग पाबनिक महत्वै पर बात उठल।
देवीजी बच्चा सबकेँ पाबैन सबहक महत्वत बता रहल छलखिन। देवीजी कहलखिन जे सब धर्ममे पाबैन होयत छै जाहि के पाछा किछु धार्मिक मान्यता रहै छै।चाँद़ तारा़ नक्षत्र आदि के अनुसार निर्धारित तिथि मे बेसीतर पर्व विशेषतः हिन्दु एवम् मुस्लिम के पाबैन मनाओल जाएत छै। इसाई धर्ममे अंग्रेजी तिथि के महत्वथ छै। पाबैन मनाबैके तिथि के अतिरिक्तस ओहि के मनाबैके विधि सेहो विशेषतः हिन्दु धर्ममे बहुत तर्कसंगत होयत छै। हिन्दु धर्म के प्रत्येकक पाबैन के नियम तेहेन छै जे ओहि पर शोध कार्य कैल जा सकैत छै।
अहि के अतिरिक्तत मनोवैज्ञानिक कारण सऽ सेहो पाबैन मनौनाइ जीवन के एकरसता हटाबै लेल बहुत महत्व पूर्ण छै। घरके साफ कऽ सजेनाइ नब कपड़ा पहनिनाइ ईश्वर के अराधना केनाइ विविध पकवान खेनाइ एक दोसर के उपहार देनाइ अहि सब सऽ पाबैन के विशेषता परिलक्षित होयत छै। किछु पाबैन ईश्वरावतार के देहावसान अर्थात् पृथ्वी सऽ विलोप हुअ पर मनाओल जायत छै जे कि खुशी मनाबै लेल नहिं बल्कि अपन अवतार सऽ दूरी बनिकऽ शोक व्यक्तप करैलेल होयत छै।
हिन्दु एवम् मुसलमान पाबनिमे व्रतक बहुत महत्व। छै। हिन्दु मे तऽ विभिन्न देवी देवताक अराधनामे व्रत करैके अलग अलग मान्यता छै। मुसलमान सबमे सबसऽ पैघ व्रत होयत छै रमजानक। जाहिमे महिना भरि लोक सब दिनभरि भूखल प्याैसल रहैत छैथ आ सूर्यास्तक बाद सऽ सूर्योदय के पहिने तक मे खाना पीना करैत छैथ। जेना मैथिल हिन्दु सब मे ओठगन खायल जायत छै तहिना रमज़ान मे सूर्योदय के पहिने सेहर (भोर) मे खाना खायल जायत छै जकरा सब सेहरी कहैत छै। तकर बाद दिन भरि निर्जला उपवास। धार्मिक मुसलमान सबके मान्यता छैन जे ई महिना पूर्णतः ईश्वरक प्रति अपन श्रद्धा अभिव्यक्ति करैके समय होयत छै। अहि महिना भरि सब पूर्ण संयम सऽ सब तरहक नशा आदि सऽ दूर रहैत ईश्वरक नाम अर्पित करै छथि। अहि के नियम बहुत कठिन छै ताहि कारण सऽ बच्चा़ गर्भवती महिला़ रोगी तथा यात्रा करैत लोक सबके ई माफ कैल गेल छै। अहि सबके अन्तमे ईद मनाओल जायत अछि।
देवी जी अपन वक्तहव्य बन्द करैत कहलखिन जे मिथिलांचल मे आर्थिक रूपसऽ उच्चवर्ग तऽ नहिं लेकिन निम्नवर्ग के कर्मचारी स्तर पर मिथिलाभाषी मुसलमानो बहुलता मे उपस्थित छथि।

बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
१.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
१०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)
आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् – विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे – देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽ–बिना डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।
Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.)
Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.)
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विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.
१.मैथिलीक नूतन वैज्ञानिक कोश आ २.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

१.मैथिलीक नूतन वैज्ञानिक कोश (वाक्य-प्रयोग सहित)-गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा।
चरम; cərəmə; चरम; अंतिम; əⁿt̪imə; अंतिम; Last, final; adj राजाक अत्याचार चरम पर पहुँचि गेल अछि।; adj rɑːɟɑːkə ət̪jɑːcɑːrə cərəmə pərə pəɦuⁿci geːlə əcʰi।; adj राजाक अत्याचार चरम पर पहुँचि गेल अछि।
चरण; cərəɳə; चरण; पएर, डेग, प्रक्रम, पद्यक पाँति; pəeːrə, ɖeːgə, prəkrəmə, pəd̪jəkə pɑːⁿt̪i; पएर,डेग, प्रक्रम, पद्यक पाँति; foot, leg, stage, line of verse; n चरण रज धोबि पीबू हिनक पएर; n cərəɳə rəɟə d̪ʰoːbi piːbuː ɦinəkə pəeːrə; n चरण रज धोबि पीबू हिनक पएर
शरण; ɕərəɳə; शरण; आश्रय; ɑːɕrəjə; आश्रय; shelter, refuge; adj अति दयालु सूनि अहाँक शरण अयलहुँ जानि॥; adj ət̪i d̪əjɑːlu suːni əɦɑːⁿkə ɕərəɳə əjələɦuⁿ ɟɑːni॥; adjअति दयालु सूनि अहाँक शरण अयलहुँ जानि॥
शरण्य ; ɕərəɳjə; शरण्य; आश्रय देबा योग्यə; ɑːɕrəjə d̪eːbɑː joːgjə; आश्रय देबा योग्य; Fit for support; adj; adj; adj
शरण्युम; ɕərəɳju; शरण्यु; रक्षक,मेघ, बिहारि; rəkʂəkə,meːgʰə, biɦɑːri; रक्षक,मेघ, बिहारि; protector, cloud, wind; n; n; n
चरपट; cərəpəʈə; चरपट; दुष्टु; d̪uʂʈə; दुष्ट; mischievous; adj; adj; adj
चरफर; cərəpʰərə; चरफर; ऊर्जायुक्त, चलबा-फिरबामे पटु, चतुर; uːrɟɑːjukt̪ə, cələbɑː-pʰirəbɑːmeː pəʈu, cət̪urə; ऊर्जायुक्त, चलबा-फिरबामे पटु, चतुर; energetic, prompt, clever; adj; adj; adj
चरसा; cərəsɑː; चरसा; चाम, खाल; cɑːmə, kʰɑːlə; चाम, खाल; leather, hide; n नेताजीक हाथ थरथरा गेलनि मुदा मुँह चालू “मुँह सम्हारि क’ बाज मौगी नइँ त’ चरसा घीचि लेबौ ।; n neːt̪ɑːɟiːkə ɦɑːt̪ʰə t̪ʰərət̪ʰərɑː geːləni mud̪ɑː muⁿɦə cɑːluː “muⁿɦə səmɦɑːri kə’ bɑːɟə maːugiː nəiⁿ t̪ə’ cərəsɑː gʰiːci leːbaːu ।; n नेताजीक हाथ थरथरा गेलनि मुदा मुँह चालू “मुँह सम्हारि क’बाज मौगी नइँ त’ चरसा घीचि लेबौ ।
चरस; cərəsə; चरस; गाजाक रस जकर धूमपान कएल जाइत अछि; gɑːɟɑːkə rəsə ɟəkərə d̪ʰuːməpɑːnə kəeːlə ɟɑːit̪ə əcʰi; गाजाक रस जकर धूमपान कएल जाइत अछि; a type of smoking, hashish; n; n; n
चराँत; cərəॉⁿt̪ə; चराँत; चरबाक हेतु सुरक्षित परती; cərəbɑːkə ɦeːt̪u surəkʂit̪ə pərət̪iː; चरबाक हेतु सुरक्षित परती; land for grazing; n; n; n
चरी; cəriː; चरी; चरबा जोग घास; cərəbɑː ɟoːgə gʰɑːsə; चरबा जोग घास; vegetation required for grazing; n; n; n
शरीर; ɕəriːrə; शरीर; देह; d̪eːɦə; देह; body; adj कतय छन्हि हुनकर मृत शरीर।; adj kət̪əjə cʰənɦi ɦunəkərə mɹ̩t̪ə ɕəriːrə।; adj कतय छन्हि हुनकर मृत शरीर।
चरिबघिआ; cəribəgʰiɑː; चरिबघिआ; चारि रस्सीसँ घोरल खाट; cɑːri rəssiːsⁿ gʰoːrələ kʰɑːʈə; चारि रस्सीसँ घोरल खाट; cot netted with four fold string; adj; adj; adj
चरिष्णुr; cəriʂɳu; चरिष्णु; गतिशील, कर्मठ; gət̪iɕiːlə, kərməʈʰə; गतिशील, कर्मठ; Moveable, active; adj;adj; adj
चरित; cərit̪ə; चरित; जीवनी, आचरण; ɟiːvəniː, ɑːcərəɳə; जीवनी, आचरण; biography, behaviour; adjनहि, कतहु फेर सँ त्रिया चरित देखाओत त ने ई…।; adj nəɦi, kət̪əɦu pʰeːrə sⁿ t̪rijɑː cərit̪ə d̪eːkʰɑːoːt̪ə t̪ə neː iː…।; adj नहि, कतहु फेर सँ त्रिया चरित देखाओत त ने ई…।
चरित्र; cərit̪rə; चरित्र; चालि, चर्या, वैशिष्ट्यi; cɑːli, cərjɑː, vaːiɕiʂʈjə; चालि, चर्या, वैशिष्ट्य; character, conduct, disposition; n ट्रेजेडीमे कथानक केर संग चरित्र-चित्रण, पद-रचना, विचार तत्व, दृश्य विधान आ गीत रहैत अछि।; n ʈreːɟeːɖiːmeː kət̪ʰɑːnəkə keːrə sⁿgə cərit̪rə-cit̪rəɳə, pəd̪ə-rəcənɑː, vicɑːrə t̪ət̪və, d̪ɹ̩ɕjə vid̪ʰɑːnə ɑː giːt̪ə rəɦaːit̪ə əcʰi।; n ट्रेजेडीमे कथानक केर संग चरित्र-चित्रण, पद-रचना, विचार तत्व, दृश्य विधान आ गीत रहैत अछि।
चर्या; cərjɑː; चर्या; करनी, चालि, आचरण, अनुसरणीय पद्धति; kərəniː, cɑːli, ɑːcərəɳə, ənusərəɳiːjə pəd̪d̪ʰət̪i; करनी, चालि, आचरण, अनुसरणीय पद्धति; deed, conduct, routine; n पञ्जीकारजीक दैनिक चर्या कलम ओ खुरपीक संग सम्पन्न होइत छलन्हि।; n pəɲɟiːkɑːrəɟiːkə d̪aːinikə cərjɑː kələmə oː kʰurəpiːkə sⁿgə səmpənnə ɦoːit̪ə cʰələnɦi।; n पञ्जीकारजीक दैनिक चर्या कलम ओ खुरपीक संग सम्पन्न होइत छलन्हि।
शर्करा; ɕərkərɑː; शर्करा; शक्कəर, चिन्नी, साँकड़, खाँड़; ɕəkkərə, cinniː, sɑːⁿkəɽə, kʰɑːⁿɽə; शक्कर,चिन्नी, साँकड़, खाँड़; Sugar; n पञ्चामृत- दही, दूध, घृत, मधु, शर्करा; n pəɲcɑːmɹ̩t̪ə- d̪əɦiː, d̪uːd̪ʰə, gʰɹ̩t̪ə, məd̪ʰu, ɕərkərɑː; n पञ्चामृत- दही, दूध, घृत, मधु, शर्करा
शर्मा; ɕərmɑː; शर्मा; शर्मन, ब्राहाणक एक उपनाम; ɕərmənə, brɑːɦɑːɳəkə eːkə upənɑːmə; शर्मन,ब्राहाणक एक उपनाम; a surname of Brahmins; n; n; n
चर्म; cərmə–mənə; चर्म; चमड़ी, खाल; cəməɖə़ी, kʰɑːlə; चमड़ी, खाल; Skin, hide, leather; n एहि गपक चर्चा अछि, जे आर्य चर्म वस्त्र पहिरैत छलाह; n eːɦi gəpəkə cərcɑː əcʰi, ɟeː ɑːrjə cərmə vəst̪rə pəɦiraːit̪ə cʰəlɑːɦə; n एहि गपक चर्चा अछि, जे आर्य चर्म वस्त्र पहिरैत छलाह
चर्मकार; cərmərə , cərmɑːrə , cərməkɑːrə; चर्मकार; चमराक समान बनबएबला; cəmərɑːkə səmɑːnə bənəbəeːbəlɑː; चमराक समान बनबएबला; shoemaker, cobbler; n एक चर्मकार आओल आ’, राजाकेँ फरिछाय बुझाओल।; n eːkə cərməkɑːrə ɑːoːlə ɑː’, rɑːɟɑːkeːⁿ pʰəricʰɑːjə buɟʰɑːoːlə।; n एक चर्मकार आओल आ’, राजाकेँ फरिछाय बुझाओल।
चर्पटी; cərpəʈiː; चर्पटी; सोहारी; soːɦɑːriː; सोहारी; Thin loaf; n; n; n
चर्र; cərrə; चर्र; वस्त्र फटबाक ध्व नि; vəst̪rə pʰəʈəbɑːkə d̪ʰvəni; वस्त्र फटबाक ध्वनि; sound of tearing cloth; nछोटगर-सन गेट, जाहिपर स्पष्ट रूपसँ ब्रेगेन्जा विला लिखल छलैक, अपन कब्जा पर झुलल चर्र-चर्र केर आवाज भेलैक; ncʰoːʈəgərə-sənə geːʈə, ɟɑːɦipərə spəʂʈə ruːpəsⁿ breːgeːnɟɑː vilɑː likʰələ cʰəlaːikə, əpənə kəbɟɑː pərə ɟʰulələ cərrə-cərrə keːrə ɑːvɑːɟə bʰeːlaːikə; nछोटगर-सन गेट, जाहिपर स्पष्ट रूपसँ ब्रेगेन्जा विला लिखल छलैक, अपन कब्जा पर झुलल चर्र-चर्र केर आवाज भेलैक
चरुआ; cəruːɑː; चरुआ; पीनी रखबाक बासन; piːniː rəkʰəbɑːkə bɑːsənə; पीनी रखबाक बासन; a pot for keeping processed tobacco; n; n; n
चरुभर; cəruːbʰərə; चरुभर; दानासँ भरल धानक सीस; d̪ɑːnɑːsⁿ bʰərələ d̪ʰɑːnəkə siːsə; दानासँभरल धानक सीस; paddy sheath full of corn; adj; adj; adj
चरुङ्गा; cəruːɖə़्gɑː; चरुङ्गा; चतुरङ्ग, शतरंज; cət̪urəŋgə, ɕət̪ərⁿɟə; चतुरङ्ग, शतरंज; chess; n; n;n
चर्वण; cərvəɳə; चर्वण; चिबाएब; cibɑːeːbə; चिबाएब; chewing; adj; adj; adj
चसचरा; cəsəcərɑː; चसचरा; चोरा कए आनक फसिल चरओनिहार; coːrɑː kəeː ɑːnəkə pʰəsilə cərəoːniɦɑːrə; चोरा कए आनक फसिल चरओनिहार; one who let one’s cattle to graze other’s crop; adj; adj; adj
शस्य; ɕəsəjə; शस्य; प्रशंसनीय; prəɕⁿsəniːjə; प्रशंसनीय; admirable; adj; adj; adj
शस्य; ɕəsəjəmə; शस्य; अनाज; ənɑːɟə; अनाज; Corn, grain; n; n; n
चसकाएब; cəsəkɑːeːbə; चसकाएब; परिकाएब; pərikɑːeːbə; परिकाएब; embolden, tempt; v.i.; v.i.; v.i.
चषक; cəʂəkə , cəʂəkəmə; चषक; कप, मदिरा पात्र; kəpə, məd̪irɑː pɑːt̪rə; कप, मदिरा पात्र; A cup, the pot for drinking wine; n; n; n
चसकब; cəsəkəbə; चसकब; परिकब; pərikəbə; परिकब; addicted, tempted; v.i.; v.i.; v.i.
चसमा; cəsəmɑː; चसमा; दृष्टिवर्धक सीसा; d̪ɹ̩ʂʈivərd̪ʰəkə siːsɑː; दृष्टिवर्धक सीसा; spectacle; nदेबलरैना फुलपेन्ट पेन्हि कऽ, चसमा पेन्हि कऽ बाबू-भैया नाहित जे रिक्शापर बैठिकऽ रिक्सा चलबइ हइ तऽ सिनेमाके गोबिना माउत कऽर हइ।; nd̪eːbələraːinɑː pʰuləpeːnʈə peːnɦi kəऽ, cəsəmɑː peːnɦi kəऽ bɑːbuː-bʰaːijɑː nɑːɦit̪ə ɟeː rikɕɑːpərə baːiʈʰikəऽ riksɑː cələbəi ɦəi t̪əऽ sineːmɑːkeː goːbinɑː mɑːut̪ə kəऽrə ɦəi।; nदेबलरैना फुलपेन्ट पेन्हि कऽ, चसमा पेन्हि कऽ बाबू-भैया नाहित जे रिक्शापर बैठिकऽ रिक्सा चलबइ हइ तऽ सिनेमाके गोबिना माउत कऽर हइ।
चसमदिल; cəsəməd̪ilə; चसमदिल; प्रत्येक्ष द्रष्टा-; prət̪jəkʂə d̪rəʂʈɑː; प्रत्यक्ष द्रष्टा; eye-witness; n;n; n
चसना; cəsənɑː; चसना; इनार कोड़बामे माटि उघबाक बासन; inɑːrə koːɖə़bɑːmeː mɑːʈi ugʰəbɑːkə bɑːsənə; इनार कोड़बामे माटि उघबाक बासन; pan used for carrying soil coming out while digging well; n; n; n
शस्त; ɕəsət̪ə; शस्त; प्रशंसनीय; prəɕⁿsəniːjə; प्रशंसनीय; admirable, praiseworthy; adj; adj; adj
शस्त्र; ɕəsət̪rə; शस्त्र; हथिआर, आयुध; ɦət̪ʰiɑːrə, ɑːjud̪ʰə; हथिआर, आयुध; weapon, arms; nतावत शस्त्र सेहो ताहि द्वारे राखल अछि, प्रसन्न भए इन्द्र अपन असल रूप धरल।; nt̪ɑːvət̪ə ɕəst̪rə seːɦoː t̪ɑːɦi d̪vɑːreː rɑːkʰələ əcʰi, prəsənnə bʰəeː ind̪rə əpənə əsələ ruːpə d̪ʰərələ।; nतावत शस्त्र सेहो ताहि द्वारे राखल अछि, प्रसन्न भए इन्द्र अपन असल रूप धरल।
शताब्दीअ; ɕət̪ɑːbd̪iː; शताब्दी; सए वर्षक खण्डt; səeː vərʂəkə kʰəɳɖə; सए वर्षक खण्ड; century, centenary; nएहि मूर्तिक रचनाकाल तेरहम चौदहम शताब्दी आंकल गेल अछि।; neːɦi muːrt̪ikə rəcənɑːkɑːlə t̪eːrəɦəmə caːud̪əɦəmə ɕət̪ɑːbd̪iː ɑːⁿkələ geːlə əcʰi।; nएहि मूर्तिक रचनाकाल तेरहम चौदहम शताब्दी आंकल गेल अछि।
चटाएब; cəʈɑːeːvə; चटाएब; चटबाएब; cəʈəbɑːeːbə; चटबाएब; get someone lick; vदही-चीनी चटाएब;vd̪əɦiː-ciːniː cəʈɑːeːbə; vदही-चीनी चटाएब
चटाइ; cəʈɑːi; चटाइ; खड़क पटिआ; kʰəɖə़kə pəʈiɑː; खड़क पटिआ; straw-mat; nदलान पर चटाइ ओछा देल गेल रहै ।; nd̪əlɑːnə pərə cəʈɑːi oːcʰɑː d̪eːlə geːlə rəɦaːi ।; nदलान पर चटाइ ओछा देल गेल रहै ।
चटकाएब; cəʈɑːkɑːeːbə; चटकाएब; डराएब, धमकी देब; ɖərɑːeːbə, d̪ʰəməkiː d̪eːbə; डराएब, धमकी देब; threaten; vt; vt; vt
चटाक; cəʈɑːkə; चटाक; टकरएबाक ध्वानि; ʈəkərəeːbɑːkə d̪ʰvəni; टकरएबाक ध्वनि; smacking sound; advचटाक!…मनसा उठिकए एक चाट देलकै।; advcəʈɑːkə!…mənəsɑː uʈʰikəeː eːkə cɑːʈə d̪eːləkaːi।; advचटाक!…मनसा उठिकए एक चाट देलकै।
चटान; cəʈɑːnə; चटान; शिला; ɕilɑː; शिला; rock; n; n; n
शतावधानी; ɕət̪ɑːvəd̪ʰɑːniː; शतावधानी; अद्भुत स्मरण शक्तिबला; əd̪bʰut̪ə smərəɳə ɕəkt̪ibəlɑː; अद्भुत स्मरण शक्तिबला; having miraculous power of memory; adj; adj; adj
शतावरी; ɕət̪ɑːvəriː; शतावरी; एक वनौषधि; eːkə vənaːuʂəd̪ʰi; एक वनौषधि; a herb, Asparagus recemosus; n; n; n
चट; cəʈə; चट; कड़ा वस्तु टुटबाक सन ध्वएनि, तुरत; kəɖə़ा vəst̪u ʈuʈəbɑːkə sənə d̪ʰvəni, t̪urət̪ə;कड़ा वस्तु टुटबाक सन ध्वनि, तुरत; crackling sound, promptly; adv चट दय ठाढ़ भ’ कए। डिबियाक बाती कखनो चट–चट कऽ कऽ चरचराइक तथा बातीक मुँहपर कारी गिरह बनि जाइक ।; adv cəʈə d̪əjə ʈʰɑːɖʰə़ bʰə’ kəeː। ɖibijɑːkə bɑːt̪iː kəkʰənoː cəʈə–cəʈə kəऽ kəऽ cərəcərɑːikə t̪ət̪ʰɑː bɑːt̪iːkə muⁿɦəpərə kɑːriː girəɦə bəni ɟɑːikə ।; adv चट दय ठाढ़ भ’ कए। डिबियाक बाती कखनो चट–चट कऽ कऽ चरचराइक तथा बातीक मुँहपर कारी गिरह बनि जाइक ।
शत; ɕət̪ə; शत; सए; səeː; सए; hundred; nओना ई सब ठाम शत-प्रतिशत सत्ये नही भ’ सकैय।; noːnɑː iː səbə ʈʰɑːmə ɕət̪ə-prət̪iɕət̪ə sət̪jeː nəɦiː bʰə’ səkaːijə।; nओना ई सब ठाम शत-प्रतिशत सत्ये नही भ’ सकैय।
चटेनी; cəʈeːniː; चटेनी; पटिआ; pəʈiɑː; पटिआ; sitting mat; n; n; n
शतभिषा; ɕət̪əbʰiʂɑː; शतभिषा; चौबीसम नक्षत्र; caːubiːsəmə nəkʂət̪rə; चौबीसम नक्षत्र; 24th constellation consisting of 100 stars; n; n; n
शतचण्डीi; ɕət̪əcəɳɖiː; शतचण्डी; दुर्गासप्तिशती; d̪urgɑːsəpt̪əɕət̪iː; दुर्गासप्तशती; a narrative poem on the life of Goddess; n; n; n
चटचटाएब; cəʈəcəʈɑːeːbə; चटचटाएब; बेर-बेर चाट मारब; beːrə-beːrə cɑːʈə mɑːrəbə; बेर-बेर चाट मारब; slap repeatedly; v.t.; v.t.; v.t.
चटचट; cəʈəcəʈə; चटचट; तड़ातड़,तेलाह; t̪əɖə़ाt̪əɖə़,t̪eːlɑːɦə; तड़ातड़,तेलाह; hurriedly and repeatedly, greasy; advनॊर संऽ चटचट गाल। चटचट मारब।; advnəॊrə sⁿऽ cəʈəcəʈə gɑːlə।cəʈəcəʈə mɑːrəbə।; advनॊर संऽ चटचट गाल। चटचट मारब।
शतधा; ɕət̪əd̪ʰɑː; शतधा; सए प्रकारसँ; səeː prəkɑːrəsⁿ; सए प्रकारसँ; in hundred ways; adv; adv;adv
शतघ्नीॊ; ɕət̪əgʰniː; शतघ्नी; बंदूक, तोप; bⁿd̪uːkə, t̪oːpə; बंदूक, तोप; a kind of firearm; n; n; n
चटका; cəʈəkɑː; चटका; बड़ी जेकाँ एक तीमन, चटकन, थापड़; bəɖə़ी ɟeːkɑːⁿ eːkə t̪iːmənə, cəʈəkənə, t̪ʰɑːpəɖə़; बड़ी जेकाँ एक तीमन, चटकन, थापड़; curry of pulse, slap; n; n; n
चटका; cəʈəkɑː, cəʈikɑː; चटका; चिड़ै; ciɽaːi; चिड़ै; A hen-sparrow; ; ;
चटकैती; cəʈəkaːit̪iː; चटकैती; चलाकी, चतुरता; cəlɑːkiː, cət̪urət̪ɑː; चलाकी, चतुरता; cleverness; n;n; n
चटकार; cəʈəkɑːrə; चटकार; स्वादिष्ट वस्तु खएलापर जिह्वाक चटुलता; svɑːd̪iʂʈə vəst̪u kʰəeːlɑːpərə ɟiɦvɑːkə cəʈulət̪ɑː; स्वादिष्ट वस्तु खएलापर जिह्वाक चटुलता; smack, clacking of tongue while relishing some spicy dish; nचटकार सँ खाओल; ncəʈəkɑːrə sⁿ kʰɑːoːlə; nचटकार सँ खाओल
चतकार; cət̪əkɑːrə; चतकार; जनैत रहलोपर विस्मय देखाएब; ɟənaːit̪ə rəɦəloːpərə visməjə d̪eːkʰɑːeːbə; जनैत रहलोपर विस्मय देखाएब; feigned surprise; adj; adj; adj
चटकारी; cəʈəkɑːriː; चटकारी; शीघ्रता; ɕiːgʰrət̪ɑː; शीघ्रता; swiftness; n; n; n
चटक; cəʈəkə; चटक; पक्षीक विष्ठाह, शीघ्रता, शोभा, चटकलासँ भेल खाधि; pəkʂiːkə viʂʈʰɑː, ɕiːgʰrət̪ɑː, ɕoːbʰɑː, cəʈəkəlɑːsⁿ bʰeːlə kʰɑːd̪ʰi; पक्षीक विष्ठा, शीघ्रता, शोभा, चटकलासँ भेल खाधि; bird’s excrement, quickness, splendour, scratch caused by splitting; adjनिर्मला जीक चटक-मटक कतए जइतनि? एक दिन एकटा योगीक माथपर कौआ चटक कए देलकैक; adjnirməlɑː ɟiːkə cəʈəkə-məʈəkə kət̪əeː ɟəit̪əni? eːkə d̪inə eːkəʈɑː joːgiːkə mɑːt̪ʰəpərə kaːuɑː cəʈəkə kəeː d̪eːləkaːikə; adjनिर्मला जीक चटक-मटक कतए जइतनि? एक दिन एकटा योगीक माथपर कौआ चटक कए देलकैक

२.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली
(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित)
मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन

१.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना-
अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।)
पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।)
खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।)
सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।)
खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।)
उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि।
नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ।

२.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना-
ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि।
ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि।
उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि।

३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश,बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश,वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि।

४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी,जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत,योगी, यदु, यम लिखबाक चाही।

५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि।
प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि।
नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि।
सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि।
ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि।

६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु,तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले,चोट्टे, आनो आदि।

७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि।

८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि:
(क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक।
अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक।
पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक।
(ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह।
अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह।
(ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि।
अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल।
(घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि।
अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि।
(ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक।
अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ।
(च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि।
अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै।

९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन),पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि।

१०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए।
-(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित)

2. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन
ठाम
जकर,तकर
तनिकर
अछि

अग्राह्य
अखन,अखनि,एखेन,अखनी
ठिमा,ठिना,ठमा
जेकर, तेकर
तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य)
ऐछ, अहि, ए।

2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।

6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।

19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा’ ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा “सुमन” ११/०८/७६

VIDEHA FOR NON-RESIDENT MAITHILS(Festivals of Mithila date-list)

8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS
8.1.Original poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Lucy Gracy from New York
8.2. Devil Blessed Us-Shyam darihare (Devil Blessed Us- Maithili story by Shyam darihare, translated by Praveen k Jha )

DATE-LIST (year- 2009-10)

(१४१७ साल)

Marriage Days:

Nov.2009- 19, 22, 23, 27

May 2010- 28, 30

June 2010- 2, 3, 6, 7, 9, 13, 17, 18, 20, 21,23, 24, 25, 27, 28, 30

July 2010- 1, 8, 9, 14

Upanayana Days: June 2010- 21,22

Dviragaman Din:

November 2009- 18, 19, 23, 27, 29

December 2009- 2, 4, 6

Feb 2010- 15, 18, 19, 21, 22, 24, 25

March 2010- 1, 4, 5

Mundan Din:

November 2009- 18, 19, 23

December 2009- 3

Jan 2010- 18, 22

Feb 2010- 3, 15, 25, 26

March 2010- 3, 5

June 2010- 2, 21

July 2010- 1

FESTIVALS OF MITHILA

Mauna Panchami-12 July

Madhushravani-24 July

Nag Panchami-26 Jul

Raksha Bandhan-5 Aug

Krishnastami-13-14 Aug

Kushi Amavasya- 20 August

Hartalika Teej- 23 Aug

ChauthChandra-23 Aug

Karma Dharma Ekadashi-31 August

Indra Pooja Aarambh- 1 September

Anant Caturdashi- 3 Sep

Pitri Paksha begins- 5 Sep

Jimootavahan Vrata/ Jitia-11 Sep

Matri Navami- 13 Sep

Vishwakarma Pooja-17Sep

Kalashsthapan-19 Sep

Belnauti- 24 September

Mahastami- 26 Sep

Maha Navami – 27 September

Vijaya Dashami- 28 September

Kojagara- 3 Oct

Dhanteras- 15 Oct

Chaturdashi-27 Oct

Diyabati/Deepavali/Shyama Pooja-17 Oct

Annakoota/ Govardhana Pooja-18 Oct

Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-20 Oct

Chhathi- -24 Oct

Akshyay Navami- 27 Oct

Devotthan Ekadashi- 29 Oct

Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 2 Nov

Somvari Amavasya Vrata-16 Nov

Vivaha Panchami- 21 Nov

Ravi vrat arambh-22 Nov

Navanna Parvana-25 Nov

Naraknivaran chaturdashi-13 Jan

Makara/ Teela Sankranti-14 Jan

Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 20 Jan

Mahashivaratri-12 Feb

Fagua-28 Feb

Holi-1 Mar

Ram Navami-24 March

Mesha Sankranti-Satuani-14 April

Jurishital-15 April

Ravi Brat Ant-25 April

Akshaya Tritiya-16 May

Janaki Navami- 22 May

Vat Savitri-barasait-12 June

Ganga Dashhara-21 June

Hari Sayan Ekadashi- 21 Jul
Guru Poornima-25 Jul
Original poem in Maithili by Gajendra Thakur
Translated into English by Lucy Gracy from New York

Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed at http://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title “KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in

Mandakini Living In The Heaven Came To The Earth Now
Badrivishal and Kedarnath
Meeting of Alaknanda and Mandakini
Two of the thundering streams meet
Who is living in the cloudy house?
The cloud that left
Did not return yet
But along the way
The cold wind came with earth quake
Animals trapped and fell down
Whose is this snow capped house?
Heart is shaken to see the stream
No ends of the mountain range
The slope is so steep and brook is at the ground
Edges fenced with two mountains
This is your beauty! Oh Alaknanda!
Mandakini who lives in the heaven
Is seen on the earth
The thundering bubbly torrent
The new vision I am gifted with today
Showed me the world filled with cold wind.

Devil Blessed Us-Shyam darihare (Devil Blessed Us- Maithili story by Shyam darihare, translated by Praveen k Jha )
(Devil Blessed Us- Maithili story by Shyam darihare, translated by Praveen k Jha )
The police chief had just left and the Supremo was about to retire for the day when a guard entered and saluted. Moving his neck-tied glasses to his eyes, the Supremo asked, ‘now what’?
‘Sir, B TV’s owner has been waiting outside for long to call on’, replied the guard politely.

‘I won’t see any TV guy right now. Ask him to come later. And with an appointment.’ Said the supremo climbing stairs of his mansion.

‘Sir, he is not here for an interview, but for a redressal. His nephew has been abducted.’ the guard explained.

Supremo halted his steps. He turned his head, ‘abducted? Nephew? How? When?’
‘He didn’t tell me all that’, guard said humbly.
‘Alright, have him wait into the outer drawing room. I will be right back’. Saying, supremo went upstairs, immediately called his brother-in-law and asked,’man! How could you kidnap B TV’s owner’s nephew?’

Santlal was stunned. Said,’what you sayin, Monsieur? My team got only a doctor in our custody and Monsieur has already been informed of that. We know nothin ’bout no B TV’s owner’s kin. My team don’t touch no one without my permission, monsieur. Me sure some other team gotta done that.’
Supremo’s eyes turned red. Said he,’Only your team has the wherewithal to pull this kind of a job through. No other team is authorized to lay their hands on such a figure. Contact B team, C team, D team right away and let me know within ten minutes who has him. Meanwhile, I will meet the B TV’s owner and engage him in conversation.’
Angrily, supremo inserted three pints of paan instead of usual two and started downstairs grumbling,’these bastards want to gulp all the ransom all by themselves. Which is why didn’t tell me. What they don’t understand is they can’t challenge the master.’
Supremo brought down his glasses to hang onto his chest from upon the eyes. Spitting a load into the spittoon outside the room, he entered the outer drawing room. B TV’s owner and accompanying news editor and senior photographer got on to their feet and greeted him. After the supremo took to his seat, the owner started,’ sir, I am B TV’s CEO Suresh Bahal…’

‘hnn-hnn what, CO?’ interrupted the supremo.
‘no sir, CEO’ Mr. Suresh clarified.
‘What’s that?’ Supremo asked diverting the talk.
‘Sir, Chief Executive Officer’.
‘Oh that! That what Pakistan’s President calls himself and some of the chief ministers here also take pride in doing that’ Supremo displayed his treasure of knowledge.
‘Yes sir…yes sir’ said Mr. Suresh Bahal pleased with his success in explaining. Introducing his colleagues, he said,’Sir, this is our news editor Mr. Mohan Bhatia and…’
Supremo interrupted yet again,’So, Mr. Bhat! What kind of news editing do you do – always finding fault with my state? My family is especially targeted by your TV. Why don’t you show something positive once in a while?’
‘Like what, sir?’ Asked Mr. Bhatia.
‘Like what? Why are you asking me that? Can’t you see all the healthy fish growing in my pond….? Fisheries industry can be encouraged by that. Potato, onion and cabbage…high varieties of these are grown in my mansion. You won’t find such varieties elsewhere. In my dairy, one cow can give thirty liters of milk! All these you can’t see! All you do is to criticize!’
Mr. Bhatia was speechless. Understanding that arguing on this matter right now might be extremely harmful to the kidnapped, he folded his hands,’Sorry, sir! I will keep it in mind now on.’
‘Yeah, these things should be kept in mind. Who is this third, Mr. CO?, Supremo asked.
‘My name is Prabal Mishra. I am a senior photographer with B TV.’ The third person introduced himself with folded hands.
‘Ohhhh, so it’s you, Mr. Prabal Mishra! Isn’t it you who came to cover my rally and snapped photos of people squabbling for snacks and fighting each other instead of listening to me! You had interviewed shopkeepers about how my party people extorted contributions from them. What have you come here for today? Wanna snap something spicy? All of you are hands in glove with opposition. Media folks are bent on conspiring to discredit a government of poor and downtrodden…’
Supremo was lecturing them in his signature fashion to terrorize them earlier on so they won’t much open their mouth later. Whereas, Mr. Suresh Bahal was shaking to his very core thinking he may have to return empty-handed.
Supremo’s dissertation continued,’…especially people of your caste are dead against my government. But photos would do nothing. My government of poor and fallen will go on. Don’t dream that I will ever allow a government of your caste in this state. Biggies pundits are falling at my feet in my court and you are out to disrepute me with a mere lens…!’ Paan’s spit was pouring out of supremo’s mouth. A guard ran out and brought a spittoon. He put it along supremo’s mouth. Supremo spit it all out along with a piece stuck in his throat. Keeping the spittoon in one hand, the guard passed a napkin with the other. Wiping the red saliva drooling out of his lips, supremo tossed the napkin towards the guard. Using his training skills, the guard caught the napkin with one hand. He looked at the guests anticipating an appreciation of his feat. He couldn’t read the disgust and fear splattered on their faces. It didn’t matter to him anyway and gloomily he went his way.

Seeing all that gurgling and spit Mr. Suresh Bahal was feeling a little dizzy. Bending his head down he tried to regain his composure and said, ‘Sir, we haven’t come for an interview today nor to cover any news.’
‘Then why are you here? Don’t tell me you came to negotiate a marriage because my son is too young and invitation I haven’t extended any!’ Supremo roared in laughter.

Ignoring the implied insult in his remarks, Mr. Bahal said, ‘Sir, my nephew has been abducted. We came to ask for your help.’
‘Hnn your nephew has been abducted? When? From where?’ Supremo pretended to be surprised.
Pushing in a couple of pints of paan in his mouth out of the bowl kept besides, and topping it with some jarda, the supremo took to digging his ears with a Johnson bud. Mr. Bahal continued, ‘Sir, My nephew came to the capital day before yesterday to prepare a special report. He was abducted moments after he came out of the hotel. In front of Mr. Prabal Mishra’s eyes four gun-totting men forced him to their car and spirited away.’

Washing off his ear-dirt into the ashtray, the supremo asked,’Did you file a report with the police?’
‘No sir.’
‘If it happened in front of your photo-man Mr. Mishra, he must have seen the number on the license plate?’ Supremo asked apprehensively.
Mr. Prabal Mishra concealed the truth,’no sir. Couldn’t catch the no. in all that hustle.’
Supremo heaved a sigh of relief. Mr. Bahal et al became a little hopeful with this sigh. Mr. Bhatia presently said,’Sir, you have such a standing in this state that all bureaucrats and police administration tremble with fear before you.So we thought that reporting the matter to police will unnecessary publicize it and endanger the life of the victim as well as bring disrepute to your government. We suggest you personally ask the police to create a pressure…’
Mr. Suresh Bahal interrupted,’Sir, we haven’t even got any call for ransom yet. Had it come, we would have resolved it then and there and wouldn’t have bothered you sir.’
‘My botheration is immaterial. After all, terrible it is that a journalist has been kidnapped. All this is a conspiracy to discredit my government. I ask you to have faith in me. Yet, it is not a low hanging fruit which you can enjoy immediately. You have to be a little patient.’ Supremo assured them.
A guard came in and saluted,’Sir, Madam is calling you upstairs.’
‘Can’t you see, we are talking?’, Supremo rebuked.
‘Sir, the Patron has called up’ the guard replied unaffected.
‘Oh, shouldn’t you say that.’ saying supremo hurried towards the stairs.
Mr. Bahal looked towards Mr. Prabal Mishra and Mr. Bhatia. Uttered Mr. Prabal Mishra,’The supremo doesn’t talk intimate on this phone. There are phones in his bedroom for special conversations.’
Then they all fell silent.
After about ten minutes, Supremo reappeared in the room and said,’All of you should now go. Be patient. I have asked the police chief and have also taken the station officer to task. We should get some information by the evening.’
‘When should we come again sir?’ Asked Mr. Bahal.
‘Call before you come’. Supremo stood up.
No sooner had they left than supremo again ran upstairs. Elder brother-in-law was seated in the upper patio. Supremo yelled at him,’You speak such things on phone? Whole story you started narrating on the phone. You are aware that my enemies are all around. But you don’t think. Now tell me what you have found out.’
‘Monsieur, me inquired from everyone of my team. The boys swore they took no one except that doctor’ Replied Santlal hesitatingly.
‘Could you talk to the other teams?’ Supremo was turning red.
‘Yes, Monsieur, total five targets are in hand – two traders, a doctor, a girl and an unknown big figure.’
‘Who did you talk to about that unknown guy?’
‘To Nalkatta, monsieur!’
‘And he said what’, supremo was losing patience.
‘He knew not the total thing. But he sure blurted out that his group has laid their hands on a fat target.’ Santlal informed.
‘Where is this asshole Nalkatta?’ Supremo lost his temper.
‘Me asked him to find everything and come here straight, monsieur’.
Supremo was not calming down. Shouted he,’Now this bugger Nalkatta is lifting billionaires and you are sitting on your ass. When every team has been alloted their areas then how come this B team has touched this target? What the hell have you been doing? If you are done with it then let me know.’
Santlal was panicking. Couldn’t speak a thing.
Supremo’s wife presently entered. Sitting besides the supremo, she asked,’What’s the matter? What are you yelling at him for?’
‘Go mind your own business. Don’t you interfere in everything. We are talking something very important.’ Supremo was extremely angry.
An orderly came in and informed,’Sir, your cousin is waiting downstairs.’
‘That’s Nalkatta, monsieur’, Santlal spurted happily.
‘Since when did he become Nalkatta?’ Madam was laughing.
A thin smile came upon supremo’s face too. Pinning it towards his wife, he directed,’You should go. I have to reprimand Nalkatta.’
Wife stood up and left.
Nalkatta appeared and laid prostate. Supremo remained unmoved like a stone.
Santlal asked,’What did you find out?’
Nalkatta’s voice got stuck in his throat. He started choking. Supremo got up and slapped him hard on his face,’Bastard, now you are grabbing billionaires! Can your ass handle it now?’
‘Monsieur, they got him by mistake.’ Nalkatta spoke massaging his cheeks.
‘How come by mistake?’ Santlal inquired.
‘Monsieur, they had the information that a hotel owner from Delhi was staying in that hotel and that he had come to attend a wedding. But they held the B. TV man instead by mistake.’ Nalkatta gave his explanation.
Supremo again hit him with his foot,’And now do you have the capacity to handle it you motherfu..! Operate only as far as your infrastructure permits.’
Pretending to be Nalkatta’s saviour, Santlal proposed, ‘ Monsieur, they cannot handle such a target. They don’t have such large scale arrangement. Pray ask him to transfer the target to my team. I promise there won’t be any disparity in sharing the goodies’.
‘What share and what goodies! My government may even fall due to abductions of such parties’ Shouting, the supremo turned to Nalkatta and ordered him,’Transfer the target to Santlal’s team within two hours. Or else each one of you will face encounters’.
Trembling with fear, Nalkatta said,’will do, Monsieur. Right away.’
Nalkatta and Santlal both stood up and started out. Supremo asked from behind,’I will take the next step only after getting confirmation about the transfer, remember that.’
When they left, Supremo was so ecstatic on his skillful diplomacy that he laughed out,’These assholes think they are chiefs. I would let them take away this party of forty-fifty million and and I will always be on thirty percent? Give me all of it this time, you bloodyfools.’
It was just over half an hour that two party members of parliament and two assembly members came over. Supremo was going to have his lunch. He said to his wife,’ These suckers don’t understand what hour it is. Wandering around all the time. Must be some transfer-posting recco. Wait for a few minutes. Let me drive’em out first.’

Entering the meeting hall, the supremo inquired,’ Aha..ha…how came all the four musketeers together?’
‘Sir, the matters have gone to such an extent that it forced us to be here today.’ An assembly member replied.
‘Why, what happened?’ Supremo asked.
‘Sir, this abduction industry is growing thick and fast in the whole province’ A member of parliament expressed worry.
Supremo roared with laughter and said,’Ain’t that better! Opposition says that our government is not allowing any industry to come up. Go and tell’em don’t we have the abduction industry growing fast and furious!’
All these four people’s representatives have been known admirer of his witty remarks. But presently they all maintained their sorry posture.
Asked the supremo again,’Why these long faces?’
‘Sir, just two days ago, a gangster forced one Mr. Mishra’s daughter out of her home and forcibly married her. The girl kept howling horribly but no one came to her rescue out of fear of the stengun.’ Spoke one member of parliament.
‘Yeah..yeah the police superintendent mentioned this to me yesterday only. The search is on. Now he has married her and has kept her for the last two days…do you think she would be pristine by now that you folks are getting so distressed? Now she has to live with him be it a gangster or a gentleman like you. These brahmins can even turn an impure one to a pristine one. You guys close your eyes and ears and relax. There will be some uproar for a few days and then all will be calm. People do not have more time than that.’
‘But the media is bellowing with rage’ Second assembly member said.
Supremo gave him a hard glance,’if you were such a coward then why did you join politics? Thicken your skin.’
‘But some response has to be there’, said the first member of parliament again.
‘Response has to be there so let it be there! Say that when Veerappan was abducting people no one showed any concern. And in this rule of the poor and downtrodden, the moment there is a crime, everyone starts shouting. This is a opposition conspiracy. People of this state are closely watching how they are bent on discrediting a government of the poor and the downtrodden. The exploited and troubled people will definitely avenge this of those conspirators.’ Thus providing enough armor to his representatives to fight the media, the Supremo moved out for his lunch.
The representatives too went their ways satisfied praising their leader’s offensive politics.
As they were leaving, Supremo had assured them further,’Folks, do not be afraid of the media. Our voters don’t read newspapers, so let them write whatever they want to. Nevertheless, I have instructed the superintendent to hold a press briefing in the evening.’
Two notable things happened in the evening. The superintendent declared to the press,’the girl was not abducted, it is a love lorn case.’
The media asked,’But the girl was wailing and the stengun-totting criminals forcibly took her away. It’s been two days. What has the police been doing?’
The superintendent had replied,’Even a super power like America has not been able to catch Osama Bin Laden despite all their efforts, how do you expect us to catch the kidnappers so quickly? We are trying. Please wait.’

Secondly, Supremo was informed by Santlal that the B. TV target has been moved to a safehouse. No police or media can ever trace him there.
Supremo immediately counseled Santlal,’Now don’t forget that you are also a people’s representative, so do not ever bring the target to your own house and yes, negotiate the ransom yourself by phone. Do not start below seventy million. Hide the vehicle used in the abduction in a secured garage. This Mishra must have read the numbers.’

After sunset, Mr. Suresh Bahal alone presented himself in supremo’s court in this high-security zone. When in private, he informed,’Sir, someone called on my cell from a public phone a while ago. The kidnappers are asking for seventy million.’
Supremo expressed surprise,’I can’t believe how shameless these criminals have become! Seventy million! Who asks for this kind of a figure in a ransom! Don’t you worry. I am calling the police chief right here in front of you. They will beat the hell out of them. Never seen so daring criminals. Oh my God! This is now crossing limits!’
Mr. Suresh Bahal stopped him,’Sir, please do not tell anything to police. I am sure I am being followed. If you tell police the abductee’s life will be in danger.’
‘Then what kind of help do you want from me?’ The supremo asked. He didn’t expect a mediaperson to agree to a ransom so fast.

‘Sir, seventy million is too much for me. You are an influential person. You know all kinds of people. You are familiar with all intricacies of this province. Please just let me negotiate through someone. I am ready to pay forty million.’ Said Mr. Bahal.
‘You are a mediaman. Don’t give up so easily. If you pay ransom, they will be even more encouraged. If you hold your ground, I will have the police of entire state go after them big time. But of course, there are always some risks in this kind of campaign. You must be prepared to accept that. If something goes wrong it will be you guys raising all hue and cry.’ Supremo extolled the strengths of his administration.
‘No sir, we will not raise a voice. Please let me negotiate. It will be a great favor to me. I am arranging for the money.’ Saying so, Mr. Bahal left.
How the negotiation took place and finally how much was bargained for, remained a mystery but on the third day Mr. Suresh Bahal’s nephew returned safely. The same day, the whole team packed up and escaped out by next flight.
(2002)

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पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00
नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00
आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 90.00
कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00
भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 90.00
मैथिली पोथी

विकास ओ अर्थतंत्र (विचार) : नरेन्द्र झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 250.00
संग समय के (कविता-संग्रह) : महाप्रकाश प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00
एक टा हेरायल दुनिया (कविता-संग्रह) : कृष्णमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 60.00
दकचल देबाल (कथा-संग्रह) : बलराम प्रकाशन वर्ष2000 मूल्य रु. 40.00
सम्बन्ध (कथा-संग्रह) : मानेश्वर मनुज प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु. 165.00 शीघ्र प्रकाश्य

आलोचना

इतिहास : संयोग और सार्थकता : सुरेन्द्र चौधरी
संपादक : उदयशंकर

हिंदी कहानी : रचना और परिस्थिति : सुरेन्द्र चौधरी
संपादक : उदयशंकर

साधारण की प्रतिज्ञा : अंधेरे से साक्षात्कार : सुरेन्द्र चौधरी
संपादक : उदयशंकर

बादल सरकार : जीवन और रंगमंच : अशोक भौमिक

बालकृष्ण भट्ïट और आधुनिक हिंदी आलोचना का आरंभ : अभिषेक रौशन

सामाजिक चिंतन

किसान और किसानी : अनिल चमडिय़ा

शिक्षक की डायरी : योगेन्द्र

उपन्यास

माइक्रोस्कोप : राजेन्द्र कुमार कनौजिया
पृथ्वीपुत्र : ललित अनुवाद : महाप्रकाश
मोड़ पर : धूमकेतु अनुवाद : स्वर्णा
मोलारूज़ : पियैर ला मूर अनुवाद : सुनीता जैन

कहानी-संग्रह

धूँधली यादें और सिसकते ज़ख्म : निसार अहमद
जगधर की प्रेम कथा : हरिओम

अंतिका, मैथिली त्रैमासिक, सम्पादक- अनलकांत
अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4,शालीमारगार्डन,एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023,
आजीवन सदस्यता शुल्क भा.रु.2100/-चेक/ ड्राफ्ट द्वारा “अंतिका प्रकाशन” क नाम सँ पठाऊ। दिल्लीक बाहरक चेक मे भा.रु. 30/- अतिरिक्त जोड़ू।
बया, हिन्दी छमाही पत्रिका, सम्पादक- गौरीनाथ
संपर्क- अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4,शालीमारगार्डन,एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023,
आजीवन सदस्यता शुल्क रु.5000/- चेक/ ड्राफ्ट/ मनीआर्डर द्वारा “ अंतिका प्रकाशन” के नाम भेजें। दिल्ली से बाहर के चेक में 30 रुपया अतिरिक्त जोड़ें।
पुस्तक मंगवाने के लिए मनीआर्डर/ चेक/ ड्राफ्ट अंतिका प्रकाशन के नाम से भेजें। दिल्ली से बाहर के एट पार बैंकिंग (at par banking) चेक के अलावा अन्य चेक एक हजार से कम का न भेजें। रु.200/- से ज्यादा की पुस्तकों पर डाक खर्च हमारा वहन करेंगे। रु.300/- से रु.500/- तक की पुस्तकों पर 10% की छूट, रु.500/- से ऊपर रु.1000/- तक 15%और उससे ज्यादा की किताबों पर 20%की छूट व्यक्तिगत खरीद पर दी जाएगी ।
एक साथ हिन्दी, मैथिली में सक्रिय आपका प्रकाशन

अंतिका प्रकाशन
सी-56/यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन,एकसटेंशन-II
गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.)
फोन : 0120-6475212
मोबाइल नं.9868380797,
9891245023
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श्रुति प्रकाशनसँ
१.पंचदेवोपासना-भूमि मिथिला- मौन
२.मैथिली भाषा-साहित्य (२०म शताब्दी)- प्रेमशंकर सिंह
३.गुंजन जीक राधा (गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित)- गंगेश गुंजन
४.बनैत-बिगड़ैत (कथा-गल्प संग्रह)-सुभाषचन्द्र यादवमूल्य: भा.रु.१००/-
५.कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते,महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन)- गजेन्द्र ठाकुरमूल्य भा.रु.१००/-(सामान्य) आ$४० विदेश आ पुस्तकालय हेतु।
६.विलम्बित कइक युगमे निबद्ध (पद्य-संग्रह)- पंकज पराशरमूल्य भा.रो.१००/-
७.हम पुछैत छी (पद्य-संग्रह)- विनीत उत्पल
८. नो एण्ट्री: मा प्रविश- डॉ. उदय नारायण सिंह “नचिकेता”प्रिंट रूप हार्डबाउन्ड (ISBN NO.978-81-907729-0-7 मूल्य रु.१२५/- यू.एस. डॉलर ४०) आ पेपरबैक(ISBN No.978-81-907729-1-4मूल्य रु. ७५/- यूएस.डॉलर २५/-)
१२.विभारानीक दू टा नाटक: “भाग रौ” आ “बलचन्दा”
१३. विदेह:सदेह:१: देवनागरी आ मिथिला़क्षर संभस्करण:Tirhuta : 244 pages (A4 big magazine size)विदेह: सदेह: 1: तिरहुता : मूल्य भा.रु.200/-
Devanagari 244 pages (A4 big magazine size)विदेह: सदेह: 1: :देवनागरी : मूल्य भा. रु. 100/-
१४. गामक जिनगी (कथा संेग्रह)- जगदीश प्रसाद मंzडल): मूल्य भा.रु. ५०/- (सामान्य), $२०/- पुस्तकालय आ विदेश हेतु)ISBN978-81-907729-9-0 COMING SOON:
1.मिथिलाक बेटी (नाटक)- जगदीश प्रसाद मंडल
2.मिथिलाक संस्कार/ विधि-व्यवहार गीत आ गीतनाद -संकलन उमेश मंडल- आइ धरि प्रकाशित मिथिलाक संस्कार/ विधि-व्यवहार आ गीत नाद मिथिलाक नहि वरनमैथिल ब्राह्मणक आ कर्ण कायस्थक संस्कार/ विधि-व्यवहार आ गीत नाद छल।पहिल बेर जनमानसक मिथिला लोक गीत प्रस्तुत भय रहल अछि।
3.मिथिलाक जन साहित्य- अनुवादिका श्रीमती रेवती मिश्र (Maithili Translation of Late Jayakanta Mishra’s Introduction to Folk Literature of Mithila Vol.I & II)
4.मिथिलाक इतिहास – स्वर्गीय प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी
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ओहि बर्खमे प्रकाशित विदेह:सदेहक सभ अंक/ पुस्तिका पठाओल जाएत।
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पाँच बर्ख(२०१०-१३ ई.)::७५०/- NEPAL-(INR 2250), Abroad-(US$125)
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(ग्राहकक हस्ताक्षर)

२. संदेश-

[ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ]

१.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत।

२.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी।

३.श्री विद्यानाथ झा “विदित”- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय “विदेह”केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध “मीटर”सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत।

४. प्रो. उदय नारायण सिंह “नचिकेता”- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल “विदेह” ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।…विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन।

५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह…अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी।

६. श्री रामाश्रय झा “रामरंग”(आब स्वर्गीय)- “अपना” मिथिलासँ संबंधित…विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।…शेष सभ कुशल अछि।

७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका “विदेह” केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू।

८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह “मौन”- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका “विदेह” क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना।

९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि “विदेह”क सफलताक शुभकामना।

१०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब।

११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- “विदेह” पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ।

१२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका “विदेह” क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि।

१३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका “विदेह” केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत।

१४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- “विदेह” इन्टरनेट पर अछि तेँ “विदेह” नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी।

१५. श्री रामभरोस कापड़ि “भ्रमर”- जनकपुरधाम- “विदेह” ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी।

१६. श्री राजनन्दन लालदास- “विदेह” ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक एहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रि‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाई। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे।

१७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका “विदेह” प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल।

१८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि…अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक…। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई।

१९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत।

२०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। “विदेह”क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ।

२१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ।

२२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य।

२३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई।

२४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि।

२५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक हमर उपन्यास स्त्रीधनक विरोधक हम विरोध करैत छी। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।

२६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक।

२७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत।

२८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल – कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी।

२९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना।

३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी।

३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि।

३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई।

३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई।

३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई।

३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक।

३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ।

३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम।

३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना।

३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ।

४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल।

४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई।

४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य।

४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना।

४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि।

४५.श्री धनकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक।

४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत।

४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि।

४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रशंभसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत।

४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना।

५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना।

५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना।

५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल।

५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना।

५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल।

५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना।

५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल।

५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई।

५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि।

५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी।

६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि।

६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब।

६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी।
६३.श्री लक्ष्मण झा “सागर”- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही।
६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्याससहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि।
६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना।
६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय।

विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

(c)२००८-०९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। सहायक सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
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‘विदेह’ ४१ म अंक ०१ सितम्बर २००९ (वर्ष २ मास २१ अंक ४१)

In maithili on October 22, 2009 at 11:26 pm

वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own scriptRoman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi
एहि अंकमे अछि:-
१. संपादकीय संदेश

२. गद्य
२.१. कामिनी कामायनी-कथा-अभिशप्त

२.२. मिथिलेश कुमार झा-रिपोर्ताज
२.३. अनमोल झा- लघुकथा- कोर बैंकिंग
२.४ कुसुम ठाकुर- प्रत्यावर्तन -१६
२.५ मखान खानि ई मिथिला- भीमनाथ झा
२.६. कथा-चौबटियापर- कुमार मनोज कश्यप

२.७. मनोज झा मुक्ति
२.८. प्रकाश झा – रंगदृष्टि; दिल्ली

३. पद्य

३.१. गुंजन जीक राधा- दसम खेप

३.२. सतीश चन्द्र झा-पंखहीन कल्पना
३.३. दयाकान्त-माँ मिथिला ताकय संतान

३.४.पंकज पराशर- -ननकाना साहिब

३.५.कामिनी कामायनी-आजुक विद्यार्थी

३.६.निशाप्रभा झा (संकलन)-आगां

३.७. अजित-ओ तँ मुहेँक बड़जोड़ छथि
३.८.कल्पना शरण-प्रतीक्षा सँ परिणाम तक-३
३.९. सुमित आनन्द
जेम्हरे देखू तेम्हरे लाइन!!

४.. गद्य-पद्य भारती -पाखलो -४ (धारावाहिक)- मूल उपन्यास-कोंकणी-लेखक-तुकाराम रामा शेट, हिन्दी अनुवाद- डॉ. शंभु कुमार सिंह, श्री सेबी फर्नांडीस, मैथिली अनुवाद-डॉ. शंभु कुमार सिंह

५. १.बालानां कृते- देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स).२.कल्पना शरण: देवीजी
६. भाषापाक रचना-लेखन – पञ्जी डाटाबेस (आगाँ), [मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.]

७. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS (Festivals of Mithila date-list)
७.१..Original poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Lucy Gracy from New York.

विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link.
विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे
Videha e journal’s all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions

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भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र ‘मिथिला रत्न’ मे देखू।

गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू ‘मिथिलाक खोज’।

मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू “विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण”।
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१. संपादकीय
आइ काल्हि पञ्जी-प्रबंध मात्र मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण-कायस्थक मध्य विद्यमान अछि। मुदा प्रारम्भमे ई क्षत्रिय( गंधवरिया राजपूत) केर मध्य सेहो छल।
वर्णरत्नाकरमे ७२ राजपूत कुलक मध्य ६४ केर वर्णन अछि, जाहिमे बएस आ पमार दोहराओल अछि। दोसर ठाम ३६ राजपूत कुलक वर्णन अछि। २० टा नामक पूर्वहुमे चर्च अछि। विद्यापतिक लिखनावलीमे, जे प्रायः हुनकर नेपाल प्रवासक क्रममे लिखल गेल छल, चन्देल आ चौहानक वर्णन अछि। गाहनवार वा मिथिलाक गंधवरिया राजपूतक दू टा शखा मिथिलामे छल, भीठ भगवानपुर आ पंचमहला(सहर्सा, पूर्णियाँ)। गंधवरिया,पमार,विशेवार,कंचिवाल, चौहान आदि मिथिलाक महत्त्वपूर्ण राजपूत छथि।मुदा गंधवरिया मिथिलामे महत्त्वपूर्ण छथि आ एखनहु मधुबनीसँ सहरसा-पूर्णियाँ धरि छथि।
वर्णरत्नाकरक राजपूत कुलवर्णनक निम्न लगभग ६२ टा कुल अछि। सोमवंश,सूर्यवंश,डोडा, चौसी, चोला, सेन, पाल, यादव, पामार, नन्द, निकुम्भ, पुष्पभूति, श्रिंगार,अरहान, गुपझरझार, सुरुकि, शिखर, बायेकवार, गान्हवार,सुरवार, मेदा, महार, वात,कूल, कछवाह, वायेश, करम्बा, हेयाना, छेवारक, छुरियिज, भोन्ड, भीम, विन्हा,पुन्डीरयन, चौहान, छिन्द, छिकोर, चन्देल, चनुकी, कंचिवाल, रान्चकान्ट, मुंडौट,बिकौत, गुलहौत, चांगल, छहेला, भाटी, मनदत्ता, सिंहवीरभाह्मा, खाती,रघुवंश, पनिहार,सुरभांच, गुमात, गांधार, वर्धन, वह्होम, विशिश्ठ, गुटिया, भाद्र, खुरसाम, वहत्तरी आदि। एखनो गंगा दियारामे राजपूत आ यादव दुनूक मध्य ‘बनौत’ होइत छथि, आ दुनूमे बहुत घनिष्ठता अछि।
पर्वतमे रहनिहार आ वनमे रहनिहारक वर्णन सेहो अछि वर्ण रत्नाकरमे। जनक राजाक विरुद ज(कबीला) सँ बनल प्रतीत होइत अछि।
महाराजाधिराज ५ मान् मिथिलेशक आज्ञानुसार पछबारिपारक लौकिक आ श्रेणिक व्यवस्था पञ्जीकार लोकनि जे स्थिर कएलन्हि से प्रकाशित भेल छल आ ईहो प्रार्थना छल जे ताहि मध्य जनिका किछु वक्त्तव्य होइन्ह से प्रार्थना पत्र द्वारा श्री ५ मान् मध्य निवेदन करथि, ततः निदान विशिष्ट सभा मध्य एकर परामर्श कए पुनः प्रकाशित कएल जायत।
एतएसँ १ सँ १५ धरि श्रेणी बना देल गेल। ढेर विवाद उठल जे पाइ लए कए उच्च श्रेणी देल गेल।
पछबारिपारक लौकिक नाममे कतहु लौकिक तँ कतहु असल नाम छल।
किछु उदाहरण अछि-
१. सिंहवाड़-मथुरेश ठाकुर
२. मनियारी- मधुपति मिश्र
३. अमौन-बालकराम पाठक
४. भराम- धीतरी
५. बसन्तपुर- माधव मिश्र
६. कोकडीही- रामेश्वर मिश्र
७. नित्यानन्द चौधरी- पिण्डारुछ
८. एडु- भैय्यो मिश्र
९. खुटौनियाँ- भवानीदत्त झा
१०. लक्षमीपति मिश्र- धगजरी
११. कन्त झा- चानपुरा
१२. टङ्कवाल महिधर झा-पेकपाड़
१३. विष्णुदत्तपुरचिकनौट (मुजफ्फरपुर)
१४. चान पाठक- गजहरा
१५. काकठाकुर- धमदाहा
१६. खाशी ध्यामी- रंगपुरा(पूर्णियाँ)

मात्र रसाढ़-अररियाक पञ्जीमे महिलाक पञ्जी भेटैत अछि।
राजाक निहुछल लड़कीसँ बियाह केलापर राजा द्वारा पञ्जीकारकेँ बजाए हुनकर नाममे तस्कर उपाधि जोड़ब, नैय्यायिक गंगेश उपाध्यायक जन्म पिताक मृत्युक ५ सालक बाद होएब, महेशठाकुरक बहिनक विवाह कूच-बिहारक राजकुमारसँ होएब, कविशेखर ज्योतिरीश्वरक उपाधिक संग उल्लेख (हुनकर पाण्डुलिपि नेपालक पुस्तकालयसँ प्राप्त होएबासँ पूर्व), ओकर अतिरिक्त ढेर रास कवि एकटा ढाका कवि , संधिविग्राहिक आदि पद आ कवि शेखर लोकनिक विवरण, मुस्लिम आ चर्मकारसँ विवाहक विवरण आ समाजमे ओहिसँ भेल सन्ततिक प्रति कोनो दुराग्रहक अभाव, ई सभ पञ्जीमे वर्णित अछि।
एहि पोथीक मिथिलाक्षर अंकन जाहि दस हजारसँ ऊपर तालपत्र/ बसहा पत्र/ आधुनिक कागजपर लिखल मिथिलाक्षर पञ्जीक ४०० वर्षसँ ऊपर पुरान पाण्डुलिपि मध्य वर्णित साढ़े पन्द्रह सए वर्षक (४५०-२००९ ए.डी.)क जीन मैपिंग वर्णित अछि।
गंगेश उपाध्याय-छादन छादन, उदयनाचार्य-ननौतीवार ननौती (करियन, समस्तीपुर),महेश ठाकुरक मातृक काश्यप गोत्री सकराढ़ी मूलमे रुद झा। रमापति उपाध्याय प्रसिद्ध विष्णुपुरी, परमानन्दपुरी वत्सगोत्री करमहा मूलक तरौनी गामक चैतन्यक गुरु ई वर्णन सेहो अछि।
पञ्जी डाटाबेस-(डिजिटल इमेजिंग /अंकन/ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यंतरण/ संकलन/ सम्पादन- गजेन्द्र ठाकुर,नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा द्वारा प्रणीत एहि पुस्तकक कारण आवरण देवानन्द प्रसिद्ध छोटी झा पञ्जीकारजीक हस्ताक्षर जे १७६६ केर अछि, केर सेहो प्रयोग भेल अछि आ हुनक पितामह पज्ञीकार रघुदेव झाक लिखल माण्डर मूलक पोथीक प्राचीनतम डिजिटल इमेजिंग सेहो अछि।

आर्यभट्टक विवरण- (27) (34/08) महिपतिय: मंगरौनी माण्डैर सै पीताम्ब र सुत दामू दौ माण्ड्र सै वीजी त्रिनयनभट्ट: ए सुतो आदिभट्ट: ए सुतो उदयभट्ट: ए सुतो विजयभट्ट ए सुतो सुलोचनभट (सुनयनभट्ट) ए सुतो भट्ट ए सुतो धर्मजटीमिश्र ए सुतो धाराजटी मिश्र ए सुतोब्रह्मजरी मिश्र ए सुतो त्रिपुरजटी मिश्र ए सुत विघुजटी मिश्र ए सुतो अजयसिंह: ए सुतो विजयसिंह: ए सुतो ए सुतो आदिवराह: ए सुतो महोवराह: ए सुतो दुर्योधन सिंह: ए सुतो सोढ़र जयसिंहर्काचार्यास्त्रस महास्त्र विद्या पारङगत महामहोपाध्या य: नरसिंह:।। 584(A)

मिथिला पञ्जी-विज्ञान प्रोन्नयन संस्थान, पचही हाउस, मिर्जापुर रोड, दरभंगा द्वारा मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थक अतिरिक्त आन जाति मध्य सेहो पञ्जी व्यवस्था लागू कएल जएबाक गप छल (आचार्य भोलानाथ झा, १८.१०.१९८२), मुदा ई संस्थान स्वयं विलीन भऽ गेल। पञ्जीक उद्देश्य जे छल, तकर विपरीत ई ब्राह्मण आ कायस्थ समुदायक मध्य आन्तरिक स्तरीकरण आनलक, मिथिलाक लोकतांत्रिक मूल्यमे कमी आनलक, पञ्जीकारक निःस्वार्थ सेवा, सत्यनिष्ठा, आ विश्वासी होएबामे कमी आएल,बिकौआ वर्गक उत्पत्ति भेल आ बाल-विवाहक प्रथा आएल, विधवाक संख्यामे अभूतपूर्व वृद्धि भेल आ आइ धरि समाज एहिसँ देखार भऽ रहल अछि कारण विधवा-विवाहक पक्षमे आ बाल-विवाहक विपक्षमे कोनो समाज-सुधार आन्दोलन मिथिलामे नहि दृष्टिगोचर भेल आ मैत्रेयी सन विदुषीक मिथिलामे उत्पत्ति पुरान गप भऽ गेल।

संगहि “विदेह” केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ ३० अगस्त २००९)८४ देशक ८९६ ठामसँ २८,५३३ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी.सँ १,९४,७९४ बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण।

गजेन्द्र ठाकुर
नई दिल्ली। फोन-09911382078
ggajendra@videha.co.in
ggajendra@yahoo.co.in

२. गद्य
२.१. कामिनी कामायनी-कथा-अभिशप्त

२.२. मिथिलेश कुमार झा-रिपोर्ताज
२.३. अनमोल झा- लघुकथा- कोर बैंकिंग
२.४ कुसुम ठाकुर- प्रत्यावर्तन -१६
२.५ मखान खानि ई मिथिला- भीमनाथ झा
२.६. कथा-चौबटियापर- कुमार मनोज कश्यप

२.७. मनोज झा मुक्ति
२.८. प्रकाश झा – रंगदृष्टि; दिल्ली

कामिनी कामायनी

अभिशप्त
ग्राउंड फ्लोरक ओ भव्यतम चूँह चूँह करैत फ्लैट बेली चमेली बोगनबेलिया के लता पुष्प सॅ कनि झाँपल सन कंपाउंडक बङका देवार प’ ठाठ सॅ ठाढ रॉक गार्डनक किछु विशेष नमूना़ झरोखेदार लाल बङका लौह फाटकक कात में चमकैत ग्रेनाइट पाथर एखनो पति के ऊपर ओकर नाम सुनहरा आखर सॅ अपन छाती प’ खोदबेने शान सॅ ठाढ
ओ देवाऱ ओ नेम प्लेपट ओ लता कुंज ओ घर बङ किछु कहय चाहैत छलै ओकर सबहक जीभ तालुॅ सॅ सटि गेल होय जेना़ मुदा ओकर सबहक वियाकुलता ओकरा सब के अवस्से बुझाय पङि जाय जे इर् घर के जनैत छल लग सॅ । ‘शांति’ के नाम एखनो अपन करेज सॅ सटाैने ओ कतेक अशांत छल से वर्णनातीत बूझू ।कतेक बेर सांझ भोऱ वा दुपहरिया में ओ नामें नै दरो देवार संगे ओ घर सेहो वियाकुल भ’ ताकए लागै अपन गृहस्वामिनी के ओ वात्स ल्यपूर्ण मधुर मधुर स्नेह सिक्तए स्पर्श़ ओ परम निश्छल हास्य ओ ममत्व् मुदा हश्र की
कतेक बरख पहिने अपन किराया के फ्लै ट में रहैत रहैत ओकर नजरि अहि ग्राउंड फ्लोर प’ पङल रहैक बिकाउ छल मुदा बङ मॅहग अपन म्युजिक के स्कूल चला चला क’ जे पाय जमा केने छल आ’ इकॉनोमिस्ट घरवला के जमा पूँजी सॅ त’ अहि इलाका में इर् फ्लैेट खरीदनाए अहि जन्म में त’ असंभवे छल़ मुदा जखन इच्छा प्रबल भ’ जाइत छै त’ विधाता कोनो नै कोनो विध आगाँ आबिए जाइर्त छथि । शांति के एक गोट दोस्त म्यूजिकक अनन्य प्रेमी गायक सहकर्मी़ कुबेर क’ परम कृपा पात्र के मददि सॅ ओ अहि एच आइर् जी डी डी ए फ्लैकटक अधिकारिणी बनि हर्षित भ’ आगाँ के सपना के महल सजेबा में लागि गेल छल करीब बरख दिनक’ समय आ’ ऊपर सॅ दस लाख आओर अहि फ्लैगट के भीतरि बाहरि सॅ सुरूचिपूर्ण कोठी में परिवर्तित करि देने छलै़ ओ दप दप करैत संगमरमरिक देवार ओ हल्का हरियर टाइल्स ।कत्त कत्त सॅ नहि आशियाना के सजावटक चीज बोस्त खरीदल गेल चाॅदनी चाैक़ चावङी बजार दिल्ली हाट़ लाइर्फ स्टाइल़ जयपुर जम्मू़ चैन्ने ।ड्राइंग रूमक पछवरिया देवार त एम एफ हुसैनक बङका कैनवासे बूझू़ कि लैंप शेड शैडिलियर्स़ साेरोस्की कटग्लास बाथरूमक सुन्दर टाइल्स़ बाथटब फिटिंग्स पर्दा सब किछु एकदम स्वर्ण मय जेना मिडास टच
तीन बेडरूमक के बङका फ्लैुट में आगाँ दिश कंपाउंड में एक गोट कमरा संगीत कक्ष के रूप में प्रतिष्ठित कराओल गेल जतय सॅ पंचम स्वर में कखनो राग मल्हार छेङल जाए त’ तानपूरा आ’ सितार क संग कखनो राग भैरवी
घरक पाछाॅ बङका पार्क पार्क में बेसी दूर धरि बङका बङका फूलक पाैधा लगवा क’ ओतय दाना पानी राखि दै त’ चिङैचुनमुनक बहार कलरव सेहो ओहि घर के आत्मेमुग्ध करि दैक ।
देखला सॅ लागै़ जेना साैदर्य आ’ कला दूनू के संजाेग कत्ताै छै त’ ओ शांति में वस्त्रे पहिरै त’ पएर क’ सैडिल सॅ ल क़ माथक किलिप धरि एके रंग जेना पुरान फिल्मक कोनो हिरोइन गीत संगीत त ओकर शरीरक सम्पूर्ण सेल में व्याप्ति एक क्षण नै चुप सदिखन चाहे किचन में हो वा बाथरूम में भाैंरा जकॉ गुनगुनाइर्त सुंदरि जखन कालेानी के सङक प’ ठाढ भ’ अपन जन्नत के निहारै त’ अङाेसिन पङाेसिन सबहक करेज में हूक उठै़ जेना ओकर सबहक छाति प’कियाे मूॅग दङङि रहल होय हूॅह’ ।
घरक लता कुॅज एक एक टा़ पजेबा पाथरि प्ला स्टर के ़ लाेकवेदक इर्रखा के भान होइर्त रहैत छलै मुदा ओ सब त’ अपन मलकानिक’उदारता प’ रइर्सी प’ कलात्मनक पहलूॅ प’ गीत संगीत प’ अपने में ‘महो महो’भेल प्रसन्नतापूर्वक ओकरा आसीरबाद दइर्त छलै़ ओकरा प्रसन्न देखि ओ सब मिली क’ झिझिर कोना झिझिर कोना’ खेलाय लागैत छल ।
‘नजरि लागे राज ताेरे बंगले पर’ जखन शांति गबै त’ इर्ंट इर्ंट सिहरि जाए ‘अइर् बंगला प’ कोनो दुष्टा़ कोनो कुटनी के नै लागै नजरि भगवत़ि ।’मुदा तैयाे केकर नजरि एतेक तेज धारदार जरैत गोइठ ासन छलै जे़ ।
उम्हर ओ करिया आ’ ऊजरा झाझी कूकूर केहेन दन भेल अलसाएल पङल एक कोन में ।पहिने त’ भरि भरि दिन नै खाए शांति के बेडरूम में बनल दूनु आलमीरा लग जाहि में ओकर वस्त्र आ’ सैंडिल सब छलै सिूॅघ सूॅघि क’ बेहाल भ’ भूकए लागै़ कखनो अहि बहिनी के दुलार कखनो ओहि बहिनी के सिनेहि के अनठबैत कूॅ कूॅ करैत पङल ।मालिक अपने सॅ कोरा म्ेंा बैसा क दूध में डूबा डुबा क’ बिस्कुट खुआबैथ त’ कनि मनि खाए ।
गृहस्वामी के माय बाबू दूनू परानी जे अहि शहरि में कत्ताे अनतए रहैत छलाह दाैङल आबि गेलखिन्ह दूनु बेटी एक त’ बारहवी करि क’ फैशन टैक्ना ेलौजी करए छल दोसर बारहवीं में ।माय बाबू अपन पुत्रक मुॅह देखिक बेकल भ’जायथ मुदा विधि क’ विधान ।
भुट्ट खाॅट पुरूख पहिनो चुप्पर आब त’ आओर चुप्पे भ’ गेला ।कनि फरिच्छ भेला प’ फैब इंडिया के घुठ्ठी सॅ कनिए ऊपर रंगीन कुरता पहिर छाति तनने दूनू कुकुर के सिकङि पकङि टहलए लेल कालाेनी में निकलए छलाह़ आब बङका भोरे कहु त’ जे अंधारे में घरक पाछाॅ कूकूर के टहला क’ घर में पइस जाइत़ आत्मक निर्वासित सन ।
घर की छल एकदम सुन मसाऩ संगीत मुरूझा गेलए कन्या द्वुय अपने में भरि भरिदिन दोस्त महिम संग घर में चूँ शब्द नै शनै शनै बङकी पढए लेल अमेरिका चलि गेलए छाेटकी सेहो बारहवी करैत कोनो कोर्स करए लेल होस्टल चलि गेलए माए बाबू के अपनो घर दुआरि छलैन्ह कत्तेक दिन छाेङने रहितथि आखिर में गृहस्वामी नाैकरानी आ’ दूनु कूकुर ।घरक रंग रूप एकदमे बदलि गेलए़ गाछ बिरीछ सुखैत़ पार्क सॅ सॅटल सबटा पाैधा सूखा गेलए अन्न पानिक अभाव में चिङै चुनमुन धरि तियागि देलक ओहि बास के ।
ंमहल्ला के दू चारि जनानि जे शांति के जनैत छल ओहि बाटे आबैत जायत एक गोट अर्थपूर्ण दृष्टि ओहि फ्लैनट प’ अवस्से द’ दै आब ककरो नजरि में ओहि घर वा घरनी लेल कोनो इरखा नहि बाॅचल छल़ ओ कलंकित भ’ गेल छलै नै अपराध बोध सॅ ग्रस््रत़ आ’ कहु नै अभिशप्तल ।
कएक बेर सुतलाहा राति में लाेकवेदक वक्राेक्ति’ सुनि घरक नीन उखङि जाए़ ओकरा होय इर् पढल लिखल मूढमति निशाचरि सब आधुनिकता के चकचुक में इर् हो बिसरि गेलए जे देवारो के कान होइत छै ।अपन माथ अपने सॅ नहि पीट सकैत छल माेन होय़ जाेर सॅ हाका्रेश करि मुदा शहरक मर्जादानुसारे कानब रोकै त’ जाेर सॅ सिसकारि ओहि सुनसान राति में दूर दूर धरि अवस्से सुना जाइत छलै
अहि में त’ किम्हराें सॅ दू मत नहि छलै जै दूनू परानी पृथ्वी के दू ध्रूव ।एकटा इर्र घाट़ त’ एकटा बीर घाट एकटा सदिखन हाय पाय कि हाय पाय़ बाप म्या भाय़ बहिन पत्नी संतान सब किछु पाय ।दोसरि नख सॅ शिख धरि कला आ’ साैंदर्यक पुजैगरी भावना क’ उन्मत्त लहरि सॅ सराबोर जखन अपन सुकुमारि कंठ सॅ ‘छुप गया कोइर् रे दूर से पुकार के़ दरद अनोखी हाय़” गबै त’केकर करेज में नै दरेग उठि जाए चिङै चुनमन धरि कुहुकए लागै़ ।जखन ओ दूनू संगी मिल क’ डुएट गाबैथ “तेरे मेरे सपने अब एक रंग है तू जहाॅ भी ले जाए राही़ ।’वा ‘ नैन साे नैन नाही मिलाव देखत सूरत आवत लाज गुइर्याॅ ” तखन त’ पूछू नहि इर्ट पाथरि प्लामस्टर फूल पाैधा जेना सब मिलि क’ ं ंमगन भ’झूमरि गाबए लागै
कतेक प्राेग्राम अपन संगीत स्कूलक तत्वामवधान में श्रीराम सेंटर कमानी आॅडीटाेरियम़ इंडिया हैबिटेट सेंटर वगैरह वगैरह में देने रहै अपन छात्र संगे स्वयं अपनो स्टेज प’ कएकटा गीत ओ आ ‘ओकर दोस्त मिलि क’ प्रस्तुत करैत आ’ प्रबुद्व गणमान्य श्राेता सबहक गगन भेदी ताली के गङगङाहटि सॅ माथ सॅ पएर धरि सराबोर भ’ जायथ ।
गृहस्वामी तखनो डाेनेशऩ फंड अहि फिराक में रहि जायथ ।हुनका तनिको भान नहि कि मुठ्ठी सॅ बालू जकॉ की ससरि रहल अछि ।
आ’ ओहि दिन सावनक सुहाैन गरजैत मेघ आकास में बिजुरि लता संग संगत द रहल छल़ नीचा धरतीके ओहि फ्लैरट में हारमाेनियम आ’सितारक जुगलबंदी आ ओहि जुगलबंदी सॅ जे समाॅ बंधलै़ बंधैत जाइत रहलै पानि बूनी के डरै कोनो विद्दार्थी नहि आयल छलै आ’ नै तबलची वा गिटारिस्ट सएह़ बच्चा सब स्कूल़ घरवला आफिस़ एकसरि दूनू दोस्त़ आकासक कारी कारी मेघ शांति के ह्दूयक शांति भंग करय लेल व्यग्र मन मजुर अहि मेघ में नृत्य रत होय लेल पाखि फङफङेबे कएने छलै कि अप्रत्याुशित रूपेण पति के आगमन पित्तै आन्हर होइत कमंडलु सॅ अपन चुरू में जल निकासि गाैतम श्राप देबए लेल हाथ ऊपर उठाैने ही रहैथ क़ि ‘जाे कुलच्छिनी़ आय सॅ तू प्रस्तर मूरत में परिवर्तित भ जाे ।’ माेन में इर् वाक आैनाइर्ते रहैन्ह कि अहिल्या अपन स्वभावक प्रतिकूल ज्वालामुखी जकॉ फुइट गेल़ हवा में उठल हाथ पकङैत एकदम कठाेर स्वर में बाजल ‘बस्स़ बङ भेल अहाॅ हमरा की सराप देब आय हम अहाॅ के द’ रहल छी़ ’गाैतम हकबक सन ठाढे़ हाथ में कमंडल आ’ जल कत्तय जरूरी फाइलक पुलिन्दा नेने अनचिन्हार सन ताकितै रहि गेला़ ‘इर् कोन रूप एकर अजगुत इर् वएह थिक जे अठारह बरख पहिने लाल जाेङा में मल्लिका ए तरन्नुम बनल ओकरा साेझाँ माथ झूकाैने बैसल़ साैस ससूरक आज्ञाकारिणी पति के अनुगामिनी बच्चा द्वय केर स्नेहिल माय लगक साप्ता़हिक हाट सॅ दूनू हाथ में सब्जी सॅ भरल भरल भारी झाेरा उठा क’ अननिहारि मध्यम वर्गीय सुगृहणी अपन परिवारक धूरि प’ नचैत स्त्री ’
तेहेन ठनका खसलै जे ओहि हरियर वटवृक्ष के सम्पूर्ण सूडऽऽह करि देलकै ।तेकरा बाद बाहर आकास में उधियाति सबटा मेघ तीव्र बसातक झाेंका सॅ उङि गेलुा मुदा ओ अनतए नि ह जाकऽ् गाैतमक मानस पटल प’ स्थायी रूपे बास ल’ लेलकै ।
कतेक घंटा दिऩ सप्ताीह़ मास़ बीतैत रहलै ‘बिन घरनी घर भूतक डेरा’ भ’ गेलै ।सम्पूर्ण घर अस्त व्यस्त़ सुन्नर चिक्क़न कजरिया टाइल्स
क’ छटा मलिन होबए लगलै़ एत्तए बाल्टी फेंकल ओत्त’ झाङू़ ओह की दुर्गति ।
आ’ एक दिन छुट्टी के दिऩ भरिसक कोनो परब छलै फ्लै टक कागद सॅ अप्पनन नाम हॅटा क’ दूनू बेटी के नाम करि शांति आबि क’ ओ कागद गाैतम के पकङा देलकैन्ह अहि चेतावनी के संग ‘हम इर् घर अप्परन बेटी द्वय के दान द’रहल छी़ मुदा एकरा देखबा लेल हम अवस्से आबैत रहब जखन जखन हमर माेन करत़ इर् हमर स्वप्नए हमर शाेणित हमर प्राण अछि।’
सदिखन सलवार सूट़ साङी पहिरए वाली शांति जीन्स टाॅप में सजल एक गोट गाैरवान्वित जुबती सन गरदनि धरि काटल केस झूलबैत़ बिन कोनो लाेच लाच के चलि जायत रहल ।
गाैतम के त’ नहि कहि मुदा बाहरि ग्रेनाइर्ट प’ सुनहरा आखर में लिखल ओ नाम़ ओ घर ओ बाॅचल खूचल पााद पष्प बिलखि बिलखि क’ कानय बाजए लागल छल ‘सरिपहुॅ हम ‘अभिशप्तह’ भ’ गेलहॅू।’
कामिनी कामायनी
20।8।09

_________ मिथिलेश कुमार झापरिचय-पात

नाम ________ मिथिलेश कुमार झा
पिता ________ श्री विश्वनाथ झा जन्म ________ 12-01-1970 केँ मनपौर(मातृक) मे पैतृक ________ ग्राम-जगति, पो*-बेनीपट्टी,जिला-मधुबनी, मिथिला, पिन*- 847223 डाक-संपर्क _____ द्वारा- श्री विश्वनाथ झा, 15, हाजरा रोड, कोलकाता– 700026 शिक्षा :
प्राथमिक धरि- गामहिक विद्यालय मे। मध्य विद्यालय धरि- मध्य विद्यालय, बेनीपट्टी सँ। माध्यमिक धरि- श्री लीलाधर उच्च विद्यालय,बेनीपट्टीसँ इतिहास-प्रतिष्ठाक संग स्नातक-कालिदास विद्यापति साइंस काँलेज उच्चैठ सँ, पत्रकारिता मे डिप्लोमा-पत्रकारिता महाविद्यालय(पत्राचार माध्यम) दिल्ली सँ, कम्प्युटर मे डी.टी.पी ओ बेसिक ज्ञान। रचना: हिन्दी ओ मैथिली मे कविता, गजल, बाल कविता, बाल कथा,साहित्यिक ओ गैर-साहित्यिक निबंध, ललित निबंध, साक्षात्कार, रिपोर्ताज, फीचर आदि। प्रकाशित पहिल रचना:
हिन्दी मे– मुखपृष्ठ अखबार का- जनसत्ता(कलकत्ता संस्करण) मे 19-10-94 केँ(कविता) मैथिली मे- विधवा(कविता)-प्रवासक भेंट(मैथिली मासिक कोलकाता)-रिकार्ड तिथि उपलब्ध नहि, आरक्षण सिर्फ सत्ताक हेतु- आलेख(प्रवासक भेंट-कोलकाता)- नवम्बर 1994 कें। प्रकाशित रचना: मैथिली:- प्रायः 15 गोट कविता, 17 गोट बाल कविता, 18 गोट लघुकथा, 3 गोट कथा, 1 टा बालकथा, 44 गोट आलेख आ 6 गोट अन्य विविध विषयक रचना प्रकाशित। प्रकाशित रचना:- हिन्दी:- प्रायः 10 गोट कविता/गजल, 18 गोट आलेख, 1 गोट कथा ओ 3 गोट विविध विषय प्रकाशित।

मिथिलेश कुमार झा

“हम मैथिल” (मैथिली त्रैमासिक) पत्रिकाक लोकार्पण

दिनांक २६.०७.०९ (रवि दिन) केँ हावड़ाक मेडिज्कल क्लबक सभागारमे साँझू पहर आयोजित एकटा कार्यक्रममे मैथिली त्रैमासिक “हम मैथिल”क लोकार्पण भेल।
एहि कार्यक्रमक अध्यक्षता कएलनि श्री किशोरीकान्त मिश्र। कार्यक्रमक उद्घाटन कएलनि श्री युगल किशोर झा, अतिथि छलाह श्री गंगा झा ओ श्री रामलोचन ठाकुर। पत्रिकाक विमोचन श्री नवीन चौधरीक हाथेँ भेल। संचालन कएलनि श्री प्रमोद ठाकुर। एहि अवसरपर विभिन्न वक्ता लोकनि पत्रिकाक हेतु हर्ष जनबैत संपादक-प्रकाशककेँ शुभकामना देलनि।
दोसर सत्रमे श्री रामलोचन ठाकुरक अध्यक्षतामे एकटा कवि सम्मेलन भेल। एहिमे कविता पाठ कएलनि श्री अजय कुमार झा “तिरहुतिया”, श्री अमरनाथ झा “भारती”, श्री अनमोल झा, श्री मिथिलेश कुमार झा, श्री विनय भूषण आ श्री रामलोचन ठाकुर।
कार्यक्रमक अन्तमे श्री मनमोहन चंचल धन्यवाद ज्ञापन कएलनि।
लोकार्पित पत्रिका:
हम मैथिल (प्रवेशांक जुलाइ-सितम्बर २००९)
प्रधान सम्पादक-श्री रामलोचन ठाकुर
संपादक-श्री मनमोहन मिश्र “चंचल”
संपादकीय पता-१४८ सी.रोड, बामनगाछी, सलकिया, हावड़ा-६, फोन-९९०३२०१०५०
पृष्ठ-४०, दाम-१६ टाका

“संपर्क”क मासिक बैसार
१२ जुलाइ २००९ (कोलकाता)-संपर्कक जुलाइ मासक बैसार नियमानुसार मासक दोसर रवि (१२ जुलाइ)केँ संध्या पाँच बजेसँ नवीन प्रकाशनक कार्यालय-कक्षमे भेल। एहि बैसारक अध्यक्षता श्री नवीन चौधरी कएलनि। आरम्भिक कुशल-क्षेम ओ विविध चर्चाक उपरान्त उपस्थित रचनाकार लोकनि अपन-अपन रचनाक पाठ कएलनि। संपर्कक परम्परानुसार संपर्कमे प्रस्तुत रचना टटका, अप्रकाशित ओ अपठित होइछ। प्रस्तुत रचना सभपर उपस्थित श्रोतागण अपन-अपन प्रतिक्रिया जनौलनि। रचनाक पाठ कएनिहार रचनाकार छलाह-मिथिलेश कुमार झा (समय-संकेत, उपकार-लघुकथा), अनमोल झा (नीक लगैत अछि हमरा-कविता), सुरेन्द्र ठाकुर (देखब कहीं छिलकि नञि जाए-कविता, मुइल राष्ट्र-कथा), नवीन चौधरी (दू गोट कथा)। पठित रचना पर उक्त रचनाकार सभक संगहि श्री किशोरीकान्त मिश्र, श्री नवोनारायण मिश्र, श्री देवशंकर मिश्र, श्री रोहित मिश्र, श्री विमलकान्त मिश्र, श्री शंकर मिश्र आदि अपन प्रतिक्रिया जनौलनि।

अनमोल झा (१९७०- )-गाम नरुआर, जिला मधुबनी। एक दर्जनसँ बेशी कथा, साठिसँ बेशी लघुकथा, तीन दर्जनसँ बेशी कविता, किछु गीत, बाल गीत आ रिपोर्ताज आदि विभिन्न पत्रिका, स्मारिका आ विभिन्न संग्रह यथा- “कथा-दिशा”-महाविशेषांक, “श्वेतपत्र”, आ “एक्कैसम शताब्दीक घोषणापत्र” (दुनू संग्रह कथागोष्ठीमे पठित कथाक संग्रह), “प्रभात”-अंक २ (विराटनगरसँ प्रकाशित कथा विशेषांक) आदिमे संग्रहित।
कोर बैंकिंग

-डाक बाबू, हमर एकटा मनीआडर अबै बला छै। देखियौ ने एलै हे की नै?
-के फेकना पठेतौ।
-हँ, एलैहे की?
-नै गै, फार्म तऽ एलौ हे, पाइ तऽ एखन नै एलैहे, एतै तऽ काहा पठेबौ।
-आर कनी दिन ठकि लिअ गिरहत! कहै छलै फेकनाक बाउ जे किदैन बैंकिंग भऽ जाइ छै झंझारपुरक बैंक तऽ ओतऽ पाइ जमा करत नेना, एतऽ संगे संग आबि जेतै खाता मे…!!

कुसुम ठाकुर
प्रत्यावर्तन
१६
हमर एकटा स्वभाव अछि, जे आई धरि हम नहि बदलि सकलियैक अछि, आ आब शायद बदलि नहि सकैत छियैक। हमरा मोन मे खराप बात बहुत जल्दी आबि जायत अछि। पचास तरहक आशंका तुंरत आबि जायत अछि। हम कतबो कोशिस करैत छियैक जे मोन सs निकालि दियैक मुदा कियैक ओ निकलत। चाहे कियो घर सs बाहर गेल होयथ आ समय पर नञ लौटल होयथ किंवा कोनो तरहक मोन खराप होय। हम बहुत जल्दी घबरा जायत छी। आ तखैन्ह नञ हमरा खएबा मे नीक लागैत अछि आ नञ दोसर कोनो काज मे। इ हमर सबस पैघ कमजोरी अछि एहि लेल हमरा हमर शुभ चिन्तक बेटा हमर पति आ हमर सब सs नीक संगी जे आई धरि एकहि टा छथि सेहो कैयैक बेर समझौलैथ आ समझाबैत छथि मुदा ओहि स्वभाव के हम नहि बदलि सकलहुँ।

हम सोचि के अस्पताल गेल छलहुँ जे हम श्री ठाकुर जी के लs कs घर अयबैन्ह आ अनबो कयलहुँ मुदा हमरा पता चलल आ डॉक्टर बी.एन.झा कहलैथ जे bone marrowकराबय परतैन्ह आ ओहो वेल्लोर जाय कs , इ सुनतहि हमरा जेना खराब दिनक आशंका भs गेल। ओना तs डॉक्टर साहब बुझेलथि जे जमशेदपुर मे सेहो bone marrow भs सकैत छलैन्ह, चूँकि ओ चाहए छलथिन्ह एक बेर वेल्लोर मे सबटा जाँच भs जाय ताहि लेल ओ जमशेदपुर मे आगू जाँच नञ कराय वेल्लोर पठा रहल छलथिन्ह। ओहि दिन, राति भरि हमरा कियैक नींद होयत। भरि राति सोचितहि प्रात भs गेल।

दोसर दिन सs वेल्लोर जेबाक आ अगुलका जाँच करेबाक विषय मे सोचय के छल, आ हम सब सब सँ पहिने अपन बहिन जमाय, यानि छोट बहिनक पति जे नीक डॉक्टर छथि आ धनबाद मे छलाह हुनका सs गप्प कयलहुँ। ओहि समय हमर बाबूजी सेहो धनबाद मे छलाह। सब सs बात बिचारक बाद भेलैक जे बाबुजी हमरा सब सँग वेल्लोर जयताह आ माँ बच्चा सब संग जमशेदपुर मे रहतिह।

बाबुजी श्री ठाकुर जी आ हम तीनू गोटे साँझ मे वेल्लोर पहुँचलहुँ। होटल पहुँचि आ तैयार भs एक बेर अस्पताल गेलहुँ आ अस्पताल देखि आबि गेलहुँ। राति भरि हमरा कियैक नींद होयत भोर मे हम सब समय पर तैयार भs अस्पताल पहुँचि गेलहुँ। अस्पताल मे तs किछु दिक्कत नहि छलैक मुदा जाहि डॉक्टर के ओहि ठाम डॉक्टर बी. एन. झा पठेने रहथि हुनक विषय मे हम सब पता करय के लेल घुमि रहल छलहुँ। हमरा सब केर घुमैत देखि एक सज्जन रुकि कs पुछलाह ” अहाँ सब केर कोनो दिक्कत अछि वा किनको खोजि रहल छि”? हम तुंरत कहलियैन्ह “असल मे हमरा सब केर डॉक्टर कुरियन सs देखेबाक अछि, हुनके खोजि रहल छियैन्ह” । सुनतहि ओ पुछलाह “अहाँ सब रजिस्ट्रेशन करवा लेने छी “? जहिना हम सब कहलियैन्ह नय करवाबय के अछि, ओ तुरंत अपना संग लs जा रजिस्ट्रेशन करवा संग चलय लेल कहलाह आ ओकर बाद कुर्सी सब लागल हॉल छलैक ओहि ठाम बैसय लेल कहि कतहु चलि गेलाह। श्री ठाकुर जी केर नाम लs बजेलकैन्ह हम तीनु गोटे भीतर गेलहुँ । भीतर पहुँचि हम जे देखलहुं तs हमर आश्चर्यक ठेकान नहिं रहल। डॉक्टर कुरियन आओर कियो नहि, ओ तs ओ व्यक्ति छलाह जे हमरा सब केर सब काज करवा अपना सँग ओहि ठाम तक अनने छलाह । हम बाबुजी आ श्री लल्लन जी तीनु गोटे एक दोसराक मुँह तकैत रहि गेलहुँ । विश्वास नहिं भेल जे एतेक नामी आ पैघ डॉक्टर के इहो रूप होइत छैक । हम सब तs कहियो कल्पना मे सेहो नहि सोचने आ देखने रहियैक डॉक्टर के इ रूप ।

डॉक्टर कुरियन पहिने जमशेदपुरक पूरा रिपोर्ट देखि आ विस्तार सs सब किछु पुछलाह आ ताहि केर बाद इ कहि अस्पताल मे भर्ती होयबाक लेल कहलाह जे दू तीन दिन मे सबटा जाँच भs जायत ताहि केर बाद हम अहाँ सब केर किछु कहि सकैत छी। अस्पताल मे भर्ती करेलाक बाद दू तीन दिन तक हम सब दिन, राति मे हिनकर भोजनक बाद करीब १० बजे आपस होटल बाबुजी केर सँग आबि जायत छलियैन्ह । मोन तs अयबाक नहिं होयत चल मुदा बाबुजी आ हिनकर जिद्द रहैत छलैन्ह तsआबि जाइ ।राति भरि हम किछु किछु समय पर बाथरूम जाइ आ समय देखि । भोर ६ बजे सs पहिनहि अस्पताल पहुँचि जायत छलहुँ बाबुजी अपन बाद मे आबथि।

एक सप्ताह धरि जाँच आ रेपोर्टक सिलसिला चलैत रहलैक आ एक सप्ताह बाद एक दिन डॉक्टर कुरियन अपने अपन पूरा डाक्टरक दल सँग अयलाह । एक टा चीज हम वेल्लोर अस्पताल मे देखलहुँ जे कोनो ठाम देखय के लेल नहिं भेटल। ओहि ठामक डाक्टर सब पूर्ण रूपेण मरीज के लेल समर्पित रहैत छथि आ ताहू मे डाक्टर कुरियन के हम महान कहि सकैत छियैन्ह । सब दिन ओ आबि पहिने मरीज वाला बिछावन केर बगल मे एकटा आओर बिछावन रहैत छलैक ओहि पर बैसि जाइत छलाह आ पहिने हाल चाल पुछैथ । ओहियो दिन आबि बैसी गेलाह आ हाल चाल पुछलाह, ताहि केर बाद कहलाह “आब सबटा रिपोर्ट तs आबि गेल अछि, मुदा हम सब bone marrow करबैन्ह जाहि मे बहुत कष्ट होइत छैक। ठाकुर जी केर खून बहुत कम छैन्ह जाहि लेल हमरा सब केर खुनक आवश्यकता परत आ अहाँ सब मे सs एक गोटे के खून देबय पडत। हम तुंरत खून देबाक लेल तैयार भs गेलहुँ। हमरा घर मे हमर चारू गोटे के एकहि ग्रुप केर खून छैक। डाक्टर कुरियन हिनका देखि जखैन्ह बाहर गेलाह तs हुनक एकगोट सहायक डाक्टर हमरा बाहर बजेलाह आ हमरा एकटा फार्म दs blood bank जा खून देबाक लेल कहलथि ।

हम फार्म लेलाक बाद हिनकर केबिन मे नहिं गेलहुँ आ सोझे blood bank चलि गेलहुँ। नर्स के जहिना फार्म देखेलहुँ ओ तुंरत एक टा कुर्सी पर बैसेलथि आ किछु समय बाद हमरा एकटा खूब पैघ हॉल मे लs गेलिह । जहिना हॉल मे हम पैसलहुँ पूरा हॉल मे सब ठाम सब बिछावन पर लोक सुतल खून दैत छल । इ देखतहि हमर डर सs हालत ख़राब भs गेल । हमरा सूई सs बड डर होइत छलs आ सुनने रहियैक जेblood donation मे बहुत समय लागैत छैक।मोन मे एक सँग कैयैक टा प्रश्न उठैत छल जाहि मे पहिल ई: जँ हम बेहोश भs गेलहुँ तs की होयत ?हमरा सँग आओर कियो नहि छलs । बाबुजी के हम खून देबय लेल नहि कहितियैन्ह ।

सूई घुसाबय सs पहिने तक हम बहुत डरल छलहुँ मुदा एक बेर सुई घुसा देलक ताहि केर बाद साहस बढि गेल आ दर्द से नहि होइत छल। जखैन्ह हमरा बुझय मे आबि गेल, हम बेहोश नहि होयब तs हम नर्स सs पुछलियैक “इ खून हमर पति के देल जयतैन्ह नय” ? ओ कहलक ” नहि अहाँक पति के दोसर खून हुनक ग्रुप के देल जायत जे bank सs उपलब्ध होयत “। हम सुनने छलियैक जे bank मे HIV केर जाँच नहि होइत छैक जाहि चलते मात्र सम्बन्धी व जे मरीजक संग आयल रहैत छथि हुनके खून लेल जाइत छलैक , इ सुनतहि हमरा और मोन बेचैन होमय लागल तथापि हम ओहि blood bank केर विभागाध्यक्ष छलैथ हुनका बजवोलियैन्ह आ कहलियैन्ह हमर आ हमर पति केर खुनक एकहि ग्रुप छैन्ह । ओहो हमरा कहलथि ई संभव नहि छलैक । हमरा किछु नय फ़ुराइत छल, तथापि हम हुनका आग्रह केलियैन्ह जे “हमर खून पर हमर नाम आ मरीजक नाम लिखि राखि दियोक आ किछु घंटा रुकि कsकोनो दोसर ठाम खून पठाबियौक , ताबैत हम डॉक्टर कुरियन सs भेंट कयने आबैत छि “। डॉक्टर कुरियन केर नाम सुनतहि डॉक्टर हमरा कहलैथ “ओना तs हम सब,सब खून पर खून देबय वाला केर नाम,मरीजक नाम आ तारीख लिखि दैत छियैक । डॉक्टर कुरियन कहि देताह तs हम अहींक खून अहाँक पति लेल पठा देबैन्ह “।

नर्स आबि हमर सुई निकालि देलैथ आ हमरा हिदायत देलैथ जे कम स कम १५ मिनट रुकय लेल मुदा हम सुई निकालैत के संग अपन चप्पल पहिरलहुं आ तुंरत ओहि ठाम सs बिदा भs गेलहुं । हम देखलियैक नर्स चाय लय आबि रहल छलैथ मुदा हमरा ओहि समय इहो होश नय छल जे हम खून देने छलियैक तुंरत नय जयबाक चाही । हम आठ नौ दिन सs वेल्लोर मे छलहुँ आ ओतबा दिन मे ततेक बेर डॉक्टर कुरियन सs काज पड़ल छलs जे कोन समय मे डॉक्टर कुरियन कतय रहैत छथि से हमरा बुझल भs गेल छल । हम जल्दी जल्दी ओहि वार्ड पहुँचलहुँ मुदा पता चलल डॉक्टर कुरियन ओहि ठाम नहि छलाह ओहि वार्ड केर डॉक्टर हमरा दोसर वार्ड केर नाम बता कहलथि अखैन्ह ओहि ठाम भेटताह , हम लगभग दौरति ओहि वार्ड तक पहुँचलहुँ ।

वार्ड मे पहुँचलहुँ ताबैत धरि पसीना सs लथपथ भs गेल छलहुँ हमरा देखि केयो कहि सकैत छलs जे हम थाकल आ परेशान छी । वार्ड मे पहुँचति देरी हम डॉक्टर कुरियन केर सहायक डॉक्टर सs हुनका विषय मे पुछलियैन्ह मुदा ओ हमारा जवाब देबय सsपहिने पुछलाह “आखिर की बात अछि अहाँ एतेक घबरायल कियैक छि? पहिने अहाँ बैसू आ हमरा कहू की बात छैक “? आ तुंरत एक ग्लास पानि मँगा कs पिबय लेल देलाह , मुदा हम पानि पिबय सs पहिनहि एक साँस मे हुनका सब बात बता देलियैन्ह आ कहलियैन्ह” हमारा डॉक्टर कुरियन केर मदद चाही” । ओ तुंरत कहलाह अहाँ के हम कतहु नय जाय देब हम तुंरत डॉक्टर कुरियन के एहि ठाम बजा दैत छियैन्ह । तुंरत अपन पेजर निकालि खबर पठा देलथि हुनक समाद अखैन्ह खतमो नहि भेल छलैन्ह कि हम डॉक्टर कुरियन के आबैत देखलियैन्ह । हम दौरि क डॉक्टर कुरियन लग पहुँचलहुँ आ सबटा बात बता देलियैन्ह । हमर गप्प सुनैत देरी डॉक्टर कुरियन हमरा कहलाह “अहाँ घबराऊ जुनि, अहीं केर खून अहाँक पति के देल जयतैन्ह” आ फ़ोन उठा ओहि ठाम सs blood bank केर विभागध्यक्ष के फ़ोन करि कहि देलथिन्ह जे “श्री ठाकुर जी केर केबिन मे हुनक पत्नी जे खून देने छथिन्ह सैह पठायल जाय “। एतवा वाक्य सुनि हमरा जे ख़ुशी भेटल ताहि केर हम वर्णन नहि कs सकैत छियैक । एहि देश मे एहेनो डॉक्टर छैथ ताहि केर हमरा अंदाज नहि छल । हम हुनका धन्यवाद कि देतियैन्ह हम एक टक हुनका देखैत रहि गेलियैन्ह। ओ हमरा दिस देखि कहलाह अहाँ केबिन मे जाऊ साँझ मे श्री ठाकुर जी केर अहीं वाला खून चढ़तैन्ह।
हम डॉक्टर कुरियन सs भेंट करि केबिन दिस जाइत छलहुँ रास्ता मे हमरा चक्कर आबि गेल आ हम एक ठाम कुर्सी पर बैसि गेलहुँ। पॉँच दस मिनट केर बाद हम केबिन पहुँचलहुँ, बाबुजी आ इ हमरा लेल चिंतित छलैथ जे हम कतs चलि गेल छलहुँ, देखैत देरी पुछलाह “कतs गेल छलहुँ “। हम कहलियैन्ह “खून देबय लेल, दsदेलियैक आ आब साँझ मे अहाँके खून चढत “।

साँझ मे हिनका जल्दी भोजन करवा देलियैन्ह खून चढ़ेनाइ शुरू भेलैक ओकर किछु समय बाद बाबुजी के होटल पठा देलियैन्ह आ हम हिनका बगल मे बैसि गेलहुँ। कतबहु कहैथ सुति रहु हमरा कियैक नींद होयत एक तs चिंता दोसर हम जमशेदपुर मे देखने रहियैन्ह जहाँ हमर ध्यान दोसर दिस देखैथ तs झट द tube के पकरि ओकर speed बढ़ा दैत छलाह जे कहुना खून चढेनाइ जल्दी खतम भs जाय। राति मे इ सुति रहलाह आ हम हिनकर हाथ पकरने बैसल रहि गेलहुँ आ जखैन्ह पूरा खून चढि गेलैन्ह तs नर्स के बजा ओकर पाइप सब निकलवा ताहि केर बाद बगल वाला बिछावन पर परि रहलहुँ।

दोसर दिन भोर मे डॉक्टर के आबय सs पहिने नर्स आबि जाँचक लेल हिनकर खून लs गेलैन्ह आ ओकर दोसर दिन भोर मे bone marrow होमय के छलैक ।

डॉक्टर कुरियन अपन पूरा डॉक्टरक दल सँग अयलाह हुनका देखैत नहि जानि कियैक हमरा आशंका आ डर दुनु होमय लागल। हमरा मात्र एतबा बुझल छल जे रीढ़ केर हड्डी सs खून लेल जयतैन्ह जे कष्टप्रद होइत छैक। डॉक्टर सब जहिना हिनकर केबिन मे घुसलथि हमरा आ बाबुजी के बाहर जेबाक लेल कहि देलैथ। हम तs एक सँग ओतेक डॉक्टर के देखि घबरायल छलहुँ। बाहर मे ठाढ़ पचास तरहक मोन मे आबैत छल। अचानक हिनकर कानय केर आवाज बुझायल, ओ सुनतहि हमरा कना गेल आ हमर आँखि के आगु जेना अन्हार भs गेल। हम बाबुजी के बिना किछु कहनहि जा एकटा कुर्सी पर बैसि गेलहुँ । बाबुजी के कोना अपन स्थिति केर विषय मे बुझय देतियैन्ह । डॉक्टर जखैन्ह बाहर निकलाह तs हमरा कहलैथ अहाँ सब आब भीतर जाऊ । भीतर गेलहुँ तs इ कानैत छलाह आ हमरा देखैत देरी कहि उठलाह “मारि देलक “। हम वर्णन नहि करि सकैत छी जे हमरा ओहि समय मे असगर केहेन बुझायल, बाबुजी छलाह मुदा हुनका सोंझा हम अपन वेदना के कोना प्रकट होमय दितियैन्ह , ओ नहि रहितथि तs हम अवश्य कानय लगितौन्ह।

दोसर दिन डॉक्टर कुरियन अपन डॉक्टरक दल सँग सबटा रिपोर्ट लs कs अयलाह ,आ आबि श्री ठाकुर जी केर बगल मे बैसि गेलाह। पहिने हुनक हाल चाल जे कि सब दिन पुछैत छलाह पुछलाह आ ताहि केर बाद अपन असली मुद्दा पर अयलाह। सब सsपहिल ओ हमरा सब केर कहलाह हम सबटा रिपोर्ट देखि लेने छी आ इ निष्कर्ष निकलल अछि जे अहाँक “cell malignant” अछि। ओहि समय मे हम इ तs नहि बुझैत छलहुँ जे “malignancy” की होइत छैक मुदा इ बुझा गेल जे किछु ख़राब बीमारी छैक, किछु गरबर छैक। डॉक्टर कुरियन सबटा बात बताबैत कहलाह आब चूँकि इ “oncology department” केर case छैक ताहि लेल हम अहाँ के “oncology department” पठा रहल छी। oncology शब्द सुनैत केर सँग हमरा जेना सब बुझय मे आबि गेल आ ओकर बाद हमरा मुँह स एक शब्द किछु नहि निकलल जे हम डॉक्टर सँ किछु पुछितियैन्ह । डॉक्टर कुरियन अपन सहायक डॉक्टर सब केर कहि कs चलि गेलाह जे अस्पताल सँ छुट्टी देबाक लेल आ “oncology” विभागक डॉक्टर सs देखबाक लेल सबटा कागज तैयार करि देबाक लेल। हम सब आपस होटल आबि गेलहुँ।

दोसर दिन हम सब होटल सs सीधा oncology department डॉक्टर प्रसाद लग पहुँचलहुँ । ओहि दिन हम आ श्री ठाकुर जी गेल छलहुँ। बाबुजी के आँखि देखेबाक छलैन्ह ओ आँखि वाला अस्पताल चलि गेल छलाह, जे एक तरह सँ नीके छलैक । डॉक्टर प्रसाद जे हमरा सोंझा मे कहलथि से भगवान कोनो पत्नी के ओ दिन नहि देखाबथि जे हुनका ओ सुनय परैन्ह । डॉक्टर प्रसाद विस्तार सs बिमारी के विषय मे बतेलाक बाद कहलथि जे इ बिमारी मे लोक बेसी सs बेसी पन्द्रह साल जीबैत छैक। किछु आओर जाँच से कराबय लेल कहलाह मुदा ओ बाहर रहि सेहो करायल जा सकैत छलैक । हम सब आपस होटल अयलहुँ, इ त बहुत राति तक जागल रहलाह आ ओकर बाद सुति गेलाह मुदा हम तs भरि राति जागले रहि गेलहुँ। दुनु गोटे एक दोसरक स्थिति बुझैत छलियैक मुदा कथि लेल राति भरि मे एको शब्द बाजि होयत । भोर मे तैयार भs समय पर डॉक्टर प्रसाद लग पहुँचि गेलहुँ ।

डॉक्टर प्रसाद किछु जाँच केलाक बाद कहलैथ जरूरत परतैक तS “WBC” बदलय परतैक आ ओहि लेल एक गोट अपन आदमी के तैयार रहय पड़त जिनकर ” WBC “लेल जा सकैत अछि । ओ “WBC” बदलय केर सबटा प्रक्रिया बता देलाह । हमरा एकटा फॉर्म द ब्लड बैंक जेबाक लेल कहलाह आ हिनका फेर सs भरती हेबाक लेल । हम हिनका केबिन मे पहुँचा ओहि ठाम सs फेर ब्लड बैंक पहुँचि गेलहुँ । ब्लड बैंक केर डॉक्टर हमरा हाथ सँ फॉर्म लs एकटा कुर्सी पर बैसय कहलाह। किछु समय बाद आबि खून निकालि लेलैथ। हम जहिना कुर्सी पर सs उठय चाहलहुँ हमर माथ घुमि गेल आ हम धम्म सs फेर कुर्सी पर बैसि गेलहुँ । इ देखि हमर बगल मे नर्स छलैथ से पकरि हमरा तुंरत बेड पर सुता देलिह । हम उठलहुँ तs डॉक्टर हमरा कहय लगलाह, “हम अहाँक खून नहि लs सकैत छी कियैक तs अहाँ जाँच समय मे बेहोश भs गेलहुँ अछि। इ सुनतहि हमरा कनाइ छुटि गेल मुदा हम अपना आप के रोकि लेलहुँ आ ओहि ठाम सँ निकलि चलि देलहुं।

हमरा किछु नहि फ़ुराइत छल हम की करी हमरा संग आओर कियो नहि छलाह । हम मोन दुखी कयने चलल जाइत छलहुँ आ सोचैत छलहुँ आब की होयत। अचानक सामने मे डॉक्टर कुरियन पर नजरि गेल ओ हमरा देखि हमरे तरफ आबैत छलाह। ओ हमरा पुछलाह ” डॉक्टर प्रसाद की कहलाह”, हम हुनका सबटा परिस्थिति बता देलियैन्ह आ इहो जे हमरा लग दोसर कियो नहि छैथ हम आब की करी। ओ तुरन्त कहलाह अहाँ घबराऊ जुनि जरूरत परतैक तs हम अपन WBC अहाँक पति के देबैन्ह । इ सुनैत देरी हम अपना आप के नहि रोकि पयलहुँ आ कानय लगलहुँ । मोन मे भेल कि एहनो डॉक्टर होइत छैक? ओ वाक्य आय धरि डॉक्टर कुरियन केर क़र्ज़ हमरा लग अछि। आय धरि हम डॉक्टर कुरियन के कहल वाक्य नहि बिसरि सकलहुँ।

मखान खानि ई मिथिला- भीमनाथ झा

मिथिलाक लोक एतेक सरस, मैथिली भाषा एते मृदुल, एहि ठामक भूमि एते उर्वर, उपवन एते सघन आ हरियर कंचन अछि- तकर कारण की? की ई नहि जे एतऽ जलाशयक आगार अछि, नदी पोखरि डबरा अपार अछि?

मिथिलामे समुद्र नहि छै, तेँ एहि भूमिक वासीक स्वभाव नोनछराइन नहि लागत, लोक “अथाह” नहि भेटत। मिथिलामे गंगा बहै छथि,तेँ समाज पवित्र अछि; मधुर जलक प्रवाह चलै छै, तेँ लोकोमे मधुरताक तरंग उछलैत देखब। पानिक एतऽ कमी नहि, लोकक आँखियोमे “पानि” भेटि जायत।

कवीश्वर चन्दा झा मिथिलाकेँ नदी-मातृक देश ओहिना नहि कहने छथि-

नदी-मातृक क्षेत्र सुन्दर शस्य सौं सम्पन्न
समय सिर पर होय वर्षा बहुत संचित अन्न
दयायुत नर सकल सुन्दर स्वच्छ सभ व्यवहार
सकल विद्या-उदधि मिथिला विदित भरि संसार

नदिए नहि, पोखरियोक प्रधानता अछि एतऽ। एहन कोनो गाम नहि, जतऽ दू-चारि दस-बीस छोट-पैघ पोखरि नहि हो। सैकड़ो वर्ष पुरान एहन-एहन सयक धक पोखरि एखनो एतऽ अछि जकरा “दैता पोखरि” कहल जाइछ, माने कोनो दैत्य आबिकऽ ओकरा खुनने छल! मनुक्ख बुते कतहु ओते टा पोखरि खूनल होइ! तहिना, बड़का पोखरिमे “महराजी पोखरि” सभ अछि। छोट-मोट तँ कैयन हजार होयत।
तेँ, मिथिलामे जलकरक चलनि बेसी। जलक सर्वप्रधान फसिल थिक- मखान। मखान- ई शब्द ध्यानमे अबितहिँ मिथिलाक अनुपम व्यक्तित्व साकार भऽ उठैछ। एहन व्यक्तित्व जकर जोड़ नहि- अद्वितीय।
मखान, कहल जाइछ, स्वर्गोमे नहि भेटैछ। देवतासभकेँ मखानक तस्मै लेऽ, पाग कयल मखानक फोँका लेऽ मन जखन ललचाय लगै छनि तँ मिथिलामे जन्म लै छथि आ जीहकेँ जुड़बै छथि।
मिथिलाक एक खास पाबनि थिक कोजगरा- उल्लासक पाबनि, उमंगक पाबनि, लक्ष्मीक आराधनाक पाबनि। ओहि दिन मखान परसबाक प्रथा अछि। से मिथिलेमे अछि।
मखान मिथिलाक खास वैशिष्ट्य बनि गेल अछि। तेँ, एहि ठामक साहित्योमे मखान प्रवेश कऽ गेल अछि। अनेक साहित्यकार कोनो-ने-कोनो प्रसंगमे एकर नाम लेने छथि। जाहि रचनामे मखान शब्द आबि गेल अछि, ओ रचना ओहने ललितगर-देखनगर, ओहने कोमल-निर्मल, ओहने हुलसगर-सुअदगर भऽ गेल अछि। कविवर सीतारामझाकेँ भगवानस रामक सुयशक निर्मलता आ महिमाक व्यापकता देखयबाक भेलनि तँ कहि उठला-
आश्विनीक चान जकाँ
दही ओ मखान जकाँ
राम-यश प्रान जकाँ
विश्वमे पसरि गेल।

कविवर सीतारामझा एक आनो प्रसंगमे, लक्ष्मी-पूजाक नैवेद्यक अंग-रूपमे, मखानक नाम लेने छथि-
पूजथि लक्ष्मी-पद नबेद दय मधुर मखानक।
अपनहुँ खाथि प्रसाद भाग धनि ताहि किसानक॥

मखानक उल्लेख कयनिहार मैथिली साहित्यकारक कमी नहि अछि, किन्तु एतऽ तीन कविक मात्र चर्चा करऽ चाहब। पहिल छथि कविचूड़ामणि मधुप, जनिक अविस्मरणीय कविता “कोजगराक मखान” अछि। दोसर छथि मंत्रेश्वर झा, जनिक गीतपोथीक नाम थिकनि- “पान एतैए मखान एलैए”। तेसर थिका गोपालजी झा “गोपेश” जे अपन पोथी “मखानक पात” सँ कतेको गोटेक मुहँ पोछऽ चाहलनि।
मधुपक “कोजगराक मखान”क विषयवस्तु उच्च वर्ग द्वारा दलितपर कयल गेल अत्याचारपर आधृत अछि। ई कविता वर्ग-वैषम्यकेँ उघारिकऽ राखि देने अछि। मधुप करुणरसक महान कवि थिका। एतऽ एक फोँका मखानसँ कवि करुणाक निर्झरिणी बहा देने छथि। किन्तु, ताहिसँ पहिने उत्सवक जीवन्तता देखल जाय-

आबालवृद्ध जुटि रहल-
आसमर्दे विदीर्ण जनु युग्म कान
मिलि हमहुँ ताहि मानव-निधिमे
बहि गेलहुँ न गुनि अपमान-मान,
कहुँ दू फोँका, कहुँ एक
कतहु नहि सेहो
तेहन महगिक विधान,
किछु हो,
आजुक निशिमे कहुना
निश्चय थिक खाइ मखान पान।
ता कि ओही भीड़मे एक अवांछित छौँड़ा सन्हिया गेलै। चीन्हि गेलापर छ्रपिटा देल गेलै। कविक नजरि पड़लनि-
जाकऽ समीप देखल निगाहि,
देखितहिँ हिय कहलक आहि! आहि!
गोविन्द त्राहि!
ई आबि मखानक हेतु, गेल,
नहि पाबि सकल एको फोँका,
सौँसे शरीरमे छैक किन्तु
ककरो कुकृत्य-निर्मित फोँका!

एहि करुण प्रसंगक बाद उल्लासक चर्चा उचित थिक। सर्वाधिक मखानक बखान गीतकाव्यमे भेल अछि। मंत्रेश्वरझाक मखान-प्रेम तँ हुनक गीतपोथीक नामेसँ झलकैत अछि- “पान एलैए मखान एलैए”। कोनो करतेबताक अवसरपर ग्रामवासिनी मिथिलाक मध्यवर्गीय परिवारमे रहरहाँ देखब ई हूलिमालि-
बड़की पिसिया कुम्हरौड़ी अँचार बनाबथि बैसल
बुढ़बा काका दरबज्जापर पान चिबाबथि ओङठल
लछमन एलैए कि राम एलैए
टोल-पड़ोसक घर-घर के समाङ एलैए
पान एलैए मखान एलैए
धीया के बियाहके सामान एलैए।

मखान जहिना स्वच्छ कोमल चिक्कन होइछ, मखानक पात तहिना कँटाह खड़खड़ आ मैलमुँह। एहिपर कहबियो प्रसिद्ध भऽ गेल- मखानक पातसँ मुँह पोछब। एकक आकांक्षा जखन दोसराकेँ सोहाइ नहि छै तँ अपन खौँझ एहू तरहेँ व्यक्त करैछ। अर्थात, बड़ नीक-निकुत चाहै छथि तँ बुझथु, तेहन उपाय करबनि जे नोचैत रहिहथि अपन मुँह! एहि कहबीक प्रयोग व्यंग्योमे होइ अछि। शीर्षक- कवितामे कवि तिलक-दहेज लेनिहार बाप, समाजक चरित्रहीन मुँहपुरुष, स्वार्थी नेता, छद्मवेशी भद्रजन एवं समाजकेँ गर्तमे ठेलनिहार जते तत्व अछि, सभकेँ मखानक पातसँ मुँह पोछि देबऽ चाहै छथि।
आइ प्रयोजन अछि-
जे ओहन-ओहन शिखण्डीक मुँह
मखानक पातसँ पोछि दी
जे बेटाकेँ विक्रीक वस्तु बूझि कए
तिलक-दहेजकेँ बढ़बइत अछि
कन्यागत करेज खखोरि कए
अपन इष्टदेवताक अर्घ्य चढ़बइत अछि।

……………….
बन्धु! तेँ आइ प्रयोजन अछि
जे समग्र परिवर्तन आनब सर्जन लेल
कोनो अवरोधक तत्त्वक मुख
मखानक पातसँ पोछि दी
जे कार्यपालिका, न्यायपालिका आ विधायिकाक
गरिमाकेँ भंग करैछ
आ विधि-व्यवस्थामे आस्था रखनिहार
शान्तिप्रिय लोककेँ अकारणहुँ तंग करैछ।

मखान जे जलतलमे, पंकक परिसरमे जन्म लै अछि, से अपन गुणसँ भगवानपर माला बनि चढ़ै अछि, भोग बनि अर्पित होइ अछि, श्रेष्ठ पदार्थक मापदण्ड बूझल जाइ अछि, ततबे नहि, मुहाबिरा बनिकऽ दुर्जनकेँ चेतौनियो दै अछि, अपन “पात”सँ कुत्सित तत्त्वक मुहोँ पोछै अछि। संसारक एहन दुर्लभ पदार्थ, जे मिथिलामे सुलभ अछि, तकर “मान” कतौ मैथिल साहित्यकार लोकनि नहि देथि! डॉ. बी.झाक धुनपर गुनगुनयबाक हेतु ककर मन नहि मचलि उठैत होयत?—
चन्द्रमा उतरल गगनसँ
चांदनीसँ नहाउ औ!
धान-पान-मखान-पूजित
मैथिलीकेँ जगाउ औ!

कुमार मनोज कश्यप
जन्म मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। बाल्य काले सँ लेखन मे आभरुचि। कैक गोट रचना आकाशवानी सँ प्रसारित आ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित। सम्प्रति केंद्रीय सचिवालय मे अनुभाग आधकारी पद पर पदस्थापित।
चौबटिया पर

‘ भैया ! हम कहैत छी आब अवस्था भेल, आबो तऽ चैनक साँस लिय । कहिया धरि कोंढ़ तोरैत रहब? आब तऽ बौआ वयस्क भऽ गेल छथि ; आबो तऽ किछु करथु कि सभ दिन पढ़ाई के नाम पर बापे के कमाई पर पुᆬटानी करैत रहताह । सभ के कोनो सरकारीये नोकरी भेटैत छैक? अपने गाम कि टोले मे देखियौ ने जे हुनका सँ कतेक छोट सभ जकरा नाक पोछबाक लुरि नहिं छलैक सेहो सभ दिल्ली-बम्बई जा कऽ हजारक-हजार रूपैया घर पठबैत आछ । साँच पुछि तऽ मैथिलक पछुएबाक कारण सरकारी नोकरी के पाछु भागब आछ । से जँ नहिं भेटल तऽ कतहु के नहिं रहि गेलहुँधोबिक गदहा बला परि़। हम तऽ कहैत छी कलियुग मे तपस्या केला सँ भगवान भने भेट जाथि ; मुदा सरकारी किन्नहुँ नहिं एकरा तऽ मरीचिका बुझु़ एतेक भाई-भतीजावाद आ घुसखोरीक जुग मे ओना कतऽ नोकरी राखल छै़ ओ तऽ जमाना रहई जे आहाँ सभ के सरकारी नोकरी भेट गेल़़आब ककरो नाम गनाउ गाम मे ?।’ कक्का आरो बहुत किछु बजैत चलि गेलाह। मुदा दलानक कोनटा मे ठ़ाढ हमरा मे आर बेसी सुनबाक सामर्थ्य नहि रहि गेल छल हम झमा कऽ खसल छलहुँ मोश्किल सँ सम्हारि पओलहुँ अपना कें । बाबूक प्रतिव्रिᆬया हम बुझि नहि पओने छलहुँ ओ मुँह सँ साईत किछु बाजल नहि छलाह बाजलो हेताह तऽ सम्भव जे मनोद्वेगक कारणे हमहीं सुनि नहि पओने होईयैक।

कक्काक शब्द हमरा जमीन पर पटकि देने छल़़हमर सिविल सेवाक बुनल सभ टा सपना जेना एके चोट मे टुटि कऽ हमरे सोझँा मे खंड-खंड पसरि गेल आ हम ओहि पर ओंघरा कऽ अपन सर्वांग शरीर शोणिते-शोणित कऽ लेने छी ।

हमर बाबू परम शुद्ध़़बेसी बाजऽ वला नहिं । ओहि दिन कक्का के स्पष्ट जवाब नहि देबाक पाछु हुनका मोनक कोनो कोन मे नुकायल कोनो अनजान भय छलनि से हमरा ओहि दिन मायक बात सँ बुझायल – ‘सरकारी नोकरी नहि भेल तऽ कतहु प्राईवेटो मे तऽ देखतियैक । बाबूये पर कतेक भार देबैऩ़पँाच-छौ महिना मे ओहो तऽ रिटायरे कऽ रहल छथि। वेतनक समुचा पाई मे तऽ घर चलिये नहि रहल छैक़़पेंसनक अधोर पाई मे कोना पार लगतैक ? मुनमुन तऽ अखन बी०ए० मे गेबे केलैयै, ओकर पढ़ाई तऽ कहुना पूरा करबैये पड़तैक़़। ‘ मायक स्वर मे जे एकटा चेतावनी छलैक से हम नहि बुझितियैक, एतबो अबोध हम नहि। हम ओहि राति कतेक कानल रहि से हमहीं जनैत छियैक। जाहि सपना के हम एक-एक विंदु सँ उकेरने रहि, जकर पँाखि पर बैसि कऽ हम कल्पना लोक मे निच्छंद विचरण करैत रहि, तकर जेना पँाखि कतरि कऽ भू-लुंठित कऽ देल गेल छलैक । हमरा अपन भविष्यक चिंता सँ बेसी दुख एहि बातक आछ जे कक्का अपन वुᆬटिल सिद्धांत – ‘दुभि, दालि आ देयाद जतेक गलय ततेक नीक ‘ – हमरो परिवार पर अजमेबा मे सफल भऽ गेल छलाह। नहि तऽ जे बाबू एकटा सपना देखने रहथि अपन संतान के प्रशासनिक सेवा के उच्चत्तर स्तर पर पहुँचेबाक सदा प्रोत्साहित कयने रहथि एहि लेल, जे गर्व सँ कहथि जे साधनक अभाव मे हम स्वयं नहिं बनि सकलहुँ तऽ की ; अपन बेटा के आई०ए०एस० बना कऽ देखायब से एकाएक यू-टर्न लऽ लेताह से हम सपनो मे नहि सोचने रही । पहिल चाँस मे हम पी०टी० तऽ निकालिये लेने रही़एहि बेर दोसर चाँस एपियर होयब़़एतबे मे बाबू अगुता जेताह; ई हुनकर स्वभाव तऽ किन्नहुँ नहिं!

हम अपन पित्त के पीबि गेलहुँ। अपन सफाई मे किछु बाजब उचित नहिं बुझना गेल । सुतली राति मे अपन दु-चारि टा कपड़ा बैग मे राखि घर सँ चुपचाप निकसि गेलहुँ बिना ककरो जनेने । मोन मे रंग-विरंगक भवना आयल़़आत्म-हत्या तक के । अंत मे मोन स्वीकारलक़़चंडीगढ़ चल जाई दिनेश लग़़क़तेक जीद्द करैत छल ओ चंडीगढ़ एबाक लेल़़क़हैत छल बड नीक शहर छै । ट्रेन एबा मे एखन देरी छैक़़ फरीछ सेहो भऽ रहल छैक़़ हम दिनेश के फोन करैत छी – ‘परसू हम चण्डीगढ़ पहुँच रहल छियौ भोर मे़ स्टेशन पर आबि कऽ अपना ओतऽ लऽ जैहैं । ‘ आर किछु हम नहि कहि सकलियै़ओ पुछिते रहि गेल़़ फोन काटि देलियै ।

स्टेशन पर ओ आयल छल हमरा आरयाति कऽ अपन घर लऽ जेबाक हेतु। दिनेश हमर लंगोटिया याऱ़पढ़लक-लिखलक कम्मे़ज़ल्दिये कोनो प्राईवेट मे नोकरी पकड़ि लेलक । सुनैत छियैक नीक कमाईत आछ । भरि रस्ता ओ हमर अकस्मात एबाक प्रयोजन पुछैत रहल हम बात के घुमबैत रहलियै । बस एतबे कहलियै जे हमरा कोनो नोकरी धरा दे़ज़े होई हम करै लेल तैयार छी। ओ हमरा अपना भरि बुझेबाक प्रयास करैत रहल य़ार ! तोरा मे प्रतिभा छौ़तों आई०ए०एस कऽ सकैत छैंतोरा पर गाम समाज के आँखि लागल छैक़़तों प्राईवेट नोकरी-चाकरी के झंझट छोड़़़तैयारी करैत रह़़ माँ भगवती के कृपा सँ सफलता अवस्से भेटतौ़। मुदा हमहुँ जिदियायल रही। ओ हारि मानि लेलक हमरा एकटा केबल-ऑपरेटर ओहिठाम नोकरी रखा देलक तीन हजार रूपैया महिना पर ।

गाम-घर, माय-बाप, भाय-बहिन सभ कें बिसरि जेबाक प्रयास कऽ रहल छी हम । कतऽ कहाँ सँ पता करैत-करैत एक दिन मायक फोन आयल़़बड़ कनैत छल़़हमरो बकोर लागि गेल़़ हम किछु बाजि नहिं सकल रहि फ़ोन काटि देलियै ।

बितैत समयक संगे एक दिन नरेंद्रजी सँ भेंट भेल़़ नरेंद्रजी अपने ओम्हर के समवयस्के जकाँ । दोस्ती बढ़ल़़पता चलल हुनकर पिता बैंक-मैनेजर छथिन समस्तीपुर मे । बैंक सँ लोन लऽ कऽ स्वयं के केबल शुरू करबाक विचार जागल । बात आगू बढ़ल़़क़ाज करबाक अनुभव आई दू साल मे भैये गेल । योजना पर काज करय लगलहुँएक-एक मुद्दा पर गहन सोच-विचार प्रोजेक्ट-रिपोर्ट तैयार भेल कतऽ सँ मशीन सभ कीनब क़ेहन आदमी सभ के काज पर राखब़़क़ोना प्रचार -प्रसार करब सभ किछुक योजना राति भरि जागि कऽ बना लेलहुँ । लोन भेटि गेल़़मशीन,आवश्यक वस्तु-जात सभ खरीद भऽ गेल। काल्हि धूम-धाम सँ उद्घाटन करबाक दिन छल । सोचलहुँ बाबू-कक्का सहित गामक सभ लोक के बजायब उद्घाटन-समारोह मे । अचानक सँ एहन पैघ योजना देखि कऽ घरक लोक गर्व सँ गद्-गद भऽ उठत़़क़क्का के जलन तऽ हेबे करतैन जे देयाद गलि नहिं, उठि रहल आछ मुदा ताहि सँ हमरा कि ? हुनकर मोने एहने छनि तऽ दोसर की करतैन ?। बुधना आबि कऽ समाद देलक – ‘आहँ करैत रहू उद्घाटन, ओम्हर पायल-केबल सभ कें मुपत्त मे केबल देखेबाक घोषणा कऽ देलकैयै । जेहो एक-दू गोटे तैयार छल अपन केबल लेबाक लेल, सेहो पायले दिस चलि गेल । फ्री ककरा नहिं रूचतै ?’ पायल केबल के मालिक भवेश तऽ हमरा संगे गामक स्वूᆬल मे पढ़ने आछ , ओकरा एना नहि करक चाहियैक । हम दौड़लहुँ भवेशक घर दिस। रस्ते मे भेटा गेल ओ। हम कहलियै – ‘ यार ! तोरा एना नहि करक चाहियौ । तों तऽ पुरान छैं ; कमा चुकल छैं, कनेक दिन फ्रीयो मे केबल देखा सकैत छैं । मुदा हम बैंक सँ लोन लऽ कऽ शुरूये करऽ जा रहल छी । हमरा पेट पर तऽ लात नहि मार । ‘ भवेश चौआनयँ मुस्कियायल छल। ओकर एहि मुस्की मे वुᆬटिलता हमरा साफ बुझा रहल छल। ‘देखही दोस ! दोस्ती अपना जगह पर छैक आ बिजनेस अपना जगह पर । ने दोस्ती मे बिजनेस एबाक चाही ; ने बिजनेस मे दोस्ती । ‘

से बिजनेस मे दोस्ती नहिये एलै । हमर सभ मशीन, सामान ओ आधया दाम में खरीद लेलक । हमर सपना एक बेर पेᆬर सँ चकनाचूर भऽ कऽ हमरा आगँ छिड़िया गेल आछ । हम अपन मोन के बुझबैत छी—सपना टुटबे खातिर बुनल जाईत छैक़़आर कोनो बात नहिं।

मनोज झा मुक्ति

देशक अवस्थाा आ जनताक प्रवृति
— मनोज झा मुक्ति
अखुनक परिवेशमे ककरोसँ पुछियौक देशक अवस्थाा केहन अछि ? त, कहता कि
कहू सभ ठाम भ्रष्टापचारे भ्रष्टायचार व्या्प्ता अछि । देशक नेता भ्रष्ट,, कर्मचारी तन्त्र
भ्रष्ट , पत्रकारिता जगत भ्रष्टा, व्या‍पारी भ्रष्ट …आर किदन किदन…सभचीज भ्रष्टेर
भ्रष्ट , तहन देशक स्थिततिके कि कहबैक…।
देशक स्‍थिति निश्चिभतरुपेण नीक त नहिंए अछि, मुदा एकर दोषी के ? सभ
जौं भ्रष्टाभचारिए अछि त नीक व्यचक्तिप केओ नहिं ? आ देशक जनता कि दूधक
धोएल अछि ? सबकेँ एकवेर अपना छातीपर हाथ राखिकऽ सोंचहिटा पड़त । आखिर
किया देशक हालति एहि तरहें दिनानुदिन खसकैत जाऽरहल अछि ?
देशमें सब तरहक लोक हाएव कोनो आश्चखर्यक गप्प़ नहिं । सबहक कहब ई
छन्हिद जे सभक्षेत्रमे भ्रष्टाोचारीए लोकक चलाचल्ती छैक । अईसँ असहमत बहुत
कम्मेदगोटे हएता । मुदा यहो सत्ये‍ छैक जे सत्य्क बाटपर धिरे—धिरे आगा ससरैत
लोक सेहो अई देशमे अछि । हँ, सत्य‍वादी धारमे लागल खाँटी राष्ट्र वादी सभक
सँख्याह बहुत कम अछि आ दिनानुदिन ओहि सँख्याेमे ह्रास होइत जाऽरहल अछि ।
तकर कारण कि ?
जौं स्पअष्टिरुपसँ कहल जाए त दशक एहि परिस्थिहतिक जिम्मेावार आन केओ
नहिं, हमहि आँहाँ छी । हमही आँहाँ देशक नेताके, व्यासपारी आ कर्मचारीकेँ
भ्रष्टाणचारी बनावि रहल छियैक ।
हम आँहाँ एकटा नेताके भ्रष्टानचार करबालेल विवश कऽ दैत छियैक । जौं
गाममे एकटा कोनो नेता साइकलपर चढिकऽ अवैत अछि या पैदल अवैत अछि त
ओकरा देखबाकले कोना जनता नहिं जाइत छियैक । एतवे नहिं ओई नेताके
अपना दरबज्जाेपर बैसऽदेवमें सेहो हमसब अपनाआपके हीन महशुस करैत छी । आ
हमरे आँहाँक गाममे जौं एकटा नेता महँग गाड़ीमे चढिकऽ अवैत अछि त ओकरा
पाछा या कहु स्वाेगत करबाकलेल माइए पुते दौड़ैत छियैक, ओकरा अपना
दरबज्जा पर बैसबऽमे हमसब अपनाके गर्वान्विेत भेल अनुभूति करैत छी । चुनावक
समयमे कतबो सकारात्मसक सोंंचवला नेता किएक नहिं हुअए ओकरा भोंट देवाक
बदलामें हमसब मतपत्रमे अपन जातिक उम्मेगदवारके चिन्हंमे मोहर लगवैत छी ।
ओतवे नहिं अपन मतक महत्वपके बुझितो हमसब अपना मतके पाई लऽ कऽ बेचि दैत
छियैक जकर कारणसँ जकरालग अपन जातिक जनसँख्या वेसी अछि आ वेसी पाई अछि
वएह नेता चुनाव जितैत छथि । कि हमर आँहाँक एहि तरहक व्यआवहार एकटा नेताकेँ
भ्रष्टत बनवाकलेल विवश नहिं करैत छैक । जौं जातिक नामपर केओ जितैत अछि त
ओ अपना जातिक वाहेक आन जनताके वारेमे किया सोंचत ? आ अपना जातिकलेल
सेहो किछु नहिं कऽसकैया, कियाक त ओ ई नीक जकाँ बुझने रर्हैत अछि जे
अपना जातिकलेल हम काज नहिंयो करब तखनो हमर जाति हमरा भोंट देबेटा करत
। आ ओ जे पजेरोबला नेता आ पाईबला नेताक तुलनामें अपनाके निरीह
बुझैत अछि, ओहो हमरा आँहाँक सामिप्यमता पएवाकलेल आ चुनाव जीतवाकलेल
पाईएके अपना जीवनक सभसँ पैघ लक्ष्यँ बुझि ‘एनि हाउ, पाई कमाऊ’ के नीति
अवलम्व न कऽलैत अछि । आ जखन ओ पाइएक बलपर हमरआँहाँक भोट लेत त किया
हमरा आँहाँक विकासकलेल ओ सोंचताह ?
तहिना देशक कर्मचारिके हमही आँहाँसब अपन काज जल्दीयसँ जल्दीा करेबाकलेल
या कानूनन नहिंयो होबऽवला काज गैरकानूनन रुपसँ करेबाकलेल घुस देल करैत
छियैक आ एहिं तरहें एकटा कर्मचारीकेँ जवरदस्तीब हमसब भ्रष्टावरी बना दैत छियैक
। ओनो कर्मचारीयो खासकऽ एकटा पुलिसमे जेबाकलेल हाकिम एकलाख टका लेल
करैत छैक, हाकिमके डाइरेक्टजर बनेवाकलेल मन्त्री द्वारा लाखो रुपैया घूस लेल जाइत
छैक । जहन ओ कर्ज पैंच लऽ कऽ बहाल भेल रहैत छैक त कोनो बहन्ने् कमेबेटा
करतैक ।
एकटा व्याकपारीकेँ काला बाज़ारी करबामे सेहो हमसब अपने बहुत बेसी
दोषी छी । हमसब बुझितो रहैत छि तइयो ओकर विरोधमे बजबाक हिम्मात नई
करैत छियैक ? हमरा आँहाँलेल के बाजि देत ? ककरो लग ओतेक फुरसति नहिं
छैक ।
हमसब सबके भ्रष्टाेचारी त कहैत छियैक, मुदा अपन टेटर नहिं देखैत छी ।
सरकार अपन गाम अपने बनाबु कहिकऽ प्रत्येाक गाममे १५ सँ ३० लाखधरि रुपैया
प्रतिवर्ष देल करैत अछि । गामक विकास कतेक भेल छैक, विशेषकऽ मधेशमे से
ककरोसँ छुपल नहिं अछि । सभ पार्टीक प्रतिनिधिसब अपन बपौटी(पैत्रृक) सम्पुति
बुझि खुलेआम लुटैत अछि आ हम आँहाँ मौन भऽ सबकिछु देखैत रहैछी । जौं
कियो व्येक्ति ओइ काजक विरोध करैत छैक त हमहि आँहा केओ पार्टीक नामपर,
केओ जातिक नामपर ओहन भ्रष्टाआचारीकेा दूधक धोएल बनाऽदैत छियैक । ओहन
भ्रष्टािचारीकलेल पार्टीयोसब अपन प्रतिष्ठाधधरि दाओपर लगा दैत अछि ओकरा
बँचवऽमें । एकरा अरिक्त जे किछु कोनो गामठाममे जौं छोटछीन विकासक काज
होइत अछि त ओकरा विनाश करबामें हमसब बहादुरी बुझैत छी । अपना घरक
अगााक सडकपर राखलगेल ग्राभेलक पाथर अपना घरमे घुसियाबऽमे त हमरा सबके
जोरा सम्भपवतः कतौ नहिं भेटत ।
एतेक धरि कि सरकार विद्यालयसबके व्यबवस्थिसत करबाकलेल अपनेगामक स्थाैनिय
व्याक्तितक अनुसारे चलेवाकलेल विद्यालय व्यसवस्थातपन समीतिके निर्माण योजना लाबि
प्रायः सभ विद्यालयके समुदायमे हस्ता न्त रण केलक, मुदा विद्यालय व्यनवस्था पन समीति
अखन मात्र पाई कमेबाक एकटा स्थवलक रुपमें परिणत भऽगेल अछि । चाहे विद्यालयमे
शिक्षकक रखबामे होय या शिक्षककेँ सरुवामें हुए, विशेष कऽ मधेशक प्रत्ये क
विद्यालय व्यमवस्थाषपन समीतिसभ एहि तरहक व्याशपारमें लागिगेल अछि । विद्यालयक पढाई
केहन छैक, शिक्षक विद्यालयमें अवैत अछि कि नहिं, विधार्थी अवैत अछि कि नहिं
ताहिसँ व्य्वस्थाकपन समीतिके कोनो मतलव नई रहल देखल जाऽरहल अछि ।
एहि तरहें देशक विकास कोना हायत ? जाधरि हमसब अपने नहिं सुधरब त
आन के सुधारत ? जौं हमसभ एकटा सत्यम बाटपर चलनिहार, देशभकत आ जनताक
समस्यासके अपन बुझऽबला नेताक बदलामे तामझामबला पँजेरो एनिहार नेताके
निरुत्सा‍ही नहिं करब त दिनानुदिन भ्रष्टालचारक दलदलमें हमसब धँसैत जाएब । सत्यकक
पक्षधरके मनोबल बढेनाई जरुरी आ सभक कर्तव्य भऽगेल अछि । आन कियो किया
हमरा आँहाँक सम्बढन्धआमे सोंचि देत ? ताएँ आनके दोष देबासँ पहिने एकवेर
हमसभ अपने टेटर देखब कि ?
टेष्टअ परीक्षा आबऽलागल, मैथिलीक विद्यार्थी पुस्ततक बिहीन
शैक्षिक वर्षक अन्त् होमऽ लागल अछि, किछु दिनकवाद दशम कक्षाक टेष्टा परीक्षा सेहो हएत । आन आन विषयक विद्यार्थीक कोर्स अन्तोऽ होमऽलागल अछि, मुदा हिलसि कऽ अथवा ककरो दबावसँ मैथिली विषय लेनिहार विद्यार्थी अखनो धरि पुस्तोक केन्द्रछक दुवारिपर हाजरी दैत बरोबरि भेटत । कारण जे दशम कक्षाक विधार्थी अखनो धरि नहि देखने अछि— दश किलासक मैथिली पोथी ।
धनुषा जिल्लाोक लगभग एक दर्जन आ महोत्तरी जिल्लाैक पर्सा पतैली लगायतक स्कूबलमे मैथिली विषयक पढाई होइत अछि, मुदा विधार्थी आ शिक्षक दुनुगोटे मैथिलीक पुस्तैक अखनधरि नई भेटलाकवाद फिरसान अछि । साझा प्रकाशनद्वारा प्रकाशित पुस्तीक, जनक शिक्षा सामग्री केन्द्रनद्वारा विधार्थीकलेल उपलब्धम कराओल जाइत अछि । जनकपुरधाम स्थिसत विद्यापति चौकपर रहल ‘विद्या पुस्त‍क केन्द्रर’क विक्रेता कलानन्दा झा कहलनि, ‘साझा प्रकाशनकेँ वेरवेर तगेदा कएलाकवादो मैथिलीक पुस्तशक उपलब्धा नहि कराओल गेल’ ।

दुखक गप्पे त ई अछि जे ताहिकालमे मैथिली विषयक पाठ्य पुस्त्कक आभाव देखल गेल अछि, जाहिकालमे साझा प्रकाशनक अध्यिक्ष छथि— मैथिलीक पैघ साहित्यतकार/पत्रकार/कवि/फोरमक नेता/बहुतरास मैथिली संघ—संस्थाजक अगुवा व्य क्तिीत्व् श्री राम भरोस कापड़ि ‘भ्रमर’ । अपनाके मैथिलीक योद्धा आ साझा प्रकाशनक पहिल मैथिल/मधेशी चेयरमैन कहबामे गर्व कएनिहार कापड़िके पदपर पहुँचलाक वादो मैथिली पोथी नहि भेटव सर्वत्र आलोचनाक विषय बनल अछि ।
मैथिली विषयक पुस्तनकक अभाव हएव, मैथिली भाषा आन्दोपलनक व्यामपकतामें सऽभसँ पैघ रोकावटकरुपमें देखाऽरहल अछि । मैथिलीक पाठ्य पुस्तअकक सहज उपलब्धथता जाधरि नई हएत ताधरि विद्यालयक शिक्षामें मैथिलीक पढाई मात्र भाषण धरि सीमित रहत । गणतन्त्र प्राप्ति कबाद मैथिलीकेा भजा कऽ भलेहिं कतेको मैथिल वरिष्ठी पदपर चलिगेल होथि, मुदा धरातलिय यथार्थ इएह अछि जे मैथिली काल्हिीयो पाछा छल आ एखनो सिसैकते अछि ।
-प्रकाश
रंगदृष्टि; दिल्ली

बांग्ला नाटक लेल कोलकाता आ मराठीक लेल मुम्बई, तहिना पहिने मात्र हिन्दीक लेल दिल्ली जानल जाइत छल । मुदा आब सम्पूर्ण भारतवर्षमे विविधतापूर्ण नाटक मंचनक लेल दिल्ली केन्द्रमे आबि चुकल अछि, ताहिमे कोनो शंखा नहि । दिल्लीक मंडी हाउस स्थित विभिन्न प्रेक्षागृहमे नित्य कोनो-ने-कोनो भाषाक नाटक मंचित होइते रहैत अछि । एहि ठाम हिन्दी, मराठी, बंगाली मात्र नहि बल्कि मणि पुरी, असमिया, उर्दू, पंजाबी,मैथिली, कन्नड़, मलयालम आदि भाषाक नाटक देखबाक मौक़ा प्राय: भेटैत रहैत छैक ।

एहि बीच दिल्लीक प्रेक्षक केँ एकटा अत्यंत सुखद अनुभव भेलनि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालयक प्रांगणमे । मराठी नाटककार विजय तेंडुलकर लिखित प्रसिद्ध नाटक जात ही पूछो साधु की आ बांग्ला लेखक रवीन्द्रनाथ ठाकुर लिखित अचलायतन; दुनूक मंचन हिन्दीमे, जेना तीनू रंगमंचक संगम भ’ रहल हो ।

जात ही पूछो साधु की राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडलक कलाकारक संग प्रसिद्ध नाट्य निर्देशक राजिन्दर नाथ आ अचलायतन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय द्वितीय वर्ष छात्रक संग युवा निर्देशक शांतनु बोस कयने छलाह ।

नाटक जात जी पूछो साधु की एकटा स्वस्थ हास्य-व्यंग नाटक अछि । एहिमे महीपत नामक व्यक्ति कहुना क’ एम.ए. पास करैत अछि – थर्ड डिविजन सँ । बहुत दिन बेरोज़गार रहला बाद सिफारिशिज़्मक टेकनिक सीख कोनो कॉलेजमे लेक्चरार बनैत अछि आ नाटकक अंतमे कतेको उथल-पुथलक बाद एक बेर फेर बेरोजगार भ’जाइत अछि ।

एहि सोझा-सोझी कथ्यक लेल नाटकक संवादमे नाटककार ततेक ने द्वन्द ओ उत्सुकता भरि देने छथि, जे प्रेक्षक एकाग्र भ’ महीपतक सोलो लौगीमे हेरायल रहैत छथि । ई नाटककारक विशेषते ने जे आई सँ 40 वर्ष पहिने लिखल कथ्य आजुक संदर्भ सेहो समकालीने बुझना जाइछ । संवाद सेहो तेहेन ने चोटगर आ तीक्ष्ण छैक जे प्रेक्षागृहमे बैसल दर्शक केँ बेधैत अछि । हास्यक पुट द’ नाटककार अपन सभ गप्प कहि दैत छथि आ दर्शक ओकरा सहर्ष ग्रहण करैत छथि ।

एकत’ सबस’ बेसी तेण्डुलकरजीक नाटकक मंचन सम्पूर्ण भारतमे भेलन्हि अछि ताहुमे जात ही पूछो साधु की नाटकक मंचन सबस’ बेसी भेल अछि । निर्देशकक रूपमे राजिन्दर नाथ जीक नाम हिन्दी रंगमंचक सुपरिचित नाम अछि । विजय तेण्डुलकरक प्राय: सभ नाटकक हिन्दीमे मंचन राजेन्दरजी कतेको बेर कयलथि अछि ।

एहि नाटक लेल मंच पर नाटकक संप्रेषणक जे विधि राजिन्दर नाथ अपनेने छथि ओ अति सरल अछि । मुदा, अभिनेताक अभिव्यक्ति पर अत्यंत बारीकी सँ कार्य कयल गेल अछि । मंच पर तीनू कात तीनटा दरवाज़ा, आधा मंच पर मात्र एक फूट ऊँच प्लेटफॉर्म आ सात-आठ टा ब्लॉक मात्र सँ एतेक जीवंत प्रस्तुति निर्देशकक दूर दृष्टिक परिणाम थिक ।

प्रस्तुतिमे प्रकाश परिकल्पना गोविन्द यादवक छनि । गोविन्दजी सेहो राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय स’ प्रशिक्षित छथि । महीपत बनल अम्बरीश मात्र दू कदम चलि जखने दोसर प्रकाश बिम्बमे प्रवेश करैत छथि कि समुच्चा परिदृश्ये बदलि जाइत छैक । मात्र प्रकाशक प्रभाव सँ मंच कखनो समाचार पत्रिकाक दफ्तर, कखनो निछछ देहात त’कखनो गामक कॉलेज वाकि पिकनिक स्थलमे परिवर्तित होइत रहैत अछि ।

एहिना वस्त्राभूषण सभ सेहो तर्क संगत अछि । जेँ सभ किछु संतुलित अछि तेँ नाटक देख सभ दर्शक भरपूर पूर्णताक संग प्रेक्षागृह सँ बहराइत छथि ।

आब दोसर प्रस्तुति : अचलायतन । ई प्रस्तुति छात्रक प्रशिक्षणक हिस्सा अछि तेँ प्रस्तुतिमे तकनीकी पक्ष पर बेसी ध्यान गेल । भ’ सकैत अछि बहुतो दर्शक केँ ई प्रस्तुति बहुत बेसी आकर्षित नै केने होइन, मुदा ई प्रस्तुति तकनीकी दृष्टिए उत्कृष्ठ त’अछिए । नाटक देखबाकाल अभिनेता-अभिनेत्रीक शारीरिक शक्तिक क्षमता, देह गति,आवाज़ संतुलन आ पात्रक मानसिक अभिव्यक्ति रोमांचित करैत छल । रवीन्द्रनाथ जीक लिखल एतेक पुराण कथा केँ आजुक संदर्भमे प्रस्तुत केनाइ अति कठिन कार्य छल, जकरा निर्देशक अपन दृष्टि सँ समकलीन बनेबाक भरपूर कोशिश केलनि अछि ।

अचलायतन के कथा सार ई जे एहि नामक एकटा शिक्षा संस्था अछि जत’ शिक्षाक रूपमे सालों-साल पुरान रुढ़िकेँ जीवित रखनाए मात्र अछि । मुदा किछु नव सोचक विद्यार्थी आ गुरुक प्रयास स’ एहि परम्पराकेँ तोड़ि देल जाइत छै आ एकबेर फेर स’अचलायतन के पुन: स्थापित करैत अछि ।
नाटक जे प्राय: कंभेंशनल फॉर्ममे कयल जाइत अछि तकरा तोड़बाक पूरा-पूरा कोशिश केलनि अछि शांतनु बोस । शांतनु बोस लगातार एहि विधामे कार्य क’ रहल छथि । मुदा एखन एहि फॉर्म केँ सामान्य दर्शक स्वीकारबाक लेल तैयार नै छथि ।

नाटक जात ही पूछो साधु की अत्यधिक यथार्थवादी अछि जाहिमे समाजक जे रूप आइ जै स्थितिमे अछि ओकरा ओही रूपमे लेखक रखलन्हि अछि आ ओकरा हम सभ सहर्ष स्वीकरलहुँ अछि जाहिमे समजाक सभरूप एक्केठाम देखबामे अबैत अछि । तथाकथित सभ्य समाज आ निरक्षर समाज दुनूक वार्तालापमे आकाश-पतालक अंतर । नाटककार आ समीक्षक आ दर्शक; सभकेँ यथार्थवादक रूपमे एकरा स्वीकार करबाक चाही । हँ ! मिथिलाक लोक जीवन एकरा कहिया ने स्वीकारि चुकल अछि । एहि फॉर्ममे मैथिलीमे सेहो कतेको रचना भेल जेँ उत्कृष्ठ अछि मुदा एखनो तक मैथिल तथाकथित सभ्य साहित्यकार ओकरा स्वीकारबाक लेल तैयार नहि भेलखिन्ह । एहना स्थिति के की कहल जा सकैत अछि ?

एहिना दोसर रूप ई जे अपन रचनाकेँ कोनो काल मात्र केँ लक्ष्मण रेखा सँ मुक्त करबाक चाही । तखने ओ कालजयी भ’ पाओत । आ रचनाकेँ सेहो समकालीन परिप्रेक्ष्यमे देखबाक चाही । ओकरामे जँ कनी फेर-बदल कयला सँ आजुक’ पीढ़ीक लेल सार्थक बनि जायत त’ ई कोन बेजाय बात हेतैक ?

प्रकाश झा
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय
भगवान दास रोड, नई दिल्ली-01.
011-23389138, 09811774106. ।

३. पद्य

३.१. गुंजन जीक राधा- दसम खेप

३.२. सतीश चन्द्र झा-पंखहीन कल्पना
३.३. दयाकान्त-माँ मिथिला ताकय संतान

३.४.पंकज पराशर- -ननकाना साहिब

३.५.कामिनी कामायनी-आजुक विद्यार्थी

३.६.निशाप्रभा झा (संकलन)-आगां

३.७. अजित-ओ तँ मुहेँक बड़जोड़ छथि
३.८.कल्पना शरण-प्रतीक्षा सँ परिणाम तक-३
३.९. सुमित आनन्द
जेम्हरे देखू तेम्हरे लाइन!!

गंगेश गुंजन

गुंजन जीक राधा- दसम खेप
(नवम खेपक बाद किछु कालक विराम आएल छल राधाक प्रस्तुतिमे। प्रस्तुत अछि राधाक दसम खेप। आशा अछि, गुंजन जीक एहि मैग्नम ओपसक प्रस्तुति अपन लोकप्रियताक शिखरपर विराजमान रहत-सम्पादक।)

कहानी बेश बढ़िया
कथानक बेश चिक्कन
मुदा सौँसे कथा मे
हमर ने मन ने हम!
कहल जे नेत की से
बुझत जे लोक की से
एही बीचहि मे तँ सभ
फाँक टा रहि जाइछ बुझब

बंद केवाड़ बुद्धि विवेक वा एकर किछु आओर अभिप्राय अपनहि सँ पुछैत-पुछैत अपनहि प्रश्न भऽ गेल मनक सेहो एकटा फराके दशा होइत छैक। राधाक सएह छनि। दुःखित छथि, दुखिते बनलि रहऽ चाहैत छथि, दुःख सँ निकलऽ चाहैत छथि। दुनू चाहबाक- इच्छाक अपन-अपन बेर होइत छनि। ईहो अनुभव विचित्रे कहबाक चाही। भोर मे मन कहैत रहैत छनि जे बात; दुपहर मे नहि रहि जाइत छनि से मनोदशा. साँझ होइत-होइत परिस्थिति किछु आर भऽ जाइछ आ अन्त मे एकटा चारिमे स्वभावक भऽ जाइत छनि राति अबैत-अबैत…मनक बात। स्वयं अपनहि हाथ सँ छहलि कऽ छुटि गेल डोलक डोरी जेकाँ गंहीर इनार। किछुओ टा कहाँ रहि जाइत छनि बुझवा योग्य, अपन सुभीता वला समाचार.
सबटा जेना अनचिन्हार भऽ जाइनि, किछु टाने चिन्हार।
कि तं मने बनि जाइत छनि समस्त ब्रजभूमि संसार ।
बा पड़लि-पड़लि रचि लैत छथि संसारे केँ अपन मन ।
एहना मे निश्चिते जल नहि, अन्न नहि आ स्वर नहि
संगी साथी नहिँ तेँ नहि कोनो तरहक वाणी-बोलीक व्यवहार ।
सबहक कउखन बलात् -स्वयं राधा कृत अनुपस्थित आ
कउखन स्वतः भऽ जाइत से ! अर्थात्
ओना तँ अनुमान होइछ सब किछु चलिए रहल अछि लोकक
दिनचर्या आ आ जरूरी समाचार । सबटा अपना गतियेँ
अपन हिसाबेँ अछि व्यस्त !
आँगन निपनाइ, जाड़निक ओरिआओन सँ लऽ
फूल-दूभि तुलसीक ब्योँत आ ठाँव-बाट धरिक प्रक्रिया, अथक
अनवरत चलि रहल अछि। आ हम!
राधाक प्रश्न राधाकेँ ! हम कतऽ छी?
कतबा आ कियेक ? हम एहि दिन-राति आ चलैत बीतैत समय मे छी वा नहि छी?
जँ छी तँ कोन अंश मे आ नहि तँ, तँ कियेक नहि छी? बाटक कात निस्सहाय ठाढ़ लोक जकाँ कियेक भऽ गेल छी हम ! सोझाँ सँ एक एक कऽ जा रहल गाड़ी, बटोही सँ लऽ कऽ वस्तु जात लादल बड़दक घंटी टुनटुनबैत गाड़ी, घोघ मे कनैत कनियाँ,
आ कउखन घरहटक बाँस वा काठक सिल्ल लादल।
सबटा तँ कोनो ने कोनो रूपेँ सृजनेक व्योंत।
कनियाक विदागरी सँ लऽ बटोहीक चलब अपना-अपना गन्तव्य धरि आ बाँस-काठ सँ लदल गाड़ी घवाहो कान्ह पर ऊघैत बड़दक बेबस जोड़ा- किछु रचने मे अछि लागल! मन सँ बा कर्तव्य सँ , बा कोनो दबल आवश्यकता- विवशता सँ । कऽ तऽ रहल अछि रचने।
श्रम-फल निर्भर परिवार-बालबच्चाक परोक्ष प्रतिपादन आ निर्माणक काज।
प्रतिपल रचना होइत अछि। से बात तँ बूझल अछि।
मुदा एहि रचना सँ भऽ वा कऽ देल जाइत अछि कोनो-कोनो मनुक्ख
वंचित, तिरस्कृत तेकर तँ नहि अछि ज्ञान! ध्यानो कहाँ गेल पहिने कहियो… जे सोचितिऐक एकर मर्म, रचना क्रमक यात्रा सँ वंचित होयवाक अभाव आ तकर मनोभाव ! कहाँ गेल ध्यान।
वंचित परन्तु करैत रहलैक अछि सतत् कोनो ने कोनो सत्ता। सत्ता माने प्रभुता। प्रभुता माने राजा, राजा माने राजा । कए टा राजाक राजा- महाराज! सत्ता माने महाराज।
श्रीकृष्ण छथि की?
हमरा कऽ देलनि सृजन सँ विरत, एक कात असकर ! की छथि ओ ?
आ स्वयं हम केहन मूर्ति आ अकर्मण्य, चुपचाप . हुनकर देल समय केँ सहजहि स्वीकारि कऽ पड़लि छी दुखित। अपनो तँ नहि रमैये मन कदाचित् एही मे ? पड़ल-पड़ल अपन आ मात्र अपनहि मनोनुकूल संसार रचै मे, ताहि मे एते असकरे बSसै मे?
कतहु चाहैत तँ नहि अछि मन -
रही अहाँ एहिना रुसल किछु आर दिन, मास..
रुसले रही हमहूँ , नहि करी किछु टा काज
नहि आबी, नहिये टा आबी अहाँक लग पास।
रहू रुसले बरु किछु आर दिन…
चीन्हि सकी हमहूँ अपना केँ आ भऽ
सकय अहुँक चरित्र आ हृदयक परिचय किछु आर
एहि बेर मन तैयार अछि,
आब सह्य करबा लेल नहि बुझाइत अछि प्रस्तुत
कऽ लेबऽ चाहैत अछि- एहि पार कि ओहि पार!
आत्मीय चिन्हार हँसीक स्वर,
बुझलनि, आकुल प्रश्न कहलखिन कृष्णकेँ
मनकथाक एहि निर्णय-बिन्दु पर राधाक कान मे पड़ल कोनो आत्मीय चिन्हारक हंसी-स्वर!
-अहाँ एना कियेक हँसलौँ एतेक जोर ठहक्का दऽ?
-’बेकूफ, एहन विषयक की हेतैक एहि पार कि ओहि पार? ई की कोनो यमुना छै…
यमुना तँ बड़ दयालु माय अछि राधा ! ओ तँ प्रस्तुत केने छैक सब लेल अपन सब किछु।
ई परिस्थिति नहि यमुना।
एकर कोनो नहि छैक ई कात ओ कात।
ई धार निरन्तर आ निर्बंध छौक । चाहला सँ
सेहो नहि छौक इच्छित परिणाम!
कालधाराक आरम्भ आ अंत, स्वयं कालेधारा सखि!
की करओ क्यो, तोहूँ की करबेँ आब
यैह छौक तोरो गाम !
एहि सभ मनोभाव केँ गाम जकाँ मान आ
बिनु तमसयने, कुंठित मोने सोच किछु-किछु
काज, किछु लोकगर उपाय, नव बाटक संज्ञान!
निकल घर-आंगन सँ, चुपचाप नहि रहै,
आब बाज, राधा बाज… नहि कर चिन्ता
निकल अपना मन सँ
आत्मा केँ करऽ दे विचरण भरि वज्रभूमि, सौँसे संसार!
जुनि हो एना जीवितहि मृत । जीवन मनुक्खक सामर्थ्य छैक ।
एही लेल होइत अछि मनुक्ख,
तोँ बूझ ई बात । सृष्टि स्वयं मनुष्येs पर तँ जीबैत अछि।
कात मे भरलो लोटा जल रहैत छौक राखल
लागल रहैत छौक उत्कट पियास
नहि पीयैत छेँ जल, करैत रहैत छेँ छट पट
अपना केँ प्रताड़ित करैत, बुझाइत रहैत छौक उत्कीरना करैत छेँ ? नहि राधे!
ई छैक एक प्रकारेँ आत्मदाह। स्वयंकेँ डाहैत मारैत रहैत छेँ! एहि मात्र अपनहिँ आत्मलिप्ततामे
बूझल छौक जे अपने ओतेक नहि मरैत छेँ तोँ जतेक मृत्यु होइत रहैत छैक कतहु अन्तऽ आन आनक । आन-आन ठाम…
एक बेर हमरा दिस ताकि ले । देख हमरा एक बेर.. खोल आँखि-आँखि खोल। बंद आँखि मे वास्तविक जीवन आ संसार अँटियेनहि सकैत छैक। बुझवाक चाही मनुक्ख केँ। बंद आँखिक सेहो मर्यादा छैक, मुदा कोनो मर्यादा सृष्टिक वास्तविक उत्तरदायित्व-मनुक्ख जीवनक उत्कर्ष सँ बेसी नहि । (अगिला अंकमे…)

सतीश चन्द्र झा

पंखहीन कल्पना
सुखा गेल अछि मोसि कलम केँ
कोना आइ कविता हम लीखू।
रुग्ण भेल अछि मोन भावना
राति अन्हार चान की देखू।

दीन हीन व्याकुल अनाथ भ’
भटकि गेल अछि भाव मोन केँ।
पंखहीन विक्षिप्त कल्पना
बदलि गेल अछि अर्थ शब्द केँ।

कानि रहल अछि वर्णक मात्रा
छंद आब उन्मुक्त भेल अछि।
सुन्दर देह आगि सँ सगरो
अलंकार केर झरकि गेल अछि।

अछि आयल दुर्दिन साहित्यक
आँखि खोलि क’ की हम देखू।
सुखा ………………………….लीखू।

अहित सुखी भ’ जीवि रहल अछि
हित दुर्लभ अछि वस्तु जगत केँ।
स्वार्थ धर्म ज्ञानक परिभाषा
भोग विलास अर्थ जीवन केँ।

झूठ पहिरने वस्त्रा रेशमी
सत्य ठाढ़ निर्वस्त्रा कात मे।
अछि निर्मल नहि जल गंगा केर
अध्र्य देब हम कोना प्रात मे।

दिशाहीन जा रहल दूर छी
केना ठहरि क’ किछु क्षण बैसू।
सुखा ………………………….लीखू।

बिलटि गेल अछि अपन घ’र मे
संस्कार, शिक्षा, अनुशासन।
खंड – खंड मे बाँटि रहल अछि
जाति धर्म केँ अंध कुशासन।

ज्ञानी छथि बैसल अन्हार मे
भ्रष्ट लोक केर नित अभिनंदन।
सत्य आचरण लज्जित जग मे
अत्याचारक रूप विलक्षण।

चिंता छोरि करू हम चिंतन
अछि मृगतृष्णा की की देखू।
सुखा ………………………….लीखू।

पहुँचि गेल अछि यान चान पर
अछि पसरल ओहिना निर्धनता।
वक्षस्थल केर वसन बेचि क’
दूध पियाबथि शिशु कँे माता।

लोक बनल अछि वस्तु बजारक
बिका रहल जीवन नेनमन मे।
भेल कतेक उन्नति एहि देशक
चमकि रहल अछि विज्ञापन मे।

बिलखि रहल अछि भूखल बच्चा
केना द्वारि पर जा क’ बैसू।
सुखा ………………………….लीखू।

दयाकान्त
माँ मिथिला ताकय संतान

ससरी गेल कतेको टाट
खसि परल कतेको ठाठ
नहि अछि कतहु पर्दा टाट
नहि राखल दलान पर खाट
कतेको घर साँझ-प्रात सं बंचित
कतेको घर ताला सं संचित
जतय रहै छल जमाल दलान
आई बाबा बिन सुन्न दलान
माँ मिथिला ताकय संतान

सगर देश मे भय रहल पलायन
मिथिला सन नहि दोसर ठाम
बी०ए०, एम०ए० घर बैसी के
कहिया धरि देता इम्तिहान
जीबाक नहि बचल कोनो साधन
नहि रोजगारक कोनो ठेकान
गाम बैसी करता की बैउया
कोना बचेता घरक प्राण
माँ मिथिला ताकय संतान

पढ़ल लिखल बौक बनल अछि
धुरफंदी सब मौज करैत अछि
एक आध जे पोस्ट निकलैत अछि
भाई-भतीजा छापि लैत अछि
सबतरि बन्दर बाँट मचल अछि
कोनो विभाग नहि आई बांचल अछि
बिना पाई कियो बात नहि करताह
कतेक सहत सज्जन अपमान
माँ मिथिला ताकय संतान

हमर बुद्धि-विवेकक लोहा
देशे नहि विदेशो मानैया
हमर मेहनत-लग्नक वल पर
आई कियो बाबु कह्बैया
हमर उन्नति देखि के आई
सब प्रांत हमरा सं जरैया
करितहु प्रतिभाक सदुपयोग
रहिता जँ मिथिलामे ओरियान
माँ मिथिला ताकय संतान

दयाकान्त
!

पंकज पराशर
ननकाना साहिब
चिड़ै डेराइत अछि
डेराइत-डेराइत चेहाइत अछि
आ उड़ि जाइत अछि निस्सीम गगन मे

एहि भूगोल मे इतिहासक ऑक्टोपसी गछाड़
आ सेहो नहि तँ कोन बात
जे तोप केर आवाज सहज लगैए
आ चिड़ै केर स्व र भयाक्रांत ?

लाउडस्पीसकर सँ गुरू ग्रंथ साहिब केर
लयात्मक स्वीर पसरैत अछि अंतरिक्ष मे
आ सड़क पर ओहिना विद्यमान रहैत अछि
निस्तकब्धवताक साम्राज्यक

बैग उठबैत बढ़बैत छी डेग
कोनो आन नगरक लेल
तकैत छी चारू दिस
तकैत जाइत छी आकुलता सँ
मुदा देखार नहि पड़ैत अछि
चिड़ै-चुनमुनीक किलोल करैत झुंड!

कामिनी कामायनी

आजुक विद्यार्थी
लोदी के लोढी बूझू
सिस्टम सील समान
थिंकर के कुतरूम बूझू
पीसू एक समान
बनत चहटगर चटनी ।
क्राम्ट क्राम्पटन फैन भेल
हॉब्स हासुआ छाप
अकबर आब होटल बनल
फैराडे फेराडॉल
बनल बढिया विज्ञापन ।
भू के नक्शा ताड़ि क’
अपन बनाउ प्ला न
जतए मोन तत्त राखू
एशिया यूरोप आनि
रहत वसुधैव कुटुंबकम
हरिश्चन्द्र औ प्रेमचंद
दूनू बेमातर भाय
एकके काज पोथी लिखब
दोसरक गप्पे केनाय
देखु इ नब नमूना ।
औरंजेब भागल कब्र सॅ
दुख सॅ ढहि गेल ताज
मुँह नूकॉने हिम छलाह
देखि विद्यार्थी आज
एना की उचित लगै छै ।
सरस्वती के राज में
कानि रहल इसकुल
ओहो केहेन दिन छलै
बिहॅसति छल गुरूकुल
केहेन बयार चलल छै ।
कामिनी कामायनी ्
20।8।09

निशाप्रभा झा (संकलन)

भगवती गीत
कओने मुँह सँ अयलीह काली,
कओने मुँह गेलीह हे कलजोरी-जोरी।
कओने मुँह भए गेली ठाढ हे कलजोरी-जोरी।
पूब मुँह सँ अयलीह काली,
पश्चिम मुँह गेलीह हे कलजोरी-जोरी,
उत्तर मुँह भए गेलीह ठाढ्हे कलजोरी-जोरी।
कओने फूल ओढब काली कओने फूल पहिरन हे कलजोरी-जोरी,
कओने फूल सोलहो सिंगार हे कलजोरी-जोरी।
बेली फूल ओढन काली, चमेली फूल पहिरन हे कलजोरी-जोरी,
ओडहुल फूल सोलहो सिंगार हे कलजोरी-जोरी।
पहिरि औढिय काली गहबर मे ठाढि हे कलजोरी-कलजोरी,
करय लगलीह सेवक के गोहारि हे कलजोरी-कलजोरी।

अजित
ओ तँ मुहेँक बड़जोड़ छथि
रिक्शापर माइक लगा जोर जोरसँ
छोटगर-छोटगर भाषणे तँ देलथि
नेताजी किछु कऽकऽ देखाबथि!

कहथि जा घर-घरमे बिजली लगाएब
आब अन्हारमे जीबि नहि पाएब
हर रातिकेँ हम दीवाली बनबाएब
एको जे खम्हा गारिकऽ लबैथ
नेताजी किछु कऽ कऽ देखाबथि!!

घर-घरक बच्चा स्कूल जाएत
पढ़ए-लिखऽ सँ नञि कियो वंचित हएत
शिक्षाक स्तर बहुत बढ़ाएब
चारियोटा शैक्षिक सामग्री बटबैतथि
नेताजी किछु कऽ कऽ देखाबथि!!

गाम-गाममे फोनेटा नहि
ई-मेल आ इन्टरनेट लगाएब
मोबाइलक तँ बाढ़ि बहायब
एक्को दू टा पी.सी.ओ. तँ खोलाबथि
नेताजी किछु कऽकऽ देखाबथि!!!

कारखाना खुलत, काज बढ़त
रोजगारीक अवसर प्रसस्त बनबाएब
बेरोजगारीक नामोनिशान मेटाएब
एकोटाकेँ ढंगगर नोकरी दियाबथि
नेताजी किछु कऽ कऽ देखाबथि!!

ओ तँ मुहेँक बड़जोड़ छथि
पार्टी आ अप्पन मात्र काज करौलथि
जितलाक बाद चेहरो नहि देखओलथि
ओ तँ आब राज करै छथि
अनेरे किए किछु कऽकऽ देखओबथि!!!

कल्पना शरण
प्रतीक्षा सँ परिणाम तक-३

अपन संहारकक नाश करै लेल
प्रकोप बरसल देवी माया पर
स्तब्ध रहि गेल ई- जानि कऽ
कोना कृष्ण पौलैथ सुरक्षित घर
पहिने मथुरामे बाल संहार भेल
फेर बात बढ़ल गोकुल तक

पूतना सऽ जे प्रारम्भ भेल छल
भयभीत कंसक नुकायल प्रहार
एक पर एक आघात होयत रहल
वकासुऱ अगासुर सन कतेक आर
मुदा अहि सब मे हारैत दुश्मन
अचूक छल हरि के पलट वार

इम्हर कखनो ब्रह्माक नटखट खेल
कखनो कालिनाग सऽ सामना भेल
बाल्य काल स माखन चोरेनहारक
हाथे कतेको के मोक्ष प्राप्ति भेल
कृष्णावतारक उद्देश्य सऽ अज्ञात
गोकुलवासी वृन्दावन दिस विदा भेल

सुमित आनन्द
जेम्हरे देखू तेम्हरे लाइन!!
ट्रेनमे लाइन, बसमे लाइन
सिनेमाक हॉलमे लाइन
गैसक गोदाममे लाइन
राशनक दोकानमे लाइन
सबसँ बड़का सैलूनमे लाइन!
जेम्हरे देखू तेम्हरे लाइन!!

स्कूलमे लाइन कॉलेजमे लाइन
डॉक्टरमे लाइन आ वकीलमे लाइन
अस्पताल आ कोर्टमे लाइन
सबसँ बड़का सर्कसमे लाइन!
जेम्हरे देखू तेम्हरे लाइन!!

चाहमे लाइन, पानमे लाइन
पैखानामे लाइन आ पेशाबमे लाइन
होटलमे लाइन, बोतलमे लाइन
सबसँ बड़का पाइनमे लाइन!
जेम्हरे देखू तेम्हरे लाइन!!

मन्दिरमे लाइन, मस्जिदमे लाइन
योगीमे लाइन आ भोगीमे लाइन
जोतखीमे लाइन, पंडितमे लाइन
सबसँ बड़का शमसानमे लाइन!
जेम्हरे देखू तेम्हरे लाइन!!

नेतामे लाइन, अभिनेतामे लाइन
खेलमे लाइन आ जेलमे लाइन
ऑफिस आ आवासमे लाइन
सबसँ बड़का सर्विसमे लाइन!
जेम्हरे देखू तेम्हरे लाइन!!

गद्य-पद्य भारती

पाखलो
मूल उपन्यास : कोंकणी, लेखक : तुकाराम रामा शेट,
हिन्दी अनुवाद : डॉ. शंभु कुमार सिंह, श्री सेबी फर्नांडीस.मैथिली अनुवाद : डॉ. शंभु कुमार सिंह

पाखलो- भाग-३

पाखलो- भाग-४

दादी अपन बेटा गोविन्दक संग हमरहुँ स्कूल पठा देलक। ओहि दिनसँ हम आ गोविन्द दुनू गोटे खास मीत बनि गेलहुँ। विद्यालयक प्रवेश-पंजीमे शिक्षक हमर नाम पाखलो लिख देलनि। अही नाम सँ हम ओहि विद्यालयमे मराठीक माध्यमसँ चारिम कक्षा धरि पढ़ाइ केलहुँ। हाजरी दैत काल हमर एहि नाम पर हमरा कक्षाक आन-आन छात्र लोकनि हमर खूब मजाक उड़ाबए जे हमरा बहुत खराप लागैत छल। प्रवेश-पंजीमे हमर नाम पाखलो लिख देल गेल रहए इहो लेल हमरा बहुत खराप लागैत छल।
गोविन्द हमरा सँ एक कक्षा आगू छल तकर पश्चातो हमरा ओकरासँ दोसती भ’गेल छल। हम ओकरा संगहि माल-जाल ल’ क’ जंगल धरि जाइत रही। जंगल जाइत काल हमरा काँट-कुशक कोनो डर नहि होइत छल। ओतए हम सभ कणेरा-काण्णां, चारां-चुन्नां1 खाइत छलहुँ। घूस-गे बाये घूस2 ई शब्द बोलिकए एक दोसरा पर ‘भा’ अएबा धरि आ कोयण्या-बाल, गड्ड्यांनी3 आदि प्रकारक खेल खेलाइत छलहुँ। चरवाहा सभक संग रहि हमहुँ चरवाहा बनि गेल छलहुँ।
गोवा केँ स्वतंत्र हेबासँ पहिनुके बात थिक। तखन हमर उमिर नओ-दस बरखक रहल होएत। गामक बन्न पड़ल पुलिस-स्टेशन एकबेर फेर चालू भ’ गेल रहैक। ओतए तेशेरा नाम केर एकटा नव पुलिस प्रधानक नियुक्ति भेल छलैक। ओ
1. कोंकण प्रदेशक एकटा जंगली फल जे लोक खाइत अछि।
2. कोंकण प्रदेशमे खेलल जाएबला एक प्रकारक खेलमे प्रयुक्त शब्द जाहिमे एहन मान्यता अछि जे ई शब्द बाजलासँ कोनो खास व्यक्तिक देहमे कोनो आत्माक प्रवेश भ’ जाइत अछि।
3. कोंकण प्रदेशमे नेना सभक द्वारा खेलल जाएबला एक प्रकारक खेल।

कहियो काल सैह पणजीसँ गामक पुलिस स्टेशन अबैत-जाइत छल। ओ अपना लेल ओतए एकटा धौरबी राखि नेने छल। ओकरा ओ अपना संगहि गाड़ी-घोड़ा पर घुमबैत रहैत छल।
गामक बगल वला जमीनक लेल दत्ता जल्मी आ सदा ब्राह्मणक बीच बहुत दिनसँ विवाद छलैक। ओकरा सभक बीच मोकदमा चलि रहल छलैक। दू-तीन साल बीत गेलाक पश्चातो एखन धरि ककरहुँ पक्षमे फैसला नहि भेल छलैक। एकबेर ओ नव पुलिस प्रधान (तेशेराकेँ) अपना घर बजाकए खूब मासु- दारू खुऔलक-पिऔलक। ओहि दिन ओ प्रधान ओकरा स्त्रीकेँ देखलकैक। ओहि काल ओ ओकरा प्रति आसक्त भ’ गेल आ ओ जाहि कक्षमे रहथि ताहि दिस देखैतहि रहि गेल। सदा प्रधानसँ विनती केलक जे ओ मोकदमा ओकरहिं पक्षमे करा दैक। कने काल चुप रहलाक पश्चात् प्रधान ओकरा हँ कहि देलकैक। शर्तक रूपमे ओ सदासँ ओकर स्त्री माँगि लेलकैक। सदाकेँ जल्मीक जमीनक संगहि-संग गामक सभसँ पैघ जमीन (केगदी4चास-बास) भेटए बला रहैक।
चारिए-पाँच दिनक बाद पुर्तगालीक विरोधमे काज करबाक अभियोगमे दत्ता जल्मीकेँ भीतर क’ देल गेलैक। तकर बाद ओकर की भेलैक ताहि संबंधमे ककरहुँ कोनो पता नहि चलि सकल। केओ कहैक जे दत्ता फेरार भ’ गेलैक तँ केओ कहैक जे प्रधान ओकरा मारि देलकैक।
ओहि दिनक बादहिं सँ सदाक घर लग सभ दिन एकटा गाड़ी लागए लागलैक। सदाक स्त्री सभ साँझकेँ नव-नव साड़ी पहिरए, नीक जकाँ अपन केश-विन्यास करए, काजर, बिंदी पौडर आदि लगा अपन श्रृंगार करए आ तेशेराक गाड़ी मे बैसि जाए। तेशेराक गाड़ी सदाक बंगला पर धूरा उड़बैत फुर्र भ’ जाइक।
4. क्षेत्र विषेशक बाध-बोनक नाम।
दोसर भोर ओ गाड़ी हुनका एतए पहुँचा दैक। ओ गाड़ीक पछिला सीट पर लेटल रहैत छलीह। हुनकर केश आ चोटी सभ उजरल-उभरल रहैक, आँखिक काजर नाक आ गाल पर लेभराएल रहैत छलैक।
मोकदमाक फैसला सदा जमींदारक पक्षमे भ’ गेल छलैक एहि लेल ओ सत्यनारायण भगवानक पूजा करबाक लेल सोचलक। पूजामे अएबाक लेल ओ भरि गामक लोककेँ हकार देलकैक। सदा ओ ओकर स्त्री पूजा पर बैसि चुकल छलीह। तखनहि प्रधान तेरेश अपन गाड़ी ल’ कए ओतए आबि गेल। ओ पूजा पर बैसलि सदाक स्त्रीकेँ उठा लेलक। पूजामे आएल सभ लोककेँ एहि घटनासँ बड्ड आश्चर्य भेलैक। केगदी चास-बास केर कागद-पत्तर सदाकेँ थम्हबैत ओ ओकरा स्त्रीकेँ ल’ कए आगू बढ़ल, तखनहि सदाक छोट भाय ओकरा सभकेँ रोकबाक प्रयास केलकैक। तेशेर ओकरा पर बन्दूकसँ निसान साधि लेलकैक आ आब गोली दागहि वला रहैक की सदा ओकरा रोकि दैलकैक। तेशेर अपन बन्दूक नीचाँ क’ लेलक। तकरा पश्चात् ओ सदाक भायकेँ एक दिस धकेलि ओकरा स्त्रीक हाथ पकड़ि आगू बढ़ल। एहि पर सदा अपना स्त्रीसँ कहलकैक—“ओकरा संग एना जा कए अहाँ हमर नाक कटबाएब की?” ई सुनि सदाक स्त्री अपन मुँह चमकबैत बजलीह—“अहाँकेँ नाको अछि की? जँ अहाँकेँ नाके चाही तँ हे ई लिअ…” एतबा कहि ओ अपन नाकक नथिया निकालि सदाक पयर लग धरती पर फेकि देलकैक आ प्रधान तेरेश केर संग चलि देलक।
तेसरे दिन प्रधान ओकरा ल’ कए पुर्तगाल चलि गेलैक।
प्रधान तेशेरकेँ पुर्तगाल जेबासँ ठीक एकदिन पहिनुके गप्प थिक। रातिक लगभग दू वा तीन बजैत हेतैक। केओ हमरा घरक फटकी खोलि हमरा घर घूसि गेल। हमर माय कम कएल लालटेमक इजोतकेँ कने तेज केलक। देखलहुँ तँ एकटा अनजान लोक! ओ बाजल—“बहिन हमरा कतहुँ नुका दिअ, हमरा पाछू फिरंगी पुलिस लागल अछि। एकबेर जँ हम ओहि पुलिस प्रधान तेशेराक हाथ आबि गेलहुँ तँ ओ हमर जान ल’ लेत। हम जीवित नहि बाँचि सकब।”
एतबहिमे दूरसँ अबैत जूता ध्वनिसँ बुझाइक जे केओ आबि रहल छैक। हमर माय ओकरा ओढ़बाक लेल अपन साड़ी देलकैक आ ओ साड़ी ओढ़ाकए ओकरा हमरहिं लग सुता देलकैक। किछुए क्षण केर पश्चात् घरमे इजोत देखि प्रधान तेशेर हमरा घरमे घुसि गेल। हमर माय बहुत डरि गेलीह। तेशेरा सौंसे घर केर तलाशी ल’लेलकैक आ ओतए के सूतल छैक? ओकरा संबंधमे पूछय लागल—हमर माय डरैत-डरैत बजलीह—“ओ हमर बहिन थिकीह…..साहेब।”

क्रमशः

श्री तुकाराम रामा शेट (जन्म 1952) कोंकणी भाषामे ‘एक जुवो जिएता’—नाटक, ‘पर्यावरण गीतम’, ‘धर्तोरेचो स्पर्श’—लघु कथा, ‘मनमळब’—काव्य संग्रह केर रचनाक संगहि कैकटा पुस्तकक अनुवाद,संपादन आ प्रकाशनक काज कए प्रतिष्ठित साहित्यकारक रूपमे ख्याति अर्जित कएने छथि। प्रस्तुत कोंकणी उपन्यास—‘पाखलो’ पर हिनका वर्ष 1978 मे ‘गोवा कला अकादमी साहित्यिक पुरस्कार’ भेटि चुकल छनि।

डॉ शंभु कुमार सिंह
जन्म: 18 अप्रील 1965 सहरसा जिलाक महिषी प्रखंडक लहुआर गाममे। आरंभिक शिक्षा, गामहिसँ,आइ.ए., बी.ए. (मैथिली सम्मान) एम.ए. मैथिली (स्वर्णपदक प्राप्त) तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। BET [बिहार पात्रता परीक्षा (NET क समतुल्य) व्याख्याता हेतु उत्तीर्ण, 1995] “मैथिली नाटकक सामाजिक विवर्त्तन” विषय पर पी-एच.डी. वर्ष 2008, तिलका माँ. भा.विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। मैथिलीक कतोक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे कविता,कथा, निबंध आदि समय-समय पर प्रकाशित। वर्तमानमे शैक्षिक सलाहकार (मैथिली) राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर-6 मे कार्यरत।
सेबी फर्नांडीस

क्रमशः
बालानां कृते-
1.देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स) आ 2.कल्पना शरण: देवीजी

देवांशु वत्स, जन्म- तुलापट्टी, सुपौल। मास कम्युनिकेशनमे एम.ए., हिन्दी, अंग्रेजी आ मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्रिकामे कथा, लघुकथा, विज्ञान-कथा, चित्र-कथा, कार्टून, चित्र-प्रहेलिका इत्यादिक प्रकाशन।
विशेष: गुजरात राज्य शाला पाठ्य-पुस्तक मंडल द्वारा आठम कक्षाक लेल विज्ञान कथा “जंग”प्रकाशित (2004 ई.)

नताशा:
नीचाँक कार्टूनकेँ क्लिक करू आ पढ़ू)
नताशा बीस

नताशा एक्कैस

नताशा बाइस

2.कल्पना शरण: देवीजी
देवीजी शिक्षक दिवस ‘2009’
प्रधानाध्यापक के विद्यालय के लऽग गेला सऽ किछु हलचल बुझेलैन।कनिक आश्यर्च आऽ कनिक भय के संगे प्रवेश केला तऽ अन्दर के आयोजनक भनक लागि गेलैन।एहेने हाल देवीजी आ आन कर्मचारी सबहक सेहाे छल।अहिबेर सबटा पासा पलटल छल। शिक्षक दिवसके सुअवसर पर अहि बेर देवीजीके पिछला साल जकाँ किछु कहैके आवश्यकता नहिं पड़लैन। देवीजी कनिक अंठा देने छलखिन मुदा सब बच्चा सब अपने सऽ तैयारी कऽ रखने छलैथ। बल्कि अहिबेर बच्चा सब दिस सऽ शिक्षक सब के उपहार के रूपमे एक रंगारंग कार्यक्रमक आयोजन कैल गेल छल।दरबान सऽ अपन अभिभावक के बात करा कऽ बच्चा सब विद्यालय के पहिने खुलबा लेलैथ आ शिक्षक सबके पहुॅंचै सऽ पहिने अपन प्रस्तुति लेल तैयार छलैथ।
कार्यक्रममे शिक्षक दिवसके आरम्भक पाछु कारण के बखान सऽ जे मनाेरंजन शुरू भेल से शिक्षक सबहक प्रति आदर अभिव्यक्तिस सऽ लऽ कऽ विभिन्न प्रकार सऽ शिक्षक सबके हॅंसाबैके प्रयास तक सराहनीय रहल। सब भावाविभाेर भऽ गेल छलैथ। प्रधानाध्यापक के व्यंगात्म क कार्यक्रम बेसी नीक लगलैन कारण हुन्का अपन विद्यार्थी सबहक आकांक्षा आऽ विद्यालयक प्रयास मे विद्यार्थीक दृष्टिकोण सऽ कतऽ कमी रहि गेल छल से ज्ञात भेलैन। एवम अहि सऽ विद्यार्थी सबहक मानसिक विकासक परिपक्वदता सेहाे अवलाेकित भऽ रहल छल।
पूरा तैयारी बच्चा सब अपने केने छल। रंगमंचके सजावट सऽ लऽ कऽ कार्यक्रमक उद्घाेषणा तथा कार्यक्रमक श्रृंखला सब बच्चे सबहक मत आ आपसी सामंजस्य सऽ भेल छल।देवीजी आ अन्य कर्मचारी लेल यैह सबसऽ पैघ खुशी छल।परन्तु विद्यार्थी सबहक स्नेहाभिव्यक्ति अखने खत्म नहिं भेल छल। शिक्षक दिवस के आहिके यादगार प्रस्तुति जे आगाँ कतेको दिन तक सबके मोनमे सुरक्षित रहतैन तकरा निहारैलेल सब बच्चा सब अपन हाथे प्रत्येतक कर्मचारी लेल ग्रीटिंग कार्ड बनेने छलैथ।अहि तरहे आहि गुरू गुड़ आ चेला चीन्नी भऽ गेल छल।

बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
१.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
१०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)
आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् – विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे – देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽ–बिना डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।
Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवाफोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara orPhonetic-Roman.)
Language: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.)
इंग्लिश-मैथिली कोष/ मैथिली-इंग्लिश कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वाराggajendra@videha.com पर पठाऊ।
विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.

१.पञ्जी डाटाबेस आ २.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

१.पञ्जी डाटाबेस-(डिजिटल इमेजिंग /अंकन/ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यंतरण/ संकलन/ सम्पादन- गजेन्द्र ठाकुर,नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा द्वारा)
(101)
रघु बनमाली (136/0) (266/0) कुनें सभापतिय: सोदरपुरसै जीवनाथ दौ (22/0) महो जीवनाथ सुतो (32/06) थेघ: दरिहरा सै मुनि दौ (16/0) बभनियामसै गोनन दौहित्र दौ।। कुने प्रo कुलपति सुतो जागेक: बेलउँच सै मधुदौ।। जागे सुतो लक्ष्मीदनाथ: वलियास सै सुपे दौ।। लक्ष्मी्नाथ सुतो (266/0) बावू भिखूकौ एकहरासै परान सुत काशी दौ पनिचोभसै रमापति द्दौणा भिखू (135/04) प्रo भिरवारी सुता माण्ड र सै नरहरि दौ सोन्हूर सुत परान सुतो नरहरि: पालीसै भवनाथ दौ।। नरहरि सुता पालीसै गणपति सुत पाठक बैजू दौ सरिसब सै गोपाल द्दौणा एहे ठ. लक्ष्मी घर द्वितीय विवाह समाप्ति 16.06.2003 Monday
ठ. बैद्यानाथ सुता तरौनी कामहासै बासुदेव सुत दाउँ दौ (30/02) विष्णु पति सुता मुकुन्दस मुरारि महेशा: परहर सकराढ़ी सै भोजू दौ (06/04)
अपरा वीर सुतो भोजू धीरू को (45/09) को बभनियाम सै रूचिकर दौ (36/03) खौआल सै श्रीधर द्दौणा भोजू सुतो रघु सुपनो (88/08) नरउनसै बासू दौ (23/06) श्रीकर सुतो बासुक: पालीसै धरादित्यि दौ (28/02) बलियास सै हरादित्य/ द्दौणा बासू सुता गंगोली सै सुरेश्व(र दौ (43/09) भन्दयवालसै फूलहत द्दौणा मुकुन्द0 सुतो शंकर बढि़याम पबौली सै रतनू दौ (32/02) अपरा रतनू सुता खौआल सै माधव दौ (36/0) चान्द् सुता माधव कान्हढ राम (68/06) देवे (60/09) हरखू पराना: वहेराढीसै गदाधर दौ (38/07) सकराढ़ीसै चांडो द्दौणा

(102) ।।43।।
माधव सुता बभनियामसै मतिकर सुत गहाई दौ दरिहरासै राजू द्दौणा शंकर सुतो बासुदेव: वलियाससै रामचन्द्रर दौ (28/03) अपरा नारू सुता ऐठो दूबे (76/0) बाग का गंगोली सै होरे सुत भवदत्त दौ भवदत्त सुतो जीवेश्वतर: पालीसै हिताई दौ (12/02) हिताई सुतो दिवाकर: तिलईसै ज्ञानधर दौ।। इबे सुतो वंशमणि सोदरपुर सै महादेव दौ (23/0) महामहो महादेव सुता सोने (134/06) (86/03) (138/08) (36/04) रूचि रतन् दाका कवि मo मo (55/09) गणपतिय: कुजौलीसै रविकर दौ (23/03) अलयसै मo मo गदाधर द्दौणा वंशमणि सुता (130/28) सुता रामचन्द्रदराघव मुकुन्दा1 बुधवाल सै दिवाकर दौ (11/03) रतिकर सुतो मतिवर (43/09) मासैकों आद्या बेलउँचसै गयादित्ये दौ (22/09) भरेहासै केशव द्दौणा अन्यो1/0 माण्डअर सै रतिकर दौ (29/03) बहेराढ़ीसै रवि द्दौणा मासे (80/09) सुतो शंकर दिवाकरौ सोदरपुरसै कमलू दौ (29/03) अपरा हाउँ प्रoरत्नाकर सुता कमलू गोढि (53/02) शुभे अन्दूक विरू (31/06) (47/05) धीरू का (62/04) वलियाससै इबे सुत गणपति दौ गंगोली सै सोम द्दौणा अन्योढि ौ टकबालसै हरदत्त दौ (25/04) हरदत्त सुता सुरगनसै धीरू सुत माधव दौ तिसुरी सै मुरारी दौ कमलू सुता खौआलसै इबे दौ नरउन सै वागे द्दौणा दिवाकर सुता बेलउँच सै माधू दौ (37/08) माधू सुता रूचि वेणी वासू रामू जीवेका वलियाससै विभाकर सुत गुणाकर दौ पालीसै कवि द्दौणा कवि रामचन्द्र सुता पबौली सै नरायण दौ (32/0) भानुदतसुता (79/08) प्राणपति घनपति श्रीपतिय: बुधवालसै मति दौ (43/04) मति सुतो नरपति (94/05) सुरपति सोदरपुरसै हौउँ दौ (29/03) करमहासै माधव द्दौणा प्राणपति सुता (168/08)

(103)
उँमापति भवानीनाथ नारायण हरिश र्म्मरणा: खौआल सै रघुसूत गोंढि दौ पालीसै राम द्दौणा नरायण सुतो श्रीनाथ लोकनाथो दरिहरासै गिरी पौत्र बागे सुत हरिहर दौ पनिया रघुपति द्दौणा बासुदेव सुतो दाउँक: कन्हौयली सोदरपुरसै मोरा द्दौणा (35/02) श्री हरि सुता हरीनाथ (61/07) रामनाथ शिवनाथा: खौआलसै हरिकेश दौ (37/0) (132/02) बाइ सुता आङनि इबन माथना (56/05) हरिअम सै परमू दौ (42/09) सोदरपुरसै महो जीवनाथ द्दौणा आङनि सुतो गोविन्दे हरिकेशों बुधवालसै लाखू दौ (38/09) खौआल सै बुद्धिकर द्दौणा हरिकेश (98/04) सुतो रतिदेव रामदेवों (164/0) पनिचोभसै अन्इ8 दौ (20/04) अन्इै सुतो जसाई क: गंगोर सै पौखू दौ (29/07) अपरा सुधाकर सुता प्रभाकर दिवाकर दिनकरा: (80/05) सकराढ़ी सै चोड़ो दौ (38/08) खण्ड)बलासै मेघ द्दौणा (63/05) प्रभाकर सुतो पौखूक बलिरूचि (10/09) अपरा रूचि सुतो शुचिकर जजिवालसै सोम सुत राम दौ वुधवालसै शिवादित्य द्दौणा पौखूक सुतो डालू मण्ड0नो माण्डकरसै सोने सुत रूद्रपाणि दौ बेलउँचसै विशो द्दौणा रामनाथ सुता रघुदेव (95/03) विष्णु/देव भोराका: हरिo मधुसूदन दौ (27/06) भवे सुता मुरारि (83/0) मधुसूदन मुकुन्दभ यथाक्रम बाघ सिंह शादिला: नरउनसै प्रथमापररोसेo गौरीपति दौ (27/08) गौरीपति ब. (81/05) पति सुता तलहनपुरसै केशवसुत गणपति दौ एकहरासै बामू द्दौणा मधुसूदन सुता और सोदरपुरसै जागू दौ (31/07) अपरा सुधाकर (02/09) सुतो जागूक: नरउन सै दिनकर दौ (24/08) दरिहरा सै कुसुमाकर द्दौणा जागु सुता (130/08) माण्डतर सै काशी दौ (33/09) काशीसुता रूचि छितू मीना: (93/0) सोदरपुरसै कितिनाथ दौ खौआल सै गहाई द्दौणा भोरा सुता वलियास सै गोढ़ाई दौ (32/03) महनू (71/05) सुतो वेणी काशी को (334/0) बुधवालसै विश्वेरश्वदर दौ (36/06) अपरा विश्वेौश्व2र सुता माण्डनरसै रतिदौ अपरा महनू सुता बहेराढ़ीसै ढोढे दौ।।

(104) ।। 44।।
(29/03) बहेराढ़ी सै रवि द्दौणा वेणी सुता श्रोत्र पल्लाव धीरू (147/02) गोपीनाथ प्रo गोपाल नाथू पौथू (55/07) (49/06) मिश्र कृष्णास: बहेराढ़ीसै वेणी दौ वेणी दौ वेणीसुतो शंकर रतनूकौ माण्डसरसै गांगुदौ (02/07) दामू सुत मांगु सुतो गांगूक पाली सै रामदत्त दौ (14/02) पबौली सै बागे द्दौणा गांगु सुतो आदित्या: बड़गाम गंगोलीसै रघु दौ (34/08) रघुसुता दरिहरासै सोनू सुत जगन्ना2थ दौ टकबालसै वंशीधर द्दौणा नाथू सुतो गोढ़ाई सोनाईकौ सरिसबसै बावू दौ (38/07) चान्द सुता रतनू राम होरिल शौरे मुरारी नइहरिय: माण्डगरसै मनोधर दौ (36/0) जाल्य सै महिधर द्दौणा मुरारि सुता बावू श्रीधर कान्हाइ करo जोर सुत धीरू दौ दरिहरासै मेघ द्दौणा बावू सुता खौआल सै जागू सुत परान दौ सुरगनसै शंकर द्दौणा गोढ़ाई सुतो मथुरेर (157/0) एकहरासै दशरथ दौ (26/07) मुरारि सुता श्री पति विष्णु पति गदाधर पीताम्ब र नारायणा: (228/08) पबौलिसै रामदत्त दौ (36/07) बेलo जोर द्दौणा श्रीपति सुतो दशरथ: नरउन जाने दौ (25/05) जाने सुतो भगीरथ महिपति माण्डदरसै शीरू पौत्र रूद्रकान्तर सुत सर्वाई दौ नरउनसै रतीश्वधर द्दौणा मिश्र दशरथ (91/06) सुतो रमापति: (94/05) माण्डिरसै श्री हरिद (26/03) जाने सुतो सोने धाने कौ कनन्दधह सै जीवधर दौ।। सोने सुतो शिव अनाथौ पचही जजिवालसै जीवे दौ।। अनाथ सुता श्री हरि हरिकेश महादेवा: पालीसै रति दौ रति सुतोटेकीक: खौआल सै अमाई दौ फनदहसै चान्द द्दौणा श्री हरि सुतो यदुनाथ: खण्डसबालासै नोने दौ (20/0) अपरा राजू सुता लान्हि शूज रूचि लवे (50/0) वरेवासै भोम दौ।। शूज सुतो मित्रकर सोमो खौआल सै गोढि दौ।। सोम सुतो नोनेक: करमहासै दिवाकर दौ।। नोने सुता वभनियाम सै सुधाकर सुत विभाकर दौ जजिवालसै पशुपति द्दौणा दाउँ सुता सरिसव सोदरपुर सै रामचन्द्रु सुत अच्युरत दौ (39/08) बावू प्रo रत्न पति सुतो रामचन्द्रर मधुसूदनो करमहासै लक्ष्मीनघर दौ (105/108)

(105)
दुबन (42/06) (52/03) दुबन सुतो लक्ष्मी्घर मनोधरौ (107/09) एकहरा सै कृष्णेपति दौ (37/05) (49/0) कृष्ण8पति सुतो रविपति इन्द्रनपति (53/07) (132/06) पालीसै गोढ़े दौ (21/03) खौआल सै रघुनाथ द्दौणा लक्ष्मीवधर सुतो नारायण: (51/0) नरउनसै गीरू दौ (25/0/) माण्ड रसै बसाउन द्दौणा रामचन्द्र (77/0) सुतो अच्युषत वनमाली कौ हरिअमसै हिंगु दौ (27/05) मधुकर सुता मितू (85/09) छीतू प्रo जीवे चान्दा0 कुजौलीसै मधुकर सुत मतिकर दौ सोदरपुरसै बासुदेव द्दौणा मितू सुतो रतिदेव हरिदेवौ एकहरासै राम दौ (40/05) अपरा महाई सुता (80/0) रतनू राम वेणी चान्दाह: सोदरपुरसै मo मo देवनाथ दौ (37/08) पालीसै यशु द्दौणा (90/02) राम सुतो रघुपति माण्डारसै शंकर दौ (223/06) बेलउँच नोने द्दौणा हरिदेव सुतो चिन्तादमणि हिंगु कौ सरिसब सै जानू दौ (41/07) अपरा जुड़ाउन सुता माधव (230/03) गोविन्दउ जानूका बहेराढ़ी सै रूचिकर दौ (39/07) माण्ड1र सै जोर द्दौणा जानू (63/02) जानू सुता माण्डिर सै शिव सुत शंकर दौ पबौली सै माधू द्दौणा हिंगु सुतो विश्व0नाथ: माण्डौर सै यदुनाथ दौ (31/09) गंगापति सुतो (156/06) जीवे यशोधर मुरारि गणपतिय: सोदरपुर सै देवे सुत अन्दू दौ घुसौतसै गुणाकर द्दौणा यशोधर सुतो दामोदर: बेलनउँच सै आदित्य दौ (35/03) गौरीश्वदर सुता आदित्यग कमल भमरू का: पण्डुाआ सै रामकर दौ (29/0/0) रामकर सुतौ लड़ावन नोने कौ गंगोर सै शिवनाथ दौ (17/0) टकबाल सै सोनमनि द्दौणा आदित्य प्रo अदितू सुता मण्डवन रघुपति विष्णुथपति शिरू का करमहासै हरि दौ सकराढ़ीसै लान्हि द्दौणा दामोदरसुता यदुनाथ चतुर्भुज (61/09) प्रितिनाथ (109/0) गोप मुशायका हरिअमसै देवनाथ दौ।।

(106) ।।45।।
(42/0) सोनी सुतो देवनाथ रूपनाथौ गंगोर सै जोर दौ।। देवनाथ सुता माण्ड(रसै नन्द न सुत रघु दौ करo जागे द्दौणा यदुनाथ (85/02) सुता घनश्याुम बालानाथ मधुसूद मo उपाo पद्यापतिय: करमहासै हरपति दौ (42/07) माधव सुता हरपति मुरारि (82/0) जाना सोदरपुरसै थेघ दौ (30/03) थेघ सुता सकराढ़ीसै मतीश्व/र दौ (39/0/0) अलयस हेलू द्दौणा हरपति सुतो रामकृष्णज (60/05) सकराढ़ी सै श्री नाथ दौ (05/08) गुणे सुता बसावन बुद्धिकर अन्दूयका बहेराढ़ीसै वाराह दौ (25/02) माण्डपरसै रघुपति द्दौणा बसाउन सुता (80/07) भवनाथ रूचिनाथश्रीनाथ जीवनाथा: पालीसै वेणी नाथ दौ (42/02) अपरा परमगुरू पदांकित वाचस्प/ति (65/09) सुता महो वेणीनाथ रघुनाथ महामहो (58/07) पाध्या य नरहरिय (62/0) पबौली सै हरदत्त सुत रूद दौ दोस्ती6 सै जीवे द्दौणा महो वेणीनाथ सुता हरखू सिद्धि गाइ लाखू गौरी श्रीदत्ता दरिहरा सै महादेव सुत देहरि दौ नरउनसै बागू द्दौणा श्रीनाथ सुता बुधवाल सै कृष्णह दौ (11/03) गणेश्वार सुता मिश्र भरथी सोने नरहरिय: बेलउँच सै महादित्य दौ (10/05) माण्डौर सै गोपाल द्दौणा सोने सुता रघुपति पाँ श्रीपति विदूका तल्ह नपुर सै गढ़लयसुत भानुकर दौ दरिहरा सै गाइ द्दौणा रघु सुता कृष्णग वेणी माधव गोपीका खौआलसै श्रीधर सुत हिरदू दौ जजिवाल सै पशुपति द्दौणा कृष्णु सुतो मधुसूदन: सरिसब सै भोगेसुत धनपति दौ पनिचोभसै अदितू द्दौणा अच्चुवत सुतो रत्ना कर: परहरस शदीसै पुरूषोत्तम दौ (43/07) धीरू सुतो रूपधर: नरउनसै रतिपति दौ (09/0/0) बहेराढ़ी सै ठ. गणपति द्दौणा रूपधर सुतो रामभद्र: बहेराढ़ी सै

(107)
सै सोने सुत महाई दौ (25/03) महाई सुता खौआल सै धारू सुत गाइ दौ पालीसै गाइ द्दौणा मo मo उo रामभद्र सुता महो (111/06) भवदेव मo मo ज्योoतिर्विद यदुनाथ (78/07) कविन्द्र पदांकित मo मo उo रघुनाथा करमहासै विद्यापति दौ (42/06) अपरा (53/07) राम सुतो विद्यापति माण्डदरसै यग्य8पति दौ (32/07) अपरा यग्यघपति (73/06) सुता बुधवाल चान्दप दौ (37/03) अपरा चान्द (86/04) सुता दरिहरा सै पद्मकर दौ (11/09) तल्ह नपुर सै गढ़वय द्दौणा विद्यापति सुता (109/06) सुता दरिo माधव दौ (25/07) (48/04) माधव सुतागुण (138/05) नन्दावर हरिहरा: (84/03) हरिo मधुकर दौ (16/03) गुणे सुतो मधुकर माधवो दरिहरासै यटाधर सुत सुपन दौ फनन्दसह सै गयन द्दौणा मधुकर सुता फविकर ठकरू अन्इ गणेश बासुदेवा सोदरपुर सै भासे दौ (32/09) सतलखासै यटाघर सुत सुपन दौ फनन्द ह सै गयन द्दौणा मधुकर सुता फविकर ठकरू अन्इु गणेश बासुदेवा सोदरपुर सै भासे दौ (32/09) सतलखासै शंकर द्दौणा कविन्द्रत पदां. मo मo रघुनाथ (75/06) सुतो पुरूषोत्तम सोदरo यदुनाथ दौ (28/09) भीम सु यदुनाथ श्री नाथ (86/09) (74/06) कुनाई का गोधुलि अलयसै देवनाथ दौ।। (32/09) देवनाथ सुतो बलभद्र (88/03) पवौलिसै बासुदेव दौ (30/08) रविदत्त सुतो (56/08) रविदत्त सुतो महो (61/08) महनूकौ दरिoगाढि़ वेणी सुतो बासुदेव: खौआल सै दिनकर दौ पालीसै गोढि द्दौणा बासुदेव सुता टकबालसै कोने दौ (23/04) अपरा रतिकर सुतो चाण (87/05) इन्द्रो वलियास हरिपाणि सुत विशो दौ सरिo सोने द्दौणा इन्द्रत सुता नोने कोने दूबे (132/02) चौबे अन्दूनका माण्डढर सै होरे दौ (19/02) नरउन सै खांतू द्दौणा (62/08) कोने सुता विष्णुूपति कृष्ण पति रतिपति शंकरा कसराढ़ी सै रूचिकर दौ (34/0) अपरा रूचिकर सुता बेलउँचसै होरे दौ (30/07) सोदरपुर सै कान्हश दौहित्र दौ (93/03)

२.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली
(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित)
मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन

१.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना-
अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।)
पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।)
खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।)
सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।)
खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।)
उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि।
नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ।

२.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना-
ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि।
ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि।
उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि।

३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश,बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश,वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि।

४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी,जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत,योगी, यदु, यम लिखबाक चाही।

५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि।
प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि।
नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि।
सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि।
ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि।

६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु,तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले,चोट्टे, आनो आदि।

७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि।

८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि:
(क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक।
अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक।
पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक।
(ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह।
अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह।
(ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि।
अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल।
(घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि।
अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि।
(ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक।
अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ।
(च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि।
अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै।

९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन),पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि।

१०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए।
-(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित)

2. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन
ठाम
जकर,तकर
तनिकर
अछि

अग्राह्य
अखन,अखनि,एखेन,अखनी
ठिमा,ठिना,ठमा
जेकर, तेकर
तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य)
ऐछ, अहि, ए।

2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।

6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।

19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा’ ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा “सुमन” ११/०८/७६

VIDEHA FOR NON-RESIDENT MAITHILS
8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS
8.1.Original poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Lucy Gracy from New York

DATE-LIST (year- 2009-10)

(१४१७ साल)

Marriage Days:

Nov.2009- 19, 22, 23, 27

May 2010- 28, 30

June 2010- 2, 3, 6, 7, 9, 13, 17, 18, 20, 21,23, 24, 25, 27, 28, 30

July 2010- 1, 8, 9, 14

Upanayana Days: June 2010- 21,22

Dviragaman Din:

November 2009- 18, 19, 23, 27, 29

December 2009- 2, 4, 6

Feb 2010- 15, 18, 19, 21, 22, 24, 25

March 2010- 1, 4, 5

Mundan Din:

November 2009- 18, 19, 23

December 2009- 3

Jan 2010- 18, 22

Feb 2010- 3, 15, 25, 26

March 2010- 3, 5

June 2010- 2, 21

July 2010- 1

FESTIVALS OF MITHILA

Mauna Panchami-12 July

Madhushravani-24 July

Nag Panchami-26 Jul

Raksha Bandhan-5 Aug

Krishnastami-13-14 Aug

Kushi Amavasya- 20 August

Hartalika Teej- 23 Aug

ChauthChandra-23 Aug

Karma Dharma Ekadashi-31 August

Indra Pooja Aarambh- 1 September

Anant Caturdashi- 3 Sep

Pitri Paksha begins- 5 Sep

Jimootavahan Vrata/ Jitia-11 Sep

Matri Navami- 13 Sep

Vishwakarma Pooja-17Sep

Kalashsthapan-19 Sep

Belnauti- 24 September

Mahastami- 26 Sep

Maha Navami – 27 September

Vijaya Dashami- 28 September

Kojagara- 3 Oct

Dhanteras- 15 Oct

Chaturdashi-27 Oct

Diyabati/Deepavali/Shyama Pooja-17 Oct

Annakoota/ Govardhana Pooja-18 Oct

Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-20 Oct

Chhathi- -24 Oct

Akshyay Navami- 27 Oct

Devotthan Ekadashi- 29 Oct

Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 2 Nov

Somvari Amavasya Vrata-16 Nov

Vivaha Panchami- 21 Nov

Ravi vrat arambh-22 Nov

Navanna Parvana-25 Nov

Naraknivaran chaturdashi-13 Jan

Makara/ Teela Sankranti-14 Jan

Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 20 Jan

Mahashivaratri-12 Feb

Fagua-28 Feb

Holi-1 Mar

Ram Navami-24 March

Mesha Sankranti-Satuani-14 April

Jurishital-15 April

Ravi Brat Ant-25 April

Akshaya Tritiya-16 May

Janaki Navami- 22 May

Vat Savitri-barasait-12 June

Ganga Dashhara-21 June

Hari Sayan Ekadashi- 21 Jul

Guru Poornima-25 JulOriginal poem in Maithili by Gajendra Thakur
Translated into English by Lucy Gracy from New York

Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed at http://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title “KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in

The Invisible Fence Of The Colours Of My Heart
The invisible fence of the colours of my heart
The collapsing walls of emotions
Pillars of rigidity standing firm
The granary of archived desires is full
Symbolising
The Himalayan wooden temple at home
Or the Tulasi tree at the passage
Only depicts good virtues
The borders of wells and high bank of ponds
The blue walls of the swimming pool
Making colour of water azure
The invisible fence of the colours of heart
Crumbling
The pillar of the rigidity stands
Flowing

१.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal’s all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions
२.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download,
३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads,
४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos
५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos

“विदेह”क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ।

६.विदेह मैथिली क्विज :

http://videhaquiz.blogspot.com/

७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर :

http://videha-aggregator.blogspot.com/

८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित :

http://madhubani-art.blogspot.com/

९.विदेहक पूर्व-रूप “भालसरिक गाछ” :

http://gajendrathakur.blogspot.com/

१०.विदेह इंडेक्स :

http://videha123.blogspot.com/

११.विदेह फाइल :

http://videha123.wordpress.com/

१२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग)

http://videha-sadeha.blogspot.com/

१३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा

http://videha-braille.blogspot.com/

१४.VIDEHA”IST MAITHILI FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE

http://videha-archive.blogspot.com/

१५. ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव

http://videha-pothi.blogspot.com/

१६. ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव

http://videha-audio.blogspot.com/

१७. ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव

http://videha-video.blogspot.com/

१८. ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला

http://videha-paintings-photos.blogspot.com/

१९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त)

http://maithilaurmithila.blogspot.com/

२०.श्रुति प्रकाशन

http://www.shruti-publication.com/

२१.विदेह- सोशल नेटवर्किंग साइट

http://videha.ning.com/

२२.http://groups.google.com/group/videha
२३.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/
२४.गजेन्द्र ठाकुर इडेoक्स

http://gajendrathakur123.blogspot.com

२५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइटhttp://videha123radio.wordpress.com/

२६. नेना भुटका

http://mangan-khabas.blogspot.com/

महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) ‘विदेह’ द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल जा’ रहल गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे।कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन)-लेखक गजेन्द्र ठाकुर Combined ISBN No.978-81-907729-7-6विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे ।

महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे।
नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA.
कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर

गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७
Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding:
Language:Maithili
६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india)
(add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)

For Libraries and overseas buyers $40 US (including postage)

The book is AVAILABLE FOR PDF DOWNLOAD AT

https://sites.google.com/a/videha.com/videha/

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(send M.O./DD/Cheque in favour of AJAY ARTS payable at DELHI.)
DISTRIBUTORS: AJAY ARTS, 4393/4A,

Ist Floor,Ansari Road,DARYAGANJ.

Delhi-110002 Ph.011-23288341, 09968170107

e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com
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विदेह: सदेह: 1: तिरहुता : देवनागरी
“विदेह” क २५म अंक १ जनवरी २००९, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिकाक पहिल २५ अंकक चुनल रचना सम्मिलित।

विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/
विदेह: वर्ष:2, मास:13, अंक:25 (विदेह:सदेह:1)
सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर
सहायक सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा
मुख्य पृष्ठ डिजाइन: विदेह:सदेह:1 ज्योति झा चौधरी
विदेह ई-पत्रिकाक साइटक डिजाइन मधूलिका चौधरी (बी.टेक, कम्प्यूटर साइंस), रश्मि प्रिया (बी.टेक, कम्प्यूटर साइंस) आ प्रीति झा ठाकुर द्वारा।
(विदेह ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ http://www.videha.co.in/ पर ई-प्रकाशित होइत अछि आ एकर सभटा पुरान अंक मिथिलाक्षर, देवनागरी आ ब्रेल वर्सनमे साइटक आर्काइवमे डाउनलोड लेल उपलब्ध रहैत अछि। विदेह ई-पत्रिका सदेह:1 अंक ई-पत्रिकाक पहिल 25 अंकक चुनल रचनाक संग पुस्तकाकार प्रकाशित कएल जा रहल अछि। विदेह:सदेह:2 जनवरी 2010 मे आएत ई-पत्रिकाक26 सँ 50म अंकक चुनल रचनाक संग।)
Tirhuta : 244 pages (A4 big magazine size)
विदेह: सदेह: 1: तिरहुता : मूल्य भा.रु.200/-
Devanagari 244 pages (A4 big magazine size)
विदेह: सदेह: 1: : देवनागरी : मूल्य भा. रु. 100/-
(add courier charges Rs.20/-per copy for Delhi/NCR and Rs.30/- per copy for outside Delhi)
BOTH VERSIONS ARE AVAILABLE FOR PDF DOWNLOAD AT

https://sites.google.com/a/videha.com/videha/

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(send M.O./DD/Cheque in favour of AJAY ARTS payable at DELHI.)
DISTRIBUTORS: AJAY ARTS, 4393/4A,
Ist Floor,Ansari Road,DARYAGANJ.
Delhi-110002 Ph.011-23288341, 09968170107
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e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com

“मिथिला दर्शन”

मैथिली द्विमासिक पत्रिका

अपन सब्सक्रिप्शन (भा.रु.288/- दू साल माने 12 अंक लेल
भारतमे आ ONE YEAR-(6 issues)-in Nepal INR 900/-, OVERSEAS- $25; TWO
YEAR(12 issues)- in Nepal INR Rs.1800/-, Overseas- US $50) “मिथिला
दर्शन”केँ देय डी.डी. द्वारा Mithila Darshan, A – 132, Lake Gardens,
Kolkata – 700 045 पतापर पठाऊ। डी.डी.क संग पत्र पठाऊ जाहिमे अपन पूर्ण
पता, टेलीफोन नं. आ ई-मेल संकेत अवश्य लिखू। प्रधान सम्पादक- नचिकेता।
कार्यकारी सम्पादक- रामलोचन ठाकुर। प्रतिष्ठाता
सम्पादक- प्रोफेसर प्रबोध नारायण सिंह आ डॉ. अणिमा सिंह। Coming
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अंतिका प्रकाशन की नवीनतम पुस्तक
सजिल्द

मीडिया, समाज, राजनीति और इतिहास

डिज़ास्टर : मीडिया एण्ड पॉलिटिक्स: पुण्य प्रसून वाजपेयी 2008 मूल्य रु. 200.00
राजनीति मेरी जान : पुण्य प्रसून वाजपेयी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.300.00
पालकालीन संस्कृति : मंजु कुमारी प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 225.00
स्त्री : संघर्ष और सृजन : श्रीधरम प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु.200.00
अथ निषाद कथा : भवदेव पाण्डेय प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु.180.00

उपन्यास

मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00

कहानी-संग्रह

रेल की बात : हरिमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु.125.00
छछिया भर छाछ : महेश कटारे प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 200.00
कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 200.00
शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00
पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00
नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00
आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 180.00
कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00
बडक़ू चाचा : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 195.00
भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00

कविता-संग्रह

या : शैलेय प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 160.00
जीना चाहता हूँ : भोलानाथ कुशवाहा प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 300.00
कब लौटेगा नदी के उस पार गया आदमी : भोलानाथ कुशवाहा प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु.225.00
लाल रिब्बन का फुलबा : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु.190.00
लूओं के बेहाल दिनों में : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 195.00
फैंटेसी : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.190.00
दु:खमय अराकचक्र : श्याम चैतन्य प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 190.00
कुर्आन कविताएँ : मनोज कुमार श्रीवास्तव प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 150.00
पेपरबैक संस्करण

उपन्यास

मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.100.00

कहानी-संग्रह

रेल की बात : हरिमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2007मूल्य रु. 70.00
छछिया भर छाछ : महेश कटारे प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 100.00
कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 100.00
शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00
पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00
नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00
आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 90.00
कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00
भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 90.00
मैथिली पोथी

विकास ओ अर्थतंत्र (विचार) : नरेन्द्र झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 250.00
संग समय के (कविता-संग्रह) : महाप्रकाश प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00
एक टा हेरायल दुनिया (कविता-संग्रह) : कृष्णमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 60.00
दकचल देबाल (कथा-संग्रह) : बलराम प्रकाशन वर्ष2000 मूल्य रु. 40.00
सम्बन्ध (कथा-संग्रह) : मानेश्वर मनुज प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु. 165.00 शीघ्र प्रकाश्य

आलोचना

इतिहास : संयोग और सार्थकता : सुरेन्द्र चौधरी
संपादक : उदयशंकर

हिंदी कहानी : रचना और परिस्थिति : सुरेन्द्र चौधरी
संपादक : उदयशंकर

साधारण की प्रतिज्ञा : अंधेरे से साक्षात्कार : सुरेन्द्र चौधरी
संपादक : उदयशंकर

बादल सरकार : जीवन और रंगमंच : अशोक भौमिक

बालकृष्ण भट्ïट और आधुनिक हिंदी आलोचना का आरंभ : अभिषेक रौशन

सामाजिक चिंतन

किसान और किसानी : अनिल चमडिय़ा

शिक्षक की डायरी : योगेन्द्र

उपन्यास

माइक्रोस्कोप : राजेन्द्र कुमार कनौजिया
पृथ्वीपुत्र : ललित अनुवाद : महाप्रकाश
मोड़ पर : धूमकेतु अनुवाद : स्वर्णा
मोलारूज़ : पियैर ला मूर अनुवाद : सुनीता जैन

कहानी-संग्रह

धूँधली यादें और सिसकते ज़ख्म : निसार अहमद
जगधर की प्रेम कथा : हरिओम

अंतिका, मैथिली त्रैमासिक,सम्पादक- अनलकांत
अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4,शालीमारगार्डन,एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023,
आजीवन सदस्यता शुल्क भा.रु.2100/-चेक/ ड्राफ्ट द्वारा “अंतिका प्रकाशन” क नाम सँ पठाऊ। दिल्लीक बाहरक चेक मे भा.रु. 30/- अतिरिक्त जोड़ू।
बया, हिन्दी छमाही पत्रिका,सम्पादक- गौरीनाथ
संपर्क- अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4,शालीमारगार्डन,एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023,
आजीवन सदस्यता शुल्क रु.5000/- चेक/ ड्राफ्ट/ मनीआर्डर द्वारा “ अंतिका प्रकाशन” के नाम भेजें। दिल्ली से बाहर के चेक में 30 रुपया अतिरिक्त जोड़ें।
पुस्तक मंगवाने के लिए मनीआर्डर/ चेक/ ड्राफ्ट अंतिका प्रकाशन के नाम से भेजें। दिल्ली से बाहर के एट पार बैंकिंग (at par banking) चेक के अलावा अन्य चेक एक हजार से कम का न भेजें। रु.200/- से ज्यादा की पुस्तकों पर डाक खर्च हमारा वहन करेंगे। रु.300/- से रु.500/- तक की पुस्तकों पर 10% की छूट, रु.500/- से ऊपर रु.1000/- तक 15%और उससे ज्यादा की किताबों पर 20%की छूट व्यक्तिगत खरीद पर दी जाएगी ।
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अंतिका प्रकाशन
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फोन : 0120-6475212
मोबाइल नं.9868380797,
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ई-मेल: antika1999@yahoo.co.in,
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१.पंचदेवोपासना-भूमि मिथिला- मौन
२.मैथिली भाषा-साहित्य (२०म शताब्दी)- प्रेमशंकर सिंह
३.गुंजन जीक राधा (गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित)- गंगेश गुंजन
४.बनैत-बिगड़ैत (कथा-गल्प संग्रह)-सुभाषचन्द्र यादवमूल्य: भा.रु.१००/-
५.कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते,महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन)- गजेन्द्र