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पंचसती – पंचउपसती- आशीष अनचिन्हार

In आशीष अनचिन्हार, पंचसती - पंचउपसती on May 3, 2009 at 1:00 am


इ कविता समस्त स्त्री लोकनिक स्वतंत्रता के समर्पित छैक। स्त्रीक अस्तित्व कतए छैक से विचार करबाक समय आब आबि गेल छैक। अंठेने कोनो काज नहि होइत छैक। स्त्री ( मैथिलानीक जय हो)। इ कविता दू खंड मे बाँटल गेल अछि। प्रत्येक खंड मे पाँच-पाँच गोट चरित्र लेल गेल अछि। त करू आस्सवादन एहि कविताक।
कविता
पंचसती – पंचउपसती
सती खंड


अहिल्या
सूनू गौतम
ओहि भोर जखन अहाँ
चल गेल छलहुँ स्नान करबाक लेल
आ आएल छलाह इन्द्र अहाकँ रूप धए
हमर देहक लेल
ओही क्षण बूझि गेल छलहुँ हम
इ इन्द्र छथि
मुदा इ मोने छैक
सूनू गौतम
हम भासि गेल रही
अहाँक नजरि मे
मुदा
इ अर्धसत्य थिकैक
सत्य त इ थिक
आत्माक सर्मपण आ देहक सर्मपण
दूनू फराक- फराक गप्प छैक
सूनू गौतम
हम आहाँके देहक सर्मपण नहि कए सकलहुँ
अहाँ पाथर बना सकैत छी फेर सँ
आब हमरा रामक पएरक कोनो मोह नहि
सूनू गौतम ध्यान सँ सूनू ॰

तारा
इ सत्य थिकैक सुग्रीव जे हम
बालिक कनियाँ छलहुँ

बालिक पश्चात अहाकँ
इहो सत्य छैक
जतबे हम
बालि सँ प्रेम प्रेम करैत छलियैक
ततबे अहुँ सँ करैत छी
मुदा ताहू सँ बेसी इ सत्य छैक
जे
अहाकव मृत्युक पश्चात
हम तेसरोक कनियाँ हेबैक
ओकरो ओतबे प्रेम करबैक जतेक
अहाँ सभ के केलहुँ करैत छी.

इहए चक्र चलैत रहत हमरा संग
त्रेतायुग
सतयुग
द्वापर
आ कलियुग
सभ युग मे ॰

मंदोदरी
राज्यक संग-संग
विजेताक
रनिवासक सेहो विस्तार होइत छैक
मुदा एकर इ अर्थ नहि जे हम
विभीषणक कनियाँ भए गेलियैक
हँ
एकर अर्थ जरूर भए सकैत छैक
जे
हमरा
अर्थात मंदोदरी के
ढ़ेप बनेबा मे कोनो कसरि बाँकी नहि छैक
जँ बाँकी होइक
त ओकरो स्वागत छैक हमरा दिस सँ
मुदा
तैओ हम विभीषणक कनियाँ
नहि भए सकैत छियैक
विभीषणक संग
संभोगरत रहितो ॰

कुंती
योनि हरदम योनि होइ छैक
चाहे ओ
अक्षत हो वा क्षत
लिंग लग इ ज्ञात करबाक कोनो
साधन नहि छैक जे
योनिक की अवस्था छैक
इ त पुरुषक मोन छैक
जे
योनि के क्षत-अक्षतक खाम्ह मे बान्हि
स्त्री के गुलाम बना लेलकै
कर्ण के त्याग करैत काल मे हमरा लग
लोक लाज छल
मुदा आब नहि
संतान हरदम संतान होइत छैक
चाहे ओ कुमारिक होइक वा बिआहलक
आब लोक लाज भय सँ मुक्त छी हम
मने कुंती
अर्थात
कर्ण आ पांडवक माए
५द्रौपदी

जखन कोनो जीवक
जिनगी
पंचतत्व सँ बनि सकैत छैक
त हमर सोहाग
पंचपति सँ किएक नहि ?
उपसती-खंड

सीता
राम विश्वामित्रक संग मिथिला अएलाह। धनुष तोरलाह। हमरा संग बिआह कएलाह।
अयोध्या जा निर्वासित भेलाह। हमहू संग धेलिअन्हि। हमर अपहरण भेल। हम अग्नि-परीक्षा
देलहुँ(अनावश्यक रुपेँ)। अयोध्या अएलहुँ। पुनः हमर निर्वासन भेल ( मजबूरीवश)। धरती फाटल,
हम असमय प्राण त्यागलहुँ।
ने त आब मिथिला अछि ने अयोध्या आ ने रामे । मुदा हम अदौ सँ निर्वासित होइत रहलहुँ । अग्नि-परीक्षा दैत रहलहुँ आ धरती मे घुसि जाइत रहलहुँ। केखनो अनावशयक रुपेँ केखनो मजबूरीवश।॰

अनूसूया
नाम थिक हमर अनूसूया
मुदा
एकटा गप्प सँ हमरा असूया होइत रहल
आर्यगण शूद्र स्त्री पर
किएक मोहित होइत रहलाह
घरक स्त्री उपेक्षित
रक्त-शुद्धताक तराजू बनल बैसल
इ बड्ड बादक गप्प थिक जे
आर्य ललना अपन स्त्रीतत्वक
रक्षाक लेल
शूद्र पुरुषक सहारा लेलथि
मुदाहाय रे हमर कपार
हम
महासती त बनि गेलहुँ
मुद स्त्री नहि ॰

दमयंती
जंगल मे नल हमरा छोड़ि
पड़ा गेलाह
इ कोनो बड़का गप्प नहि
जखन ओ नाङट रहथि
हम अपन नूआ फाड़ि
हुनक गुप्तांग झाँपल
मुदा इहो कोनो बड़का गप्प नहि
बड़का गप्प त इ छैक जे की
मात्र पुरुषे स्त्रीक इज्जतक रक्षा कए सकैत अछि
स्त्री पुरुषक नहि
जँ नहि
त हम कोना केलियैक ?

राधा
अच्छर-कटुआ हमरा
कृष्णक घरवाली बुझैए
साक्षर कुमारि
आ हम राधा
एहि बिआहल आ कुमारि दूनूक अवरुद्ध धारा मे
फसँल
एकटा नारि मुदा अबला नहि
कलियुग जँ कहिओ कदाचित् मुक्त संभोग व्यवहार मे हेतैक
सादर हम स्वागत लेल तैआर रहबै
ओनाहुतो इ जरुरी नहि छैक जे
बिआहक बादे संभोग कएल जाए
आ ने इ जरुरी छैक जे संभोगक बाद बिआह कएल जाए
बिआह आ संभोग मे की संबंध छैक से
विवेचना मिमांसक करताह
मुदा एतबा कहबा मे कोनो संकोच नहि
जकरा संग मोन नहि मानैत हो
ओकरा संगक संभोग
बलात्कार सँ कम नहि ॰

गांधारी
हमरा एक सए एक पुत्र छल
अर्थात
लोकक नजरि मे
हमर पति हमरा संग
एक सए एक बेर संभोग कएने हेताह
मुदा हम जनैत छी
ओ संभोग नहि
बलात्कार छल
एहन बलात्कार जाहि मे ने त
स्त्री चिचिआ सकैत अछि
आ ने केकरो कहि सकैत अछि
सुनिगबाक अतिरिक्त
लोक हमरा सती बुझैए एहि लेल
आनहर पतिक संग बनि गेलहुँ आन्हर
मुदा
पट्टी बान्हल हमर आँखि मे
अबैत रहल कतेक रास सपना
इ केओ कोना देखत ?

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