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मनभरनि डूबि मरलैए-रूपेश कुमार झा ‘त्योंथ’

In मनभरनि डूबि मरलैए, रूपेश कुमार झा 'त्योंथ' on September 16, 2009 at 6:20 pm

दू दिन पर अयलहुं
मधुबनी सं गाम त’ देखै छी-
आइ गाम लगैछ
सुन्न-मसान
नहि क्यो अछि कतौ
भम्म पडैछ सभक दलान
कखनो काल क’ सुनय मे अबैछ
कुकुरक कटाउझ
छोट हड्डी टुकडी लेल
सभ अछि हरान
दाइ-माइक सेहो पता नहि
लगैछ गाम आइ मरघट समान
कखनो काल क’ सुनय मे अबैछ
कनिया-मनियाक फुसफुसायब
कोनो विषय पर कनफुसकी
सीमा तोडि भेल हल्ला
सुनि हल्ला भेल झ’ड़ कान
कतय गेलाह पुरूष ओ
दाइ-माइ , नेना-भुटका
कोना बुझब जे भेलैछ की ?
हम भेलहुँ फिरेसान
नजरि पडिते एकटा नेना पर
पुछलियै की भेलैए ?
मनभरनि डूबि मरलैए
कहलक ओ अबोध जान
सुनीते पड़ऐलहुं पोखरि दिस
पहुँचलहुं ओतहि, जतय
लोकक लागल छल करमान
देखि लागल हमरा ठक-बक
भीड़क बीचो-बीच राखल
मनभरनिक देह बेजान
मायक रूदन ओ तड़पब
देखल नहि गेल हमरा
मुदा बाप भेल छल कठोर
लगै छल जेना मरल हो क्यो आन
किएक ने लगै ?
भेल छलैक बेटी गराक घेघ
सर्वगुण संपन्न रहितो
नहि होइत छलैक बियाह
द’ सकै छल ने ओ मोटगर दहेज़
नहि छलैक ओकरा नगदी-नरायन
द्वारे-द्वारे क’ल जोडैत
थाकि गेल छल ओ
कएक थम त’ सहय पडैक अपमान
बेटी कें देखल नहि गेलैक
बापक फिरेसानी
गेल दुनिया सं निश्चिंत क’ बाप कें
अपने हाथे तेजि प्राण


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