चिकड़ि रहल अछि शब्द आबि क’
निन्न पड़ल निश्बद्द राति मे।
अछि उदंड, उत्श्रृखल सबटा
नहि बूझत किछु बात राति मे।
केना करु हम बंद कान के
उतरि जाइत अछि हृदय वेदना।
बैसि जाइत छी तैं किछु लिखय
छीटल शब्द हमर अछि सेना।
कखनो कोरा मे घुसिया क’
बना लैत अछि कविता अपने
जुड़ल जाइत अछि क्लांत हृदय मे
शब्द शब्द के हाथ पकड़ने।
कविता मे किछु हमर शब्द के
नहि व्याकरणक ज्ञान बोध छै।
सबटा नग्न, उघार रौद मे
नेन्ना सन बैसल अबोध छै।
कखनो शब्द आबि क’ अपने
जड़ा दैत अछि प्रखर अग्नि मे।
कखनो स्नेह,सुरभि,शीतलता
जगा दैत अछि व्यग्र मोन मे।
क्षमा करब जौ कष्ट हुए त’
पढ़ि क’ कविता शब्दक वाणी।
शब्द ब्रह्म अछि नहि अछि दोषी
छी हमही किछु कवि अज्ञानी।
