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कथा- कालरात्रिश्च दारुणा- साकेतानन्द.

In कालरात्रिश्च दारुणा, साकेतानन्द. on April 27, 2009 at 3:50 pm

की कहैत रही..? छोडू घरक माया_मोह…भागि चलू…?” हुनकर स्वर मे प्राण_भय भरल रहनि. ओह, तखनि तक तक तबौअनिक ट्रैक्टरो चलिते रहै…जरलाहा के अक्किल पर पाथर पडि गेल रहय…ओ सिसकलागल रहथि. आब पछताइये ककी हैत..? हे एना कानू नंई ! मोन आर घबडा जाइ छै.

कानू नंइ तकी करू यौ ? घर देने धार बहैयै…अहां कहै छी कानू नंहि ?” बंटू झाक हाथ मे एकटा हरवाही पैना रहनि. दू टा जोडल चौंकी, जाहि पर दुनू गोटे बैसल छला, तै पर सहाथ लटका कपैना पानि मे देलखिन ! कत्तौ नंहि ठेकलनि. सांझ सडेढ फीट बढि गेलै! निचला चौंकी बुझू डूबि गेल !” ” दैब हौ दैब ! आब हम कोन उपाय करबै ?” ओ विलाप करलगै छथि. घौना करैत बांधक ठीकेदार, इंजीनियर के सरापलगै छथिन. बंटूझा नंहि रोकै छथिन. रोकैक आब एकदम इच्छा नंहि छनि.हुनकर पत्नी; बरसाम बालीक घौना आ अई कोठली, ओई कोठली देने बहैत कोसीक कलकल, एकटा अद्भुत स्वर_ श्रृष्टि करहल छलै. जंजंसांझ गहराय लागल छलै___तौं_तौं कोसीक हाहाकार बढलागल छलै. एत्ते तक जे बगल मे बैसल पत्नी सआब चिकडि क़गप्पकरपडै छलनि. ओ कानिये रहल छली__ ” कत्तपडेलें रे ठीकेदरबा सब ? कत्तहौ सरकार साहेब ? बान्ह तोडबाक छलौ तकहितें ने रे डकूबा सब…पडा कचल जैतौं डिल्ली ! अपन बौआ लग चल जैतौं…कहिते किने रे … आब के बचेलकै हमरा सब के रौ दैब ?” ओ बच्चा सब जेकां भोकाडि पाडि ककानलागल रहथि. आइ तेसर राति छियै… आब की हेतै रौ दैब !” ” हे, कहने रही ने, कनै छी तमोन सुन्न भजाइये.” ” कियैक ने भागि कवीरपुर चल गेलौं, किछु छियै तशहर छियै; ओइ ठाम सकत्तौ भागि सकै छलौं…माथपर कोन गिरगिटिया सवार भगेल रहय यौ…गाम सकैक बेर ट्रैक्टर गेलै.हुनका ई नहि बूझल छलनि जे वीरपुर आब वैह रहलै ? ओ आब सुन्न, मसान, भकोभन्न भगेल छै. ओहि ठाम भरि छाती पानि बहि रहल छै. सब किछु के उपर देने, सब किछु के चपोडंड करैत कोसी बहि रहल छै. ओत्तुक्का लोक ? ओत्ते टा कस्बाक ओत्ते लोक कतगेलै ? कतगेल हेतै लोक सब हौ भोलेनाथ ? बंटूझा के किछु नहि बूझल छनि, किछु नहि. लोक तबेर पडला पर चिडैयो सबेसी उडान भरि सकैये…मखानक लाबा जकां छिडिया सकैये, देश्_विदेश पडा सकैत अछि.वीरपुर मे आब ध्वंस हेबाक प्रक्रिया मे सब किछु छै.
अही बीच लक्ष केलखिन तपत्नीक कपसनाइ बन्द बुझेलनि. शाइत सुति रहली की…जं सूति रहल होथि..तहुनका नल राज जकां छोडि कगेल हेतनि ? छिः छिः की सोचि रहल छथि ? मुदा बात मोन मे घुमडैत रहै छनि जे ई नंहि रहितथि तबंटूझा के पडाइक कैक टा बाट रहनि. अगल_बगलक कैकटा उंच स्थान सब मोन पडलनि…नेपाले भागि जैतथि. डेढ_दू किलोमीटर दूर परहक कैक टा ऊंच डीह सब मोनमे चमकि उठलनि. असकर रहितथि तकैक टा उपाय रहै… तैं तीन दिन सयैह चौंकी भरि सुखायल स्थान पर लटकल छथि दुनू व्यक्ति ! सत्ते माया चंडाल होई छै. मुदा ककरो की पता रहै जे एत्ते भरबा कऊंच पर बनल घरक ई गति हेतै ! हे एकरा क्यो बाढिक पानि नहि कहै जेबै कहियो, ई प्रलयक प्रबल प्रवाह छियै, बलौं सबान्हल बान्ह तोडि कनिकलल पानि छियै कोसिक, सब के रिद्द_छिद्द कइयेकछोडतै, बेरबाद कदेतै सबके, अइ बेर नहि छोडतै. बंटूझा के साफ
लागि रहल छलै जे कोसी अइ बेर नहि मानतै, बदला लइयेकरहतै .
सुनै छियै, कत्ती राति भेल हतै ? भूख नहि लागल अछि ?” ”लागल तअछि, देब खाइलय ?” हुनकर स्वर खौंझायल रहनि, जेना चैलेंज करहल होथिन. कने जसाहस करी, भंसाघरक ताख पर चाउरक टिन धैल छै, ताख डूबल छै की ?” ”ओह, चुप रहूने, जँ नहियो डूबल छै तभंसाघर गेल हेतै, अइ अन्हार रातिमे जखन घर देने कोसी बहि रहल हो…” ”घर कहाँ रहलै यौ, अपन घर देने तकोसी बहैये आब.” ”बीच नदी मे यै ?” ”हँ यौ, नदीक गुंगुएनाइ नहि सुनै छियै ?” ”सब सुनै छियै, तखन कहै छी जाइ लए ?” ”चाउरक टिन जनहि आनब… आइ तेसर दिन छियै. टिन टा आबि जाय ने कोनो तरहे, दैब हौ दैब !
वेगो बढल जा रहल छै… एहन ठोसगर पक्को घर के तोडि सकयै कोसी ?” ”किछु घंटा लगतै ओकरा, डीह पर घर नहि सौ दू सै ट्रक राबिश पडल रहत.ई कहि ओ चुप भगेला. दुनू वेकती बडी काल तक चुप छला. अच्छा, नहि आनब तखायब की ?”
अहीं उतरू ने.” ”नै हौ बाप, वेग देखै छियै ? हम तएक्के डेग मे लटपटा_सटपटा कचपोडंड…. देखियौ, दरबज्जे_दरबज्जे, कोठलिये_कोठलिये कोना खलखला कबहि रहल छै !” ”नै उतरब तदुनु गोटे भूखे मरब!” ”मरि जायब, अही कोसी मे भांसि जायब! भांसि ककोपरिया कुर्सेला मे लहास लागत…गिध्ध_कौआ खायत!!
ओह, चुप रहू ने!बंटूझा बडी कालक बाद चौंकी आ छतक बीच हवा के संबोधित करैत बजला_” आइ तेसर दिन छियै ! आइ तक पटनां_डिल्ली के हमरा सबहक सुधि नहि एलै ?”
अहूं तहद करै छी…अहि बोह मे बौआ अबिते हमरा सबके बचबैलय ?” हुनका दिल्ली सुनिते अपन बेटा टा मोन पडै छनि, आर किछु नहि.सत्ते, हुनका लोकनि सनक हजार_दस हजार नहि लाखों लोक, आइ तीन__दिन सफंसल अछि, एकर खबरि ककरो नहि लगलैयै ? एहनो कत्तौ होई ? ओ जेना पत्नीक बात नहि सुनने होथि, भोर मे आंटा सानि कओकर गोली खेने रहथि. आइ, तेसर बेर राति गहरा रहल छनि. हिनका दुनू व्यक्तिक अतिरिक्त कोनो चिडियो_चुनमुनीक आवाज़ कहां सुनै छियै ? एखन तकुसहा मे बान्ह तोडि कबहैत कोसियेक आवाज़ छै चारू भर…बान्ह, छहर, नहर, सडक, रेल, गाछी_बिरछी के मटियामेट करबाक स्वर ! सब किछु के ध्वस्त करबाक घुमडल मौन स्वर__गडर_गडर_गडर…ह’..हहा_हहा_हहा; विजयिनी कोसीक अट्टहास सहिनका दुनूक कान तीन दिन तीन राति सबहीर भेल छनि ! मोबाइल. इंटरनेटक युगमे तीन दिन बीत गेल आ क्यो सुधि लै बला नंहि ? ….. काल्हि तक तदुनू व्यक्ति छत पर चादरि टांगि रहथि . जखन सोपाने बरिसलगलनि, आ ओत्ते मेहनति सउपर आनल सब वस्तु जात भीजलगलनि; अपनो दुनू गोटे सनगिद्द भगेला तभगि ककोठली मे एला तअपन कोठरी मे भरि जांघ रहनि.. चौंकिक ऊपर चौंकी धयलनि; तखन सओही पर बैसल छथि. आब तनिचला चौंकी डूबलागल छलनि ! दैब रौ दैब ! काल्हि मंचेनमाक नाव के की हाल भेलै हौ दैब…सत्तरि अस्सी गोटे, बाले बच्चा व्मिला कहेतै, नाव पलटिते कोना हाक्रोश करैत बेरा_बेरी डुबैत….हौ दैब, कोना हाथ उठाउठा जान बचेबाक गोहारि करैत रहै यौ ! पुक्का फाडि क नेना सब जेकां कानलगली. पानिक हहास मे हुनकर रुदन बडा भयौन लगैत रहै. जुनि मोन पाडू यै… असहाय लोकके डुबबाक दृष्य नहि मोन पाडू !” ”मोन होति रहय ओत्तेटा कोनो रस्सा रहिते की आने कोनो ओत्तेटा वस्तु__फेक दितियै…मुदा किछु नहि कभेल… ओत्ते लोक चल गेलै आ जा रहल छै, से छै ककरो परवाहि…बज्जर खसतौ रे पपियाहा सरकार बज्जर !” ”यै ई कयैक ने सोचै छी जे हमरा सब जीविते छी, जं मंचेनमाक नाव पर हमरो सब चढि गेल रहितौं तआइ कोन गति भेल रहिते ? अपना सब नहि चढलहुं तप्राण बांचि गेल ने !” ”देखैत रहियै, लोक कोना छटपटाइत रहै…? छत पर सस्पष्ट देखाइ पडैत रहै!” ”सब टा देखैत रहियै ! बगल मे चुनौटी हैत दिय’ !” ”कत्ते खैनी खायब ?” ”भूख लागल यै.” ”तैं तकहैत रही… कनी साहस करू. भंसाघर मे घुसिते, सामने ताख पर चाउरक टिन छै; बगल मे नोनो छै.” ”अहां आयब पीठ पर ?” ”नै यौ, हमरा बड डर लगैये. हे ओ भीतर बला चौकठि के देखियौ त’… देवाल छोडने जाइ छै ?” ”हँ यै बरसामबाली! ई तदेवाल छोडि देलक.” ”आब घर खसतै की यौ ?” ..चुप्पी, संगहिं नदीक हहास! पानि मे कोनो जीव के कुदबाक छपाक ध्वनि ! ने तसगरे पसरल पानि… तै पर अन्धकार. किछु बजै कियैक ने छी ? सुनू , आब हमरो बड्ड भूख लागि गेल अछि…” ”देखै छियै, करेंट सआब चौंकीक पौआ सब दलकै छै; एखनो हम चाउरक टिन आनि सकैत छी. आयब हमर पीठ पर, उतरी हम ?” फेर चुप्पी. दुनू चुप छथि. बीच मे वैह अलगटेंट हरजाइ बाजि रहल अछि__कोसी बाजि नहि डिकरि रहल अछि !
ठीक छै, हम उतरै छी…आब जे हुए, आब नहि सहल जाइये…!” ”नै यौ! हम अहांके ऐ अन्हार राति मे पानि मे नहि पैसदेब. सांझ मे ओ सांप के देखने रहियै…मोन अछि कि नहि ?” ”ओ एत्तै हेतै ? नहि हम उतरै छी, किछु भेल हुए, आखिर अपने घर ने छियै यै ?” ”उतरबै ?”कहि बरसामबाली कनी काल चुप भजाइ छथि; फेर कहै छथिन__”बुझलौं यौ, मोन होइयै गरम_गरम चाह पिबितौं; एकदम भफाइत.” “अच्छा, कत्ते राति भेल हेतै ?” ”देवाल पर घडी तलटकले छै, देखियौ ने.” ”एंह, ओहो साला बन्द भ गेल छै.” ”ठहरू, कने पानि के देखियै ! अरौ तोरी के, निचला चौंकी तडूबल बरसामबाली.” ”हे यौ, कने एम्हर आउ, हमरा डर लागि रहल अछि. हमरा लग आउ ने.” ”छीहे त’ ?” ”नै हमर लग आउ सब चिंता_फिकिर बिसरि कदुनू गोटे सूति रही. जे हेतै से परात देखल जेतै.!” ”भने कहै छी, दलकैत चौंकी आ भसकैत घर मे निश्चिंत भसुतै लए कहै छी…नीचा कोसी बहि रहल अछि ! भने कहैत छी.” ”खिडकी सदेखियौ, भोरुकवा उगलै ? घडियो जरलाहा के बन्द भगेलै….” ”कथी लए कचकचाइ छी, ई कालरात्रि छियै, अइ मे क्यो ने बचत…” ”ठीके कहै छियै यौ; ऐ बेर क्यो ने बचतै.” ”मारू गोली. जत्ते बजबाक हेतै, बाजल हेतै. सुनै छियै?सुति रहलियै ?” ”धुर जो, एहन परलय मे पल लगतै ? हम कहैत रही डिल्ली ठीक छै ने ? ओकरा खबरि भेल हेतै ? ओत्तबौआ अंगुनाइत हेतै…हे अइ बेर नहि अनठबियौ, अगिला सुद्ध मे करा दियौ. नहि करब आड्वाल; नहि गनायब. मुदा पुतहु चाही हमरा पढलि_लिखलि. एकदम स्मार्ट, अपन बौए जेकां.बंटूझा के लगलनि जे एहन समय आ ताहि मे बियाहक गप, जरूर हिनकर दिमाग भांसि रहल छनि. कल्हुका भोर देखती की नहि तकर ठेकाने ने, चलली है बेटाक बियाह नेयार करै लए.मुदा बरसामबालीक तटाइम पास रहनि__बेटाक बियाहक प्लैन बनायब. हुनको मोन भेलनि जे ओ कथाक मादे कहथिन जे हाले मे यार अनने रहथिन. मुदा ओ चौंकी आ छतक दूरी के एकटक देखैत रहला. पानिक स्वर हुनकर कान के बहीर बना रहल छलनित तमाथ मे कोनो धुंध, कोनो धुआं सन भरल बुझाइ छलनि. बरसामबालीक बुद्धि ठीके भांसि गेल छलनि, नहि तएहन मे बेटाक बियाहक नेयार करब !से चाहे जे हुए, पुतहु हमरा सुन्नरि आ पढल चाही.” ”अहां के बड्ड भूख लागि रहल अछि की ?” ”हं यौ !” ”सुनू, अहां घबडायब नहि ! हम यैह चाउरक टिन नेने अबै छी ! नै जाउ यौ…नै उतरू यौ…नै जाउ यौ !बरसामबाली अनघोल करिते रहली, जाबे तक हुनकर मुंह मे गर्दा नहि उडियाय लगलनि. मुदा बंटूझा फेर कोनो उतारा नहि देलखिन. 

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