सृजन- दोसर खेप…………
मोन मे उतरल कहाँ अछि
किछु अभिप्सा काम बोधक।
अछि हृदय मे आइ हमरो
कामना मातृत्व बोधक।
बुन्द जे ठहरल उतरि क’
जीव मे जौं होइत परिणत।
अपन देहक रक्त, मज्जा
दैत रहितहुँ दान मे नित।
स्नेह सँ गर्भस्थ शिशु कँे
धर्म मानवता सिखबितहुँ।
स्त्राी जातिक एहि जगत मे
मान राखब , नित पढ़बितहुँ।
अछि जगत मे पूज्य नारी
देवता के बाद दोसर।
कष्ट सँ जीवन बुनै अछि
गर्भ मे निज राखि भीतर।
किछु सजावट लय बनल
अछि वस्तु नारी नहि जगत मे।
नहि करब अपमान कहियो
बनि पुरुष दंभी अहं मे।
अंक मे नवजात शिशु कँे
दूध स्तन सँ पिया क’।
पूर्ण मानव हम बनबितहुँ
झाँपि आँचर मे जिया क’।
होइत तखने जन्म हमरो
किछु सफल परिपूर्ण जीवन।
जौं सृजन नहि भेल तन सँ
व्यर्थ अछि अभिशप्त जीवन।
छै केहन मोनक अभिप्सा
लालसा जग मे सृजन कँे।
दैत छै के धैर्य एकरा
नहि बुझै छै कष्ट तन केँ।
छथि अचंभित देवतो गण
देखि नारी के समर्पण ।
जी रहल जीवन बिसरि क’
गर्भ के रक्षा मे सदिखन।
गर्भ मे नौ मास रखने
अडिग बैसल असह् दुख मे।
द’ रहल छथि अन्न भोजन
देह सँ निज मातृ सुख मे।
हर्ष मे अछि मग्न ममता ।
छै तपस्या पुत्रा स्नेहक।
साधना मे लीन अछि ओ ।
छै केहन हठयोग देहक।
अंत क्षण साक्षी विधाता !
मोन मुर्छित, दर्द तन मे।
वेदना सँ प्राण व्याकुल
अछि केहन पीड़ा सृजन मे।
सुनि अपन नवजात शिशु के
ओ पहिल अनमोल क्रंदन।
धन्य ममता ! दुख बिसरि क’
हँसि उठै छै फेर तन मन।
अंकुरित ओ बीज कहियो
भ’ उठै छै गाछ भारी।
छाँह ममता के बनै छै,
प्राण के आधाार नारी।
अंतिम भाग पुनः दोसर बेर….…..
