कविता
हे हमर प्रेयसी
जहिना
फूल झहरि-झहरि खसैत अछि
माटि पर
ओकरा सजबए लेल
मेघ हहरि-हहरि
बुन्नी बनि जाइत छैक
फसिलक लेल
सुगंध उड़ि-उड़ि
बसात मे मीलि जाइत छैक
ओकर सौन्दर्यक लेल
तहिना
हे हमर प्रेयसी, हे हमर सोन
आउ
हम दूनू मीलि जाइ
एक दोसरा मे
नव जिनगी , नव चेतनाक
लेल
