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संस्कार

In मधुबनी,सतीश चंद्र झा on अक्टोबर 16, 2009 at 11:36 बिहान

संस्कार

नहि जानि कतय ई जीवन के
ल’ जायत नवका संस्कार।
भ’ रहल जतेक उन्नति लोकक
भ’ रहल ह्ास ओतबे विचार।

आगत केर सपना मे जागल
बीतल जीवन छथि बिसरि गेल।
ई देश प्रांत मानव समाज
सबसँ छथि बंधन मुक्त भेल।

अपने गृहणी दू टा बच्चा
परिवारक जीवन पूर्ण भेल।
सुख दुख जे भोगथु बृद्ध पिता
ममता केर सेवा व्यर्थ भेल।

निज स्वार्थ जीवनक परिभाषा
सुख भोग जीवनक सत्य धर्म।
छथि पढ़ा रहल अपने शिशु के
परहित जग मे अछि अशुभ कर्म।

धन बल जीवन कें परम लक्ष्य
परिजन पुरजन सँ अनचिन्हार।
ई अंध दौड़ अछि केहन जतय
परलोक मोक्ष सबटा बेकार।

स्वध्याय,ज्ञान,तप,अनुशासन
गीता पुराण सब भेल व्यर्थ।
अछि बात व्यथा के कोना आइ
सबसँ सम्मानित बनल अर्थ।

चेतू आबो किछु करू ऐहन
इतिहास अपन स्थान देत।
अनको लए किछु जँ सोचि लेब
सगरो समाज सम्मान देत।

नहि त’ सभ मोन पड़त जहिया
आयत जीवन के अंत पहर।
ओ गाम घर सभ अपन आन
रहि – रहि करेज मे देत लहर।

हम सत्य कहै छी जीवन मे
दुख के कारण अछि ई निजता।
अछि जतेक धर्म जग मे एखनो
सबसँ महान अछि मानवता।

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